प्रेम के सुभाव

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– रामदेव शुक्ल

मीतू हम दूनू जने उहाँ पहुंचि गइल बानी जाँ, जहाँ से लवटले के कवनो राहि नइखे बँचल। अगहीं बढ़े के बा, चाहे एहर बढ़ि चलल जा, चाहे ओहर। बोलऽ कवने ओर चलल जाव?

मीता के लिलार चमकि उठल। कहली- ”तहार कहल आ हमार सूनल, ई कबसे हो रहल बा? बाकि एक बात पक्का बा कि हमार मतारी हमके जवन मंतर दिहले बाड़ी, ओकरा से हटि के हम कवनियो राह नाहीं धरबि। देबू कहलें- ऊ कवन मंतर हऽ?“। हमार माई कहलस- ”ए बेटी बिना परेम के बियाह सबसे बड़का पाप।“ हम पुछनीं- ”माई, ई हमसे काहें कहत बाड़ू? माई एक चुप्प तऽ सौ चुप्प।“ कुछ दिन बीति गइल तब एक बेर हम बाति के घुमा के पुछनीं- ”तहार बियाह के करावल? माई फेरू चुप। हम पुछनीं- अगुवा के रहल?“ माई के मौन टूटल- ई कुलि जानि के का करबू? हमन के जनमते इहे घुट्टी पियावल जा कि बेटी आन के घरे के बासन हई। जेतना जल्दी माई बाप के घर से अपने घरे पहुँचि जासु, ओतने नीमन। अब ई मति पूछऽ कि लइकी के आपन घर कहाँ बा? जँहवाँ मतारी बाप डोली में बइठा के भेजि दें, ऊ घर बेटी के आपन भइल। हम पुछनीं- ”मतारी बाप कइसे जानें कि लइकिया के कहाँ भेजे के बा? माई बतवली कि नाऊ बारी बाभन, उपरोहित केहू बता दे कि फलाना गाँव में फलाना अदिमी के होनिहरगर बा। बेटी के बाप भाई भतीजा के साथे जाके लइका देखि आवे। दर दहेज, दिन बार धरा जाव। तब लइकनी का केहू से जानकारी मिले कि तहार बियाह फलाने दिन के होई। बेटी के हिम्मति नाहीं रहे कि मुँह खोलें। एतना लइकई में बियाह होखे कि कुछु बुझइबे नाहीं करे। केतना जनी ससुरा जाके नइहर कबो लवटबो नाहीं करें। कहत कहत माई के कंठ गहबर हो गइल।“

ना जाने केतना लइकी के दुखदरद माई की कंठ से रोवाई बनि के फूटत रहल आ आँखी से बहत रहल। बहुत मनवले पोल्हवले की बाद माई चुपाइल। अगिले दिने हमसे कहलसि अब जमाना बदलि गइल बा। लइकी पढ़त लिखत बाड़ी। बालिग भइले पर बियाह के बाति चलति बा। बाकि अबहिनो बियाह खोजल आ पक्का कइल बेटी के बाप-भाई-नातहित के हाथ में बा।

