पिछला हफ्ता बड़की पंचायत के साठ साल पूरा भइला पर इहे लागल कि साठा त अब भइल बाकिर सठियाइल जमाना से बा. अब त अधिकृत तौर पर सठिया गइल कहल जा सकेला ना त साठ साल पुरान बात पर लट्ठ ले के ना निकलल रहीत लोग. बुड़बक मरले बिराने फिकिरे. उझाव बुझाव कुछ भले ना बाकिर विद्वान बने के दावा जरूर करी लोग. ओह विवादास्पद बात में अइसन कुछ ना रहल जवन हमनी के बाबा दादा के अपमान करत होखो. बाकिर बुड़बक बुझावे से मरद. एह सठियाइल लोगन के समुझावल बहुते मुश्किल काम बा. बाकिर हमरा एह सबसे का? हम त आइल रहनी बतकुच्चन करे आ साठ साल के बाति निकलत निकलत सठियाए पर चलि गइल. आ बाति निकल गइल बड़की पंचायत के. पचायत महान हमनी के पंच महान. आम जनता, लेखक, कवि, कार्टूनिस्टन के अतना औकात कहाँ जे एह महान लोग पर तंज कस सको. बड़ बड़ जने दहाइल जासु गदहा पूछे कतना पानी? बाकिर साठ के संबंध साठा आ सठियइला दुनु से होला. सठ से ना. सठ शठ के कहल जाला, शठम् शाठ्यम समाचरेत. जो तोको काँटा बुवे ताहि बोव तू भाला. ओकरो लागे पता कि बावे, पड़ल केहु से पाला. बाकिर बतकुचना के त एहू सब से कवनो मतलब नइखे. ऊ त बस इहे बतावल चाहेला कि भाषा सम्हार के बोले लिखे के चाहीं भासन कसहूं दे लीं. उर्दू में कहल जाला कि नुक्ता का हेर फेर से खुदा जुदा हो जाला त भोजपुरी भा हिंदीओ में अइसन बहुत कुछ बा जवना में मात्रा के हेर फेर से मतलब बदल जाला. अर्जुन समय का मार से अर्जून बने के मजबूर हो जालें. हंस आ हँस के फरक त अब बहुते कम लोग समुझ पावेला आ हँस के हंस लिखे में ओह लोग के तनिको बेजांय ना लागे. कोंढ़ी आ कोढ़ी, कोठा आ कोठी, कोठीवाल आ कोतवाल, तसली आ तसल्ली, झोल आ झोर, झोरल आ झोलल, बेकत आ बेंवत, पाणि आ पाड़ी, . अब एह सुने में एक जइसन लागे वाला बाकिर अलग अलग मतलब वाला शब्दन का अलावा मुसीबत ओहू शब्दन से होला जवन सुने आ लिखे दुनु में एक जस होलें बाकिर ओकर मतलब कई गो निकलेला. वइसनका अनेकार्थी सब्दन के दुअर्थी कहल गलत होखेला. अनेकार्थी आ दुअर्थी दुनु अलग अलग होले. अनेकार्थी मे कहे वाला क मकसद कुछ अउर कहे के होला बाकिर सुने वाला हो सकेला कि गलती से कवनो दोसर मतलब निकाल लेव. बाकिर दुअर्थी में कहे वाला के मतलब उहे होला जवन सामने वाला समुझत बा बाकिर अगर केहू टोक देव त कहे वाला तुरते पलटी मार दी कि हम त “हई” कहनी रउरा “हउ” समुझ लिहनी. दुअर्थी शब्द हर भाषा, हर समाज में मिलेला बाकिर भोजपुरी के कुछ लोग एह दुअर्थी खातिर बेसी बदनाम कर देला. वइसे भोजपुरी समाज बहुते सहनशील आ उदार होला. ओकर मूल्यांकन दोसरा भाषा भा समाज में रहे वाला बढ़िया से ना कर सकसु बाकिर तब तकलीफ होला जब आपनो लोग दोसरा के कहल बात पर हुँआ हुँआ करे लागेला. इचकीओ भर से हलुका का होला? दोसरा भाषा में शायद ना बतावल जा सके बाकिर भोजपुरी में एगो शब्द बा जवना के भोजपुरी जमात में जम के इस्तेमाल होला. अलग बाति बा कि “सभ्य” समाज, जवन अपना के श्लील मानेला, ऊ ओह “अश्लील” शब्द के पचा ना पाई एहसे ओकरा के हमहू इस्तेमाल कइल ना चाहब. समय बदलत बा आ समय का साथे बहुत कुछ बदलत बा. बाप के नाम साग पाति बेटा क नाम परोरा. डैडी मम्मी का फेर में बाबू आ माई कब भुला हेरा गइल पता ना चलल. आ एह फेर में हमार जगहा कब पूरा हो गइल इहो पता ना लागल. चले दीं अब.

कुछ त कहीं...

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