बनचरी (भोजपुरी के कालजयी उपन्यास के छठवी कड़ी)

Banachari-cover-final

– डा॰ अशोक द्विवेदी

अइसे त प्रकृति के एक से बढ़ि के एक अछूता, अनदेखा मनोहारी रूप ओह विशाल बनक्षेत्र में रहे बाकिर कई गो मुग्ध करे वाला जगह, हिडिमा घूमत-फिरत देखले-जनले रहे. सबेरे माता जब ओके भीम का सँग खुला आहार-बिहार आ सँगे रमण करे के सुतंत्र कइली त ओके जइसे मन मांगल मुराद मिल गइल. अब ले नियम-अनुशासन आ बान्हन में बन्हाइल ओकर सुतंत्र अल्हड़पन आ खुला बात-ब्यवहार ओकर असली सुभावे छीन लेले रहल. प्रकृति आ जंगल-पहाड़ के बेटी, जइसे प्रकृतिये से बिलग हो गइल होखे. रात के लजात-सकुचात भीम का बलिष्ठ भुजपाश में समात खा ओके जीवन का ओह अकथ सुख आ आनंद के इयाद आइल, ओके बुझाइल कि अभी त ऊ ओके हीक भर भोगबे ना कइलस. देह के भूख अउर बढ़ गइल रहे.

राह में भीम का सँगे चलत खा ओकरा मन के कूल्हि बान्हल बान्ह अचके टूटि गइल, ऊ अचके उनकर बाँहि धरत उनसे लपटाइ गइल. भीम हक्का-बक्का, हिडिमा के ई खुला बेधड़क-भाव उनके अटपटाह लागल. ऊ हाथ छोड़ावत ओके झटक दिहलन. हिडिमा फेरू कामातुर लपटाये के कोसिस कइलस त ओके अपना से अलगियावत कहलन, ”एतना बेचैनी काहें बा तोहरा? इ जंगली व्यवहार ह!“
– ‘का, तहरा अच्छा ना लागल?’ हिडिमा अचकाइल पुछलस.
– ‘ना, ई सबेर के बेरा, न नहाइल – न धोवल, ना कवनो अइसन जगह, हमनी का कवनो पसु थोरे हईं जा, आ ना राछसे हईं जा, हमहन का सभ्य मनुष्य हईं जा. ’ भीम समझावे के कोसिस कइलन.
– ‘लेकिन एमे गलत का बा? हमनी किहाँ त युवक युवती एकान्त जगह में ई सब करे खातिर स्वच्छन्द बा! नारी पुरुष के आ पुरुष-नारी के निजी-प्रेम-बिहार पर कवनो रोक आ बान्हन नइखे. ’ हिडिमा फेरू भीम के बाँहि धरत कहलस.
भीम के समझ में ना आइल कि ऊ एह प्रेमातुर कामातुर युवती के कइसे समझावसु. ऊ मुस्कियात कहलन, ”हमनी का समाज में एकरा खातिर एगो मरजादा बा. ई सबमें अतना बेचैनी आ आतुरता, ऊहो असमय, बेमोका ठीक ना मानल जाला. “
हिडिमा रुकि गइल. ओकरा कुछ ना बुझाइल कि भीम का कहल चाहत बाड़न.
‘अरे पगली, पहिले हमनी का कहीं नहाइ धो के इतमीनान से कुछ जलपान क लीं जा, आराम से कवनो सुन्दर आरामदायक स्थान पर बइठि के बातचीत प्रेम-बिहार करीं जा. ’ फेर प्रेम से हिडिमा के अँकवारी में बटोरत, ठठाइ के हँसि दिहलन. हिडिमा प्रेम, उलझन आ खीसि का विचित्र भँवर में रहे, जब ओकरा भीम के बात बुझाइल त ऊ उनका बाँहि से छटकि के निकल गइल. भीम हँसि के पकड़े चहलन, त ऊ उनका छाती पर दूनो हाथे मुक्का मारत बोलल, ”छोड़ऽ, हटऽ तूँ बहुत खराब बाड़ऽ! हम तोहसे ना बोलब!“ बनावटी खीसि देखावत ऊ बोल त दिहलस, बाकिर ओकर मने जानत रहे कि एतने बात बोले में ओके, भीतर से कतना जोर लगावे के परल. फेर ऊ हँसत-खिलखिलात बायाँ ओर बन का भीतर भागे लागल. भीम ओकरा पाछा हँसत दउरत त रहलन, बाकिर हिडिमा का चुस्ती-फुर्ती वाली चाल पर हरान रहलन. अइसहूँ अपना विशाल भारी शरीर के लेके, अनजान पहाड़ी-बनइला राह में भागे के उनका अभ्यास ना रहे.

