– हरेन्द्र कुमार पाण्डेय

योगेश्वर नाम रखले रहस उनकर मास्टर चाचा जवन कलकाता में पढ़ावत रहस. स्कूल में भरती का समय राउत जी मास्टर साहेब ठीक (!) कइलन युगेश्वर. लेकिन गांव में सबका खातिर उ जिंदगी भर आ मरलो के बाद जुगेसरे रहस. शिवदत्त महतो के बेटा जुगेसर परसाद. बड़ा नाम कइलस लडिक़ा. लेकिन गांव के लोग के ओसे का भईल? ना आइल ना गइल. ना केहू से मिलल जुलल. हां, जबे अपना होनहार बिरवा के उपदेश देबे के होखे कायथ टोली में त एके गो नाम होखे – जुगेसर.

मोतिहारी से करीब दस कोस रहे शिवदत्त महतो के गांव. एक भाई कलकाता में मास्टरी करस आ आपन परिवार के साथे रहस. दोसर एकजाना भाई कबो स्कूल ना गइले. तनी बुरबक किसिम के बचपने से. सबेरे से सांझ तक खेते में पड़ल रहस. बुजुर्ग लोग कहेला बियाह भइल रहे उनकर लेकिन उनकर मेहरारू के बाल बच्चा ना होत रहे एही से शुरू में छोड़ देले रहे लोग. खैर उनका दूनो बेरा खाना भौजाई दे देस.

शिवदत्त ओह जमाना में गांव का प्राइमरी स्कूल से पांच क्लास तक पढ़ले रहन. खेती बाड़ी बढिय़ा से होखे आ कबो-कभार कलकाता वाला भाई कुछ रुपया पइसा भेज देस. गांव का हिसाब से शिवदत्त के परिवार खात-पियत इज्जतदार परिवार रहे.

गांव के आउर लडिक़न का लेखा जुगेसरो गांवे के प्राइमरी स्कूल में भरती हो गइले. जइसन सब लडिक़ा करस उहो एगो बोरा भा एगो झोला लेके स्कूल जाये लगले. बोरा बइठे खातिर आ झोला स्लेट पेंसिल राखे खातिर. लडिक़न में कवनो भेदभाव ना रहे. सभे बराबर जबले साल भर ना बीतल.

सालभर बाद जुगेसर सीधा दू में चल गइले काहे कि उनका हरफ लिखे आ बीस तक पहाड़ा याद हो गइल रहे. फेर त जुगेसर कहीं ना रुकले फस्ट त फस्ट. साथे-साथे बाप का नजर के हीरा बन गइले. हर बाप का ईच्छा होला बेटा उ सब करो जे उ ना कर पउले. शिवदत्त जुगेसर के खेती बाड़ी के काम में एकदम ना भेजस. बाकिर सब लडिक़ा स्कूल जाये का पहिले खेत खलिहान में कुछ ना कुछ कर स.

फस्ट डिविजन में मैट्रिक ओह गांव में जुगेसरे पास भइल रहन. गांव खातिर एहसे गर्व के बात का हो सके. लक्ष्मी प्रसाद खुद चल के शिवदत्त के दरवाजा पर अइले आ कहले – ‘बड़ा खुसी भइल शिवदत्त, बेटा के रिजल्ट सुन के. ओकरा के अब मास्टरी के ट्रेनिंग में दे द. मोतीहारी का ट्रेनिंग कालेज में हमार सरबेटा बाबू बा. हम चिट्ठी लिख दे तानी. मिल आव.’

सफलता अपने आप आदमी के मोलायम बना देला. शिवदत्त बहुते मोलायम आवाज में कहले – ‘हमनी के ईच्छा बा आगे पढ़ावे के. फर्स्ट भइल बा जुगेसर. कालेज में छात्रवृतिओ मिली.’

‘देखऽ. कालेज में पढ़ावल बड़ा खरचीला बा.’ मने-मने कुढक़े लक्ष्मीप्रसाद बोललन.

मोतीहारी कालेज में नाम लिखावे का समय मास्टर चाचा आ गइल रहस. उहे कहले – ‘भईया तू चिन्ता मत कर. अइसन तेज लडिक़ा खातिर जरूरत पड़ी त खेत बेचल जाई.’

