Banachari-cover-final

– डा॰ अशोक द्विवेदी

सोझा बन के कुछुए भीतर एगो बड़का झँगाठ फेंड़ का ऊपर से दू गो आँख ओनिये टकटकी बन्हले भीम आ उनका पलिवार का एक-एक हरकत के देखत रहे. भीम के, साँझि से एह सुतला राति ले तनिको सुनगुन ना मिलल रहे कि ओह लोगन पर नजर राखल जा रहल बा. अइसन ना कि ओह भयानक लउके वाला नीरस बन में चारू ओर खाली भयानके लागे वाला दृश्य रहे. उहाँ सब कुछ रहे… जइसे कि बरसाती जल क स्वच्छ जलाशय, फूल, फर आ सुघर लतरन से तोपाइल अनेक किसिम के फेंड़. कहीं कहीं त बइर के लदरल गाँछि अइसहीं मन ललचावे. भीम अइसनके बइर का एगो गाँछ से अँगौछा-भर फर तूरले रहले. उनका पता ना रहे कि ओह पूरा बन-क्षेत्र पर हिडिम नाँव के एगो असुर क कब्जा रहे. ऊँच ऊँच पहाड़ी ढलान पर उगल शाल आ साख के विशाल फेड़ रहलन सऽ. हिडिम आलसी, क्रूर आ भयानक रहे. ओकरा डरे, बन का ओह सउँसे क्षेत्र में वातावरन, उदास डरावना आ नीरस हो गइल रहे.

साँझ होखे का पहिलहीं, जब भीम के पलिवार के लोग ओकरा क्षेत्र में घुसल, तबे हिडिमासुर के पता चल चुकल रहे. ऊ अपना मायावी शक्ति से बन के स्थिति बदले के सामरथ राखत रहे. बाकी अहंकार, आ क्रोध ओकरा कपार पर सवार रहे. ऊ राजा लेखा काम भले ना करे बाकि सबका पर हुकुम चलावे; इहाँ तक कि सहोदर बहिन हिडिमा के ऊ दासी लेखा हुकुम देत रहे. एतना अधिक संख्या में एगो मानव दल देखि के ओकरा जीभ पर पानी आ गइल रहे. ऊ अपना कबीला में जाके, विशिष्ट भोज खातिर तइयारी करे क हुकुम दिहला का साथ आज फेरू अपना बुधिगर, रूपवान बहिन हिडिमा के हिदायत देके भीम का पलिवार पर नजर राखे खतिर भेजले रहे. ओकरा पूरा यकीन रहे कि हिडिमा शिकार के नीक से फाँस ली. हिडिमा अनिच्छा से उहाँ गइल त सुघ्घर, रूपवान, देंहिगर आ दिव्य लउके वाला एगो अजबे परिवार ओकरा सामने रहे.

सोझा बइठल गठल देह धजा आ चाकर छाती वाला रूपवान व्यक्तित्व के स्वामी जुवक के पौरुष आ सामरथ ऊ देरी से देखत रहे. आँख झपकावत ओकर निढाल पुष्ट सगरी शरीर निगिचा जरत आग का धीम लपटन से उठत अँजोर में ओके भितरे-भीतर बेचैन करत रहे. आज ओकर मन बदले खातिर बहुत कुछ रहे, जइसे खाना के प्रबन्ध करत भीम आ उनका भाइयन के आपुसी प्रेम आ एकता. हिडिमा का मन में का जाने काहे सहानुभूति आ दया क भाव उपजे लागल रहे. सबले सुखद अनुभूति ओकरा तब भइल जब ऊ ओह शान्त सहज औरत के भोजन परोसत देखलस. गोलाई में बइठल अपना बेटन के दुलार भरल शीतल दीठि से निहारत ऊ भोजन अइसे परोसत रहली, जइसे संसार क सबसे स्वादिष्ट नियामत धरत होखस. हिडिमा के आपन लरिकाईं इयाद परे लागल रहे, काश ओकरो महतारी जीयत रहिती…ओकर आँख छलछला उठल रहे. ओके त अपना अहंकारी भाई से हमेशा निष्ठुर व्यवहार आ मार मिलल रहे. अपना कुल के मायावी बिद्या, शारीरिक शक्ति आ चुस्ती-फुर्ती का कारन हिडिमा भलहीं मानव से इतर बलशाली आ असामान्य रहे, बाकि नारी-सुलभ रूप-लावण्य आ नैन-नक्श कम ना रहे.

