भगवान के चटकन

– डॉ॰ उमेशजी ओझा

UmeshOjha

अरे ए रबिन्दरा, आपन दिमाग ठीक राख, जमीन प रहेके सीख, हवा में मत उड़. सब कोर्इ के इजत होला. जोऽ, आ लईकी देख आउ आ बढिया से आपन बेटा सुरेश के बिआह क दे. ढेरी लईकी देखि के छोड़ छाड़ मत कर, भगवान सब देखत बानी. तोहरो लईकी बिया.

ई सभ बात रबिन्द्र के बुढ़ माई, जेकरा मुंह में एको दात नइखे, एगो टुटही खटिया प बइठल आपन तोतली आवाज में एके सांस में कह दिहली. उनकर बात अबही खतमो ना भइल रहे जब हम ओहिजा चहुँपल रहीं.

‘का बात ह काकी, रबिन्द्र के अतना काहें बोलतानी?’
‘त का करी बेटा. जब से रबिन्दरा के बेटा के नौकरी लागल तबे से ओकर मन हवा में उडत बा. कतने लईकी के देख के आइल बाकि एकरा लईकी पंसदे नइखी सँ आवत. बुझाते नइखे कि कइसन इनर के परी चाहीं. तुहीं समुझाव कि तोहरे निहन हर लईकि के माई बाप के इज्जत होला. जादा लईकी देखि के छोड़-छाड़ मत करस.’

अतना सुनला के बाद हम रबिन्द्र के ओरि घुमि के कहनी, ‘का भाई रबिन्द्र, काकी का कहऽतानी?’
रबिन्द्र झँझुआत कहलस, ‘कहे द यार. एकगो त बेटा बा. का करीं, कइसनों लईकी से त बिआह नइखीं कर सकत ?’

रबिन्द्र के बात सुनि के हम त सोच मे पड़ गईनी कि का ई उहे रबिन्द्र हवे जे आपन इसकूल में लईकन से बड़-बड़ शिक्षा के बात करेले.

रबिन्द्र एगो सरकारी इसकुल के मास्टर हवें. उनका एगो लईका आ दुगो लईकी बाड़ी सँ. जवना में से एगो लईकी के बिआह हो चुकल बा. बाकिर कवनो कारण से उ लईकी नइहरे में रहेले. आपन ससुराल जाए का नामे से दुर भागेले. रबिन्द्र के लईका सुरेश के नोकरी वायु सेना में लागल रहे. ओहि सुरेश के बिआह खातिर रबिन्द्र परेशान रहलें.

जब से सुरेश के नोकरी लागल तब से रबिन्द्र के दुआर प सुरेश के बिआह करे खातिर बड़-बड़ आदमी के आवे से रोज लाईन लागल लागत रहे. रबिन्द्र आपन पतोह के रूप में आवे वाली लईकी के ऊँचाई लगभग 5‘ 4‘‘ आ ओही अनुपात में ओकर सीना आ कमरो चाहत रहले. पढलो लिखल बी.ए. से कम ना खोजत रहले जबकि उनकर लईका सुरेश इन्टरे पास रहले. रबिन्द्र के दिमाग में खलबली मचल रहत रहे कि आपन बेटा के बिआह कइसन करीं, बाकिर कवनो निर्णय प ना पहुँच पावत रहले.

कतने लईकी देख के छोड़ चुकल रहले रबिन्द्र. जईसे कहीं कवनो लईकी के ऊँचाई कम बा, त कवनो के उचाई के उलटा कमर आ सीना नइखे मिलत, त कवनो कम बोलतिआ. कम बोले वाली के बारे में अनुमान लगावल जात रहे कि ऊ घर गृहस्थी ठीक से ना चलाई. अगर जादा बोले वाली होखे त झगऽडालु होई. अगर सब कुछ ठीक ठाक मिलल त लईकी के उमर सामने आवत रहे. काहे कि रबिन्द्र के लईका सुरेश 21-22 बरिस प नोकरी में बहाल भइल रहले. बाकिर रबिन्द्र के ई समझ में ना आवत रहे कि जब लईकी बी.ए. पास चाहीं त उ उनकर लईका से बराबर आ बड़ होईबे करी. रबिन्द्र के आपन बेटा के बिआह ना त बराबर उमिर, आ ना ही बड़ उमिर के लईकी से करेके रहे. माने कि उमिरो छोट चाहत रहे उनका.

आजु फेर रबिन्द्र आपन बेटा के बिआह खातिर लईकी देखे जात रहले. वोही प उनकर बुढ़ माई चिल्लात रहली आ भगवान के दुहाई देत रही.

साँच ह कि काकी के बुढ़ हड्डी कतने जमाना के रसमो रिवाज के देख आ झेल चुकल रहल. रबिन्द्र आपन इछा के पुरती करे खातिर पिछला पॉच बरिस से तमाशा करत बाड़न. सांझि के मालुम भइल कि आजु फेर रबिन्द्र के लईकी पसन ना आईल ह. लईकी त एकदम फिल्मी हिरोईन से तनिको कम ना रही. सब कुछ रबिन्द्र के चाहत के अनुसार आ ओइसने कमर आ सीनो रहे. बाकि लईकी सुरेश से दू ईंच छोट बताके उ लईकी के नापंसद क के घरे आ गीले.