बोलत बोलत माई चुपा गइलि। एह बेर हम ओकरे आँखी में आँखि डारि के पुछनीं- ”तें अपने बियाह से सुखी नाहीं भइले। बाबूजी से प्रेम नाहीं कइले? उनसे प्रेम नाहीं करेले?“
माई कहलसि- ”सुखी भइनीं। अब्बो सुखी बानीं। तोहार बाबूजी से हमके का नाही मिलल? धन दउलत, मान मरजाद, बेटा बेटी का नाहीं मिलल? उनके एइसन पति पाके कौनो दुख कइसे होई?“
हम कहनीं- ”तब काहें कहत बाड़े कि बिना प्रेम के बियाह पाप हऽ?“
माई मुसुकइली। कहली- ”हम तहनपाच खातिर कहत बानीं। नवका जबाना बा। पढ़त लिखत बाड़ू। नोकरी चकरी करबू त बियाह की मामला में पुरनका चाल कइसे चलबू? तहरी साथे पढ़े वाली लइकी लोग बियाह के बारे में का सोचेली, जनते होखबू। एही से कहनी हँऽ कि सोचि बूझि के चलिहऽ। तहार बाबूजी बहुत दिन से तहरी लायक लइका खोजि रहल बानें। हमसे कुछ कहेलें नाहीं, बाकिर भितरे फिकिर में घुलत रहेलें।
हम अचक्के पुछि परनीं- तें लइकई में केहू से परेम कइले रहले?“
माई हँसि के कहलसि- ”हमन के बियाह प्रेम कइले की उमिर में नाहीं भइल, पुतरी खेले वाली उमिर में भइल। हमार माई बतावे कि हम त माड़ों में सूति के ढिमिला गइनीं, मेहरारू उठाके बइठवली सँ। तब सेनुरदान भइल।“
मीता के बात सुनि के देबू कहलें- ”तहरी माई के मंतर सबकी जिनगी के मंतर होखे के चाहीं। आ हमरे तहरे जिनगी के मंतर त ई बटले बा। बाकि….।“
”बाकि का? मंतर बा त बाऽ। न पाछे लवटले के न जगह बा, न पाछा लवटले क जरूरत बा। आगे बढ़ऽ।“ मीता देबू के ललकरली।
देबू कहलें- ”एतना सोझ राहि नइखे मीता। तहार बाबूजी के जिनगी के सवाल बा।“
मीता झमकि के बोलि परली- ”उनके जिनगी के सवाल ओहर बा, त हमरे तहरे दूगो जिनगी के सवाल एहर बा। एगो जिनगी बचावे खातिर दूगो के आगी में काहें झोंकि दीहल जाव?“
”अबहिन किरोध में बाड़ू। एह् आगी से बहरा निकड़ि के सोचबू त समुझि जइबू कि हमरे तहरे आ बाबूजी के सोच में का फरक बा। बाबूजी के न एतना मानसिक विकास भइल बा आ न एतनी पढ़ाई लिखाई के सुविधा मिलल बा। उनके सोच ओइसने बा। जइसन उनके बाबूजी के रहल आ उनकऽ आजा परपाजा के रहल। ओह लोगन के विकास ईहे मानल जाई कि जनमते लइकनी के मुवा दिहले के अपराध मानल लोग। अब के धनीमानी माई बाप व गरभवे में बेटी के मरवा देत बा।“
मीता गहिर साँस छोड़ली। कहली- ”अपने जिनगी के डोर अपने हाथ में न रहे, एइसन जियले से अच्छा त ऊहे रहल कि जियहीं ना दीहल जाव।“
”बस करऽ मीता। जिनगी से बड़हन, जिनगी से अनमोल कवनो चीज नाहीं बा। जिनगी बाचल रही त केतनों ऊँच उड़ान भरल जा सकेले। रहल बात एह समय के त हमन के का करे के चाहीं? हम चाहत बानीं, एक बेर तहरी माई से बतियावल। उनसे बतियवले की बाद कुछ फरियाई।“ कहि के देबू मीता के अँखिये से दुलारि दिहलें। कहलें- ”माई से पूछि के बतइहऽ कि
कहाँ हमसे भेंट होई। तहरी घरे हमार गइल ठीक नाहीं रही। बाबूजी के जीव दुखावल नइखीं चाहत।“

संजोग एइसन भइल कि बाबूजी दू दिन खातिर अन्ते गइलें। मीता देबू के अपनी घरवे बोला लिहली।
मीता आ देबू के मन के बात उनके मतारी से जियादे के जानी। मनही मने ऊ गौरा पार्वती से मनावत रहें कि ई जोड़ी बिछुड़े ना पावे। बाकि ऊ अपने सवाँग के सुभाव जानत हई। उनके आन्हर परेम एतना दिन से सहि रहल बाड़ी। एक दिन बात चला दिहली- ”एजी, बबुनी एतना पढ़ि लिहली। अब अपने लायक लइका से बियाह करे के सुविधा उनके मिले के चाहीं।“ सुनते मीता के बाबूजी चिकरले ”कवनो लइका खोजि लिहले बा का? माई बेटी मिलि के कवनो परपंच रचले बाड़ू सो का? एइसन होखे त सुनिले- हमरी मउवत के बादे हमरी बेटी के एइसन बियाह हो पाई।“ कई दिन ले मरद-मेहरारू में अनबोलता रहल। हारि-पांछि के मीता के माई सब बात बेटी से बता दिहली। अपनी ओर से ईहो चेता दिहली कि तहन पाच अपनी मरजी से बियाह करे के सोचबऽ जा ओसे पहिलहीं तहार बाबूजी परान तेयागि दीहें। ओकरे बाद हमार का होई, सोचि लीहऽ जा। मीता सब बात देबू से बता दिहली।