बे साज-सँवार के जिनिगी जिये वाली जंगली जाति का बावजूद हिडिमा का भीतर एगो नारी हृदय रहे आ ओमे करुना आ दया के मधिम सोत संचित रहे. जातिगत संस्कार आ जीवन-शैली ओके असभ्य आ जंगली का रूप में भले प्रस्तुत करे, बाकि जइसे अँगारी राखि का परत का नीचे तोपाइल रहेला, हिडिमा का भीतर प्रेम आ दया के धीम आँच जरूर रहे. अपना क्रूर, हिंसक भाई हिडिम, जवन ओकरा समाज के नायक आ अधिपति रहे अपना आचरन आ व्यवहार का कारन ओकरा कबो पसन ना परल. नर बलि आ नर मांस भक्षण का क्रूर कार्यक्रम में ऊ कब्बो शामिल ना भइल. एकाध बेर एकर बिरोध करत में, ऊ अपना भाई से पिटाइ चुकल रहे. ऊ जानत रहे कि ऊ अगर हिडिम के बहिन ना रहित त एह बिरोध पर कहिये जान से हाथ धो देले रहित. आज भाई का सख्त हिदायत आ धमकी भरल आदेश पर ऊ एह पूरा परिवार पर नजर गड़वले रहे, जवन खइला-पियला का बाद अब आराम करत रहे. फेंड़ का ऊपरी डाढ़ि पर गझिन पतइन का बीच छिपल हिडिमा का भीतर भीषण अन्तर्द्वन्द छिड़ल रहे. भीम नाँव क ऊ मोहक बलशाली पुरुष टेक लगवले जाग के अपना सूतल पलिवार क निगरानी करत रहे. बहुत देर का इन्तजार का बादो काहें ऊ ना सूतल? का ओकरा नीन ना आवत रहे? साइत पलिवार का प्रति अतिशय प्रेम आ सुरक्षा के चिन्ता में ऊ जागत रहे…. हिडिमा सोचलस.

तन्द्रालस भीम के पसेना चुहचुहाइल चिक्कन सुघर सुगठित देंहि आ सुघराई में न जाने कवन खिंचाव रहे कि हिडिमा के ओकरा पर आसक्ति आ मोह बढ़ल जात रहे. ओकर मन इहे करत रहे कि जाके धीरे से लगे बइठ जाव आ ओके भर आँखि निगिचा से निहारे. आजु ले कब्बो केहू खातिर अइसन पागल-अनुराग ओकरा भीतर ना जागल, फेरू का कारन बा कि एह सुघराई पर ऊ मोहित बिया? ‘… हे दइब ! ई कवन लीला हऽ तोहार… हमार मन काहें अवश आ बेकाबू हो रहल बा ?’ ऊ मनहीं मने अपना देवता के सुमिरन कइलस. बाकिर छान-पगहा तोरावत ओकर मन माने तब नऽ.

कहल जाला कि देवता आ राछस अदिमिये के बनल बिगड़ल रूप हऽ. रूप, आकार, भेख आ पहिरावा का जरिये अदिमी के आदमी, देवता आ राछस नियर देखावल जाला बाकि साँच त इहे बा कि अदिमी अपना आचार-व्यवहार सोच आ अच्छा-बुरा कर्म से देवता भा राछस बनेला. अदिमी अपना कुल जाति पलिवार समाज का संरक्षन में संस्कार, सोच-बिचार आ जीवन-संस्कृति पावेला. ज्ञान के अँजोर में, अच्छा-बुरा चीन्हे जाने का साथ सुभाव के गुन-धर्म में ओकर चरित्र बिकसित होला. अज्ञान के अधिकता आ ओकर अतिशय सक्रियता अदिमी के राछस बना देला. बनइला आ हिंसक जन्तुअन का बीच रहे वाला जंगली लोगन के अज्ञान आ हिंसक प्रवृत्ति का साथे सभ्य कहाये वाला कथित समझदार समाज ओके हमेसा अपना नजरिया से असभ्य आ असंस्कृत मानि के ओसे आपन दूरी बनवले रहि गइल. हिडिमा एही जंगली आ असभ्य जाति के रहे- एगो अइसन नारी प्रतिनिधि, जेकरा भीतर सभ्य आ सुशिक्षित समाज का नारिये लेखा रूप, नैन-नक्श, शरीर के सुघराई, यौवन, प्रेम, दया आ करुना से भरल हिरदया रहे. लाज आ सँकोचो रहे तबे न ऊ अबले अपना के रोकि के रखले रहे.