– ‘रुक जा हिडिमा! हम ना जानत रहलीं कि तूँ बन क हिरनी हऊ! हिरिमा, रुक जा!’ हँसत खिलखिलात हिडिमा भीम के बिकल स्वर सुनि के थथमि गइल, ई सोचि के ओकर विह्नलता अउर बढ़ि गइल कि ‘ऊ जेके पागलपन का हद तक चाहत बिया ऊहो ओकरा खातिर अतना चाह राखत बा. ’ पाछा मुड़ि के तकलस, भीम धीरे धीरे ऊपरी राह के चढ़ाई चढ़त रहलन.
‘बस कुछुए कदम अउर चले के बा जी. एकरा बाद हम आपके बन के अइसन अनछुवल सुघराई देखाइब जवन आप कब्बो ना देखले होखब. ’ हिडिमा धीरे धीरे, आगा बढ़े लागल. भीम ओकरा पाछा चलत चलत जब ओह खुलल जलाशय पर पहुँचलन त छिन भर खातिर विस्मित-बिमुग्ध हो गइलन.
उज्जर, लाल कमलिनी का फूलन से गहगहाइल बन-पक्षियन का चहचह से मनसायन ओह शान्त मनभावन जलकुंड का किनारे खड़ा होके हिडिमा प्रफुल्लित भाव में कहलस, – ”लीं, आप खातिर सुन्दर बेबस्था हो गइल. अब मुँह हाथ धोईं चाहे स्नान करीं. बाकि हमार एगो शर्त बा!“
– ‘ऊ का?’
– ‘सामने वाला बन में कुछ अच्छा फलदार फेंड़ बाड़न स. आप नहाइ-धोइ के फल तूरब तबले हमहूँ स्नान क लेइब. हिडिमा सहज भाव से मुस्कियात कहलस. भीम स्वीकार में मूड़ी हिलावत भोला भाला अल्हड़ युवक लेखा मुस्कियात अपना देंहि से धोती हटवलन आ अँगोछा पहिरि के जलकुंड में छपाक से कूदि गइलन. भीम का सुडौल चिक्कन देंह के मुग्ध भाव से निहारत, हिडिमा के मन कइल कि ऊहो अपना देह के मृगचर्म वाला वस्त्र खोलि के शीतल जल में कूदि जाव, बाकि अपना प्रबल होत इच्छा के दबावत दुसरा ओरि ताके लागल. अपना भीतर उफान मारत काम बेग के रोकल कठिन रहे, बाकि राह में भीम के देंहि झटकल इयाद अवते ओकर मन उदासी से मरूवाइ गइल. अचानक ओकरा भीतर एगो बिनोद सूझल… आज ऊ अपना प्रानप्रिय के तब तक छकाई, जबले ऊ खुदे आतुर भाव से ओके अपना अंगे ना लगा लिहें… ई ठीक रही… बाकि का ई संभव होई, ओकरा भीतर उभरत काम के उद्दाम लहर कइसे काबू में आई? कुच्छू हो जाव, ऊ तबले समरपन ना करी जबले ऊहो, ओकरे नियर बेचैन आ आतुर ना हो जइहें. ’ धीरे-धीरे हिडिमा जलकुण्ड का दुसरा ओर ऊँचाई पर चल गइल. ओकरा सामने जल चिरइन क एगो जोड़ा गर में गर सटवले जलकेलि में व्यस्त रहलन सऽ. दोसर कवनो समय रहित त हिडिमा उन्हन के आखेट का बारे में सोचित बाकि ओह समय ओकरा आँखि में उन्हनी खातिर एगो नेह भाव उतरि आइल रहे… ओके लागल कि ऊहो हिडिमे लेखा प्रेम पियासल काम-केलि में भुलाइल बाड़न सऽ.