सब कुछ जानि समुझि के मीता आ देबू आपस में राय कइले रहलें कि माई से बतिया के कवनो रस्ता सोचल जाई। देबू मीता की माई से हाथ जोरि के कहलें – ”तब आपे कवनो उपाइ बताईं। हमन के एतना दिन से एक दुसरे के जानत चीन्हत बानीं। बियाह कइल चाहत बानीं, बाकि एह सूरत में बियाह कइले के सोचियो नाहीं सकल जाला कि बाबू जी के जान चलि जाव। एइसन नौबत आवे ओकरे पहिले बियाह के बतिये भुला जाइल जाई।“
तड़पि उठली मीता-एतना आगे बढ़ले का बाद तूँ का बूझऽ ताड़ऽ कि बियाह से पाछे हटल जा सकेला?
देबू मुँह खोले, ओसे पहिलही मीता के माई बोलि परली- देबू बेटा। मीता त बउरा गइल बाड़ी। हमरा तहरी बुद्धि विद्या पर भरोसा बा। हम मरत दम तक तोहन लोगन के साथ देबे के तइयार बानीं। तू जानत बाड़ऽ कि मीता के एक जने भाई बाड़ें? उनके कब्बो देखले बाड़ऽ?
देबू कहलें- ”नाहीं माई, न उनके देखले बानीं, न उनके नाँव सुनले बानीं। मीता कबो बतइबो नाहीं कइली।“

मीता के बाबूजी जेसे परेम करेलें ओपर आपन एतना अधिकार मानेलें कि ओकर उठल बइठल व बोलल-चालल, खाइल-पियल, ओढ़ल-पहिरल, सोचल-बिचारल सब कुछ उनही की मरजी से होखे।

मीता के कपड़ा-लत्ता पर टोका टोकी नाही करें, इनके खाइल-पियल हमरी साथे होखे, बाकि बेटा के पलभर आँखि के ओट नाहीं होखे दीहल चाहें। लइकवा छोट रहल, तबले त बाप के इसारा पर नाचल। जब बड़ होखे लागल आ स्कूल के ओकर आपन साथी सँघाती बने लगलें त बाप से फरके रहे लागल। बाप चाहें कि बेटा अउरी केहू से न बोले, न बतियावे। उनही की लग्गे रहे, उनही के साथे खानपान करे, उनही के लग्गे बइठे सूते। लइकवा के जीव उबिया गइल त एक दिन स्कूले से भागि गइल। भगवान सोझ रहलें कि राही में हमरे भाई से भेंट हो गइल। मामा की साथे जाके ममहर में रहे लागल। हमार भाई आके हमसे बतवलें कि हमार बेटउवा अपने बाप से एतना चिढ़ि गइल बा कि उनके मुँह नइखे देखल चाहत।
बाप सुनलें त खूब लालपियर भइलें, कहलें- हमार बेटा होके हमही से टेढ़ रही?
हमार भाई समुझवलें- लइकन के अपने ढंग से सोचले समुझले के मौका देबे के चाहीं। कवनो लेखा बाप एह बात पर राजी भइलें कि बेटा सहर के स्कूल में पढ़ाई करो आ हास्टल में रहो। कई बरिस भइल छुट्टियो में हमार बाबू घरे नाहीं आवेलें। मामा घरे जालें चाहे कवनो साथी किहाँ चलि जालें। एतना बता के मीता के माई चुपा गइलीं। उनके आँखि ढ़बढ़िया गइल। कुछ देर केहू कुछ ना बोलि पावल।
देबू कहलें- बाबूजी के दुख बुझले के कोसिस करे के चाहीं। जवन अदिमी बेटा के एको पलछिन अलगे करे के तेयार न होखे ओही का जब ई पता चलल कि बेटा उनके देखल नइखे चाहत, त उनके जीवन कइसन भइल होई? ऊ कवने लेखा तीहा धरत होइहें? उनके दुख केतना बेथाह होई?
मीता के लेकार फूटल- ”अच्छा, माई, तें बताउ, का तोहरो उप्पर बाबूजी के एइसने परेम रहल? एही लेखा अपनी मरजी के गुलाम बना के तोके रखलें ?
मीता के माई बेटी कावर ताकते रहि गइली। कुछ देर बाद पुछली- तूँ त पढ़ि-लिखि के एतना हुनरगर हो गइल बाड़ू। तहरा का बुझाला? हमार कवनो आपन इच्छा कबो देखले बाड़ू? हमन के ऊ बाछी रहनीं जेकर पगहा माई बाप जेकरे हाथ थमा दीहल ओही के पाछे पाछे जाके ओकरे खूँटा पर बन्हा गइलीं। एक बात अउर सुनिलऽ अगर कब्बो ऊ बाछी पगहा तुराके भागि के नइहर चलि आवें त भाई-बाप खरहरा उठाके मारत पीटत ओही खूँटा पर पहुँचा के दम लें।“
एकर मतलब कि ”तूँ जनम भर अपनी ओर से कवनो इच्छा करबे नाहीं कइलू?“
बेटी के बात सुनिके मतारी कहली- इच्छा भइबे नाहीं कइल ए बेटी। जवन तहरे बाप के इच्छा, तवने हमार।
”माई तूँ झूठ बोलि रहल बाड़ू।“

