• अनिल कुमार राय ‘आंजनेय’

भोजपुरी अइसन भाषा ह, जवना पर केहू गुमान करि सकेला. एह भाषा के जेही पढ़ल, जेही सुनल, जेही गुनल ऊहे अगराइल, ऊहे धधाइल, ऊहे सराहल, ऊहे सिहाइल. एकरा मरम के जेही बुझल ओही के भरम भहराइल. एकरा ओरि जेही एगो नजर डालल ओही के ई भाखल भाषा भासल, ओकरा आँखि का आगा के अन्हरिया बिलाइल आ टह-टह अँजोरिया लउके लागल. एह भाषा में अइसन मिसरी क मिठास आ सहद का हद दर्जा क सवाद सहेजल बा जे एह भाषा का चितचोर मोहन का बात क लुनाई लूटे खातिर कवनो भाषा क गोपी ओही तरे दिवाना रहिहन आ उनुका ऊहे उपाइ नाधे-नवाधे के परी जवन बिहारी कवि बखनले बाड़न-
”बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाय.
सौंह करै भौंहन हँसै दैन कहै नटि जाय..“

एह भाषा में बाति ना होले, बतरस होला. बाति भा बात आ बतरस में का भेद ह से हम फरिआइ के, खुलासा कइके कहि रहल बानी. बाति होले नीसठ आ बतरस होला रसगर आ मनगर. ऊखि का ऊपर के बोकला बोकड़ि के, नीकहन क छील-छाल के एकग्गर कइला पर ओह चिमिरिख, चीमर आ छेहर छोइला का तर के तर गुद्दी उजागर हो जाले. छोइला छुरिन छीलि के हटाईं भा दँतवसि के. दाँतन ढरमेच के मुँह का समाई भर एक कट्टा काटि के ऊखि का गुद्दी के जवन हिस्सा मुँहें चूसे खातिर लिहल जाला, ऊ बड़ा रसगर, मनगर आ चभक्का होला. ऊखि के ईहे रसगर, मनगर आ चभक्का हिस्सा कहाला गुल्ला. गुल्ला रस ले गुल-गुल रहेला, एही ले कहाला गुल्ला. एह रसचमोर गुल्ला क रस जब निकनी क नीचोरि आ चूसि लिहल जाला त बकिका हिस्सा जवन मुँह में बाँचेला ऊ कहाला खोइया. गुल्ला जब रस खो देला त बाँचि जाला खोइया. जे रस खो दिही, बेरस हो जाई ऊ खोइया ना कहाई, त अवरी का कहाई? ई खोइया बड़ा निसठ होला, निकनी के संठ. ई पेट क दहकत-लहकत कुंड (जठरानल) में ना झोंकाला. एह कुंड में त रस स्वाहा कइल जाला आ चूल्हा क आगि, कउड़ भा भऊर के दवँक में झोंकाला खोइया. रसना रस ले ले. सिट्ठी ना. (ए रसना के खाली चाम मत बुझीं, ईहे न पेट का आगि क लहकत ललकी लवरि ह. एके लब-लब करे वाली खाली लबरा मत जानी, बड़ी जबरा ह. ई लवर क कवर लीलसि, सेकर हिसाब जो कहल बने, त करीं.) एही ले पुरुखा-पुरनियन क, बुद्धिमान लोगन क ईहे सीख-सलाह रहेला जे बाति तवलहीं करे आ गुल्ला तबलहीं चूसे जबले ओमे रस रहे. गोइयाँ आ चतुर सुजान ऊहे कहाला जे बाति में रस ना रहि गइला पर बन कइ दे आ गुल्ला चूसि के खोइया उगिल दे. बतरस ह गुल्ला आ बाति ह खोइया. साँच कहीं त, बाति क बतंगड़ आ बतकूचन के बखेड़ा जखेड़ा लगावल हमरा रचिको ना सोहाला. एहसे बाति आ बतरस क एगो-दूगो, बस गिनले-गुथल तीनि-चार गो अवरी परतोख देइ के हम एह बतकही के ‘इति रेवा खंडे’ कइ रहल बानीं. बतक्कड़ई से न त कवनो बाति बनेले आ न त कुछ सिरइबे करेला. रउरो सभे सुनलहीं बानीं जे ”बातहि बात करख बढ़ि आवा.“

