भाव के खरिहान में ‘कठकरेज’

– ओमप्रकाश अमृतांशु

Kathkarej-coverकला-साहित्य कवनो भाषा में होखे ओकर महत्व सबसे उपर होखेला. साहित्य समाज के रास्ता देखावेला, अपना साथे लेके चलेला आ अपना संस्कृति के पहिचान करावेला. साहित्य के बाग-फुलवारी जेतने हरियर, कंचन-कचनार रही समाज ओतने पलत-बढ़त, फरत-फुलात आ टह-टह-टहकार रही. साहित्य कवनो जाति-समप्रदाय, गरीब-अमीर के थाती ना हउए. साहित्य त अमरित के फुहार हउए, जेही एह फुहार में भींज जाला उहे मदमस्त होके झूमे लागेला.

“गाछन से अबो बुन्नी टपर-टपर टपकता आ चिरइअन के ऊ बिलायती भाषा चारू ओर सुनाता. चिरइअन के साथे फतिंगो आकाश के सिंगार करत बाड़े. लागत बा कि आदितमल के गुदगुदा के उनकर चादर हटावल चाहत बाड़े.” “बरम बाबा के सगरो गाछ नइखे भींजल त बुझाता कि केहू सुतला में उनका मुड़ी पर एक कचोरा पानी गिरा देहले बा.” एतना सुनर भाव के डाढ़-पात से लदरल बा ‘कठकरेज’.

केशव मोहन पाण्डेय के लिखल नया कहानी-संग्रह के नाम हउए ‘कठकरेज’. संग्रह के पहिला कहानी के नाम बा ‘लिट्टी’ दिल में सिहरन उठावेवाली कहानियन के संउसे द्वश्य साफ-साफ झलकत बा. नव गो कहानियन के सुनर माला आ ओह में मोती जइसन सुनर-सुनर शब्द. एक-एक कहानी में अलग-अलग भाव के सुगंध. जे एक बेर पढ़ी बेर-बेर पढ़े खातिर अकुला जाई. दुसरका कहानी के शीर्षक ‘करनी के फल’ में एगो सिधवा आ ईमानदार मंहथ के साथे दगाबाजी जाटा के खेल भांपे लायक बा. दुष्ट जाटा के करनी अइसन बा कि उ लहलहात फसल के भइसिन से चरवावे में आ गऊ हत्या करे में ओकर आत्मा ना काँपल. अंत में ओही धवरी गाय के खूंटा पे गिरल, पेट फाटल आ परान पखेरू बन के उड़ गइल ओकर. ‘भकजोन्ही’ के सुंघनी लाल जाति के लाला बाड़न. छली, झूठा, कामचोर बाकिर आत्मविश्वास से लबालब भरल पात्र. बाप बने के मैदान में निकहा सफल बाकिर मेहनत-मजदूरी में ओतने असफल. इनका बारे में लेखक के कलम कहता – ‘गाछ पर भकजोन्ही अपना छली रूप पर घमण्डे डूबत-उतरात रहली सँ. बरला पर त चनरमो के कुछ ना बुझऽ सँ बाकिर बुतइला पर अस्तिवे खतम हो जाए.’ संग्रह के कहानी जे भी ‘महतारी’ पढ़ी ओकर आंख बेर-बेर डबडबा जाई. मउनी में कसे लायक विधवा जोन्हिया काकी के मइल आंचर से ममता के मिठास बरीसऽता. पंजाब में रहे वाला पूरन आ पतोह के जब इयाद आवेला उनका आँख से पानी छलक जाला. महतारी के रोंवां-रोंवां में अपना पूत खातिर आशीर्वादे भरल रहेला. संउसे कहानियन के ताना-बाना जमीनी रहन-सहन से जुड़ल बा.