एक छिन खातिर भीम के झपकी आइल फेरू कवनो खुरखुराहट से आँखि खुल गइल. नीन भगावे खातिर ऊ खड़ा होके, ओही जगह टहले लगलन. खरखराहट का दिशा में कान रोपि के आपे क कोसिसो कइलन त कवनो औरत क मद्धिम सुसुकी सुनाइल. ऊ तनिकी भर आगा बढ़ि के देखलन, कुछु ना सूझल त जरत आग में से एगो जरत मोट लकड़ी खिंचलन आ ओकरा लपट का अँजोरा देखे के उतजोग करे लगलन. कुछु अउर आगा एगो फेंड़ का जरी बइठल एगो मेहरारू अपना दूनो ठेहुना पर मूड़ी नववले सुसुकत लउकल. भीम लुकाठी के अँजोर आगा करत पुछलन, ‘एह सुनसान रात खा, निर्जन बन में अकेल तूँ के हऊ आ काहें सुसुकत बाड़ू?’

– ‘हम हिडिमा हईं!’ ऊ मूड़ी उठवलस. काँच आम का फाँक अस बड़ी-बड़ी आँखि लोर से डबडबाइल. बाकि चमक भरल गोहुवां रंग, सुन्दर सुगढ़ चेहरा आ गुदगर देंहि. सबसे खास बात ई कि ओकरा दीठि में एगो मासूमियत आ खिंचाव रहे. भीम का ओकरा से सहानुभूति भइल बाकि छिन भर खातिर भीम का भीतर सवाल उठल …. कहीं ई कवनो मायावी परपंच ना नु हऽ? भा कहीं ई हमहने लेखा कवनो यात्राी परिवार क बिछुड़ल ना नु हऽ? ई खुद अकेल एक राती खा, इहाँ निर्जन जगह कहाँ से आ कइसे आ गइल?

– ‘हम हिडिमा हईं! हिडिमा उनकर अचकचाइल देखि सहज भाव से बोलल, ‘हम एह बन के अधिपति हिडिम के बहिन हईं. रोवत ऐसे बानी कि हमार क्रूर भाई तोहन लोग के फँसा के ले आवे खातिर हमरा के भेजले बा, बाकिर हम तोहन लोग के दिव्य रूप, आपुसी लगाव आ प्रेम देखि के प्रेम वश मोह में परि गइलीं. तहरा के देखि के हमरा भीतर से अनुराग के पहिल अँखुवा फूटल बा, हम तोहसे सचहूँ प्रेम करे लागल बानी. हम नइखीं चाहत कि, हमरा हिंसक मांसभक्षी क्रूर भाई का हाथे तोहन लोग के कवनो हानि होखे. तोहन लोग के बँचावे के उपाइ सूझत नइखे… हिया में उफनत प्रेम आ हमरा निर्दयी भाई के प्रानघाती हमला का डरे अपना असहाय के स्थिति में पाइ के रोवाई बर गइल हा. तूँ तुरंते अपना परिवार सहित इहाँ से भागि चलऽ हम तोहन लोग के बचाइब.“ हिडिमा झट से उठ खड़ा भइल.

– ‘अच्छा, त तूँ ओह मायावी राछस के बहिन हमन के फँसावे भरमावे खातिर आइल रहलू?’ खीसि में भरल भीम का हाथे जरत लुवाठी झटके से नीचे आ गइल. एगो असहाय औरत का प्रति थोरिके देर पहिले मन में उपजल सहानुभूति, दया आ अनुराग पर जइसे ऊ अपने पर झुँझला उठलन.

