बनचरी (भोजपुरी के कालजयी उपन्यास के पँचवी कड़ी)

Banachari-cover-final

– डा॰ अशोक द्विवेदी

स्नान-पूजा का बाद जब कुन्ती अनमनाइल मन से कुछ सोचत रहली बेटा भीम का सँगे बाहर एगो फेंड़ का नीचे हँसी-ठहाका में रहलन स. हिडिमा के पास आवत देखि कुन्ती पुछली –
– ‘बेटी ए स्थान के आसपास, कहीं तहरा राज का सीमा में कवनो साधु-संत-रिसि लोग क आश्रम बा?’
– ‘बा काहें ना माता? हमनी का सीमा पर बन का किनारे एगो समतल मैदान में छोट आश्रम बाटे शालि ऋषि के. उहाँ एगो स्वच्छ सुन्दर जलाशय बा. आश्रम में ओह लोगन के लगावल कुछ फलदार फेंड़ो बाड़े स, बाकि ई सब काहे पूछत बानी माता?’ निश्छल हिडिमा, जिज्ञासा में रहे.
– ‘बेटी, हमहन आर्यवंशी हईं जा. तहरा कबीला का रहे वाला स्थान पर हमहन क ढेर दिन रहल उचित नइखे.’
– ‘काहें माई? हमनी का भले अनार्य आ अशिक्षित जाति क हईं जा, बाकि हमहनों में पुरोहित, पुजारी आ धरम में विश्वास राखे वाला चरित्रावान आचार्यों लोग बा, ऊ लोग हमहन के तरह तरह क मूल्यवान शिक्षा आ विचार व्यवहार सिखावेला! रउवाँ देखते बानी!’ हिडिमा बिस्तार से बतावे लागल.
– ‘जरूर बा बेटी! तबे त तूँ अतना विवेकवान, आ समझदार बाड़ू. बेटी अच्छा आ बुरा हर समाज में होला. ऊ सभ्य समाज वाला आर्य होखे भा जंगल-पहाड़ में रहे वाला अनार्य भा राक्षस आ दानव समाज. अइसन ना रहित त हमनी के सभ्य आ शिच्छित समाज में लाक्षागृह ना रचाइत. आजु हमनी का ओही स्वार्थी, कुटिल आ ईर्ष्यालु लोगन क शिकार होइ के एह अवस्था में पहुँचल बानी जा…’ कुन्ती जइसे अतीत का खोह में ढुकल कवनो बुरा दृश्य देखत होखसु.
– ‘आप लोगन का संगे का भइल माई कि सुन्दर सभ्य नगर छोड़ि के इहाँ जंगल में अतना कष्टकर जीवन खातिर विवश होखे के पड़ल? हमार संरक्षक आचार्य चांडक कहेलन कि आर्य कहाये वाला सिच्छित समाजो में कुछ लोग बहुत घृणित आ अमानवी काम करेला… लोगन के पीड़ा पहुँचावेला, अन्याय आ अत्याचार करेला… स्त्राी के उपभोग के चीज मानेला… अउर न जाने का, का…. हिडिमा भोला भाला चेहरा पर चिन्ता के भाव आ गइल.
– ‘छोड़ऽ बेटी, एह सुखद साइत आ आनंद का समय में हमहूँ का लेके बइठि गइलीं, कबो फुरसत में तहरा के बताइब. ए बेरा त आश्रमे के बात जरूरी बा. कुन्ती दुखदाई अतीत से मुँह फेरत सहज होखे के कोशिश कइली.’
– ‘बाकि माई, हम अब राउर बानी… राउर संकट आ दुख अब हमरो बा… हम ना जानब त कइसे रउरा सभ क अनुगामी बनब…? रउरा कुल पलिवार में अइलो का बाद जदि आप हमसे कुछ छिपावल राखल चाहत बानी त ई हमार दुर्भाग…’ हिडिमा दुखा गइल.
– ‘ना बेटी हिडिमा! अइसन मत कहऽ. हम अस्थिर होके सब कुछ बताइब… अभी अतने समझ लऽ कि हमहन के गोपनीय होके सुरक्षित रहल एह समय सबसे जरूरी बा… पता ना शत्रु कब, कहाँ, कवन माया रचि देव. उनहन का लगे भेदिया आ गुप्तचरन क कवन कमी बा?’ कुन्ती का सफाई में अनजान शंका से भय उपजि आइल.
– ‘एह खातिर निश्चिन्त रहीं माई. हमनी का भले बनवासी हईं जा, बाकिर इहाँ पतइयो खरकला के आहट हर बनवासी का हो जाला. हमरा राज में एक से एक चतुर जोधा, भट, मल्ल आ चुस्त-फुर्तीला भेदिया गुप्तचर आ समाचार पहुँचावे वाला धावक बाड़ें. रउरा पर आँच आवे का पहिले, हमार समाज मर मिट जाई.’ हिडिमा का चेहरा पर एगो अनुभवी दृढ़ योद्धा क तेज उभरि आइल.
– ‘हम सब जानत बानी बेटी. तोहन लोग पर हमार पूरा विश्वास आ भरोसा बा. बाकि अपना जिये आ रहे के तौर तरीका आ आचार बिहार के नियम का कारने हम कवनो आश्रम का लगे बास कइल चाहत रहनी हाँ.’
– ‘ठीक बा माई, जइसन राउर इच्छा, राउर आज्ञा माथ पर बा… चलीं सभे हम आप सबके आश्रम ले चलब.’ हिडिमा कुछ सोचत बिचारत उठ खड़ा भइल.