देबू मीता के मुँह देखत रहि गइलें। मीता अपनी माई की आँखि में झाँकत रहि गइली। माई के चेहरा पाथर के हो गइल रहल। ओह घरी बुझाइल कि तीनों जने साँसो लिहल भुला गइल रहलें।तीनो जने के भित्तर केतना केतना हाहाकार उठत रहल, एकर लेखा जोखा केकरे बस के बात बा!
देबू ओह पाथर चेहरा के ताप सहि नाहीं पवलें। कहलें- ”माई, आदमी इच्छा के मूरत होला। हर छन एक न एक इच्छा मन में उपजत रहेला। एइसन कइसे हो सकेला कि रउवाँ मन में कब्बो कवनो इच्छा उपजले ना होखे। मीता ठीक कहि रहल बाड़ी। रउवाँ आपन साँच छिपा रहल बानीं। साँच बात बताईं।“
”तू ठीक कहत बाड़ऽ। मरद होके जनमल बाड़ऽऽ नऽ?“ बिना इच्छा के जीयल मरद का जानें? आ कइसे जानें? उनकर त पालन पोषन एह रूप में कइल जाला कि घर के सब लोग, बेटा के हर इच्छा के पुरावे खातिर काम करें। हमार बाप कहें- ”लइकन के मन बादशाही होला। जबले लइका अपने से नीक बाउर चेते वाला ना हो जा, तबले ओकर बात टारे के नाहीं चाहीं।“ त एइसन मयगर रहलें हमार बाप। बाकिर कब्बो हम उनके मुँह से ई ना सुनले रहलीं कि ”लइकी के मन बादशाही होला। लइकी होके जनमले के मतलब होत रहे, आन की इच्छा के आपन इच्छा मनले के टरेनिंग। एही के संस्कार कहल जात रहल।“