– ‘ना-ना, अइसन नइखे… बाकिर तहार ई सोचलो सही बा. हम हिडिम जइसन निरदई, आ क्रूर राच्छस के सहोदर बहिन जरूर हईं, बाकि हाथ क पाँचो अँगुरी एक्के लेखा ना होले. हमरा बन क्षेत्र में सब लोग एक्के अस नइखे. इहाँ हिडिम्ब के अत्याचारी सुभाव आ चाल-चलन वाला बहुत कम… कुच्छे लोग बा, साइत ओकरा डरे. खुद हमहीं ओकरा डर से तोहन लोग पर नजर रखले रहनी हाँ बाकि साँच मानऽ तहरा आ तोहरा सुघर परिवार खातिर हमरा मन में सुच्चा प्रेम का अलावा जदि कुछ बा त ईहे, कि तोहन लोग के बँचावे खातिर हम, तोहन लोग के लेके कहवाँ भाग जाईं?’ हिडिमा का एह कथन में कवनो बनावटी स्वांग आ छल ना रहे; ई भीम समझत रहलन, बाकि राच्छस का डरे ऊ चैन से सूतल अपना भाइयन के नीन में बाधा ना डालल चाहत रहलन.

– ‘आवे दऽ ओह असुर के! ओकरा डरे हम अपना माई अउर भाइयन के ई सुखद नीन चउपट ना करब.’ ऊ निश्चिन्त भाव से कहलन.

हिडिमा का बेकल मुख पर एक छिन खातिर भय आ आशंका के करिया बादर घुमड़ि आइल… ‘तूँ नइखऽ समझत कि ऊ केतना खूँखार आ निर्दई हऽ… बस पहुँचहीं वाला बा ऊ! तहरा साथ-साथ हमरो के मुवा घाली! जेकरा मुँहें एक बेर खून लागि जाला, अतना जल्दी ना छूटे!’

– ‘ठहर जो! अरे निर्लज्ज, तूँ अपना सगा भाई आ राजा से विश्वासघात त कइबे कइले, एह साधारन मनुष्य से प्रेम क के अपना कुल आ कबीलो से द्रोह कइले. अब हम सबसे पहिले तोरे बध करब.’ खीसि में आँखि से लुत्ती फेंकत, करिया कलूठ, डेरवावन रूप वाला हिडिम्ब अचके प्रगट हो गइल. विशाल काया वाला ओकरा बदरंग देंह से दुर्गन्ध आवत रहे. खून नियर लाल-अंगार आँखिन से खीसि के लुत्ती निकलत रहे. ओकरा गरदन में दू-तीन गो खोपड़ी के गूँथल माला रहे.

एक छिन खातिर भीम हिडिमा का ओर बढ़त ओह दीर्घकाय डरावना राच्छस के तकलन, फेर बिना बिचलित भइल, क्रोध में ओके ललकरलन, ‘अरे कायर! औरत पर का मर्दानगी देखवले बाड़े? तोरा अपना बल आ बीरता के एतना घमंड बा त हमरे से लड़ तूँ!’ फेर ऊ लमहर साँस खींचि के दूनो भुजा फइलवलन आ आपन दहिना पैर जोर से भूंइं पर पटकलन त उहाँ के जमीन दलकि गइल.

– ‘अच्छा तऽ तेंही मरू पहिले, हम पहिले तोर खून पीयब, फेर तोर बोटी-बोटी काट के खाइब!’ हिडिम बेग से भीम पर झपटल.
– ‘ना भाई हिडिम ना! इनके हम आपन पति मान चुकल बानी! इनके मारि के तूँ हमनी का बन-परंपरा के लांछित मत करऽ.’

हिडिमा कातर भाव से घिघियाइल त हिडिम का जरत क्रोध से उठत लपटन में जइसे घीव के आहुति परि गइल. ऊ जोर से हुंकार भरलस आ गोहुँवन साँप लेखा फुफकारत भीम पर छलांग लगा दिहलस. भीम अपना दूनो पंजा पर ओकरा बेग के ओइसहीं रोकि लिहलन, जइसे अपना दर प जमल चट्टान ऊपर से भहराये वाला दुसरा चट्टान के रोकि लेले. हाथापाई करत ऊ हिडिम्ब के दूनों कलाई जोर से पकड़ले पाछा पड़े धसोरते रहलन कि ऊ उनका के झटकारत अपना दहिना पंजा से भीम पर भयानक प्रहार कऽ दिहलस. उनकर कान्हि, ओकरा बघनख अस बढ़ल नोंह से घवाहिल हो गइल.