खैर खेत ना बेचे के पड़ल. भगवान का कृपा से जुगेसर के हर क्लास में स्कालरशिप मिलल. मोतिहारी में घर भाड़ा लेके उ पढ़ाई करे लगलन. ओजा अपने हाथ से खाना बनावस. घर से चावल आटा ले आवस. कालेज के सब लडिक़ा उहे करस. हँ, समस्या होखे घर से बस स्टैंड आवे में. उनका गांव से बस स्टैंड आवे खातिर रास्ता बोल के खेत के मेड़ रहे आ बांध. गांव के बारे में जतना रोमांटिक बात होला उ जुगेसर का कुछ ना पता चलल. केमिस्ट्री में फर्स्ट क्लास आनर्स मिलल जुगेसर का जवन ओह समय में बिरले मिले. बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर से चिट्ठी आइल – एमएससी में प्रवेश लेले से छात्रबृत्ति मिली. लेकिन जुगेसर निर्णय लिहलन पटना विश्वविद्यालय में प्रवेश खातिर. अब आपने निर्णय लेवे खातिर स्वतंत्र रहस उ.

ठीक एही समय जुगेसर का जिन्दगी में परिवर्तन आइल. कब कइसे भइल उनका सोचे के समयो ना मिलल. हॉस्टल के वातावरण सही ना मिलल. हॉस्टल के वातावरण बहुते विचित्र रहे. पहिले त उनका बिहार विश्वविद्यालय लेके पटना वाला उनकर खिंचाई करस. फेर जब दिन बीतल लडिक़ा के पहुंच कहां तक बा. उनको बिस्वास होखे लागल ऊपर जाये खातिर बैकग्राउंडो ज्यादा जरूरी बा. ओकरा बाद जात-पांत वाला चर्चो खुलेआम होखे. एतना दिन जवना बिषय के उनका सोचे के समय ना रहे ऊहे सब महत्वपूर्ण होखे लागल.

कालेज प्रयोगशाला में एगो इंस्ट्रक्टर रहस बैकुण्ठ प्रसाद जी. उनकर स्वभाव जुगेसर का बड़ा पसंद आवत रहे. अपना काम से काम राखस. ओहदिन जुगेसर के मिजाज बड़ा उखड़ल-उखड़ल रहे. घरे से खबर आइल रहे माई के तबीयत खराब बा. जाये-आवे में कवनो बात ना रहे लेकिन माई के याद त आवते रहे. बैकुण्ठे प्रसाद बोललन – ‘का बात बा जुगेसर जी! आज राउर मूड कुछ ठीक नइखे लागत.’

-‘ना-ना. कवनो अइसन बात नइखे, सर! सब ठीक बा!’ जुगेसर के घबड़ाइल अस आवाज निकलल. बैकुण्ठ जी पास आ गइले. कहलन – ‘देखऽ भाई! तू इहां पढ़े-लिखे आइल बाड़. दोसरा बात पर मन दीहला पर बर्बादी छोड़ के कुछ ना मिली.’

फेर एक दिन जुगेसर हॉस्टल छोड़े के मन बना लिहलन. लेकिन ई त मोतिहारी ना रहे कि जहां तहां रहे के व्यवस्था हो जाई. जे कमरा भाड़ा मांगल जाए सुन के स्टूडेंट भाग जायं. आपन मन के बात एकदिन उ बैकुण्ठ जी के बतवलन. बैकुण्ठ जी कुछ चिन्ता कइलन. फेर कहलन – ‘आच्छा हम काल्ह बताइब.’

दोसरा दिन बैकुण्ठ जी जवन प्रस्ताव दिहलन जुगेसर का जइसे हाथ में लड्डू मिल गइल. बैकुण्ठ जी कहलन – ‘देखीं, हमार घर त छोटहन बा. लेकिन एगो कमरा हम किराया पर देले रनी ह. हमरा परिवार में उहो कमरा के जरूरत बा लेकिन रउरा रहब त हमनी के काम जइसे एतना दिन से चलत बा, आउरो एक डेढ़ साल निकल जाई.’

जुगेसर सकुचात-सकुचात पूछ भइलन-‘देखीं सर, हम रउआ के बड़ी इज्जत करीला. अपने के घर में रहला पर न जाने कवनो अइसन-वइसन हो जाई त हम खुद के कबो माफ ना करब.’