– ‘हिरिमाऽऽ! ओय हिरिमाऽऽ!!’ भीम धोती बदल के जोर से चिचियइलन त हिडिमा के तन्द्रा टूटि गइल…कतना अपार अनुराग के भाव फूटत बा एह नाँव का संबोधन में… उहो कवनो पुरुष के कइल संबोधन… आजु से पहिले त ओकर राछस भाई हिडिम ओके बनचर लउँड़ी ले ढेर मान ना दिहलस. बलुक अधिकतर तिरस्कार आ मारपीट के हरमेसा अपना अभिमान के पौरुष वाला अधिकारे जतवलस…. भीम का सँगे ओके पुरुष क एह मधुर रूप-साहचर्य के अनुभव भइल… इ अनुभव अनोखा आ मीठ रहे. ऊ भीम के ओही दिशा में जात देखलस, जेने फलदार बिरिछ होखला का बारे में ऊ बतवले रहे.
– ‘अरी ओय हिरिमी… हम जलपान खातिर फल तूरे जा तानी, कहाँ बाड़ी तूँ?’
– ‘बहुत अच्छा; लेके आईं! हम तबले कुछ अउर काम कर लेत बानी. ’ हिडिमा जलाशय का दुसरा छोर से खुस होत चिचियाइल. भीम के निश्छल ठहाका से पूरा जल क्षेत्र गूँजि गइल.

हिडिमा एही लापरवाह ठहाका पर तऽ न्यौछावर रहे. भीम का एही निडर, निश्छल बीर रूप पर हजार बेर लुट जाए खातिर तइयार रहे. ई भीम का प्रति ओकरा अछोर अनुरागे क देन रहे कि ऊ आपन बनचर रूप, सोभाव आ बात ब्यवहार कूल्हि तेजी से बदलत रहे. ऊ किनार पर खिलल कुछ फूल जल्दी जल्दी चुनलस आ एगो बड़हने पात पर ध के मोरत अपना अंगवस्त्र में खोंस लिहलस.

हिरनी अस कुलांच मारत ऊ जलाशय का ओह छोर प’ पहुँचल, जहाँ थोरिके देर पहिले भीम स्नान कइले रहलन. एक बेर एने ओने तकलस आ अपना छाती आ कमर से मृगछाल के बान्हन खोलि के निर्बसना जल में समाइ गइल. जल विचरन करत ऊ जलकुंड का किनार से कुछ अनोखा किसिम के घास नोचलस, माटी में मिलाइ के दूनो हथेलियन का बीच में रगरलस आ ओही से आपन देहिं माँजे लागल. थोड़ी देर तक मछरी लेखा जलाशय में पवँरला का बाद जब निकलल त ओकरा व्यक्तित्व में एगो नये दमक आभा आ टटकापन रहे. किनार पर राखल आपन कपड़ा पहिरला का बाद ऊ बिचरत एगो अइसन पाथर का शिला प खाड़ भइल जवन किनार से जलाशय का भितर तक उभरल रहे. थिर जल में आपन सोना नियर दमकत देंहि आ मुखड़ा निहारत ऊ अपना केश के जल झरलस, ओके गूंथ के बेनी बनवलस आ तूरल सुगंधित टटका फूलन के खोंसत सोचे लागल. ओकरा एकर तनिको आभासे ना भइल कि ओह अद्भुत फूलन का सुगंध से व्याकुल भँवरा कब दबे पाँव ओकरा निगिचा ले पहुँच गइल. साइत एकर कारन ओकर आपन मुग्धाभाव रहे- ऊ भाव, जवना में ऊ खुदे अपना छिपल सुघराई के अचके देखि जान के अचंभित आ हैरान रहे.