सबकुछ अतना अचानक आ तेजी से घटत गइल कि हिडिमा अपना मंत्राी उत्तुंग आ गुप्तचर भेदिया दूतन से एक छिन खातिर बतियाइयो ना पवले रहे. आचार्य चंडक के उत्तर क्षेत्र का जात्रा से अइला क समाचार ओके मिलल रहे बाकि उनकर असिरवाद पावे क मोको ओकरा ना भेंटाइल रहे. उ बहुत तेजी से अपना अंतरंग सखी निरिमा का लगे गइल. ऊ अपना भाई निम्बा आ पति अंगुठ से धीरे धीरे कुछ बतियावत रहे. अपना प्रिय सखी, राजकुमारी हिडिमा के देखते, खुशी से धावल निम्बा लगे चलि आइल. मधुर मुस्कान का साथे पुछलस, ‘हमार सुधि कइसे आइल सखि!’ हिडिमा अपना प्रिय सखी के अँकवारी में भरत बोलल, ‘सखि माई कुन्ती के आदेश बा कि ऊ शालि ऋषि का आश्रम में रहिहें, उनके अपना आहार-बिहार आ रहन-सहन में सरलता होई.’ अंतरंग सखी निरिमा तुरंत समझ गइल, ‘ठीक बा निम्बा भाई आ हमहूँ ओह लोग के पहुँचावे चलब!’
– ‘हम कुछ अउर समझदार साथियन के लेके आवत बानी.’ निरिमा के पति अंगुठ उछाह में बोलल, आखिर अपना राजकुमारी आ राजा वृकोदर के सेवा करे के कुछ त मोका मिलल.

हिडिमा के यकीन रहे कि ओकरा समाज क लोग ओकरा एगो संकेत पर, बहुत कुछ करे खातिर तत्पर रहे. ओकरा विकल मन के बहुत राहत मिलल.

हिडिमा अपना विश्वस्त बनवासी रच्छकन आ सखी निरिमा का संगे कुन्ती का लगे पहुँचते बोलल, ”चलीं माई, आश्रम चलल जाव. अभी दूपहर बा, साँझ से पहिलहीं ई लोग पहुँचाइ के लवटि आई.“ फेर का, कुन्ती अपना पाँचों पुत्रन के इसारा कइली. ऊ लोग महतारी के निर्णय पहिलहीं जान चुकल रहे. सब लोग महतारी का सँग हिडिमा आ निरिमा का पाछा चल दिहल. निरिमा क छोट भाई निम्बा मार्गदर्शक रहे.