सांझि के हम फेर रबिन्द्र के हाल चाल लेबे खातिर आ ई समझावे खातिर कि ऊ जवन करत बाड़े समाज के लाएक नइखन करत. उनका घरे पहुचनी त काकी फेरू आपन तोतली भाषा में बोलत रही –
अरे ऐ रबिन्दरा. तू जवन तमाशा करत बाड़े तवन सभ भगवान देखत बानी. भगवान के चटकन देखाई ना देला, अइसन मत होखे कि सुरेशवा कहीं दोसर खानदान के लईकी से बिआह कर ले आ तू कही समाज में मुंह देखावे लायक ना रह जो. तोरा के मास्टर कवन बना दिहलस, तोरा त बुरबकवन के मास्टर होखे के चाहत रहे.’
ई सब चलते रहे कि रबिन्द्र झुंझला के आपन माई के बोलल चहले तबहीं उनकर मोबाईल के घंटी बाजल ट्रीन ट्रीन, ट्रीन ट्रीन. रबिन्द्र फोन उठावते बोलले, ‘हेलो, खुश रहऽ बेटा!’

कुछ देर बात कईला के बाद रबिन्द्र एक दम से शान्त हो गइल रहले. चेहरा पिअरा गइल रहे. अइसन बुझात रहे कि देहि में खुन नइखे रहि गइल. आपन माथा पकड़ि के आपन माई के खटिआ प धड़ाम से बइठ गइले. रबिन्द्र के हाल देखी के उनका माई के ना रहाइल. आखिर रबिन्द्र जे भी रहले, उनकर बेटा रहले. रबिन्द्र के माई रबिन्द्र के पकड़ि के पुछली – का भईल बेटा? काहे अइसे करत बाड़? सुरेश ठीक बा नु?’

आपन माई के बात बीचे में काटत आ झुँझुआत रबिन्द्र कहले, ‘तू जवन चाहत रहू उहे हो गइल. सुरेशवा दोसरा जाति के लईकी से बिआह काल्हूए करत बा. हमनी के बोलवले बा. चलऽ चलबू नु आशिर्वाद देबे!’ रबिन्द्र के बोली में आपन माई के प्रति व्यंग रहे.

बाकि साँचो भगवान के चटकन समये से लागेला, उ लउकेला ना. रबिन्द्र आपन बेटा के बिआह के खातिर जइसन लईकी के कामना कइले रहले आ उजागर करत रहले उ समाज से उलटा रहे. काकी के अनुभव तनिको कम ना रहे. आज रबिन्द्र के मिजाज ठंढा गइल रहे आ काकी के बात भगवान सुन लेले रहीं.

Comments 2

  • प्रिये संपादक जी.
    कहानी प राउर टिपणी बढ़िया लागल. एह प एकरा से बढ़िया टिपणी नईखे हो सकत. ई सही बात बा कि लेखिनी लेखक के दिमाग के उपज ह. अगर पाठक आ संपादक के टिपणी लेखक के लेख प ओकर अच्छाई आ बुराई के होत रहो त लेखक के आपन लेख में सुधार होत रही. लेखक के ई बुझाई कि ओकरा से कहा गलती हो रहल बा. बात सशी बा कि ई कहानी में लईकी के मनह स्थिति प जोर नईखे दिहल गईल. सायेद ऊ दिहल रहित त कहानी के शीर्षक कुछ और होईत. एह कहानी में रविन्द्र के माध्यम से समाज में आजू ई जवन प्रचलन बनत जा रहल बा कि लईकी देखि आ छोड़ दिही. जवन सही नईखे. एकरा से ओह लईकी प का बीती आगे दोसर कहानी में कोशिस करब कि पाठक पढ़ सकस. रउरा से अनुरोध बा कि असही कुछ टिपणी हर लेख प देत रही त एक नया परिचर्चा जारी हो सकी . बहुत-बहुत धन्यवाद .

  • रविन्द्र जवन करत रहले ऊ त ठीक नाहिए रहे बाकिर जवना आधार पर उनका सोच के गलत बतलावे के कोशिश भइल बा ऊ सोच ओहू ले घटिया बा. काहे कि एहमें समाज के जाति के आधार पर बाँटे के कोशिश बा. देखला का बाद छोड़ दिहल लईकी के मानस पर पड़े वाला भावनात्मक असर के चरचा भइल रहीत त कहानी दमदार बन गइल रहीत.
    गनीमत बा कि अब लईकियन में बदलाव आवे लागल बा आ ऊ अब कवनो खूंटा पर बन्हाए ला तईयार नइखीं सँ. बाप के फर्ज निभावे में लागल रविन्द्र अगर अपना लइको से राय विचार कइले रहितन त कहानी के अंत अइसन ना भइल रहीत.

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