आपन पदचाप दबवले पाछा से आवत भीम खुदे ई अनछुवा टटका रूप-सुघराई देखि के निहाल रहलन. उनका बाँहि के घेरा जब पाछा से हिडिमा का सद्यःस्नाता देह के जकड़लस, त ऊ मुँह घुमाइ के भीम के देखलस. प्रानप्रिय के प्रेम बिकलता से ओकरा असीम सुख मिलल. ओकर पलक मुनाये लागल. ओकरा पूरा विश्वास होखे लागल, खाली ऊहे ना, ओकर पुरुषो ओकरा पर अनुरागल बा, ओके पहिल बेर ई बुझाइल कि ऊ जेके जान ले बढ़ि के चाहत रहे, आजु ओकरा प्रति ऊ हिया उँड़ेले के तइयार बा.

भीम के कसल आलिंगन भर से ओके अपना सउँसे जीवन के नया अरथ मिल गइल रहे. कुछ छिन मदहोस शरीर के ढील छोड़ला का बाद कुछू सोचि के ऊ चिक्कन मछरी लेखा उनका बाँहि का घेरा से छटक गइल, ”अबे अतना अधीर काहें बानी आर्यपुत्र ! चलीं पहिले बन विहार आ भोजन तऽ कऽ लीं, फेरू हम आपके अइसन-अइसन मनमोहक जगह आ प्रकृति क अइसन सुघर चमत्कारी रूप देखाइब, जवन आप कबो देखले ना होखब. “
– ‘अच्छाऽऽ सही में?’ भीम मुस्कियात ओकरा ओर बढ़े लगलन. वनचरी हिडिमा ओ बेरा उनके संसार क सर्वसुन्दरी प्रिया लागत रहे.
– ‘पहिले भोजन जरूरी बा… आ आप त फल तूरि के लियावे गइल रहनी नऽ?’ हिडिमा चपलता से पाछा पड़े घुसुकत, दूर होत गइल.
– ‘कुल्हि फल उहाँ बड़का फेंड़ का जरी धइल बा…. ’ भीम इशारा से देखावत चाल तेज कइलन, बाकिर हिडिमा त हिडिमा रहे, उनके पहिलहीं छलाँग मारत ओह फेड़ तक पहुँचि गइल.
भीम जब हिडिमा के पाछा लागल पहुँचलन त अचंभा में पर गइलन, उनकर धइल फल क गठरी गायब रहे.
– ‘कहाँ बा फल? हम जानत रहलीं हाँ कि आपसे ई सब ना होई. चलीं हमरा सँगे, अब हमरे कुछ करे के पड़ी. ’ हिडिमा चपलता से हँसत कहलस.
मन क भोला, बउराह भीम हरान रहलन. अचानक हिडिमा उनका के अपना दहिना हाथ का अँकवारि में धइलस आ ऊपर उछरि के उड़ि गइल. ऊपर से नीचे के बन, पहाड़, सुन्दर घाटी आ बनइला जीवन क समूह सब कुछ लउकत रहे. ऊ उड़त चिरई लेखा नीचे चारू ओर ताकत, भीम के एगो झरना देखवलस, जेकरा चारू ओर हरियर लतरन आ हरियराइल घास से तोपाइल, अनगिनत फूलन क सुरम्य ढलान रहे. ऊ धीरे-धीरे झरना का लगहीं एगो पहाड़ी खोह का लगे चौरस जगह पर उतरि के चुहल करत खिलखिला उठल, ”देखीं, राउर तूरल कूल्हि फल हेइजा मोटरी बान्हि के धइल बा!“

