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– ईश्वरचन्द्र सिन्हा

सिंहवाहिनी देवी के सालाना सिंगार के समय माई के दरबार में जब चम्पा बाई अलाप लेके भैरवी सुरू कइलिन, त उहाँ बइठल लोगन क हाथ अनजाने में करेजा पै पहुँच गयल. रात भर गाना सुनत-सुनत जे झपकी लेवे सुरू कय देहले रहल, ऊहो अचकचाय के उठ बइठल, जइसे केहू ओनके उप्पर लोटा क पानी उड़ेल देहले होय.

चम्पा बाई के गला जइसन सुरीला रहल, बइसहीं ओनकर रूपो अइसन रहल कि देखवइयन के झाँई आवे लगे. औ भैरवी के ओन्हे जइसे सिद्धि मिलल रहल; बनारस में ओह समय ओनके जोड़ के भैरवी गावे वाला केहू दूसर नाही रहल. चम्पा बाई क टीप ओह भोरहरी के बेरा गंगा के चीर के ओह पार रेती तक पहुँचत रहल. जइसहीं चम्पा बाई दोहराय के गउलिन- ‘लगत करेजवा में चोट’ सज्जै दरबार झूम उठल.

‘वाह मालिक, तनी बताय के’- मंदिर के ओर के सीढ़ी से ई आवाज लगते, दरबार के एक कोने में जइसे हलचल मच गयल. चम्बा बाई चकपकाय के ओहर तकली, त देखैं कि बचऊ महराज क छः फुटी काया सीढ़ी पार कइके सामने आइ गइल हौ. चम्बा के गइबै जइसे भुलाय गयल.

बचऊ महराज आवाज देहलन- ‘सुरू होवे दा चम्पा, काहें चुपाय गइलू. का सच्चौ के पीर उठ गयल?’

बचऊ महराज के एतना कहतै दरबार के जउने कोने में हलचल मचल रहल, ओहर से आठ दस जवान लाठी लेहले तनतनाय के खड़ा हो गइलन. ई पट्ठा बल्ली बाबू के रहलन, जेकरे नाम के दबदबा ओह समय बनारस पै रहल. हर समय दर बीस पट्ठ दुआरे पै पड़ल भाँग-बूटी छानल करें और जरूरत पड़ले पै सौ दू सौ के एकट्ठा करे में देर न लगे. बल्ली बाबू के पट्ठन के लाठी खड़कतै, लोगन के देही के जइसे खून सुखा गयल. बाकी बचऊ महराज पै एकर तनिको असर नाहीं देखायल. ऊ अगिला पट्ठा के ओर ताक के कहलन- ‘का रे सुमेरवा! जाय के बल्ली से कह दीहे कि हमसे मिल लीहें.’

सुमेर टकटकी लगाय के देखत रह गयल. बचऊ महराज कंधे से खसकल दुपट्टा उप्पर चढ़ावत घाट के ओर बढ़ गइलन. दरबार खतम हो गयल. कुछ लोग घरे गइलन, औ कुछ लोग नहाये बदे गंगा किनारे. चम्पा बाई बल्ली बाबू के पट्ठन के घेरा में दालमंडी के रस्ता धइलिन.

बात ओह समय के हौ, जब तुरुकन के अमलदारी के धूर चटाय के फिरंगिन के कोतवाली चौक के करेजा पर खड़ी होय के भद्दीमल के हवेली से आँख लड़ावे सुरू कइले रहल. बल्ली बाबू के घर एही हवेली के पिछवैं लख्खी चौतरा से सटले रहल. कहल जाला कि एकर नाम लख्खी चौतरा एह बदे पड़ल कि हाथ भरके चौतरा बदे जब दुइ बनारसिन में ठन गयल त दूनो ओर के कुल मिलाय के एक लाख रुपया लड़े में खरच हो गयल. बल्ली बाबू बनारस के सराफा बाजार क राजा कहल जाँय. का मजाल कि एक्को गुल्ली सोना चाहे एक्को सील चाँदी बिना ओनके मरजी के बिकाय जाय. उमिर त अबहीं पचीसिये में रहल, बाकी सराफा के बूढ़-बूढ़ दलाल ओनके गुरू कहैं औ मानै. जब बल्ली बाबू सराफा में पहुँचै त बड़े-बड़े सेठ हाथ में पान के दोना लेके खड़ा हो जाँय. बल्ली बाबू खाली दलालै ना रहें. बल्ली बाबू के रहत सराफा के ओर केहू आँख नाहीं उठाय सकत रहल. सराफा के नइकी कोतवाली पै ओतना भरोसा ना रहल, जेतना बल्ली बाबू पै.

