कुछ दिन पहिले एगो साहित्यकार बंधु के फोन आइल रहुवे. उहाँ के जानल चाहत रहीं कि तिवई के मतलब का होला. शब्द के अर्थ ओकरा व्यवहार का तरह बदलत रहेला. अगर अइसनका ना रहीत त आक्सफोर्ड डिक्शनरी हर बेर आपन नया संस्करण ना निकालित. हर कुछ दिन पर पुरान शब्दन के नया प्रयोग भा नया शब्दन के आविष्कार होत रहेला. तिवई शब्द के हमार बतावल अर्थ उहाँ के पूरा ना लागल रहे. पूरा होइयो ना सकत रहे काहे कि भोजपुरी बोले बतियावे लिखे पढ़े वाला लोग पूरा दुनिया में पसरल बाड़न. कई कारण से भोजपुरी के अबले कवनो मानकीकरण नइखे हो पावल. हर वेबसाइट, हर माध्यम अपने हिसाब से भाषा गढ़े में लागल बा. हमहूं एगो माध्यम के संपादक प्रकाशक होखला का नाते भोजपुरी के मानकीकरण के कोशिश में लागल बानी.

खैर, बात बहक गइल. शुरु भइल रहे तिवई से. तिवई ओह सयान लड़िकी के कहल जाले जवना के शादी नइखे भइल. बाकिर कुछ लोकगीतन में तिवई शब्द के इस्तेमाल बियाहलो औरत खातिर भइल बा. कहीं ऊ अपना बच्चा होखे खातिर तिकवत बिया त कतहीं अपना परदेसी पति खातिर. अब एह तिकवल से तिवई के उत्पत्ति मानल जाव त तिवई के मतलब हर ओह औरत के समुझल जा सकेला जे कवनो इन्तजार में होखे, केहू खातिर तिकवत होखे. तिकवत के मतलब केहू खातिर ताकतो हो सकेला. अब ई ताकल वाला ताकत आ देह के बल वाला ताकत दुनु शब्द व्यवहार में बाड़ी सँ. अइसनका श्रुतिसम भिन्नार्थक शब्द, “सुने में एक जइसन मतलब फरदवला”, हर भाषा में मिलेला. कई बेर कवनो शब्द के गलत अर्थ में इस्तेमाल अगर बहुते हो जाव त उहे अर्थ ओकर स्वाभाविक अर्थ हो जाले. आजु अतने.

One thought on “बतकुच्चन – ७”
  1. पूरा तरह से सहमत।

    पीठ सब्द के देखीं त एगो पीठ संस्कृत से आइल बा अउर तत्सम बा…जइसे विद्या क पीठ अउर इ पुलिंगी बा पर उहवें एगो पीठ तद्भव ह जवने क उत्पत्ति संस्कृत की पृष्ठ से भइल बा अउर इ स्त्रीलिंगी ह…
    सब्द के मतलब बदलत रहेला…कबो-कबो नया अरथ में भी परयोग होला अउर कबो-कबो अपनी कवनो अरथ से दूर भी हो जाला…एही से त सबद के ब्रह्म मानल जाला….जे जेतने डूबी ओतने पाई पर एकर अंत कबो ना हो पाई….आनंदम…आनंदम…जय हो…

कुछ त कहीं...

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