प्रकृति के एगो नियम विज्ञान में पढ़ावल जाला कि ऊ गँवे गँवे सब कुछ के समतल सपाट करे में लागल रहेले, चाहे ऊ पहाड़ होखे भा कवनो झील पोखरा गड़हा. अलग बाति बा कि पता ना का होई जब सब कुछ समतल हो चुकल रही. शायद तब धरती पर पानी के प्रलय आ जाई. अब एह अबूझ अनजान पहेली में अझूराइल त बतकुच्चन के मकसद नइखे बाकिर आजु कुछ सोच के एकर चरचा उठवले बानी. प्रकृतिये का तरह भाषा विज्ञानो के हाल होला. भाषा विज्ञानी भा व्याकरणाचार्य लोग गँवे गँवे हर भाषा के कवनो ना कवनो सूत्र में बान्हल चलि जालें जबले ऊ भाषा आम आदमी खातिर दुरूह ना बनि जाव. एह विकास यात्रा में संस्कृत, ग्रीक, लैटिन वगैरह त बाँच गइली सँ बाकिर ओकरा बाद के कतना भाषा पता ना कहवाँ बिला गइली सँ. ग्रीक लैटिन के बात छोड़ दीं त संस्कृतो शायद एहसे जिन्दा रहि गइल कि हमनी के ढेरहन धर्मग्रन्थ संस्कृत में लिखल बा. ओकरा बाद के पालि, प्राकृत, अवहट्ट, अपभ्रंश वगैरह गँवे गँवे बिला गइली सँ ठीक ओही तरह जइसे भोजपुरी के मूल लिपि कैथी. आजु कैथी लिपि के पढ़े लिखे वाला केहू ना मिली. बाकिर कुछ लोग कैथी लिपि के साम्यता आजु के गुजराती लिपि में खोज निकलले बा. आ बहुत हद तक ई बाति सहियो बा. बाकिर दुनु लिपियन में अंतरो बहुते बा. खैर बाति फेर बहक गइल. कई बार कह चुकला का बादो आजु फेर कहे के मन करत बा कि हर भाषा के आपन सुभाव होला आ भोजपुरियो के बा. भोजपुरी में दुरुह वर्ण के इस्तेमाल ना होला. स त बा बाकिर भोजपुरी सुभाव में श आ ष ना आवे. संयु्क्ताक्षर से भोजपुरी शुरुवे से फरका रहत आइल बिया. लेकिन एकर कुछ आपनो वर्ण बाड़ी सँ जवन देखे में त संयुक्ताक्षर लागेली सँ बाकिर हईं सँ स्वतंत्र वर्ण. जइसे कि ङ्ह, र्ह, ल्ह, म्ह, न्ह. एकनी के उदाहरण देखल जाव त जङ्हिया, बर्हम, चाल्हाक, गम्हउरी, अन्हरिया से मतलब साफ हो जाई. अब रउरा जानल चाहत होखब कि आजु हम ई पोथा खोल के काहे बइठ गइनी ? एने कई हफ्ता महीना से भ्रष्टाचार के जोर चलत बा. अब भ्रष्टाचार खातिर भोजपुरी में शब्द बा भठियरपन, भ्रष्टाचारी खातिर भठियारा बाकिर देखत बानी कि लोग एह ठेंठ शब्दन के इस्तेमाल कम करत बा. का एह चलते कि भठियारा साफे बतावत बा कि सामने वाला गइल गुहाइल बा जबकि भ्रष्टाचार में तनी शिष्टता झलकत बा ?

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