बचऊ महराज पैंतीस के पास पहुँचल रहलन. बाल-बच्चा वाले रहलन. शरीर और रियाज खानदानी रहल. बाप दादा के बखत से जजमानी होत आइल रहल. जजमानियो एकठे रियासते होले, जेकरे रच्छा बदे मालिक के गु ड ं ा बने के और चेलन के एकठे फउजो पाले के पड़ेला. बचऊ महराज ई दूनो में बनारस उप्पर मानल जात रहलन. ओनकर हवेली बालूजी के फरस पै रहल. ऊ हवेली का रहल एकठे किला रहल. सदरी दुआर एक्कै, बाकी ओम्मे अँगना इग्यारह ठे. बचऊ महराज लँगोट के पक्का रहलन, बाकी ओह समय के रईसन मतिन गाना सुनै के सउख ओन्हऊ के रहल. साल भर पहिले जब बनारस के रईसन के महफिल में चम्पा बाई के धूम मचल रहल, बचऊ महराज कब्बौ-कब्बौ चम्पा बाई क कोठा पै जाय के गाना सुन आवें. बाकी साल भर से चम्पा बाई मुजरा त बन्द करी देहलिन, महफिलो में जाब छोड़ि देहलिन, चाहे केहू ओनके एक लाख देवे बदे काहें न तइयार होय.

साल भर पहिले चम्पा बाई के भे ट ं जब बल्ली बाबू से भइल, त चम्पा अपने मतारी के कुल सिखावल-पढ़ावल भुलाय के बल्ली बाबू पर लट्टू हो गइलिन. बल्ली बाबू उहाँ जाये त सुरू कइलन गाना के आनन्द लेवे, बाकी धीरे-धीरे ऊ दूसरे आनन्द में पड़ गइलन. ऊहो समय आय गइल, जब मोजरा के समय रईस लोग दालमंडी पहुँचै त चम्पा बाई के खिरकी बन्द पावें. ई बात दालमंडी के घरे-घरे फइल गयल कि अपने रईस के कहले से चम्पा कोठा बन्द कय देहलिन. दालमंडी में बल्ली बाबू चम्पा के रईस कहल जाये लगलन और चम्पा के रोब-दाब ओह गली में सबके छाप लेहलस.

नया-नया आयल कोतवाल फरजंद अली के भी तरस के रह जाये के पड़ल. चम्पा के गाना सुने के लालसा ओनके मने में झुराय गयल. चम्पा नाचब-गायब कुल छोड़ त देहलिन बाकी जब सिंहवाहिनी देवी के सिंगार के समय नगिचायल त ओनके अपने माई के कहल इयाद पड़ गयल. ओनकर माई हर साल सिंहवाहिनी देवी के सिंगार के दरबार में गावे बदे जरूर जाँय. ऊ बतउले रहलिन कि चम्पा के नानियो उहाँ जाये में कउनो साल नागा नाहीं कइले रहलिन. ओनके ई विसवास रहे कि देवी जी के किरपा से ओनकर बंस फूलत-फलत आवत हौ. चम्पौ जब से नाचब-गाइब सुरू कइलिन, देवी जी के दरबार में जाय अपने हुनर से माई के रिझावे से ना चूकें. ऊ बल्ली बाबू के राजी कइ लेहलिन कि भोर के बखत मन्दिर में जाय के एक ठे भैरवी सुनाय अइहें.