-‘अरे भाई. हमरो बाल धूप में सफेद नइखे भइल. आप पर हमार विश्वास ना रहीत त कबो स्टूडेंट के घर में राखे के सोचबो ना करतीं.’

-‘खाए पीए के कइसे इन्तजाम होखी?’

जुगेसन के प्रश्न स्वाभाविक रहे.

‘आगे वाला किरायेदार खाना बना लेत रलन ह. बाकी पास में एगो होटल बा उ महीन पर खिआवेला. ठीके-ठाक बा. बहुत अकेले रहे वाला लोग उहां भोजन करेला.’

अब आखिरी सवाल जुगेसर का गला में अटकल रहे. भाड़ा? बैकुण्ठ जी समझदार त रहले रहस. स्पष्ट कइलन – ‘पहिलका किरायेदार सौ रुपया देत रल. आप ओतने देब.’

शाम में दूनो जाना एके साथ निकलल लोग. कदमकुंआ में रहे बैकुण्ठ जी के घर लेकिन घूम फिर के कइगो गली से होके जाये के पड़े. रेल लाइन पासे में रहे. बैकुण्ठ जी के खटखटावला पर कवनो लडक़ी दरवाजा खोललस. बैकुण्ठ जी ऊपर के चाभी मंगवलन. दरवाजा से घुस के एगो छोट आंगन रहे. जब तक चाभी लेके उ लडक़ी फेरू आइल जुगेसर एक नजर चारों ओर दौड़वलन. पास में प्रकाश रहे. एगो कमरा पास में बाथरूम जइसन लागल. आंगन के तीनों ओर एक-एक गो कमरा रहे. एगो कमरा से लागल सीढ़ी रहे पातर अस.

बैकुण्ठ जी सीढ़ी से ऊपर गइलन आ उनका पीछे-पीछे जुगेसर. ऊपर खुलल छत रहे जवन चांद का प्रकाशे से साफ दीखत रहे. कमरा के आगे बरामदा जइसन थोड़ जगहो रहे जवन सीढ़ी से लागल रहे. छत के दोसरा तरफ बाथरूम रहे. बाकी छत पर कइक गो रस्सी तानल रहे.

देख के जुगेसर के मन खुश हो गइल. अगिला महीना के पहिला तारीख से आवे के ठीक हो गइल. पहिला तारीख के शनिचर रहे एहसे ठीक भइल एकतीसे से जइहन. होटलोवाला से बात हो गइल – दू बेरा खाना सुबह भा शाम में एक बेर नास्ता. दिन में भात-दाल सब्जी. सप्ताह में एक दिन आमिष. 200 रुपया कुल लागत. छुट्टी खातिर कम से कम एक दिन पहिले बतावे के पड़ी.

दू चार दिन जुगेसर का अच्छा ना लागल. कहां होस्टल के जिन्दगी आ कहां अकेले. लोग बाग बा लेकिन केहु बोले बतियाये वाला ना. हालांकि जुगेसर का कभी होस्टल ना सोहाइल रहे. नापसंदगीओ आदत हो जाला आदमी के, आ ई नापसंदगी के अभावो चुभेला.

कबो-कभार आवत जात में बैकुण्ठ जी के लडिक़ीयन वाला घर पर नजर पड़ जाव जुगेसर के. बडक़ी बहन हरदम किताब के साथे दीखे. कभी कुर्सी पर बइठल त कभी कमरा में टहलत. टहलत-टहलत ऊ किताब पर आंख गड़वले रहे.

ओह दिन एतवार रहे. जुगेसर बिछावन पर लेटल रहस खाना खाके. तबहिए बैकुण्ठ जी अइलन.

– ‘आ जाईं.’ जुगेसर कहलन आ बैकुण्ठ जी आके कुर्सी पर बइठलन.

-‘का हाल चाल बा?’ पुछलन उनसे.

-‘रउआ जइसन गार्जियन रहला पर कुछ खराब हो सक ता. सब ठीक बा.’ जुगेसर वातावरण के हल्का करे का लिहाज से कहलन.