धीरे धीरे इ द्वन्द भयानक जुद्ध में बदलि गइल. मुक्का आ केहुनी के हुंकार भरल प्रहार दूनो ओर से होखे लागल. एक ओर एक दुसरा के खून के पियासल दूनों के पसेनियाइल लहुआइल देंह के टकराव आ दुसरा ओर बन सुन्दरी हिडिमा के भयकातर चेहरा. हुंकार आ फुफकार का आवाज से भीम के सूतल भाई जाग चुकल रहलन स. सबकर नजर सबसे पहिले डेराइल सहमल ओह नवयुवती पर परल. केहु का समझ में ना आइल कि इहाँ ई सुन्दर युवती कहाँ से आ गइल आ ऊ भयानक राच्छस….! भीम के अनुज झपटल चललन सऽ त माता रोकली…. ‘दू आदमी का मलजुद्ध में, तिसरा के घुसल उचित नइखे.’ अपना हर भयानक वार से भीम के बाँचल देखि के हिडिम्ब के झुँझलाहट आ उग्रता चरम पर पहुँच चुकल रहे. हिडिम्ब अब अपना मायावी रूप में देंहि दोबरी कइ के फेंड़ उखारि-उखारि भीम पर फेंके लागल रहे. भीम के उछलत कूदत, परेसान देखि हिडिमा आँख मूनि के कवनो मंतर बुदबुदाइल त हिडिम्ब अपना असल रूप में आ गइल. बहिन के शत्रु के पक्ष लिहल देखि ओकर क्रोध पागलपन में बदल गइल, ऊ उछाल मरलस त भीम आखिरी क्षन में दहिना ओर उछलि गइलन आ ओकरा मुँह का भरे भहराते, ओकरा पीठ पर अपना ठेहुना से जोरदार प्रहार कइलन. हिडिम्ब अइसे डँकरल जइसे कइ गो घोड़ा एक्के संग हिनहिना उठल होखन स.

पानी जब साफ आ थिराइल रहेला, तब्बे ओमे कवनो परछाहीं भा छबि लउकेले. हिंडोरत, हिलत पानी कबो चेहरा देखावे वाला ऐना ना बने. भीतर का अज्ञान आ क्रोध का पागलपन में हिडिम्ब अपना बिकृत रूप के ना देखि पवलस. बिबेक खो दिहला का कारन, सामने क साँच ओकरा ना बुझाइल, नतीजा में ओकर पंजा फेरू भीम का पंजा में गँसि गइल. कबो भीम ओकरा के ठेलत पाछा ले जासु कबो भीम के ठेलत ऊ पाछा ढकेले. नीचे के बन, झाड़ी घास रउँदा गइल रहे आ जमीन जोतला खेत लेखा खोनाइ गइल रहे. हिडिमा अब आपन भय तेयागि के अपने भाई पर आक्रमण का मुद्रा में आ गइल. धीरज से देखत माता, युवती का मनोभाव के समझि के ओकरा लगे चलि गइली, फेर ओकरा कान्ह पर हाथ रखत धीरज दिहली, ‘धीरज धरऽ बेटी, हमार बेटा एकरा खातिर सक्षम बा.’

नकार आ अहंकार के मानस हरमेसा साँच के झुठियावल चाहेला. सामने परतच्छ जथारथ के साँच ओकरा अहंकार के चुनौती देत, भीतर का क्रोध के बढ़ावेला. अइसन में ओकरा भीतर उठत कुबिचार आ जिद ओकरा के बिनास आ बिध्वंसे का ओर ले जाला. हिडिम का भीतर चिढ़, जिद आ क्रोध के भाव ओके आन्हर बना चुकल रहे. ऊ भीम के आत्मबल, साहस आ शारीरिक बल के परखला का बावजूद सकारे के तइयार ना भइल. नकार ओकरा खीसि आ जोम के अउर बढ़ियाइ दिहलस… एह हालत में ओकर बिनास त निश्चिते रहे.

ए बेरी जब ऊ खीस में भीम का तरफ बेग से झपटल त चौकन्ना भीम, तेजी से जगह बदलत ओके लँगड़ी मार दिहलन, फेरू ओकरा मुँह का भरे गिरते सिंह लेखा ओकरा पीठ पर चढ़ल भीम ओके दोहरउवा सँभरे क मोका ना दिहलन. ओकरा रीढ़ पर, उनकर ठेहुना आ गरदन पर केहुनाठ के लगातार चोट, हिडिम्ब के पस्त क दिहलस. ओकर दूनों बाँहि उल्टा दिसा में घुमाइ के ममोरत खा भीम के दहिना लात ओइसहीं ओकरा रीढ़ पर जमल रहे. हिडिम का मुँह से पीड़ा के भयानक चीत्कार, आसपास का फेंड़ आ झाड़ियन में छुपल तीर-भालाधारी बन सैनिकन के जगहे पर जड़ क देले रहे. भीम के रौद्र रूप में भरल हुंकार उनहन का भीतर अचरज भरल भय बन के घुसि गइल रहे. अपना राजकुमारी हिडिमा के चुपचाप खड़ा देखि के ऊ असमंजस में रहलन स.