भकुवाइल भीम देखलन, सचहूँ उहाँ फल क मोटरी अस्थिर से धइल रहे. सामने उँचास पहाड़ के एगो हिस्सा आगा पड़े अइसे ओलरल रहे, जइसे प्रकृति आपरूपी केहु के रहे खातिर बइठका बनवले होखे. ‘ई जगह बहुत बढ़िया बा… रउरा जलपान आ विश्राम लायक. अब मुँह का ताकत बानी, आईं इहाँ, आके निश्चिन्त भाव से बइठीं. ’ हिडिमा हँसत ओलरल पहाड़ का भित्तर ढुकि गइल.
बिस्मय से अचकचाइल भीम के हिडिमा का मायावी शक्ति क खेयाल आइल, ”अच्छा, त ई बात हऽ!“ ऊ फलगरे ओनिये बढ़ि गइलन.

बइठका नियर ओलरल पहाड़ का नीचे एगो सुन्दर दुआरि वाला गुफा रहे. हिडिमा ओही का भीतर से निकलल, ओकरा एक हाथ में हरियर पतई आ घास के बिनल-बान्हल एगो चटाई आ दुसरा हाथ में जल पिये खातिर एगो सुन्दर बाल्टीनुमा कवनो सुखाइल बनलउकी क तुमड़ी रहे. भीम का लगे चटाई बिछावत बड़ा नम्रता आ आदर से बोलल, ”छिमा करब आर्यपुत्र ! आप बइठीं, हम फल लियावत बानी. “

सभ्य संसार के नारी लेखा हिडिमा के ऊ आदर भरल विनम्र निहोरा भीम का बहुत रुचल. ऊ चुपचाप चटाई पर पालथी मारि के बइठ गइलन. हिडिमा तुमड़ी लेले फलगरे झरना का ओर भागल. ऊ बइठले-बइठल हिडिमा के ओह तुमड़ी में झरना के स्वच्छ मीठ जल भरत देखत रहलन. निहुरल हिडिमा के मुखमंडल आ सुगढ़ देहिं ओ बेरा सुरूज का लाली में एगो नये गुलाबी आभा से भरल उनके न्योतत रहे.

बड़-बड़ पतइन का पत्तल पर जलपात्र से धोवल फल सजावत हिडिमा का सकुचाइल-ललाइल नेह-निष्ठा भीम के भूख अउर बढ़ा दिहलस.
– ‘आर्यपुत्र ! जलपान शुरू करीं!’ हिडिमा कहलस. भीम एगो फल उठा उठा के खाए लगलन. हिडिमा बड़ा अनुराग से उनका ओर एकटक चितवत रहे. अचके भीम के नजर उठल, हिडिमा के नजर एक छिन खातिर झुकि गइल.
– ‘तुहूँ खा!’ हमहन के ई आचार-बिचार तूँ कब आ कहाँ सीखि लिहलू?
– ‘माता से! माई कुन्ती के आप सब के भोजन करावत देखले रहलीं, बाकि एकर सुख आ आनन्द उठावे क मोका आज पहिली बार मिलल. ’ हिडिमा एगो फल उठा के भीम का मुँह तक ले गइल, ‘एक बेर हमरा हाथे खा लीं… तबे हमहूँ खाइब…!’

भीम एह अपनत्व आ अनुराग पर निहाल हो गइलन आ हिडिमा का हाथ के फल काटत, अपना हाथ क फल, ओके खियावे लगलन. फेर त सँकोच के बान्हन अपना आपे खुलि गइल. जलपान का बाद हिडिमा उनकर बाँहि पकड़ले गुफा का भीतर ले गइल. नीचे ओइसहीं फूले पतइन क नरम मोलायम बिछावन. भीम जथारथ का एगो दुसरे लोक में पहुँच चुकल रहलन. पति-पत्नी का एह एकान्त-विश्राम के व्यवस्था हिडिमा का सुरूचि आ नेह के ऊँचाई अउर बढ़ा दिहलस. ऊ ओकरा गुदगर देहिं के धीरे से अपना गोदी में खींचि लिहलन. हिडिमा पहिलहीं से आतुर रहे. ऊ अब खुलि के देह-सुख भोगे लागल.