ओनके संगे बल्ली बाबू के दस बारह पट्ठौ उहाँ गइलन. संयोग क बात कि ओही समय गंगा-नहाये जात के जब बचऊ महराज मन्दिर के पास पहुँचलन त चम्पा के टीप सुनके माई के दरबार में पहुँच गइलन और अन्यासे ओनके मुँह से ऊ बात निकल गयल, जौन दरबारै के खड़बड़ाय देहलेस.

बल्ली बाबू अपने पट्ठन से जब ई कुल सुनलन त मारे गुस्सा के ओनकर चेहरा लाल हो गयल. ऊ दप से लाठी उठौलन और दलान के बाहर होय गइलन. गल्ली में पहुँचते ओनके मन में न जाने का आयल कि मुड़ के लाठी फेंक के खाली हाथ बचऊ महराज के घरे पहुँच गइलन.

बल्ली बाबू के देखतै बचऊ महराज उठ के आदर से ओनके बइठावे चहलन, लेकिन बल्ली बाबू खड़ै-खड़ै कहलन- ‘सुमेरवा कहलेस ह कि महराज बोलउले हउवन. सुमेरवा कउनो गुस्ताखी कइलेस का?’

‘नाहीं हो. चम्पा के भैरवी साल भर पै सुनै के मिलल, तवन ऊ ससुरा लाठी खड़कावे लागल. चम्पो त अइसन लजाइल जइसे तोहार बिअहुता होय.’
‘बिअहु त ा’ सु न के बल्ली बाबू तिलमिलाय उठलन. तब्बौ अपने के संभार के कहलन ‘कल भोरे में मनकनिका घाट पर चम्पा के भैरवी सुने के तोहके नेवता हौ महराज.’

बल्ली बाबू के चुनौती समझत बचऊ महराज के देरी ना लगल. ऊ झगड़ा बढ़ावे नाही चाहत रहलन. ऊ त लाठी खड़कले पै सुमेरवा के ई चेत दियावे बदे कि हम तोहरे मतिन पट्ठा नाहीं, बल्कि गुरू हईं, बल्ली बाबू के बात से ऊ समझ गइलन कि बात उहाँ तक बढ़ गइल हौ, जौने से पीछे नाहीं हटल जा सकत. बल्लिओ बाबू बिना जबाब के इंतजार कइले उलट के बाहर चल गइलन.

ई खबर बिजली मतिन सहर भर में फइल गइल. सबकै जबान पै एकै बात रहल कि कल का होवे वाला हौ. दूनो ओर के पट्ठा लाठी चिकनावे सुरू कय देहलन. दूनो कोठियन में हलचल मच गयल. रात दुइये बजे से मनिकनिका पै लोग जुटे लगलन. भोर होत होत बचऊ महराज और बल्ली बाबू अपने-अपने पट्ठन के साथ पहुँच गइलन. ओहारदार पालकी में चम्पा बाई भी उहाँ ले आवल गइलिन. रोवत रोवत ओनकर आँख फूल गइल रहल. बार बार ओनके मन में आयल कि रोय-धोय के बल्ली बाबू के रोकीं. बाकी ई सोच के कि फिर बल्ली बाबू बनारस में कवन मुँह देखइहें, मुँह न खुलि पावे. चम्पा पत्थर के करेजा कय के ई तय कय लेहलिन कि चाहे जवन कुछ हो जाय, बल्ली बाबू के सान में बट्टा चम्पा के मोहब्बत औ चम्पा के अपने स्वारथ बदे न लगे पायी.

बचऊ महराज सामने के मढ़ी पै बइठल रहलन. बल्ली बाबू उहाँ जाय के पुछलन- ‘का महराज भैरवी सुने के तइयार हउवा.’
‘हाँ हो! हम त सुरू होवे बदे अगोरत हईं.’ बचऊ महराज मुस्कियाय के कहलन.
‘साज पै का बजे के चाहीं.’ बल्ली बाबू तनी तिरछा होके कहलन.
‘चम्पा तोहार हई और साजो तोहरे मन के रहे के चाहीं.’ बचऊ महराज तनी ठनक के कहलन.

