आजु दू अक्टूबर ह, गांधी बाबा आ लालबहादुर शास्त्री के जन्मदिन. दुनु सादगी से भरल. संजोग से आजु दुर्गापूजा के नवराति के छठवाँ दिन ह. एह धूमधाम, उत्साह, उछाह भरल मौका पर सोचत बानी कि काहे ना व्रत, उत्सव, तेहवार, पर्व तकले अपना के समेटले रहीं. अधिकतर लोग खातिर दुर्गापूजा उत्सव ह, धूमधाम उछाह से भरल उतसो मनावे के मौका. बाकिर बहुतो लोग खातिर ई व्रत के मौको ह, पर्व हऽ.

उत्सव शादी बियाह, जीत हार बहुते कुछ का मौका पर मनावल जाला जबकि कवनो धार्मिक अवसर पर मनावे वाला उत्सव पर्व कहल जाला. ई पर्व साहित्य में कवनो बड़का ग्रन्थ के खंडो हो सकेला, जइसे कि महाभारत में कई गो पर्व आइल बा. बाकिर आजु हम धार्मिके पर्व तक अपना के बन्हले राखे के मन बनवले बानी. अधिकतर लोग खातिर पर्व उतसो तेहवार व्रत एकही चीज हो सकेला बाकिर सोचे के बाति बा कि अगर एकही बात रहीत त फेर अलग अलग शब्द काहे बनावल गइल रहीत. समानार्थी शब्द समान होइयो के हर मामिला में समान ना होखसु. कई बार देश काल परिस्थिति संदर्भ का आधार पर अलग अलग बाकिर समानार्थी शब्दन के इस्तेमाल कइल जाला. बाकिर पर्व, उतसो, तेवहार, व्रत त समानार्थी शब्द हइये ना हईं सँ. सब अलग अलग अर्थ राखेली सँ. कवनो तरह के खुशी उछाह में उतसो के धूम धाम रह सकेला बाकिर पर्व खास खास धार्मिके मौका पर होला. एही तरह तेहवार पर्व के कहल जाला खास कर के ओह पर्व के जवन उछाह का साथे मनावल जाला. कहे के मतलब कि हर तेहवार पर्व होला बाकिर हर पर्व तेहवार ना होखे. बहुते पर्व संयम सादगी से मनावल जाली सँ आ ओह पर्व के तेहवार के दायरा में ना राखल जाव.

व्रत कवनो संकल्प भा निश्चय के कहल जाला. आ जब कवनो धार्मिक अनुष्ठान नियम पूर्वक उपास रहि के कइल जाला त ऊ व्रत हो जाला. एहीसे कहनी ह कि आजु केहू उत्सव मनावे का मूड में होई त केहू व्रत करत होई. नवराति के उपास, उपवास करे वालन खातिर उ व्रत ह जवना में बहुते कुछ बरतल होई, मनाही होई इस्तेमाल करे के भा खाये पिये के. अब व्रत से बरतल बनल कि बरतला का चलते व्रत हो गइल एह बारेमें हम कुछ ना कह सकीं. महात्मा गाँधी के जन्मदिन सरकारी विभागन खातिर उत्सव होला, छूट्टी के दिन. बाकिर कुछ लोग एह दिने लालबहादुर शास्त्रीओ के जनमदिन चुपचाप व्रत लेखा मना लेला.

तेहवार शब्द से तेहा आ तेहो शब्द दिमाग में घूमे लागल बा बाकिर ओकरा पर फेर कबो.

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