किरिन डूबे का पहिलहीं, जब सूरूज के ललाइल गोला पहाड़ का नीचे उतरे लागल, त हिडिमा के दीठि घूमल. भीम का सँगे पहिल दिन क सँकोच भरल कबो ना भुलाये वाला आलिंगन आ निकटता से ओकर मन अबहियों ना अघाइल रहे. आज खुलि के नेह-रस क कुछ घोंट भीतर गइल रहे. ओकरे खुमार में ऊ दूनों बाँहि-लता में भीम के बन्हले, ना जाने कवना अछोर आनंद का समुन्दर में डुबत उतिरात रहे. … ‘हाय, अतना जल्दी साँझ हो गइल…! ओकरा कुन्ती के गम्हीर आदेश मन परल… साँझ के भीम के लेके जरूर चलि अइहऽ!’ जइसे बिच्छी मरले होखे, ऊ भीम के बान्हन से छटक के खड़ा हो गइल, ”चलीं चलल जाव ना त माई रुष्ट होइहें. “

अलसाइल अतिरपित भीम अपना मन पर काबू करत खड़ा भइले. ”चलीं, नीचे चलि के झरना में हाथ मुँह धोइलीं आ हिडिमा हँसत पहाड़ का ढलान से उछरि-उछरि के नीचे उतरे लागल. “
– ‘अइसे मत भागऽ हिडिमा, कहीं गिरि जइबू?’ भीम फुर्ती आ चपलता से नीचे उतरत हिडिमा के देखि के अचंभित रहलन. भारी भरकम देहिं से थाहि थाहि के ढलान उतरल बहुत दुष्कर लागत रहे. उनका अचरज ए बात के रहे कि एगो कोमल कमनीय आदिवासी, लइकी लेखा ई हिडिमा बिना कवनो मायावी शक्ति के बनवासियन लेखा अतना फुर्ती से नीचे कइसे उतरि गइल.
– ‘सम्हारि के उतरब जी…! अभी रउवा के हमरा से बहुत कुछ सीखे-जाने के बा… आ हमरो राज का लोगन के रउरा से बहुत असरा आ उमेद बा. ’ हिडिमा साहस बढ़ावे वाला सुर में चिचियाइल. – ”अच्छा भाई, हम समझ गइनी, धीरे धीरे हो जाई तहरा सँगे अभ्यास. “ नीचे उतरि के भीम बहत झरना का जल का लगे पहुँचलन, त इठलात हिडिमा के फेरू अँकवारि में बान्हि लिहलन.

हिडिमा के अपना प्रियतम के ई अमरित ढारत प्रेम बहुत रसगर लागल बाकि, बनावटी खीसि देखावत बोलल, ”रहे दीं, रहे दीं… रउरा कहले रहली कि भला इ कवनो बेरा हऽ! आ हमके त माता के आदेश माने के बा!“
– ‘अच्छा भाई, माता के आदेश मानऽ, बाकि हम एह शीतल जल से तनी नहाइल चाहत बानी. ’ भीम अपना बान्हन के ढील कइलन आ ओके लेले देले कल कल छल छल करत जलधार में खड़ा हो गइलन.

बहे वाली धारा ठेहुना से ऊपर ना रहे, हँ पानी के बेग बहुत तेज रहे. हाथ मुँह धोवला का बाद ऊ लोग अँजुरी में भरि के शीतल मीठ जल पियल, फेरू किनार पर धइल, अँगोछा से हाथ मुँह पोछत भीम कहलन, ”अब केने चले के बा? हमके त दिशा आ स्थान के तनिको ज्ञान नइखे. अइसे त पहुँचत पहुँचत रात हो जाई. “
हिडिमा हँसत भीम के कमर एक बेर फेरु अपना दहिना बाँहि में धइलस,”अब आपो हमरा के कसि के पकड़ि लेईं. हम राउर मदद करब. “ आ ओकरा संकेत पर भीम ओह पहाड़ी क्षेत्र में उगल बन के तेजी से पार करे लगलन.