माई के पाथर चेहरा पिघलि गइल। मुसुकइली आ कहली-हम अपनी मीता के एइसन संस्कार नइखीं दिहले। हम इनके ई सिखवले बानीं कि अपनी इच्छा के दूसरे पर लदले के कोसिस जनि करिहऽ, बाकि दुसरे के नजायज इच्छा के अपने उप्पर लदाए मति दीहऽ। तू इनके जानत बाड़ऽ। ईहो जानि गइल होखब कि “मीता न आपन इच्छा दुसरे पर लादेली, न दुसरे के इच्छा के गुलाम बनेली।“
देबू खुलि के हँसि पड़लें। कहलें- माई एतना त हमहूँ पढ़ले आ समुझले बानीं कि परेम के मतलबे होला, जेसे परेम होखे ओसे ओसही होखे, अपनी इच्छा के गुलाम बना के परेम नाहीं कइल जा सकेला, बाकिर व्यवहार में एइसन कहाँ लउकेला?
मीता बोलि परली- ”काहें, लउकत नइखे? सोझहीं त बाड़ी हमार माई? एही से न हम कहनी हँ कि माई झूठ बोलि रहल बाड़ी।
माई के तनाव हल्लुक हो गइल रहल। कहली- चुप रहु। अच्छा मान लेत हईं, झूठ कहनी हँऽ।“ बाकि हम तोहके जवन सिखवले बानी ऊ त साँच बा नऽ? अब तू जा देबू मिलिके के सोचऽ जा कि कइसे तोहन लोग के बियाह हो जाय आ तहरी बाबूजी के जिनगी बाँचल रहि जा।
मीता जोर से साँस लिहली। बुझाइल कि बाबू जी के लवटले पर उनसे बतियावे खातिर साहस अपने भित्तर खींचि रहल बाड़ी। देबू कुछ नाहीं बोल पवले। चुपचाप गुनत मथत रहलें। माई पारापारी दूनू जने के मुँह ताकत रहली। अपनहीं चुप्पी तुरली- तहन पाच खूब पढ़ल लिखल बाड़ऽ जा। आपन ऊँच-नीच सोचे वाला त बटले बाड़ जा, अउरियो लोग के जिनगी राहि पर लगावे के लियाकत बा। बाबूजी के एगो अउरी पच्छ बा जवने के भुलाइल ठीक नइखे।
देबू पुछलें- ”ऊ कवन पच्छ हऽ?
माई कहलीं- जे अदिमी बेटी के बियाह अपनी मरजी से न कइले पर जान देबे के तेयार बा, ऊहे बेटी के एतना पढ़ावल कइसे?
देबू अचकचा गइलें। कहलें- ”एह बात पर त हमार धेयान गइले नाहीं रहल। ई त घोर अचरज के बात बा। एइसन अजगुत कइसे हो गइल?“
माई मीता की ओर देखि के कहली- ”इनहीं से पूछि लऽ।“
मीता के उफान उतरि गइल रहे। कहली- ”बाबूजी के चलित त हमार पढ़ाई ओतने रहि जाइत जेतना गाँव के मिडिल स्कूल में भइल। तकदीर साथ दिहलस। जूनियर हाईस्कूल में जिला में सबसे जियादे नंबर हमार रहल। हाईस्कूल में पढ़े खातिर हमके वजीफा मिले वाला रहल। बाबूजी कहलें- घरहीं पढ़ि के हाईस्कूल के परीक्षा देबू तब्बो फस्ट अइबू। माई की लगे रोवले से कौनो काम बने वाला नाहीं रहल। हम चिट्ठी लिखि के मामा के बोलवनीं। मामा अइलें। बाबूजी हठ नाहीं छोड़ें त मामा कहलें- ”रउवाँ पूरा जिला में नाक कटवावे पर उतारू हो गइल बानीं। जिला में टाप करे वाली लइकी के नाँव सरकारी हाईस्कूल में लिखाई, ई सब जानत बा। जब प्रिंसिपल के मालूम होई कि एतना तेज लइकी के बाप एतना गँवार बाड़ें, त अखबारों में नाँव छपि जाई, ओकरे नीचे छपाई कि देखल जाव, एह जबाना में एइसनो लोग बा।“ हम सब के जगहँसाई होखी। बेटी के जिनगी बरबाद होखी, तवन कलंक अलगे।
नकिये कटइले की डर से त बाबूजी घर से बहरा जाए नाहीं दीहल चाहत रहले। जब ई जनलें कि नाहीं पढ़वले पर अउर बेइज्जती होई तब शहर भेजे के तेयार भइलें। मामा ले जाके सरकारी हाईस्कूल में नाँव लिखवलें, हास्टल में जगहि दियवलें आ ओइजा की प्रिंसिपल से हमार कुलि हाल बतवलें। ऊ कहली- ”इनके बाबू जी से कहि दीहऽ कि हम इनके अपने बेटी बना के राखबि आ पढ़ाइबि। प्रिंसिपल जवन कहली तवन एह लेखा पूरा कइली कि कुछुए दिन बाद हास्टल छोड़ा के हमके अपनी घरे में राखि लिहली।