आश्रम में पहुँचला पर एह लोगन क जबर्दस्त स्वागत-सत्कार भइल. सखी निरिमा अपना भाई निम्बा आ दुसर बनवासियन का सँगे लवट गइल, बाकिर लवटत-लवटत सुरक्षा का लेहाज से दूगो युवकन के हिदायत देत, गहन बन का भीतर चल गइल. शालि ऋषि आ उनकर सहयोगी ऋषि परिवार के लोग के कुन्ती के संक्षिप्त परिचय आ उनका पुत्रन का बारे में जान के खुसी भइल. ऊ लोग सहर्ष आश्रम में रूके के अनुमति दे हिदल. ओह लोगन का रात्रि-विश्राम खातिर एगो बड़हन परन कुटी खाली क दिहल गइल. जलपान आदि का बाद, ई जानि के कि अब कुछ दिन ई परिवार राजकुमारी हिडिमा का साथे एही आश्रम में निवास करी, ऋषि अपना शिष्य लोगन के दुसरा दिने अलग पर्नकुटी बनवावे आ ओह लोगन के भरपूर मदद देबे क निर्देश दिहलन. फेरू युधिष्ठिर से कहलन, ”अब आप लोग संध्या स्नान आदि से निवृत होखीं. इहाँ से निगिचे जलाशय बा!“
– ‘जी राउर बहुत बहुत आभार!’ जुधिष्ठिर सरधा में झुकि के प्रनाम कइलन, आ सब लोग शालि ऋषि का कुटी से बाहर निकलि आइल. माता कुन्ती के लेके हिडिमा जलाशय पर गइल. जलाशय के सिमसिमाइल हवा चलत रहे. शान्त, सुरम्य वातावरन में जाते कुन्ती सुखद अनुभूति कइली. हिडिमा बड़ पतई का दोना में जल भर के ले आइल. मुँह आँख धोवला का बाद कुन्ती के थकइनी जब कम भइल त हिडिमा सवाल कइलस, ”स्नान कइल चाहत बानी माता?“ ‘ए बेरा ठंढा बहुत बा… अगर राउर इच्छा होई त हम बेवस्था करीं.’
– ‘ना बेटी, हम खाली हाथ-गोड़ धोइ के वापस लौटब! हँ तोहरा के स्नान जरूर क लेबे के चाहीं, जा. आपन ई भारी वस्त्र उतारि के नहाइ लऽ! तहार मन हलुक हो जाई.’ कुन्ती हिडिमा पर मीठ चितवन क नेह उड़ेलत कहली.

हिडिमा तनिको देरी ना कइलस मृगचर्म वाला लबादा लेखा वस्त्र उतारि के आपन कंचुकी आ अन्तःवस्त्र पर ठेहुनियाइ के कुन्ती के सामने सकुचात बइठि गइल, ”हम माई के लाड दुलार से वंचित रहनी, शिशु अवस्था में कुन्दकी चान्या काकी के नेह छोह मिलल, उनहीं का पालन-पोसन में हमार इ काया बनल आ अब महतारी का जगहा तूँही न बाड़ू माई!“

कुन्ती ओह निश्छल भोली बाकि विवेकी आदिवासी बाला के सुगढ़ गोहुँवाँ रंग क चिक्कन कमनीय काया देखि के मंत्रमुग्ध रहली, ”अरे हमार पगली हिडिमा, अब जल्दी नहइबो करऽ ना त हमार पुत्र आवत होइहें सऽ. मेहरारू, के नहाइल केहू ना देखे पावेला, काहेंकि ऊ पलक झपकावत नहा धोइ के वस्त्र पहिरि लेली सन. अब तूँहूँ ओह निहुरल मोट फेंड़ के लगे आपन ई कूल्हि वस्त्र धइके, जल्दी नहाइ लऽ.“

हिडिमा, चंचल भाव से झपटत आपन वस्त्र उठाइ के फेंड़ का जरी धइलस आ जलाशय में धीरे से उतरि गइल. कुन्ती ओकरा बालसुलभ चपलता पर मुँह फेरि के हँसि दिहली… ”उनके अपना निर्णय पर खुसी भइल कि अइसन, निश्छल सुलच्छनी आ समझदार कुलवधू मिलल.“ ऊ अब अपना परिवार पर छाया नियर दिन-रात मँडरात संकटन का प्रति कुछ समय खातिर निश्चिन्त अनुभव करत रहली. उनका एह नव संबंध से बनवासी आ बलवान आदिवासी समुदाय के निष्कपट सहायता मिलल. ऊ जानत रहली कि ई संबंध आगा चलके निराश्रित पाण्डवन खातिर बहुत काम के साबित होई. एह शक्तिशाली समाज का व्यवस्थित एकता आ निष्ठा भाव के त ऊ दुइये दिन में जान चुकल रहली. अब ओकर प्रत्यक्ष अनुभव आ परतीतियो होत रहे.
– ‘चलीं माता, हम नहा धोइ के रउरा आज्ञानुसार अब तइयार बानीं.’ हिडिमा के खनकत चपल बोली सुनते कुन्ती का ओठन पर एगो दुलार भरल प्रीतिकर मुस्कान उभरि आइल.