बे बाति के बाति कइला से भला बाति बनिए कहाँ ले सकेले? बाता-बाती में हूँ-टूँ होला. जहाँ बोल-ठोल भइल कि ठोठा धरे के नउबत आइल. दू बाति भइल कि दू हाथ होत देरी ना लागे. बाति-बाति में बाति बढ़ेले. बाति बढ़वले बाति बढ़ेले आ बाति ओरिअवले बाति ओरिआले. जे बाति ध ले ला ऊ बरोबर बेघाता करे का घात में रहेला. बतिधर भइल त नीमन ह बाकिर बाति धइल नीक ना ह. बाति के बतास बातूनी के कबो कल न लेबे दे, ऊ निकनी के बाति जाला. सचहूँ बाति अनरस आ अमरख पैदा करेले. आ बतरस अमरस का अमृत ले भरल-पूरल रहेला, जेसे एकरा खातिर मन लुलुआत-छिछिआत रहेला. बतरस सरल रहेला एसे हमेसा सरस परेला. बतरस के गुन केतना ले बखानीं, साँख नइखे होत. अवरी सुनीं, बात का ऊ ई ह कि बतरस ह रुई आ बाति ह बनउर. चिन्तन का चरखा पर चढ़ा के बुद्धिमान सुजान लोग विचार का धागा के ओहिआवेलन आ ओजही बतरस का रुई के काटल बिचार का धागा के करम का करघा पर सुख आ सील का ताना-बाना से बीनल मनभावन पीतम्भर पंडित लोग पहिरेलन.

बाति में रस लेत बतरस के हाल रउरा सुनली-गुनलीं. अब पाती क हाल सुनी. एह भाषा क पाती हियरा का भाषा से लिखाले. एही से पाती पावे वाला छोहन छाती से पाती लगा लेलन. अइसने प्रेम पाती लिहले-दिहले ऊधो एक बेर मथुरा ले गोकुला जुमलन. मनभावन मोहन क मीत, सनेहिया के सनेसिहाव, मनरुचा ऊधो के अचके में आइल सुनि के गोपी लोग बेहाल हो उठल. आपन सुध बुध बिसारि दीहल लोग. जे जहें से ई समाचार सुनल से तहे से तड़ा-तड़ी धधाइल-अगराइल-अरबराइल अगहुँड़ दउरल. नन बाबा का दुअरा ऊधो जी का चहुँपते पाती पढ़े खातिर झुमेल लागि गइल. बीच में पाती लिहले अकचकाइल उजबुक लेखा सुधवा ऊधो जी आ उनुका चारू ओरि प्रेम-दिवानी गोपी लोगनि क हुमेल. धीर ना धरात रहे, बेकली बढ़त जात रहे. पाती के छाती से लगावे बदे लोग पंजा पर उचके लागल. फिरु का भइल? रत्नाकर जी गवाह बानीं –
”हमकौ लिख्यौ है कहाँ? हमको लिख्यौ है कहाँ?
हमकौ लिख्यौ है कहाँ? कहन सबै लगीं.“