इ रास्ता हिडिमा के चीन्हल-जानल, आसान आ सुगम रहे. बुझइबे ना कइल कि कइसे ऊ अतना जल्दी ओही ढलान वाला राह पर निकलि अइलन, जवना से उतरि के आश्रम के राह जात रहे.

कुन्ती अपना बेटन का साथे, भीम का अब ले ना लवटला से दोचित रहली. जुधिष्ठिर का माथ पर चिन्ता के रेख उभरे सुरू हो गइल रहे. अनुज परेसान रहलन स. अर्जुन जरूर अपना दहिना मुट्ठी के बायाँ हथेली पर बार बार पटकत रहलन. जुधिष्ठिर विश्वास जतावत अर्जुन के झुँझलाहट भाँपे के कोसिस कइलन, ”भीम कवनो छोट, अजान लड़िका थोड़े बाड़न, ऊ आवते होइहें, उनका हमनी ले ढेर चिन्ता होई आ फिर ई काहें नइखऽ सोचत कि हिडिम के ई बन क्षेत्र अतना सुगम आ निरापद नइखे. अर्जुन तूँ काहें परेसान बाड़ऽ?“
– ‘बात ई नइखे भइया… मंझिला भइया जरूर लवट अइहें, बाकि हम ई सोच रहल बानी कि हमनी का आखिर कब तक शालि ऋषि का ए आश्रम में चुपचाप बइठल दिन काटत रहब जा.. ई क्षेत्र अतना दूर नइखे कि पापी दुर्जोधन आ कपटी मामा शकुनि क चल्हाँक भेदिया आ गुप्तचर ना पहुँचि जइहें सऽ…. ’ अर्जुन के उलझन आखिर खुलि के बहरिया गइल.
– ‘सब सही बा… बाकि हमरा समझ से ई क्षेत्र एसे ज्यादा सुरक्षित बा, काहें कि हिडिम बन का रहस-भेद से सब भय आ आतंक का कारन अपरिचित बा आ हिडिमा का लोगन का कारन हमहन पर फिलहाल कवनो बिपदा नइखे. हिडिमों त अब भीम का कारन हमरा परिवारे क हो गइल बिया. ओह निष्कलुष सरल युवती के आचरन-व्यवहार आ निष्ठा तोहन लोग देखियो चुकल बाड़ऽ जा… हमरा राय में अभी अकुताइल ठीक नइखे. ’ जुधिष्ठिर सहज संयत भाव से ढाढस देत कहलन.

अर्जुन उठ के खड़ा हो गइलन. हाव भाव से इहे बुझात रहे कि जुधिष्ठिर से ऊ संतुष्ट नइखन, ”ठीक बा बड़का भइया, जवन राउर निर्देश होखे. “ आ कुटी से बाहर जाए लगलन.
– ‘कहाँ जात बाड़ऽ? ठीके त कहत बा बड़का…’ कुन्ती के आवाज से अर्जुन थथमि गइलन. ’
– ‘चलऽ लोग… भोजन के समय हो रहल बा… आज हम तोहन लोग खातिर, आश्रम से मिलल दूध आ साँवाँ का चाउर से मीठ खीर बनवले बानी. ’ कुन्ती माहौल के सहज बनावत कहली तऽ नकुल, सहदेव प्रफुल्लित होत कहि पड़ल लोग- ”माई! तूँ हमन के केतना खेयाल राखेलू..? बाकि बिना भीम भइया के रहले खइला के ऊ सवाद कहाँ?“
– ‘अरे, हमहूँ आइए गइनी… हमके तनिकी भर देर का भइल तोहन लोग हमार भोजने गड़प करे का फेर में पड़ि गइलऽ जा…!’ भीम हँसत कुटिया में ढुकलन.