-‘ ई त राउर बड़प्पन बा. हमरा के भगवान दीहलही का बाडऩ.’ उदास उदास अस जवाब दीहलन बैकुण्ठ बाबू. जुगेसर का अंदाज भइल बैकुण्ठ बाबू जरूर कवनो मतलब से आइल बाडऩ? उ बात बढ़वलन – ‘का कह तानी सर. रउरा जइसन कतना लोग का बा आज का दिन में. बढिय़ा नौकरी, पटना जइसन शहर में घर. हसत खेलत घर संसार.’

-‘अरे संसारे त झमेला बा. बाबुजी बाबा का दबाव में पढ़ाईए-लिखाई का समय में हमार शादी कर दिहनी. लडिक़ा के चक्कर में दू गो बेटी आ गइल लोग. अब एही चिन्ता में रहीला हमेशा.’

जुगेसर दिमाग पर जोर देबे लगलन. न जाने का कहे आइल बाडऩ बैकुण्ठ जी. उनकर त उमर भइले रहे. उनका शादी खातिर न जाने केतना प्रस्ताव आवत रहे मैट्रिक पास भइला के बादे से. थोड़ देर खातिर मन बहक गइल. वर्तमान में अइला पर महसूस कइलन बैकुण्ठ जी असली बात कहे वाला बाडऩ.

-‘देखीं ना अर्चना मेडिकल के तैयारी कर तारी. पढ़े लिखे में त अच्छा बा लेकिन प्रतियोगिता अइसन बा कि विश्वास नइखे होत. बूझात नइखे कि रउरा से कइसे कहीं?’

-‘बताईं ना. हमरा खातिर रउरा एतना करतानी. रउरा खातिर कुछऊ करे के अवसर हम भगवाने के आशीर्वाद समझब.’ जुगेसर के स्वर में बैकुण्ठ जी के मतलब जाने के आग्रह साफ झलकत रहे.

-‘बात बा कि अर्चना फिजिक्स में थोड़िका कमजोर बाड़ी. रउरा यदि थोड़ समय निकाल सकतीं….’ बैकुण्ठ जी रुक गइलन. जुगेसर का ई कहानी के प्लाट जइसन लागत रहे. तब बैकुण्ठ जी के अपना इहां लावे के असली मतलब रहे. अब दोसर पदक्षेप लडक़ी के पढ़ावे के. फिर…

बैकुण्ठ जी का उपस्थितिए में अर्चना के पढ़ावल आरम्भ कइलन जुगेसर. पहिलहीं दिन बुझा गइल.. ई लडक़ा के पढ़ाई छोड़ के दोसर कुछ नइखे माथा में.

जवन चीज समझावे के कोशिश करस जुगेसर जी ऊ फटाफट आंख मूद के मंत्र जइसन बुदबुदाव आ दोहरावे लागल. धीरे-धीरे जुगेसर समझ गइले एकरा खातिर तोता रटंते ठीक बा. कइएक दिन का बाद सब कुछ जइसे सामान्य हो गइल. बढिय़ा बिद्यार्थी शिक्षक के बहुते प्यारा हो जाला. अइसन जुगेसर के ऊ पहिला छात्र रहे. ओकरा प्रति उनकर स्नेह कुछ बेसिए हो गइल. लेकिन उमिरो के आपन तकाजा होला. जेठ के दिन में एगो घटा के छोट टुकड़ा जइसे कबो-कबो उनका दिमाग पर दीख जाव. का बैकुण्ठ जी के मन में अर्चना आ उनका के बीच कवनो प्रस्ताव त नइखे मने-मने. लडिक़ी त ठीके बिया. अर्चना जब आंख बंद कर के रटा लगावत रहे ऊ ओकरा ओर चोर निगाह से निहारस. एक दिन त कुछ गड़बड़ो हो गइल.

अर्चना के ऊ आणविक संरचना बतावत रहलन. थ्रीडाइमेंसनल कन्सेप्ट ऊ जवनो तरह बतावस अर्चना के ठीक स्पष्ट न होत रहे. जुगेसर जी घुमा फिरा के बतावस लेकिन अर्चना कॉपीए पर समझे के कोशिश करे. थोड़ खिसियाइल अस बोललन ऊ – ‘अरे भाई बार-बार कहतानी कॉपी के पन्ना टूडाइमेंसनल बा. आणविक संरचना समझे खातिर सोचे के पड़ी, कल्पना करे के पड़ी, आपने दिमाग में तस्वीर बनावे के पड़ी.’