कवने लेखा हमरी साथे मेहनत कके हमके हाईस्कूल में बोर्ड परीक्षा में प्रदेश में तिसरी जगहि लेबे लायक बना दिहली, एकर लमहर कथा बा। एकर सुफल ई भइल कि हमरे माई-बाबूजी के बोला के जिला के कलक्टर साहेब एतनी बुधि आगर बेटी जनमवले खातिर माला पहिरवलें आ शाल ओढ़वले। तब बाबूजी का बुझाइल कि बेटी के आगे पढ़वले से केतना फैदा हो सकेला। ओकरे आगे इंटर आ बीए तक ले पढ़ाई हम बिना घर से खर्चा लिहले अपनी दुसरकी महतारी ओही प्रधानाचार्या की देखरेख में पूरा कके यूनिवर्सिटी में आ गइनीं, कइसे एम0ए0 भइल, अब रिसर्च हो रहल बा, ई सब तोहरा से जियादे के जानी?“ एतना मान-सनमान हमरी वजह से बाबूजी के मिलल कि लोग से हमार बखान करत अघइबे नाहीं करें। माई जनली कि हमरे जोग दमाद खोजे खातिर बाबूजी परेसान बाड़ें। हमसे कहली तब हम अपने आ तहरे बारे में बतवनीं। माई समुझली कि बेटी के पढ़ाई लिखाई आ आदर सनमान से बाबूजी के मन बदलि गइल होई। एक राति बिना हमार तहार नाँव लिहले बाबू से पुछली कि बचिया अपने जोग पढ़ल गुनल अदिमी से बियाह कइल चाहे त कइसन रही? ओकरे बाद का भइल जानते बाड़ऽ। दूनू जने उनके हठ के आगि में झँउसात बानीं। हमने के नाहीं, अब त माइयो झँउसा रहल बाड़ी।
मीता बात कहि के चुपा कइलीं। बुझाइल कि अब कुछ कहे-सुने के रहि नाहीं गइल बा। देबू के चेहरा अउरी गम्हीर हो गइल। माई दूनू के चेहरा पढ़ली आ हुलसि के कहली- ”ए धिया का गुनावनि कइले बाड़ू। हमरे बिसवास पर भरोसा करऽ। तहन के बियाह होके रही, हमार चाहे जवन गति बने।“
मीता का बुझाइल कि माई छछात दुर्गा हो गइली।
मीता सचेत हो गइली। कहली- ”माई तहार बिसवास हमन खातिर सबसे अनमोल बा। हमन के फिकिर दूसर बा। हमन के बियाह तब्बे कइल चाहबि जा, जब तहार आ बाबूजी के सोगहग असिरबाद मिलि जाई। एक दुसरे की देहि के लालच हमन के प्रेम के आधार नइखे। बियाह सबकी सनमति से होई, तब्बे होई। भागि पराके, बाबूजी के जीव दुखा के बियाह कइले की बदले हमन एसहूँ रहि सकीलें।“
गाँव में पोस्टमैन साहेब हफ्ता दस दिन में कब्बो एक दिन आवेलें। अइलें, आ मीता के नाँव के बड़हन लिफाफा रजिस्ट्री वाला ले अइलें। दुआर पर बाबूजी के हाथ में देके एगो कागद बढ़ा के कहलें- ”हे पर दसखत कऽ दीहल जाव।“ बाबूजी लिफाफा पर लिखल नाँव पता पढ़लें। चिट्ठी पावे वाला के नाँव लिखल रहल मीता। उनकर पता रहल, मार्फत श्री निवास शर्मा। ओकरे नीचे गाँव डाकखाना, जिला सब लिखल रहल। बाबू जी लिफाफा आ रसीद वाला कागद पोस्टमैन के थमा के कहलें – ”ई हमरे नाँव के चिट्ठी नाहीं हवे। भित्तर से जनाना लोग के बोल के दे दऽ आ ओही लोग से दसखत करा लऽ।“ लिफाफा लवटावत में लौछेड़े भेजे वाला के नावे पता पढ़ि लिहलें। बुझाइल कि उनके बेटा के नाँव लिखल बा। कई साल हो गइल बाप-बेटा के देखा देखी नाहीं भइल। मन में कचोट ऊठल बाकि भितरे घोंटि लिहलें। सोचि लिहलें कि कहीं रहे, भले रहे। चिट्ठी आइल बा। कवनो बतावे लाएक बात होई त मतारी बेटी बतइबे करिहें। भित्तर के ई हालि कि लिफाफा खोलि के मीता भाई के बियाह के नेवता पढ़ली। दुबारा पढ़ली। तिसरी बेर पढ़ली। हर बेर उनके चेहरा के रंग बदलत गइल। उनके माई बेटी के मुँह देखत रहि गइली। बेटी अपनी ओर से कुछ नाहीं बतवली त माई पुछली- ”कस रे, केकर चिट्ठी हवे आ एइसन का लिखल बा कि तोर बोलिए बन्न हो गइल।“
मीता कहली- ”जब जनबू कि एह चिट्ठी में का लिखल बा, त तहरो हालि ऊहे हो जाई, जवन हमार भइल बा।“
माई कहली- ”अच्छा, बताउ का लिखल बा। जवन हालि होई तवन होई। बात बताउ पहिले।“
मीता कहली- ”करेजा कस के सुनऽ, तहरी बेटा के बियाह हो गइल। ओही के नेवता हऽ।“ बाबूजी के नाव से नइखे आइल, बाबूजी के मार्फत हमरे नाँव से आइल बा। बियाह कचहरी में भइल। तहरी पतोह के नाँव हऽ सोनी। ऊ कहाँ के हई, उनके माई-बाप के हऽ कुछ नइखे लिखल। तोहरे बाबू की ओर से ईहे लिखाइल बाकि सोनी से हमरे बियाह की खुशी में दस जून के जुहू बीच के सन एंड सैंड होटल में दावत में आके हमन के असीसल जाव। दस तारीख बितले पाँच दिन हो गइल। अब हम चहबो करीं त गइले के कवनो जोगाड़ नइखे।

