(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 15वी प्रस्तुति)

– आशारानी लाल

जब ना तब हमके बइठल देख के ऊ हमरा सोझा धमक जाले. दूर से चलल-चलल आवेले एही से थाकलो लउकेले. ओकरा तनिको अहस ना होला. इहो ना सोचेले, कि बड़ लोगिन के सोझा चाहे हमा-सुमा के लगे जइसे-तइसे आ जब-तब आके खाढ़ ना होखे के चाँही.

कबो हम ओकरा ओरी ताकिलाँ तऽ कबो महटिया जाइलाँ. हम ओके अन्हेरिया, गरीब-गुरबा, चाहे बउकड़ बूझ के ना महटियाइलाँ. इहे सोचिलाँ कि ओकरा से हम का बतियाइब. न तऽ ऊ हमार बात बूझी, न हम ओकरा के बूझब. ऊ बूझो चाहे ना, अपन लटकल मुँहवा हमके देखाइए दी, ना त कबो-कबो लोरो चुआवे लागी – तब हम का करब.

अइसे देखेमें ऊ करिया रंग के दूबर-पात तनी लमहर मेहरारू लउकत रहे. ओठवा ओकर दुनु बन्दे रहत रहे, तऽ दाँत कमें लउकल करे. ओकर दूनो उज्जर-उज्जर आँख, ओकरा मुँहे पर सही सलामत लउक जाइल करे. कवनो बात पुछलो पर, ऊ जल्दी बोलत ना रहे, अपन मुड़िए हिला-हिला के आ नटई घुमा के, ऊ कुल बात के जबाब दे देत रहे. भर टोला रोजे घुमल करे, तबो ओकरा में लाज भरल रहे. कवनो मरद-मानुस के सोझा ऊ अपन साड़ी अपना माथे पर से खींच-खाँच के मुँहवा ढाँक लिहल करे – जवन ओकरा लजइला के चिन्हासी लागे. बार तऽ ओकर हरदम अँझुराइले-खँझुराइल रहत रहे, काहे कि बार झारे के मोका ओके कबो भेंटइबे ना करे. भोरहीं से अपना धन्धा में जोता जात रहे. ओकरा लगे बहुते लोगिन के अढ़वल काम पड़ल-पड़ल टुकुर- टुकुर ताकल करत रहे. कबो केहू के दुआर झारे-बहारे के रहे, तऽ कबो कहीं से गोबर उठावे आ फेंके के रहे. इहे ना कई लोगिन के घर-दुआर में गोबर-माटी डाले के आ लीपे-पोते के पड़ल रहत रहे. केहू के दुअरा चिपरियो पाथे रोज ऊ जाइल करे. ओके बेर नवे लागे सबकर कहल काम आ टहल पुरवे में. ओकरा फुरसते कब रहे कि केहू लगे बइठो चाहे बतियावे. एतना जाँगर ठेठवलो पर का जाने ओकरा भरपेट खयेका जूरत रहे कि ना ? कामे के सूर में ऊ अइसन बूड़ल रहत रहे कि तनी हँसहू बोले के मोका ओकरा ना भेंटाय. लागे कि ऊ हँसल-मुस्कराइल भुला गइल होखे. कहेला लोग कि पढ़ले-लिखल लोग काम में ढ़ेर बाझल रहेला, बाकी ओकर काम आ मेहनत देख के त हमरा आँखी के सोझा अन्हार हो जात रहे.

अबे कुछे दिन भइल कि हम ओह घर में बियह के आइल रहीं, आ ओह घर के बड़ पतोह बनल रहीं. देखलीं कि अतवार-मंगर छोड़के रोजे भितर-बाहर के ओसारा में गोबर पड़ल करे. ई गोबर डाले के काम उहे मेहरारू करत रहे, एही से देखे में हमार घर बड़ा चिकन-चाकन लउके. एह गोबर डाले वाली मेहरारू के हमार सास फिदनी कहि के पुकारत रही. ई फिदनी नाव सुन के त पहिले हमरा हँसी आइल बाकी धीरे-धीरे जब रोज ओकर काम-धन्धा देखलीं तब सोचे लगलीं कि – ए बाबा ! एह रूप में त ना बाकी एह नाव में बड़ा गुन बा. हमार सोच आ हँसी ओकरा गुन के सोझा हीन लागे लागल.