अर्चना आंख मूंद के सोचे शुरू क दिहलस आ बुदबुदात रहे. जुगेसर ओकरा चेहरा पर नजर गड़वले रहस. एकदम स्तब्धता. तबहीं दरवाजा पर हंसल खिलखिलाइल सुनाइल. दूनो के आंख एके साथ खुलल.

अर्चना के बहिन पूजा खड़ा रहे. हंसी रोक के कहलस – ‘अरे दीदी पढ़ऽतारू कि योगासन करऽतारू ?’

दूनो जाना झेंप गइल लोग. पूजा एह साल मैट्रिक के परीक्षा देबे वाली बाड़ी. बडक़ी बहिन से बिल्कुल उल्टा स्वभाव. भीजल कपड़ा छत पर उहे पसारे आवे. रंगो साँवर रहे. ए घर में ओकरे हंसी सुनाव. बाकी अर्चना के मुस्कुराहट देखे खातिर त जुगेसर के आत्मा तरसत रहे.

समय कइसे बीत गइल. अर्चना के परीक्षा हो गइल. बतवलस बढिय़ा भइल बा. जुगेसरो के फस्ट इयर के परीक्षा होखे वाला रहे. अपना पढ़ाई पर ध्यान देबे लगलन. अर्चना के पढ़ावे से जवन रुटीन बनल रहे ऊ टूट गइल. हँ, एगो बात रहे घर के सभे उनका से आवत जात बतियावे लोग. अर्चनो कबो-कबो ‘प्रणाम सर’ कह जाव. एतने काफी रहे उनका खातिर. हां पूजा जबो छत पर आवे एक बार उनका कमरा में जरूर आवे आ हाल-चाल पूछे. ऊ मैट्रिक सेकेंड डिवीजन से पास होके कालेज में भर्ती हो गइल रहे. बैकुण्ठ जी के जान पहचान से साइंस में भर्ती हो गइल रहे.

प्रेक्टिकल के दूगो पेपर बाकी रहे. तबहिए खबर लागल कि घरे जुगेसर के माई बीमार बाड़ी. माई खातिर मन दुखित हो गइल लेकिन का करस सामने परीक्षा रहे. घरे से सम्पर्क कइलो संभव ना रहे. परीक्षा खतम भइला पर घरे जाये के प्लान बनवलन. जहिया जाए के रहस पता चलल मेडिकल के रिजल्ट निकले वाला बा. लेकिन रुके के कवनो सवाले ना रहे. सुबह-सुबह निकल के महेन्द्रू घाट अइलन. उहंई से मोतिहारी के टिकट मिल गइल. स्टीमर से गंगा पार होके गाड़ी मिल गइल जवन सीधे मुजफ्फरपुर जाव. मुजफ्फरपुर से ट्रेन बदल के मोतिहारी पहुंचलन त पांच बज गइल रहे. गांवे जाये बाला आखिरी बस खचाखच भरल रहे. ऊपर नीचे लोग भरल रहे. ऊपर चढक़े जइसे-तइसे जगह बनाके बइठ गइलन. बस छूटल साढ़े पांच बजे. अपना स्टैंड पर पहुंचते-पहुंचत अन्हार हो गइल. स्टैंड पर केहू कहीं ना रहे. ऊ धीरे-धीरे गांव के ओर वाला रास्ता पर चले लगले. करीब साल भर बाद घरे जात रहस.

संसार के चक्रो अपना गति से चलेला. केहू खातिर ओकरा क्षणभर ठहरे के फुर्सत नइखे. जुगेसर का जिन्दगी में पहिला अनुभव ओहि दिने भइल. घरे पहुंचला पर पता चलल माई एक दिन पहिलहीं गुजर गइल बाड़ी. उनुका ठकुआ मार दिहलसि. बोले के चहलन त आवाज ना निकलल. रोए के चहलन त आंख ना पसीजल. माई से बइठ के ऊ कबो भर मन बतिअवले ना रहस. माई के सब बात ओकरा आंख से प्रकट होखे. जब लडिक़ाई में ऊ लालटेन का सामने पढ़स त माई दूर बइठ के खाली निहारे उनका के जबले ऊ सुत ना जास ऊ बइठल रहे. माई के सूतल ऊ अपना होश में ना देखले रहस. ऊ माई नइखे. अब कबहूं माई के चेहरा ना देखे के मिली. कवनों फोटवो त नइखे.