सूरदासजी क साखी बा कि अपना सामसुनर क अइसने प्रेम पाती पाके मन के गहिरन गोपिन का आरु आ गइल आ ओह लोगनि क डबडबाइल आँखि क लोर लरकि परल. आँखि क मोती ढरकि गइल. थम्हाव ना लीहलस, सम्हरले सम्हरल ना. जतन जवाल हो गइल. बिना सावने क बदरी बरसे लागल. फिरु त ”निरखत अक स्याम सुन्दर के हवै गइ स्याम स्याम की पाती!“ कतहूँ त अन्हरिया में पाती बाती आ सँघाती के कार करेले अवरी तकहूँ छाती फारेले. रावन क पठवनिया सुकनासिक लखन लाल जी क दीहल अइसने छतिफार पाती रावन का हाथे थम्हवलस. लखन लालजी क ई पाती का रहे? ई हनुमान जी का पोंछ का लूक क लाफ फेंकत लवर रहे, जेसे रावन क छाती जरे लागल आ पाती बाँचि त घललस बाकी बाँचे के ओके कवनो दवर ना भेंटाइल. कतो-कतो चिट्ठियो भट्ठी मतिन दँवकि उठेले. छाती फारे वाली पाती अनदेखाइयो मेंहें लिखाले. एके लखनलाल नियर बीरे ना लिखेलन. एके लिखेलन अनभल देखे वाला मुरुख, गँवार, खल आ नीकहन के सठ. बहुता त अइसन चिट्ठी भर ……… नयर सोझा-सोझी आ डिठार ना, अलोते लिखाले. बे ठर-ठिकाना के. अवर परोसी सराये ले असरा. जेकरा सराये ले आहि अलम रहि जाला, ओकर रोआँ जो टूटल त ओकरा से अइसने कुकरम होई. हम त सपनो में अपना गरकट मुद्दइयो के छाती फारे वाली अइसन घाती पाती ना दीहल चाहीलाँ. अइसन राढ़ बेसहल हमरा ना सोहाला. हारल-थाकल आदिमी एही के मरदुम्मी बुझेलन. बाकी डूबि के पानी पिअल कवनो पद के बात ना ह. हमरा समुझे से बज्जर चलावे वाला नीमन. ”बज बचन जेहि सरा पिआरा“ – उनहूँ के राम-राम. बाकिर त छानी फारेवाली, ढाठी देबे वाली एह घाती पाती लिखे का घात में रहे वाला पाँजल पाजी, अनदेखना, मुरुख, गँवार आ सठ के हम सइ हाथ फरकवें ले सलाम करीलाँ. केहूँ अनुभवी के राय बा जे-
”सात हाथ हाथी से डरिहऽ चउदह हाथ मतवाला.
सइ हाथ ओकरा से डरिह, जेकर नाँव सुरतवाला..“

बाकि हमरा से जो पूछल जाव त हम ई हे कहब जे सुरतवलो के ढेर सजग आ चिहुँकल पत उतार लेबे वाला पाती का लिखनिहारन से रहे के चाहीं. एह लोग ले हम गन-गन काँपीलाँ. हम आठो घरी ई हे बिनइलाँ जे जीव जरावे वाली पाती पढ़े भा लिखे के रामजी लगन मत करसु. हमरा समुझ से त पाती ऊ ह जवन पत राखे, अन्हरिया में अँजोरिया करे. पाती थाती हऽ, छाती ले लगा के सेंके, जतन से परान का पाछे राखे आ गरब-गुमान करे के चीजु ह. पाती ऊ बाती ह जवन बिसभोर परल डहर फेनु से धरा दे. एके पावते दूर देस में डहरल पिया, बिदेसे विलमल बेदरदी बलमा का हिया में प्रेम पलुहे लागेला. आ सँवरिया क प्रेम पगल पाती का पूनम क दरस पाके परस खातिर गोरिया क हिरोहत हियरा हिलोर उठेला. अपना सुगना क सनेह से सरबोर सनेस पाके सुग्गी निहाल हो उठेली. हरिनी आपन चितचोर चकित चितवन चारू ओरि डाल रहल बाड़ी. चितचोर के चितवत, पिया क पंथ हेरत-हेरत अपनहीं हेरा गइली, बेदरदी बलमा नेहा लगाके, भरोसा देके अबहीं ले ना आइल. बिरह पिया का सुधि क मथानी से मन मथ रहल बा. पीर क लैनू गहिरात जात बा. आँखि में आँखि लागल बा, आँखि लागो त कइसे लागो? ‘पिया क पंथ निहारत मोरी सगरी रैन सिरानी हो.’ एनी ले त पाती लिखाइल, खूबे लिखाइल. एतना लिखाइल कि ”सँदेसन मधुबन कूप भरे.“ बाकिर ओने से? ओने के त ई हाल बा जे ‘अपनो नहि भेजत नँद नन्दन हमरो फेरि धरे.’ चोली सूखे के नाँव नइखे लेत, आँखि में सावन-भादो छवले बा. छाती ले पनारा बहि रहल बा. राति कटले कटात नइखे, दिन ओरात नइखे. जिनिगी जवाल हो गइल. डहकि उठत बाड़ी ‘आहि हो बालम?’ …. करेजा करकि गइल. तले से एतने में आ गइल पाती. छाती जुड़ाइल. बालम बिना बेहाल प्रेम क पिआसल हरिनी अपना पिया क सनेस पाके गह-गहा उठली. ”तनी अउरी दउर हिरनी पा जइबू किनारा हो.“ रचिकी धीर धरे के साजन कहत बा. धनियाँ का धीर धरहीं के परी. जबले साँस तबले आस. साँस क पहरुआ पाती बनि गइल, साँस जाव त जाव कवना राहे? पापी पपीहरा जब ‘पिउ-पिउ’ क रट लगा के करेजा किकोरे लागेला, अमवा क बगिया में बइठलि कोइलरि ‘कुहुकि-कुहूकि’ हियरा में हूक जगावे लागेली त बिरहा क आगि में विरहिन के देहिं दहकि उठेले, जीए के आस अरुझा जाला. एतने में आ जाले हिया के हुलसावे वाली हरि जी क पाती. अँचरा पसारि के पिया क प्रेम पाती धनि ले लेली. छाती से पाती लगा के जियरा जुड़वावे लागेली. सजनी अपना साजन क पाती परस-परस, निहार-निहार निहाल हो उठेली. मन के तीहा देली, ”चढ़ते सावन सरसावन मनभावन अइहन, फिरु त ई मुरुझात सनेह क लता लहसे लागी, पलुहत-फफनत देरी ना लागी.“