मीता एक्के साँसे एतना बोलि के चुपा कइली। उनके माई कुछ देर चुपाइल रहली आ अचक्के ठठा के हँसे लगली।
मीता चिहा के पुछली- ”काहें हँसत बाड़े?“
माई कहली- ”हँसत बानी तहरी बाबूजी के बात सोचि के। अबहिन त तहरिये बियाहे की बात पर परान तेजत रहलें हा, अब बेटा के एइसन बियाह के बात सुनिहें तब उनकर कवन गति होई?“
मीता कहली- अपने बाबूजी के हम जेतना जानि पवले बानीं ओह हिसाब से बेटा के ऊ अपने मन से निकालि दिहले बानें। जब बाप-बेटा में कवनो लगाई छुवाई कब्बो नाहीं रहल त ऊ चाहे जवन करें, बाबूजी के ठेंगा से। खा-पीके सुता परि गइल त मीता के माई बहरे निकड़ि के पति के सिरहाने खड़ा भइली।

ऊ सूतल रहलें त जगावे के परत। जागले रहलें। उठि के बइठि गइलें। पुछलें- ”कुछ कहे के बा? आवऽ बइठि जा।“
मीता के माई का बुझाइल कि मालिक के बोली पहिले जइसन कड़क नाहीं रहि गइल बा। एह नरमी के कारन का हो सकेला? जवन कारन होखे, हम जवन बात कहे आइल बानीं ओकरे खातिर ठीके बा। कहली- ”आजु ले कब्बो अपने के साथ दुआर पर खटिया पर बइठल बानीं कि बइठीं। रउवाँ जनलीं हँऽ भेजे वाला नाव उनहीं के रहुवे। का लिखल बा चिट्ठी में?“ मीता बतवली हऽ कि बाबू के बियाह बंबई में कवनो सोनी नाव की लइकी से भइल बा। ओही की खुशी में दावत रहल पाँच दिन पहिले।

”एकर मतलब ई भइल कि तहार बाबू मीता के दावत में बोलावल नाहीं चाहत रहलें। एह चिट्ठी से हमके-तहके बतावल चहलें कि अपनी मनमरजी से ऊ आपन बियाह कऽ लिहले बाड़ें।“ मालिक की बोली में न दुख बुझाइल, न सुख। अगिले छन मीता के माई अचरज से भरि गइली जब सुनली- ”अब पतोहि उतरले के तेयारी आराम से करिहऽ। कब्बो न कब्बो त तहार बाबू तहरी पतोह के लेके अइबे करिहें। ईहो हो सकेला कि नाती भइले कि बादि आवें।“

मीता के माई अदकि गइली। ई सोचि के सका गइली कि बुढ़वा पगला गइल का? न त एतना नरमी से ई कबो बतियवले रहलें हँऽ, न एतना लमहर बतकही कइले के इनके आदत रहलि हऽ। ऊ धेयान से मालिक की आँखि में आँखि डारि के ताके लगली। मालिक कहलें- ”काहें एतरे ताकत बाड़ू?“ हम पगलाइल नइखीं। सोचबू त तुहँऊ बुझि जइबू कि आगे ईहे कुलि होखे वाला बा। लइका अपनी मरजी से जीएँ।
मीता के माई के जीव थीर भइल कि मालिक के होसहवास ठीक बा। एह मौका के फैदा उठावे के खेयाल आ गइल। कहली- ”अब मीता के जिनगी के सवाल पर सोचे के समय आ गइल बा। हमन के कुछ फरियावल नाहीं जाई त ईहो मामला अझुरा जाई। बोलीं, का सोचत बानीं?“
मालिक के सुभाव त एह सवाल पर भड़कि जाए वाला रहल, बाकि आजु कुलि बात अजगुते हो रहल बा। तनिको रिसियइलें खिसियइलें नाहीं, ”अब तूँ ही बतावऽ का करेके बा। कवनो लइका ओकरा पसन्न परि गइल होखे त बता देउ। ओसे पूछि के हमसे बता द। ईहे डर लागत बा कि कवनो लंपट लफंगा ओके न फँसा ले!“
मीता के माई कहल चहली कि लइकवा त लाख में एक बा, उनसे मिल चुकल बा, बाकिर कुछ सोचि के बतवली नाहीं। कहली- ”रउवाँ कहत बानीं त हम मीता से पूछबि।“

