बोले-बतियावे से आगा / पढ़े-पढ़ावे के जरूरत !


– अशोक द्विवेदी

लोकभाषा भोजपुरी में अभिव्यक्ति के पुरनका रूप, अउर भाषा सब नियर भले वाचिक (कहे-सुने वाला) रहे बाकिर जब ए भाषा में लिखे-पढ़े का साथ साहित्यो रचाये लागल तब एह भाषा के साहित्य पढ़े वालन क संख्या ओह हिसाब से ना बढ़ल, जवना हिसाब से एकर बोले-बतियावे वालन क संख्या रहे।

पहिल कारन ई रहे कि खेतिहर संस्कृति से उपजल ई भाषा लिखे-पढ़े आ पढे पढ़ावे क माध्यम ना रहे। पहिले संस्कृत, उर्दू, हिन्दी, अंग्रेजी आदि रहे। राष्ट्रभाषा-आन्दोलन के प्रभावी क्षेत्र रहला का कारन, एने क क्षेत्रीय भाषा भोजपुरी, अवधी, ब्रजी, मैथिली आदि साहित्यिक रूप में समृद्ध रहलो पर हिन्दिये में शामिल मान लिहल गइली स। हिन्दी-साहित्य का बुनियादी आधार का रूप में विद्यापति, कबीर, सूर, तुलसी, जायसी आ ब्रजी कवियन के ले लिहल गइल आ पढल-पढ़ावल जाये लागल। तब भोजपुरी-क्षेत्र समर्पित भाव आ निष्ठा से हिन्दिये का पक्ष में रहे। हिन्दी खातिर भोजपुरियन का एह पक्षधरता आ निष्ठा क ई अरथ निकालल गइल कि भोजपुरी भाषाभाषी, हिन्दी भाषा भाषी हउवन लोग ।अनर्थ ई भइल कि ए भाषा में लिखे-पढे वालन के खतियावले ना गइल आ विशाल जनसंख्या वाली भाषा रहला का बावजूद भारतीय भाषा सब का सँग आठवीं अनुसूची में मान्यता का लायक ना बूझल गइल । मान्यता का नाँव पर बिजुके आ रोड़ा अँटकावे वालन में भोजपुरिये क्षेत्र के कथित ‘‘हिन्दी-दाँ’’ लोग के नाँव रहे ।

भाषाई चेतना आ अस्मिता का ममिला में भोजपुरिहा लोगन क आपन भाव-सुभाव संकोची त रहबे कइल, सोना में सोहागा ई कि ऊहो लोग अंग्रेजी आ हिन्दी के तरक्की के भाषा मानत-मानत अपना मातृभाषा के पिछड़ल आ गँवरऊ माने लागल। तबे नऽ अपना भाषा में लिखात-छपात साहित्य का दिसाईं ओतना ललक आ उछाह ना देखावल, जेतना दोसर भाषा-भाषियन में अपना भाषा-साहित्य खातिर लउकेला। एगो अउर बिसंगति ई पैदा भइल कि भाषा का गंभीर आ भोजपुरी जीवन से जुड़ल साहित्य का बजाय गावे-बजावे आ मनोरंजन का लिहाज से भोजपुरी भारतीय बजार (मार्केट) में पइसा आ शोहरत का जरिया का रूप में चमके लागल। एही के ‘लोकप्रियता’ से जोड़ि के कइ एक लोग फायदा भलहीं उठवले होखे, बाकिर नुकसान ई भइल कि मनोरंजन में, फूहर-पातर, सतही दुअर्थी, अश्लील गीतन का प्रचार से भोजपुरी भाषा आ संस्कृति के बदनामियो मिलल। भोजपुरी के सृजनशील स्तरीय आ अच्छा साहित्य का प्रति बने वाला नजरिया आ धारना एही कुल्हि का चपेट में, आ गइल । भोजपुरी बोले बतियावे के भाषा का खाँचा से बहरा त निकलल, बाकि पढ़े-पढ़ावे के लकम (अभ्यास) आ दिलचस्पी का अभाव में प्रतिष्ठित ना हो सकल।