भोजन का बाद ओह दिन आश्रमवासियन का तरफ से दिहल गइल पर्नकुटी में विश्राम भइल. हिडिमा, माई कुन्ती का सँगही एकोर सूतल. पाँचों भाई दुसरा ओर.

भोरे-भोरे जब कुन्ती के नीन टूटल त अपना बगल में हिडिमा के ना पाइ के चिहुँक उठली, उनकर मन में तरह तरह के सवाल आ शंका उपजे लागल. ऊ चारू ओर नजर दउरवली. दुसरा ओर उनकर पाँचों बेटा सूतल लउकलन सऽ. ऊ उठि के पर्नकुटी से बहरा आ गइली, बाकिर हिडिमा के कुछ पता ना…. आखिर कहाँ चलि गइल भोरहीं-भोरे? कहीं अइसन त ना नऽ, कि ओकर इहाँ मने ना लागल… ऊ सोचली. फेर उनके, हिडिमा क भोला-भाला निश्छल चेहरा आ ओकर एक-एक बात-व्यवहार मन परल… ना इ होइये ना सके… एक छिन खातिर उनका मन में विचार आइल कि भीम के जगाइ के जलाशय का ओर भेजसु, फिर सोचली… कुछ देर इन्तजार क लिहला के बाद ऊ भीम के जगइहें. उनकर दीठि निरभेद सूतल भीम पर गइल… त मने-मन उनका अपना उजबुजाहट पर खुदे हँसी आ गइल. ऊ अपना जगह पर ओठँघि गइली आ कर बदलत फजीर होखे क इन्तजार करे लगली.

झलफलाहे ऊ उठली, त सबका से पहिले जुधिष्ठिर के बोली सुनाइल… ‘प्रनाम माता.’ फेरू पीछे से भीम, फेरू अर्जुन… सब एक्के सँगे उठि के पाँव लागल. ऊहो असीस देत उठ बइठली. हिडिमा का बारे में केहू का कुछ पूछे से पहिलहीं उनकर आदेश गूँजल… ”चलऽ जा जलाशय का ओर, उहाँ से निवृत्त होके तब कुछ काम होई! तबले हिडिमो लवटि आई!“
– ‘एकर माने कि भउजी सबका ले पहिलहीं चलि गइली! आदर्श बहू के कुल्हि लच्छन बा उनका में, भइया भीम उनके भले जंगली आदिवासी मानसु!’ नकुल के बोल सुनते सब हँसि दिहल.

भीम बनावटी क्रोध देखावत उठसु, एकरा पहिले दूनों छोट भाई भाग के कुटी से बहरियाइ गइलन.

जलाशय से नहाइ-धोइ के लवटला पर, सबका चेहरा पर अचरज के भाव लउकल. हिडिमा अपना कुछ आदिवासी युवकन का सँगे मोट मोट बाँस के थून्ही गाड़त रहली, दू गो युवक हाली-हाली चीरल बाँस बिछाइ के ओपर सरपत, मूँज आ नरकट बिछावत रहलन सऽ!
– ‘अच्छा, भउजी त बड़ा तेज निकलली! एही बेरा कुटी छवाये शुरू हो गइल!’ नकुल सहदेव फलगरे ओनिये बढ़ चलल लोग.
हिडिमा के निष्ठा आ काम का प्रति ओकर लगन पर कुन्ती मने-मन पछताये लगली… ऊहो ना जाने का-का सोचि गइली, हिडिमा का बारे में. ”अर्जुन, भीम तोहनो लोग के मदद करे के चाहीं, बेचारी के!“ उनका मुँह से अचके निकलल, त अर्जुनों दउरि के अपना छोट भाइयन के हाथ बंटावे लगलन.