अगिले दिन मीता के खिया-पिया लिहले कि बाद उनके माई हुलसि के बतवली कि उनके बाबूजी के मन नरमा गइल बा। उहाँ का ओह लइका के बारे में जानल चाहत बानीं। जेके तू पसन्न कइले बाड़ू। अब ई सोचऽ कि कवने जुगुति से देबू के बारे में उनके बतावल जाव! मीता बाबूजी की नरमी पर बिसवास तुरंते नाहीं कइली। भितरे जीव धुकधुकात रहल। उनके मन में मैडम के खेयाल आइल। सोचली कि बाबूजी उनहीं पर पूरा भरोसा करेलें। माने लें कि मैडम की वजह से उनकी बेटी के जिनगी बनि गइल आ एइसन बेटी के बाप भइले के नाते उनहूँ के समाज में आदर सनमान मिलल। माई से कहली- ”कवनो लेखा देबू के नाँव बाबूजी के कान में मैडम के मुँह से डरवा दीहल जाव। बाबूजी इनकार नाही करिहें।“
माई पुछली- मैडम कहाँ बाड़ी आजकाल?
मीता उदास हो के कहली- ”ईहे त नइखे मालूम। दिल्ली से रिटायर भइले कि बाद मैडम केरल चलि गइली। ओइजा के पता ठेकाना मालूम नइखे।“
माई कहली- ”पता ठेकाना मालूम नइखे, तब हमरा एगो झूठ बोले के परी।“
मीता- ”कइसन झूठ?“
माई- “धरम झूठ।“
मीता- बुझउवल मति बुझाउ। ”धरम-अधरम में साँच-झूठ के फरक होला। जवन साँच ह तवन धरम, जवन झूठ, तवन अधरम। धरम झूठ का होला?“
माई कहली- ”हम तहन पाच की लेखा ढेर पढ़ल लिखल त नइखीं, बाकि एतना जानत बानीं कि जवने झूठ से केहू के नोकसान ना होखे, केहू के जान बचि जा भा केहू के भलाई होखे, ओह झूठ के धरम झूठ कहल जा सकेला।“
मीता- ”तब तहार धरम झूठ का हऽ?“
माई- ”हम तहरे बाबूजी से बताइबि कि राउर बेटी जवने लइका के पसन कइले बा, ऊ ओहू से जियादा जोगता वाला बा। उनकर महतारी ऊहे मैडम हई, जिनकी वजह से मीता के जिनगी बनि गइल आ मीता के माई-बाप के समाज में एतना आदर सनमान मिलल।“
मीता- ”बाबूजी मानि जइहें बाकि देबू कइसे मनिहें?“
माई- हम देबू के मन पढ़ि लिहले बानीं। जवन अदिमी एतना पवित्तर प्रेम कऽ सकेला, ओसे अधिक धरम के समुझी? देबू के परेम देहि के लालच से उप्पर बा। हर तरह के लोभ लालच से उप्पर बा। ओके प्रेम कहऽ चाहे धरम कहऽ, एक्के बात बा। जवन मैडम बिना कौनो सवारथ के तहार जिनगी बनावे खातिर तन-मन-धन से एतना मदद कइली उनके बेटा रहतें त देबू जइसने रहतें। हमरे मन में देबू मैडम के बेटा बनि के आइल बानें त अकारथ नाहीं जाई हमार भाव। मीता के आँखि में उजास लउकल। उनके माई के बिसवास अउर बढ़ि गइल। कहली-”आ एक बात अउर। तहरे बाबूजी के हिरदय मोम काहें हो गइल! साइत परेम बिना बोलले आपन काम करेला।“


(पाती पत्रिका के अंक 75 ‘प्रेम-कथा-विशेषांक’ से साभार)


शीतल सुयश, राप्ती चौक, आरोग्य मंदिर, गोरखपुर, 273003

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