बल्ली बाबू लउट गइलन. चम्पा के पालकी से उतार के सामने के मढ़ी पै बइठा देहलन. हाथ में तलवार ले के माथे पै लगवलन आ आगे बढ़के बचऊ महराज से कहलन- ‘आवा महराज! पहले साज मिलाय लेवल जाय.’
बचऊ महराज अपने चेला से तलवार लेके माथे लगउलन और जय जगदम्बा कहके सामने आ गइलन.
जइसे जइसे तलवार खनके, वार अउर ओकर काट होय, वइसे वइसे देखवाइन के साँस टँगाये लगल.
एक घड़ी बीत गइल, लेकिन दूनो लड़वइयन के तेजी में कउनो कमी ना आयल. चम्पा दाँत से जीभ दबउले करेजा थाम के बइठल साज मिले के घड़ी टकटकी लगाय के अंगोरत रहली. बाकी ई साज त भैरवी से मेल खातै नाही रहल. झलफलाह होबे लगल.

नहवइया घाट पर आवे लगलन. बल्ली बाबू के निगाह तनी अँजोर में जब चम्पा के झुरायल मुँह पै पड़ल, त ओनके देह में जइसे बिजली दउड़ गइल. अब त ओनकर वार एतना तेज हो गयल कि बचऊ महराज के बचावै करे के फुरसत न मिलै. देखवइयन के अइसन बुझाइल कि अब मैदान बल्ली बाबू के हाथ में हौ. तब ले त चारो ओर हल्ला मच गइल. चम्पा के भाग फुटल. बल्ली बाबू के वार रोके बदे जइसहीं बचऊ महराज तलवार चलउलन, बल्ली बाबू के गोड़ गोबर पै पड़के अइसन बिछलायल कि झटका से चलावल गइल बचऊ महराज के तलवार पर ओनकर गर्दन अपने-आपै लटक गइल.

बचऊ महराज झप से तलवार फेंक के बल्ली बाबू के दूनो हाथ में उठाय लेहलन. ओनके उठउले तुरते अपने घर पहुँचलन. चेला भेज के डाक्टर बोलउलन. तबले त कुल खतम हो चुकल रहल. चम्पा के जइसे काठ मार गयल. ऊ न त रोवलिन न कुछ बोललिन. बल्ली बाबू के पट्ठा रोय-रोय के चम्पा से घरे चले के समुझवलन, बाकी ऊ त जइसे पत्थर हो गइल रहलिन. न कुछ बोलें, न कुछ सुनें. दुइ घंटा बाद मनिकनिका पर चिता सजावल गयल. बचऊ महराज रोवत-रोवत लास के चिता पे सुतवलन. ओनकर रोवाई देख के पत्थर के करेजा पिघल जाय. अइसन बुझाय जइसे सग्गै छोट भाई के चिता में आग लगावे के होय.

चिता में आग लग गइल. चिता जल गइल. बाकि चम्पा अपने जगह से हिलली नाहीं. जब लोग चिता बहाय के चले लगलन त अइसन बुझायल जइसे झटके से चम्पा के नींद खुल गइल हौ. बल्ली बाबू के पट्ठा ओहीं रहलन. चम्पा चकपकाय के कह उठलीं- ‘हमैं भैरवी गावे के रहल न. जगउला काहे नाहीं. देरी न हो गयल होई. बल्ली बाबू नराज न होइहें?’ चम्पा के देख के सुमेर के आँख से पानी झरै लगल. चम्पा उठलीं. धीरे-धीरे उहाँ गइलिन, जहाँ बल्ली बाबू के चिता जलावल गइल रहल. पलथी मार के बइठ गइलिन. कुछ गुनगुनइलिन. फिर अलाप लेहलिन. ओकरे बाद ओनके कंठ से फूट निकलल भैरवी- ”सैयाँ बेदरदी दरदिया ना बूझे, रहत नजरिया के ओट.“


(पाती पत्रिका के अंक 75 ‘प्रेम-कथा-विशेषांक’ से साभार)

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