आश्रमवासियन से दाब, टाँगी आ हँसुआ माँगि के जब भीम आ अर्जुन आइल लोग त हिडिमा हँसत बोलल, ”देवर जी, ऊपर मुँड़ेर बान्हे खातिर सीधा आ मजबूत डाढ़ि के थूनी आ बल्ली के जरूरत पड़ी आ बीच में दूनो ओर मोट मोट लमहर थून्ही के! भाई निम्बा! तूँ सँगे जाके सहायता करऽ!“

निम्बा अर्जुन का पाछा बन का ओर चलल त भीम आ अर्जुन ओकरा सँगे बढ़ल लोग.

हिडिमा दुसरका कुटी क नाप जोख के अन्दाज करत मोट मोट थून्ही गाड़े लागल.

कुन्ती जब पूजा अर्चन का बाद जुधिष्ठिर का सँगे लइकन के बोलावे अइली, त देखि के अचम्भा में पड़ि गइली. दू गो कुटी तइयार हो चुकल रहे… आ हिडिमा अब तिसरा पर्नकुटी छवावे में लागल रहे… सूरूज क घाम में श्रम का पसेना से भींजल ओकर देंहि अउर सुघ्घर सलोना लागत रहे. भीम आ अर्जुन बीच का बड़े-बड़े थून्ही पर कूटल मूँज के रसरी से बँड़ेर बान्हत रहे लोग, आ दू गो आदिवासी नवहा बान्हल पलानी के अंतिम रूप देत रहलन सऽ.
– ‘अब सब लोग, जलपान क लऽ जा बेटा, खराई हो जाई! हिडिमा अब रहे द बेटी!’ कुन्ती आगा बढ़त कहली!
– ‘थोरकी देर अउर रुकि जाईं माई… देखीं हमरा हाथ में माटी लागल बा….’ हिडिमा गोबर, आ कवनो ललछाँह माटी मिलाइ के जल में सानत रहे. फेर कुन्ती खड़ा होके बिस्मित भाव से देखे लगली. छोट गड़हा खोनि के सानल ओह माटी में बनवासी युवक गेरू लेखा कवनो माटी डालि के, पानी डालत रहलन सऽ. हिडिमा अपना सखी निरिमा आ इंगुरी का सँगे, गील लेई बनल ओह माटी के दूनो हाथे उठाई के कुटी के चारू ओर लगावल नरकुल आ पतई से बनावल टाटी के अइसे लेवरत लीपत रहेल स, जइसे ऊ कवनो सुघर चिक्कन देवाल होखे. कुन्ती एह बुद्धिमत्ता वाला कलाकारी के देखि के मुग्ध रहली. बनवासी असभ्य आ अशिक्षित कहाये वाला एह जाति के श्रम, निष्ठा आ हुनर आ फुर्ती के ऊ कायल हो गइली. कुच्छे घरी में तिसरकी कुटी तइयार हो गइल.
– ‘ई तीन गो कुटी काहें बनत बा भउजी ?’ अर्जुन चिकारी करत पुछलन…
– ‘पहिली कुटी माता के रही आ दुसरकी बड़की कुटी आप सब खातिर रही… एम्मे सभे आँटि जाई…. हिडिमा मुस्कियात कहलस त सँगे सँगे ओकर दूनो सखी निरिमा आ इंगुरी का मुख पर अरथ भरल हँसी छितराइ गइल.’
– ‘आ हई तिसरी काहें भउजी?’ सहदेव हँसत पुछलन… हिडिमा लजाइ के मूड़ी नीचे क लिहलस आ ओकर दूनो सखी खिलखिलाइ के हँसि दिहली सन.
– ‘बस, बस बहुत मजाक भइल, अब चलऽ जा सब लोग जलपान करे!’ कुन्ती गम्हीर होत जइसे आदेश दिहली.