फिदनी अपना हाथ के हथेरिए से गोबर पानी मिला के आ ओके रगड़-रगड़ के घर-दुआर अइसन चिक्कन बना देत रहे आ चमका देबे कि उहाँ अदिमिए नाहीं, लागे कि देवतो लोग आके दू-छन बइठे खातिर मचल जाई. हम ओकर नाँव त जानिए गइल रहीं, एक दिन इहो देखलीं कि अम्माजी धीरे से अपना हाथे में दू-चार गो ले रोटी लेके ओपर गुड़ धऽ लेली, फेरू आपन हाथ अपना अँचरा में लुकवा के, बहरी के दलानी में गइली जहाँ पहिलहीं से ऊ फिदनी चउकठ धइले ठाढ़ रहे. ओह रोटिया के धीरे से ओकरा हाथे में धरा के ऊ घरे में मुड़ के आ गइलीं. फिदनियो अपन हाथ अपना लुगा में लुकवा के चल देलस. अब हम रोजे जब जब फिदनी बहरी के दुअरिया पर काम क के ठाढ़ होखे, तब अम्माजी के ओकरा मजूरी के दिहला पर अपन नजर गड़वले रहत रहीं, काहे कि ऊ कबो नून मरिचा साथे धके रोटिया ओके दिहल करँस. तबे हमरा बुझाइल कि ई दूगो रोटिये ओकर मेहनताना के मजूरी बा, जेके देत आ लेत के केहू दूसर ना देख पावेला. हम जान गइलीं कि ई अम्माँजी के बहुते चाँलाकी के बात बा. ना तऽ एह मजूरी के बारे में दूसर केहू जानी आ न कबो एह काम में मजदूरी खातिर केहू हड़ताल करी. कहल जाला कि मेहरारून के अक्किल ना होला, बाकी हमरा अम्माजी के त एह दिसाईं बहुते तेज बुद्धी चलत रहे. एगो इहो बात देखे में आइल कि फिदनी के तर-तिहुआर के चलते ढ़ेरे बोनस भेंटा जात रहे. मानतानी कि पवनी कुल खातिर घीव लगा के ना, तेले घँसके दलभरूई-पूरी आ बखीर बनत रहे, त उहे बोनस बन के फिदनिओ के मिलल करे. ई पूरी बखीर के बोनस – ओके सबका सोझा दियात रहे – चोरवा लुकवा के ना. एह मोका पर फिदनी तनी हँसे-बिहँसे आ अवरियो खयका आ लुगा के माँग अम्माँजी से करे, जेमें थेर बहुत अवरी ओकरा भेंटाइयो जात रहे.

फिदनी के मेहनत के बारे में केतनो कहल जाव ऊ कमे रहे. ओकर मेहनत आ दीन भाव देख के हम ओकरा पर तनी मोहा गइल रहीं. जब ऊ हमार घर लीपत रहे तबे ओसे हम पुछलीं कि – तोहार ‘ऊ’ कहाँ रहेलन ?

एतना सुनते फिदनी के मुड़ी नीचे गड़ गइल, ऊ लजा गइल, तब अम्माँजी बोललीं कि – अरे – ‘ऊ’ कहाँ घरे रहेला. ‘ऊ’ त परदेस में महिना महिना दिन ले भीख माँगे खतिर घुमत रहेला. ओकरा आवे-जाये के दिन के कवनो ठीक ना रहेला, अहिसे न ई फिदनी अपने जाँगर ठेठा के कमात खात रहेले, आ अपना लइकनो के पोसेले.

अम्माँजी के बाते से हम जनलीं कि ई फिदनी एगो जोगी के मेहरारू ह. एके सबलोग जोगिनिया, चाहे रहमत बो, चाहे फिदनीए कहिके गोहरावत रहेला. ई फिदनी एह गाँव में एह टोला के सब बाबू भइया लोगिन के घरे सेवा टहल में लागल रहेले, जवन ओकरा करे लायक होला. ऊ एगो जोगी के मेहरारू रहे, जेकरा न खाये के खयेका रहे न पहिरे के बस्तर.लइकवा कुल त एगो जँघिया पहिन के उघारे-निघारे खेते खरिहाने घुमत रहत रहन सन. उहो फाटले पुरान, मइल-कुचइल लुगा पहिन के एने-ओने धउरत रहत रहे. अपना तन पर अपन लाज ढाँके खतिर ऊ लुगा पहिनत रहे. जब कबो फिदनी तनी नीक लुगा पहिन लेबे तऽ लोग बाग लागे न सुगबुगाए आ कहे कि कहले न जाला कि- ‘गरीब के लुगाई, भर गाँव के भउजाई होले’.

फिदनी केहू के घरे कुछु छू ना सकत रहे.बाकी चोरा लुका के ओह गाँव के गँवई मनचला बाबू लोग ओके अपन भउजाई कहि के अपना हवस के पुरवत रहत रहे. एह बात के फिदनी पर कवनो असर ना पड़े, काहे कि ओके खाए-पहिने के भेंटा जात रहे. एगो भुखाइल दुखिया गरीब मेहरारू के अवरी का चाँहीं. ऊ केहू से इहाँले कि अपना मरदो से कबो कुछु ना माँगत रहे – ई सब तऽ ओकरा मेहनत के फल रहे, जेसे ओकर पेट भरत रहे.