धूमधाम से बारात आइल. बड़ी परेम से समधिमिलान भइल. बाकिर ई का? सेराइल पूडी खातिर बारात वापस जाए के धन्ध लाग गइल. ‘बेटहा’ कहानी में इहे जूझ लागल बा. हमनीन के शादी-बिआह में बेटहा के अकड़ रस्सी के अईठन जस होखेला. अपना घरे भलही बासी रोटी खात होइहें बाकिर समधियाना में तातल पूड़ी चाहीं. बेटिहा त बेचारा बनके घिघियात रहेला अइसे, कि जइसे बेटी पैदा कर के सबसे बड़का पाप कर दिहले होखे. लईकी के एगो बात से पासा पलट जात बा. ‘पवितर लहर’ में सुन्नर बाबा के पतरा से कथाकार लड़त लउकत बाड़न. घर में नया-नवेली दुलहिन आइल बिया, उ भूखे-पियासे छटपटात बिया, कंठ सुखाइल बा, बेहोश बिया बाकिर बाबा के पतरा में दू घंटा बाद के साइत बा. बाप के देवता जइसन माने वाला बेटा आज उनकरे विरोध में खड़ा भइल – “हम लात मारऽतानी तहरा ई विधि-विधान……” पारम्परिक रिति-रिवाज प चोट करत लेखक के कलमो बदलाव के पक्ष में खड़ा बा. किताब के अंतिम कहानी के नाम ‘कठकरेज’ हउए. कहानी के चित्र मर्मस्पर्शी आ सुन्नर बा. जुगुल चौबे के संघर्षमय जीवन पोरे-पोरे दरद से भरल बा. दू-दू गो जवान बेटा के कान्ध दे दिहल बाप के करेजा त काठे के नु होई. कुफुत में देह सुखा के कांट हो गइल. दिन-रात पूजा पाठ करेवाला चौबे जी के अब केहू पे भरोसा ना रहल. ना भगवान प ना आदमी प. दिन-रात बभनइति करावेवाला बाभन आदिमी मांस-मछरी खाए लागल.

भोजपुरी पंचायत प्रकाशन से प्रकाशित ई पहिला कहानी-सग्रह हउए. ‘कठकरेज’. कहानी संग्रह के सभ कहानीयन में अजब-गजब के भाव समाइल बा. एक-एक कहानी आपने गांव-जवार में घटल घटना लागत बा. सभ पात्र चिन्हल-चिन्हावल लागत बाड़ें. आपन माटी आपन खेत-खरिहान, रीति-रिवाज के महक समाइल बा. हालांकि कवनो-कवनो कहानी में कतहीं-कतहीं भाव के गहराई के कमी खलत बा. तबहियो ठेंठ शब्दन के प्रयोग सराहनीय बा. कुल मिला के संग्रह रोचक आ पढ़े लायक बा. लेखक केशव मोहन पाण्डेय के कोशिश सार्थक बा. सफल बा. उपजाऊँ बा. आशा बा पाण्डेय जी के कलम निरन्तर बिना थकले आगे बढ़त रही आ भोजपुरी साहित्य फरत-फुलात रही.


पुस्तक:परिचय, कहानी-संग्रह कठकरेज
लेखक: केशव मोहन पाण्डेय
प्रकाशक आ मुद्रक भोजपुरी पंचायत प्रकाशन, नई दिल्ली
कीमत : ९० रूपिया

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6 Comments

  1. अमृतांशु जी,
    सबसे पहिले हार्दिक धन्यवाद!
    हम पहिलहूँ से जानत रहनी हँ कि रउरा ताकतवर चित्रकारी के साथे नोकदार कलम के कलाकार हई, आज त छछात हमही गवाह बन गइनी। ई समीक्षा पढ़ के हम सचहूँ भकुआ गइनी हँ। भकुअइनी हँ ए से कि कई गो अइसन ठाव बा, जहवा हम सोचलहीं नईखी, रउरा ओहू के गीत गा के हमरा कहनियन के अमर क देहले बानी। हम त तरि गइनी। रउरा के एक बेर फिर से धन्यवाद आ धन्यवाद एह अंजोरिया के!

  2. bhojpuiri bhasha ja khati saundary, kahani ke harek bimb ko ek alag najariya se dekhane ka kakaushal me keshaw mohan jee ki adhubut shaili inke rachnao kojiwant banati hai …bahut sundar samiksha

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