सामूहिक जलपान में, बन से आइल कंद-मूल का साथ मीठ-मीठ बइर क फल आ जंगली सेब लेखा कुछ फल रहे. कुन्ती बड़ा दुलार आ नेह सहित सबके जलपान करवली. घंटा भर विश्राम आ बतकही का बाद ऊ लोग कुटी बनावे में दूना उछाह से जुटि गइल. हिडिमा अपना करीबी आ अंतरंग बनवासियन का साथे सुरूचिपूर्ण ढंग से काम में जुटल रहे. अनुज भाइयन का साथे भीमो पूरा उछाह से काम में लागल रहलन. हिडिमा बीच बीच में मोहक मुस्कान आ शरारती हँसी का साथ स्रम से पसेनियाइल भीम आ अपना बिनोदी देवरन के देख लेत रहे.

साँझ होत-होत तीनों परनकुटी तइयार हो गइल रहे. निम्बा आ ओकरा साथ के युवक बिछावन खातिर मोलायम खर-पतइयन क मोट-मोट कई गो चटाई तइयार क चुकल रहलन सऽ. निरिमा ओके कूटल हरियर मूँज का बरल रसरी से बड़ा सलीका से बन्हवावत, बिनवावत रहे.

भीम गाछ-बिरिछ के बाँचल डाढ़ि आ झलांसी के घिसिरा के एकोरा धरत रहलन आ उनकर दुलरूआ छोट भाई हँसि-हँसि के उनकर मनोरंजन करत रहलन स. भीम खुश रहलन. हिडिमा के लगन आ नेह-निष्ठा भरल श्रम उनका अन्तर में, ओकरा प्रति उनकर प्रेम आ सम्मान अउर बढ़ा चुकल रहे. ऊ कनखी से हिडिमा के अपना सखी निरिमा आ बनवासी नवहन का साथ जब जलाशय का ओर जात देखलन त अपना छोट भाइयन के निर्देश देत बोलि परलन, ”चलऽ लोग, अब कुटी का चारू ओर फइलल खर-पतई आ कंजास बहारि के साफ सुथरा कइ दिहल जाव!“

जुधिष्ठिर का सँगे कुन्ती हिडिमा आ ओकरा सहायकन के मेहनत आ लगन से बनावल गइल परन-कुटी के चारू ओर निरीक्षन करत, मने-मने सराहत रहली. कुटी का भीतर घुसे खातिर बड़ा ढंग से दुआरी बनावल गइल रहे. मोट-मोट दू गो हरियर बाँस का बीच में, तीन जगहा से बान्हल बाँस का फट्ठा सटाइ के बीनल-बान्हल चाँचर. जुधिष्ठिर दुआरि से चाँचर हटावत कुटी का भीतर झँकलन- गोबर आ चिक्कन माटी से लीपल-लेवरल चिक्कन फरस का एक ओर बिछावन खातिर ताजा बीनल चटाई. ऊ हर्षित होत बोल परलन, ”वाह! वाह हिडिमा, हमके आजु बहुत गर्व आ संतोष के अनुभव हो रहल बा! माता, हई आवास देखि के अनुजा के गुन-गिहिथान आ सुरूचि के बड़ाई के ना करी? हमके विश्वास नइखे होत… माता कि हिडिमासुर के बहिन ओकरा अतना विपरीत, सुघर-सुलच्छनी, बुधिमान आ गुनी बाटे.“
– ‘बेटा, हमरा एह कुलबधू हिडिमा का सरल निष्कलुष रूप, सहज व्यवहार आ नेह-निष्ठा से बहुत सुख आ तृप्ति मिलल बा. आचार-विचार आ व्यवहार में इ अबले हमके कवनो आर्यकन्या से तनिको कम नइखे बुझाइल.’
– ‘हँ माता, बाकिर भीम आ हिडिमा के अब जिम्मेदारियो बढ़ि गइल बा. हमनी के अब एह लोगन के बन्धनमुक्त कइके, हिडिमा के राज के नया बेवस्था आ इन्तजाम खातिर सलाह देबे के पड़ी! अस्थाइये सही, बाकि कम से कम बरिस भर तक हमहन के इहाँ रुकहीं के पड़ी, हँ आपन गोपन भाव बनवलो जरूरी बा पहिचान छुपावे खातिर.’ जुधिष्ठिर कुछु सोचत-बिचारत धीरे से कहलन.’
– ‘हँ, तूँ बिल्कुल ठीक सोचत बाडऽ! काल्हु सबेरे हम हिडमा के समझा देइब कि अब ऊ इहाँ के चिन्ता-फिकिर छोड़ि के भीम का सँगे दिन भर घूमे फिरे खातिर सुतंत्र बाड़ी. भीमो के उनका सँगे आहार बिहार का साथ साथ इहाँ के राज-काज के जिमवारी उठावे खातिर हम कहबि.’ कुन्ती जइसे निरनय पर पहुँचत कहली.