अम्माँजी से हम जनलीं कि फिदनी ओह गाँव के जोगीटोला में रहेले. इन्हनी के रहे खातिर एके गो कमरा ओह घर में रहे, जेमें एकनी के मूर्गा-मुर्गी, बकरी-छेरी, बाल-बच्चा आ अपनहू कुल राती खानी सुतत रहन सन. रहे-सहे के कवनो चिन्ता फिकिर एकनी के ना होला. ई कुल वर्तमान में जीयेलन सन, यानी आज खा लीहन सन त काल्ह का होई ? ई कबो ना सोचेलन सन. ए कुल के न तऽ बाजार भाव से मतलब होला न कवनो बैंक के नाँव जाने से. भीख मांगल एह लोग के पुस्तैनी पेशा होला. फिदनी एही जोगिन के समाज के उपज रहे, जेकरा जिनगी में न त कबो अमीरी आइल, न त कबो गरिबिये ओकर साथ छोड़लस.

आज उहे फिदनी बेर-बेर हमरा सोझा घुरिया-घुमरिया के हमरा से बोलल-बतियावल चाहत रहे. ओकरा त सोचे के चाँहीं कि जब एक बेर हम ओसे बोलल बन्द कऽ दिहलीं, तऽ अब एतना दूर शहर ले आके आ हमरा इयाद के झरोख में घुस के हमार पीछा जब ना तब काहेंके करत रहतिया. हम तऽ ओही दिने चुपा गइनी जवना दिने सुनलीं कि ऊ अपना गरीबी के तरजूई पर अपना नासमझ बेटी के तउल देलस. इ सुनते हमार करेजा कसमसा के थउस गइल. ऊ बेटी अबे छवे-सात बरीस के भइल रहे. भगई आ चिरकुट लपेटले घुमत रहत रहे. ऊ कबो महुआ बीनत के, तऽ कबो नीब चुनत के लउक जाइल करे. कबो-कबो लकड़ी, चुन्नी, पतई आ करसियो उठावत रहे. ओही अबूझ बेटिया के पइसा के लालच में अपना कंगाली के तरजूई पर ऊ चढ़ा देलस.

का जाने कवना बेपारी के हाथे. फिदनी ओके कुछ पइसा गिना के दे देले रहे. ऊ बेपारी कवनो दूर दराज देस में ओह धीया के लेके चल गइलन सन. ऊ कुल ओकरा साथे का-का कइले होइहन सन् केहू जान ना पावल ? अपना अबूझ बेटी के बेंच के इ फिदनी कुल्ही महतारिन के मुँहे करिखा पोत देले रहे. जब हमरा मालुम भइल कि अइसन घिनौना काम बाप नाहीं, ऊ महतरिए कइलस ह, तब से हमरा मन के हिया में ओह फिदनी खातिर जेतना मोह के तेल भरल रहे, कुल सूख गइल आ हमार इ मन घिरना से भर गइल. इहे बात बा कि आज ओकर ईयाद जब जब हमरा आवता तब-तब ओकर कठकरेजी महतारी वाला रूप हमरा सोझा लउके लागता. एही से हमार मन अब अपना टेक पर अकड़ के घेड़ा नियर हिनहिनाता. हम भले अपना मन के बेर-बेर झटकारऽतानी आ समझावतानी कि ओकरा से हमके बोले बतियावे के चाँहीं, बाकी ऊ अड़ल, बा एही पर कि ना हम ओसे कुछु ना बोलब न बतियाइब, आ न तऽ ओकरा बारे में कुछु लिखब.

एतना कइलो पर ई फिदनी मानत नइखे. लागता कि ऊ हमरा सोझा आके – रिरिआ-गिरिआ के हमसे इहे पूछल चाहतिया कि – मोसे-रूसल बानी
का ? मोरा संगे-संगे आज ”उहो“ आइल बानऽ, आ रउवा से एगो भिच्छा माँगतान. आज अपना बोलिए के भीख हमनी के दीहीं नऽ.


पिछला कई बेर से भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के पूरा के पूरा अंक अँजोरिया पर् दिहल जात रहल बा. अबकी एह पत्रिका के जनवरी 2012 वाला अंक के सामग्री सीधे अँजोरिया पर दिहल जा रहल बा जेहसे कि अधिका से अधिका पाठक तक ई पहुँच पावे. पीडीएफ फाइल एक त बहुते बड़ हो जाला आ कई पाठक ओकरा के डाउनलोड ना करसु. आशा बा जे ई बदलाव रउरा सभे के नीक लागी.

पाती के संपर्क सूत्र
द्वारा डा॰ अशोक द्विवेदी
टैगोर नगर, सिविल लाइन्स बलिया – 277001
फोन – 08004375093
ashok.dvivedi@rediffmail.com

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