ई बेटी हई. हाथे पाती लेले बाड़ी, बँचात नइखे. बँचाव त कइसे बँचाव? दूनों आँखि लोर ले भरभरा गइल बा, जइसे होत भिनुसहरा कमल-कोष में बटुरा गइल होखे. बाबा क बगिया इयादि परति बिया, मन भींगि रहल बा. बाबा क मीठ बोल, माई क मोह, भइया क छोह, भउजी क ढीठ दुलार-निनार, सखी-सहेलर क नोना-चोन्हा, ऊ संग-साथ, सहजोर अँमुदउवल-गुदरउवल अवरी सीखवल सुगना क ”मुन्नी-मुन्नी“ रट, अपना बछिया के दूध्या-पियाअवत-चाटत धवरी गइया, तुलसी माई क चउरा, सँझवाती, ‘आखो-माखो दिअवा चाखो’ केतना इयादि करीं? केतना भुलवाईं? ई हमरा मन के नइखे, बूतो के नइखे. पीर पोरे-पोरे, गाँसे-गाँसे समा गइल बा. एइसने त पाती लिखाले-पढ़ाले कुसल-छेम क एह पाती खातिर गंगा मइया के पियरी चढ़ावे आ तनाव करे के मनौती कइल जाले. पियार क ई पियरी, साध क ई चढ़ावा आ भाव-अरमान क ई तनाव बड़ा अनमोल होला. एही पाती खातिर कउवा मामा ले उचरे बदे मिनती कइल जाले. कउवा मामा ले उचरे बदे निहोरा आ मनावन करत खान ई बचन दिआला कि जो बालम क, बाबा क, भइया क, भउजी क, आँखि के जोति प्रान प्रिय लाल क पाती जो आजु मिलि जाई त सोने से तोहार चोंच मढ़ाइब, सोने के कटोरी में तोहें दूध-भात खियाइब. केतने बेर कउवा क चोंच भावना क सोना से मढ़ाइल आ केतने बेर भावना का सोने क कटोरी में उनुके मन भर प्रेम क दूध आ बिसवास क भात खिआवल गइल. एकर कवनो लेखा-जोखा नइखे. ई बात ना रहित त कउवा काहें पतिअइतन, बेर-बेर काहें उचरतन? हम त ईहे कहबि जे कउवा भावना, प्रेम अवरी बिसवास क के आदर-मान करेलन. प्रीति के रीति ऊ जानेलन. आ रउरा? डूबि मुई ना.

लेखक संपर्क – कोरन्टाडीह, उजियार, बलिया

(भोजपुरी दिशा-बोध के पत्रिका पाती से साभार)

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By Editor

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