कुन्ती समेत सब भाइयन के चेहरा प आइल तनाव खतम हो गइल. पाछा पाछा आइल हिडिमा निहुरि के कुन्ती के गोड़ छुवलस, त कुन्ती गदगद हो गइली… ”कल्यान होखे बेटी सौभाग सोहाग बनल रहे तोहार. “ हिडिमा ओह मधुर असीस का जादू में बन्हात गठरी बनल कुन्ती का लगे सटि गइल.
– ‘तोहन लोग थोड़ी देर ले बात बतकही करऽ जा. तबले हम हिडिमा का सँगे दुसरा कुटी से खीर लेके लवटत बानी. चलऽ हिडिमा!’ कुन्ती हिडिमा का कान्ह प हाथ रखली.

अनुजन के लेके भीम भोजन के बेवस्था करे लगलन. अर्जुन कमण्डल में राखल जल छिरिक के चारू ओर सबके बइठे के इन्तजाम कइलन त जुधिष्ठिर झोरी में टाँगल फल उतारि के नीचे धइलन. ”भीम भइया, तोहके बन-बिहार करत खा हमहन क इयाद त आवत ना होई, त कम से भाभी से पूछि के हमन खातिर ए बन के कुछ स्वादिष्ट फल त लियाइये सकेलऽ. “ नकुल हँसत भीम के छेड़े लगलन.
– ‘अरे भला मझला भइया के ई सब छोट-छोट बात सतावे लागी त फिर बिहार का होई?’ सहदेवो पाछा पाछा तुक्का लगवलन.
– ‘तूँ दूनू क दूनों जाना अब हमरा हाथे मार खइबऽ जा. ’ भीम आँख तरेरत लाड़ देखवलन… ”तोहन लोग के त ना बाकि बड़का भाई आ माता खातिर जरूर काल्ह फल ले आइब!“ सब ठहाका मारि के हँस पड़ल.

माटी का एगो बर्तन में खीर लेले माता कुन्ती जब हिडिमा का साथ लवटली त अचरज में सबकर दीठि टँगाइले रहि गइल. हिडिमा सूती साड़ी पहिनले कवनो आश्रमवासी कन्या नियर स्मित मुस्कान छीटत उनका पाछा खड़ा रहे. ओकरा हाथ में धोवल-धावल केरा क दू गो बड़ बड़ पात रहे.
– ‘माई, भउजी कहाँ रहि गइली? आ ई के हऽ?’ नकुल सवाल कइलन त एक बरे फेर सबका होठे मुखर हँसी उभरि आइल. कनखी से देखत भीम हिडिमा का ओह नया रूप पर बिस्मित बिमुग्ध रहलन. हिडिमो अपना देवर लोगन से हँसत कहलस, ”अगर आपो सबके हमरे नियर सहधर्मिणी चाहीं त हम काल्हुए एकर इन्तजाम कर सकीलें. “

कुन्ती समेत जुधिष्ठिर आ भीम हँस पड़ल लोग. अनुज झेंपि गइलन सऽ. कुन्ती का हलुक अनुशासन पर सभ गोलाई में बइठि गइल. केला क बड़ पात के काट के सबका आगा हिडिमा धइलस, फेर फल आ खीर परोसि के कुन्ती हिडिमा का बगल में बइठली.

‘खीर’ का नाँव से परोसल, ए नया अनोखा मधुर खाद्य के चखत हिडिमा का भीतर इ सवाल बहुत तेजी से उठल कि ई कइसे पकावल-बनावल जाला. ओकरा मन में आइल कि ऊ माता से एकरा बारे में पूछो, बाकि फेरू ई सोचि के पता ना, एह लोगन पर एकर का प्रतिक्रिया होई ऊ ना पुछलस. ‘जाये द, काल्हु आर्यपुत्र से पूछब. ’ ऊ मने मन तय कइलस. खीर के मधुर सवाद से ऊ बिस्मय में रहे. आचार्य जवना अमरित के चर्चा करेलन अइसने त ना नु होत होई?
(अगिला कड़ी के इन्तजार करीं.)


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डा॰ अशोक द्विवेदी के परिचय

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