कुछ दिन पहिले हम अपना संपादकी में, भोजपुरी का एगो नया सकारात्मक (पाजिटिव) पहलू के चर्चा कइले रहनी कि भोजपुरी भाषा भाषियन मे पढ़ल लिखल युवा लोग भोजपुरी भाषा के सोशल साइट्स आ ‘ई मीडिया’ से जोड के संवाद खातिर बहुत आगा बढवलस। फेसबुक, वाट्सएप आदि आधुनिक तकनीकी का जरिये अपना भाषा के आत्मीयता अउरू बढल। इन्टरनेट विस्तार में सहायक त बा, बाकि सबका खातिर ना। बहुसंख्यक लोग आजुओ, प्रिन्टेड पत्र-पत्रिका आ किताब पढ़े के अभ्यस्त बा। दोसर बात ई कि दुनिया में एक बेर फेर गंभीर अध्ययन खातिर प्रिंन्टेट किताब खरीदे आ पढे़ के रूझान बढल बा। आज पढ़े-पढावे बदे बड़-बड़ नगरन में राष्ट्रीय/अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेला लागत बा। भोजपुरी में साहित्य का हर विधा में हजारों किताब छपल बाड़ी स आ छप रहल बाड़ी सऽ। जरूरत बा ओकरा प्रचार-प्रसार आ पढला-पढवला के। एही से भोजपुरी साहित्य के आकलन आ मूल्यांकन होई, जवन नइखे हो पावल।

आकलन मूल्यांकन खातिर पुरनका-नवका साहित्य पढ़े-गुने के परी …….. उहो भोजपुरी का भाव भूमि पर उतर के, बिना कवनो पूर्वाग्रह के। भोजुपरी भाषा साहित्य पर शोध करे वाला लोग प्रचलित ढंग से आ मानक का हिसाब से हिन्दी में पी-एच0 डी0 कर रहल बा। बाकिर पढे-पढावे वाला आम पाठकन के कमी बहुत अखरत बा। मन के संतोख खातिर कहा सकेला कि एघरी के इलेक्ट्रॉनिक (टीवी, लेपटॉप, टेबलेट) जमाना में अखबार किताब पढ़े के गंभीरता आ टाइम हइये नइखे। एह सब के बावजूद भाषा-साहित्य के महातम बनवले रखला खातिर भोजपुरिया लोग के टाइम निकालहीं के परी।

भोजपुरी का नाँव पर होखेवाला ज्यादातर आयोजन में गंभीर प्रभाव डाले वाला चर्चा-परिचर्चा आ विमर्श कमे होला। भीड जुटाके प्रभाव डाले खातिर, गाना-बजाना, डांस तक भोजपुरी भाषा-संस्कृति के सीमित कइला का कारन, चयनित आ उत्कृष्ट पर पर्दा पर जाला। एही में भाषा आ ओकर उत्कृष्ट रचनात्मकता दबा जाले। एगो अउर असंगति बा। भोजपुरी मान्यता के सवाल होखे भा साहित्यिक संस्थानन के गतिविधि, इमानदारी आ निरपेक्षता ना रहला से सभत्तर झोल आ दरार साफे लउकत बा । ना त भाषा-भूगोल एकवटत लउकत बा, ना प्रतिनिधित्व करे वाला सही लोग जुटत बा। नेतागिरी, दलबन्दी, मठाधीशी आ संकीर्ण सोच वाली राजनीति हर रचनात्मक कोसिस के चउपट कइ धइ देले बिया। स्तर के बात छोड़ीं, आयोजक लोग अपना हेली-मेली आ ग्रुप का लोगन का बाद, जादातर अइसन उठाऊ लोग के बोलावत बा जे भोजपुरी साहित्य के अध्येता होखा भा ना होखे, बाकि मनमाफिक आ भविष्य में कामे आवे वाला होखे। आपन पीठ अपने थपथपवला से का होखे वाला बा ? भोजुपरी से अपनाइत आ प्रेम राखे वाला के जदि नीयत आ उद्देश्य साफ बा आ ऊ अपना भाषा खातिर कुछ बढ़िया कइल चाहत बा, त सबसे पहिले, ऊ पढ़े-पढ़ावे वाला लोगन के जमात बरियार करो।

नयका साल में सकारात्मक सोच का साथ, अपना रचनात्मकता के धार दी। हमार शुभकामना।

(< a href=""http://bhojpuripaati.com/">भोजपुरी दिशाबोध के पत्रिका पाती के नयका अंक – दिसंबर 2017 – से साभार : हमार पन्ना )

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