भीम अलस्त मरणासन्न हिडिम्ब के उलाटि के चित करत गर्जना कइलन, ‘तोरा नियर आतताई, नरभक्षी राच्छस के जियल ब्यर्थ बा. तोरा रहले, ना रहले एह बन का धरती के कुछु फरक ना पड़ी, एह से तोर मुवले ठीक बा.’ कहत भीम एक पोरसा ऊपर उछड़ि के आपन ठेहुना ओकरा छाती पर दे मरलन, ऊ बध कइल जात जानवर लेखा डँकरत खून बोकरि दिहलस. ओकरा निर्जीव शरीर से अलगा हटत भीम आपन दूनों हाथ ऊपर उठाइ के अतना जोर से हुंकार भरलन कि बन क पतई ले काँप उठल.

आँखि से लगातार आँसु गिरावत हिडिमा का कान्ह पर ढाढस के हाथ फेरत माता पुछली, ‘तूँ के हऊ बेटी आ इहां अचानक कइसे आ गइलू? ई राच्छस कइसे आ गइल?’
– ‘हे माई ई एह बन के स्वामी हिडिम्ब हऽ आ हम एही क बहिन हिडिमा. हम अपना भाई आ बन के स्वामी का आदेश का खिलाफ जाके रउरा एह बलशाली पुत्र से प्रेम कइले बानी. पहिले नजर में, इनका पर मोहित होके इनके पति मान चुकल बानी.’ हिडिमा निश्छल भाव से कहलस त माता का ओकरा खुलल प्रेम के इजहार आ अब तक लउकल घटना-प्रसंग से सहजे विश्वास हो गइल कि ऊ झूठ नइखे बोलत. ऊ चुपचाप शान्त होत भीम के देखली.
– ‘माई, आदिवासी आ भीलनी एकबेर जब केहु के आपन दिल दे देले त ओकरे प’ न्यौछावर हो जाले. हमनी का परंपरा में, जे राजा आ सरदार के हरावेला भा मार देला, ऊहे हमहन के राजा बनेला… कहत-कहत हिडिमा शान्त भाव से सोचत माता के चरन पकड़ लिहलस’.

माता बिचलित रहली. उनकर लड़िको सुनि के बिचलित हो गइलन सऽ. आपन असलियत प्रगट होखे का डरे केहू केहु के नाँव लेके ना बोलावत रहे. इहाँ एह अजनबी अनार्य जाति का बनवासियन में अचानक फँस गइला से ओह लोगन में एगो दुसरे दुबिधा खड़ा हो गइल रहे.

– ‘बेटी हमनी का नीति-नियम का मोताबिक जेठ बेटा के बियाह पहिले होला. तूँ जेके अपनावल चाहत बाड़ू, ऊ मझिला हउवन.’ माता दुबिधा के कोर छुवत धीरे से कहली
– ‘माता, आप काहें नइखीं समझत? इहाँ हमरा कबीला के लोग खड़ा सुन रहल होई, हम सँचहूँ आपका पुत्र पर आपन मन हार चुकल बानी, आ इनिका बिन हमरा जीवन के कवनो अरथ नइखे!’
– ‘भला एगो आर्य कुल में तूँ कुलबधू कइसे बन सकेलू? हमार समाज राक्षसी अनार्य कुल में बियाह के मान्यता दिहल त दूर एकर खिल्ली उड़ाई! ऊ समाज तोहरा निश्छल प्रेम के पवित्रता ना देखी. बेटी तूँ खुद अपना राज के राजकुमारी बाड़ू! हम तोहके सुखी आ स्वतंत्र रहे के असीस भर दे सकत बानी!’ अतने कहत कहत कुन्ती क करेजा फाटे लागल.