निरिमा आ ओकरा साथे आइल लोगन के छोड़ि के जब संझा के हिडिमा लवटल त ओकर प्रफुल्लित चेहरा देखे लायक रहे. सरोवर में नहइला कारन ओकर गेहुँआँ रंग दमकत रहे. केश पानी से सिमसिमाइल रहे, बाकिर ओम्मे ताजा फूलन क गूँथल माला बड़ा सहूर से बान्हल रहे. ओकरा हाथ में पुरइन पात के एगो बड़हन दोना रहे, जवना में उज्जर, पीयर आ ललछौंहा पँखुरियन वाला सुगंधित फूल रहे. जलाशय से आश्रम में लवटत खा, ऊ जवन राह पकड़ले रहे, ऊ बन का ऊँचाई वाला हरियर घास भरल पथरीला राह रहे. थोरिके देर पहिले ऊ भीम के अपना अनुजन का सँगेे जलाशय का ओर जात देखलहूँ रहे. मन में रंग विरंग क सपना बुनत, अपने में हेराइल उटपटांग डेग डालत खा, अचके भीम के ठठाइ के हँसल सुनि के उ चिहुँकि उठल रहे. हँसी का दिशा में जब ओकर नजर गइल त ओकरो हँसी आ गइल… ”अल्हड़ भोला भाला भीम बुझला छोट भाइयन का सँगे हँसत-ठठात नहाये-धोवे जात रहलन. धीरे धीरे आश्रम के कुटी लउके लागल रहे.“
”इ हाथ में का लेले बाड़ू बेटी हिडिमा?“ कुन्ती मूड़ी नीचे कइले आवत हिडिमा से पुछली.
– ‘आप लोगन खातिर कुछ फूल चुन के लेले आइल बानी माता, एम्मे नीचे कुछ सुगंधित फूलो बा!’ हिडिमा कुटी का भीतर चलि गइल.

कुन्ती नवबधू के अन्तर्मन के भाव समझ चुकल रहली. फूलन के दोना नीचे धरत हिडिमा का लगे पहुँचि के ओकरा माथ पर हाथ फेरत कहली, ”बेटी, तूँ पहिले जाइके आपन कुटी ठीक-ठाक क आवऽ! थोरिकी सा पूजा क फूल इहाँ रखि के बाकी ले ले जा, आज भीम का साथ तहार पहिल रात हऽ, उहाँ के साज सजाव तोहरे हाथे होई त नीक रही.“
लजात, सकुचात हिडिमा कुन्ती का कहला अनुसार कुछ फूल एगो पतई पर धइके बाहर निकलि गइल. तिसरका पर्नकुटी में पहिलहीं से नरम गलइचा नियर बड़हन बिछावन बिछावल देखि के हिडिमा मुस्कियइला बिना रहि सकल. बिछावन पर पहिलहीं से कुछ फूल छितरावल रहे… ”जरूर ई सब काम देवर लोग कइले होई! ऊ अंदाज लगवलस आ ई सब खातिर माता क मौन स्वीकृति होई. ऊ दोना का फूलन से दुआरि पर बन्दनवार लेखा बनवलस; आ छोट छोट श्वेत सुगंधित फूल सेज पर छिटलस फेरू खड़ा होके सजावल कुटी के भर आँखि निहारत, एक छन खातिर आपन आँखि बन क लिहलस, ओकरा भीतर सुतल प्रेम के अगिन जइसे जागि उठल. ई अब अपना प्रिय का अँकवारि में उनका दरस-परस से शांत होई… ओके लागल कि भीम ओकरा लगहीं खड़ा होके मुस्किया रहल बाड़न… लाज में ओकर दूनो हथेली अपना आपे पलकन के ढाँपि लिहलस. बाहर कुछ आहट मिलल, त चेतना लवटल. ऊ कुटी से बहरा निकलल आ दुआरि के चाँचर लगा दिहलस.
(अगिला कड़ी के इन्तजार करीं.)


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