हिडिमा कातर भाव से कुन्ती का ओर देखलस, फेरू फेंड़न का पाछा आ लता-झाड़ियन का आड़ में बिखइल बाण धनुष आ तलवार-भाला लेके तत्पर बनबासी रच्छकन के सुनाइ के जोर से बोलल, ‘महाबली के पूरा पलिवार सहित राजसभा में ले चलऽ लोग! उहाँ हमनी का रीति-रेवाज का मुताबिक स्वागत सत्कार कइल जाई!’ बात खतम होत कहीं कि एक पल में अपना हरबा हथियार समेत बन रच्छक बाहर आ गइलन स आ पलक झपकावत ओह लोगन के घेरा में लेके राजकुमारी हिडिमा आ महाबली क जैकार करे लगलन सऽ. कुन्ती व्याकुल होके अपना बेटन का ओर देखली.

– ‘ए घरी त उहे करे के पड़ी, जवन ई लोग कहत बा. माता तूँ चिन्ता मत करऽ!’ युधिष्ठिर शान्त भाव से कहलन. घेरा में लेले आदिवासी रच्छकन में से दूगो अपना नायक का संकेत पर चउकड़ी मारत गझिन बन में गायब हो गइलन सऽ.

कुछ दूर चलला का बाद साफ आ चौरस बन क्षेत्र आ गइल रहे. दूरे से बाँस बल्ली गाड़ि के बनावल ऊँच छरदेवाल वाला एगो साफ सुथरा रिहाइशी क्षेत्र लउके लागल. ओकरा मुख्य दुआरि का फाटकन के पल्ला खुलल रहे. दुआरि का दूनों ओर पाँच-पाँच गो रक्षक अपना हथियारन का साथ खड़ा रहलन स. हिडिमा के अपरिचित परिवार सहित आवत देखि के दाढ़ी बढ़वले दू गो बुजुर्गन का साथ एगो साफ सुथरा अधेड़ रहे, जवन कमर में बाघ क चर्म बन्हले रहे. ओकरा हाथ में कवनो हथियार ना रहे, बाकिर उहाँ खड़ा लोग ओकरा आगा बेर बेर आदर भाव देखावत आपन मूड़ी डोलावत रहे. भीम का साथ हिडिमा के निगिचा आवत देखि के ऊ अधेड़ बुजुर्गन का साथे तेज चाल में आगा आइ के अगवानी कइलस, फेरू कद काठी में बलिष्ठ लउके वाला भीम क परिचय पुछलस. ‘हम वृकोदर हईं. ई हमार बड़ भाई, हई हमार आदरनीय माता आ हई लोग हमार छोट भाई ह लोग.’ भीम जल्दी जल्दी में परिचय दिहलन. पाछा चलत हिडिमा बृकोदर नाँव पर जरूर चिहुँकल, बाकि ई सोचि के कि कवनो शंकावश साइत महाबली भीम आपन नाँव प्रगट कइल नइखन चाहत. ऊ चुपे रहल. बुजुर्ग हिडिमा का कपार पर नेह से हाथ फेरत ओके सान्त्वना देत कहलन, राजकुमार हिडिम अपना क्रूर कर्म आ उदण्ड सोभाव का कारन बनवासियन में पसन ना कइल जात रहलन.

– ‘ई हमनी के राज के मंत्राी चांडक काका हईं. हमेशा हमके बेटी क लाड-दुलार आ ज्ञान देत आइल बानी.’ हिडिमा उनहूँ के परिचे माता कुन्ती के देत, दुसरका दाढ़ी वाला बूढ़ का ओर इशारा कइलस, ‘इहाँ का पुरोहित काका, राज-समाज सबके भला-बुरा के ज्ञान करावत रहेनी.’

”महाबली बृकोदर के जय!“ साथ चलत कूल्हि रच्छकन का जयघोष का साथ सभ फाटक का भीतर आ गइल. दूर दूर तक जहाँ ले दीठि जात रहे बड़ छोट कूल्हि आदिवासी ठेहुनिया के आदर भाव से माथ झुकाइ के आदर प्रकट करत लउकल. भीम आ उनकर कूल्हि भाई एह समाज के आचार-बिचार आ व्यवहार से अचंभित रहे. बाड़ बनावल छरदेवाल का भीतर काफी बड़हन क्षेत्र रहे. अरियाँ अरियाँ कुटिया आ छोट छोट फलदार आ छायावाला फेड़ पौधा. जहाँ-तहाँ बनइला सूकर, बकरी वगैरह बान्हल लउकल.
(अगिला कड़ी के इन्तजार करीं.)


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डा॰ अशोक द्विवेदी के परिचय

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