सब हीत नात आवे लागल लोग. दू दिन बाद श्राद्ध रहे. मास्टरो चाचा पहुंच गइलन. जुगेसर से भेंट होते कहलन – ‘हँ भाई का सोचतार? कवनो कंपटिसन वगैरह दे तार कि ना?’

जुगेसर के पढ़ावे खातिर इहे चाचा जोर लगवले रहस. लेकिन जबसे उनकर आपन लडिक़ा सेकेंड डिवीजन से पास भइलन जुगेसर के प्रति उनकर भाव बदल गइल रहे. अब मिलले पर हाल-चाल होखे. आदमी के आपन आ गैर में अंतर अइसने समय पर होला. जुगेसर का अब ई वातावरण पसंद ना आवत रहे. बाबूजी सादा कपड़ा पहिनले रहस. घर में बिना हल्दी के खाना बने. हीत पाहुन जेही आइल रहे आपन-आपन हाल चाल कहे में लागल रहे. केहूके मरला में जे आइल बा ना बुझात रहे.

भगवान किहां का चलता आदमी सोच ना सके. एही अज्ञानता से शायद संसार चलता. ओह दिन बाबूजी आ चाचा साथे-साथे श्राद्ध के बाजार करे मोतिहारी गइल लोग. रात का पहिले लवटे के कवनो सवाले ना रहे. सभे आपन-आपन काम में लागल रहे. दुआर पर लालटेन जला के जुगेसर बइठल रहस. तबही दूगो लडिक़ा हांफत-हांफत अइलन स. दूनो बस स्टैंड मोड़ पर ओही लोग के सामान ले आवे गइल रहलन. सामान उतार के हड़बड़ाइले जे बतवले स ओकर मतलब रहे लवटे के समय बाबूजी आ चाचा सामान के साथे छत पर बइठ के आवत रल लोग. शहर से निकले का बेर कइसे बाबूजी से बिजुली के तार छुआ गइल बा. उनका के लेके चाचा अस्पताल गइल बाड़े. हाल ठीक नइखे बूझे में जुगेसर का कवनो समय ना लागल. लेकिन अबही का कइल जाव. कवनो बस त बा ना एह समय. सारा गांव में खबर फइल गइल. लोग जमा हो गइल. कइसे तार झूलत रहेला से लेके बिजली कइसे बनेला आ कहां जाला तक बात हो गइल. अस्पताल पहुंचलो जरूरी बा केहू ना कहे.

तबही जगमोहन आइल. ई जगमोहन जुगेसर का साथे सातवीं क्लास ले पढ़े जाव. ओकरा बाद आपन खेतबारी में काम करे लागल रहे. जात के त ब्राह्मण रहे लेकिन घर के अवस्था अच्छा ना रहे. कवनो पंडिताईओ ना रहे ओ सब का. आवत आवत कहलस – ‘का सोचऽतार जुगेसर ?’
-‘हमरा त कुछ नइखे बुझात जगमोहन भाई.’
-‘कह त मोतिहारी चलल जाव.’
-‘कइसे जाइल जाई?’
-‘एगो साइकिल त हमरा बा. एगो साइकिल जोगाड़ हो जाइ त दूनो आदमी चल चलती स.’
-‘हम केकरा से साइकिल मांगी?’
-‘देखऽ ना बैजनाथ मास्टर का बढिय़ा साइकिल बा.’
मास्टर लगहीं खड़ा रहस. आपन नाम सुनके सामने आ गइलन. पूछलन-‘का भइल हो जगमोहन?’
-‘का भइल, हमरा से पूछतानी. आपन साइकिल दीतीं त हमनी दूनो आदमी अभी मोतिहारी चल जइतीं.’
धर्मनाथ मास्टर कह भइलन – ‘अरे देख ना काल सबेरहीं स्कूल जाये के बा. डिपुटी सुपरिटेंडेंट आवे वाला बाड़े.’
जगनमोहन का जइसे मालुमे रहे मास्टर आपन साइकिल ना दीहन.
-‘त जाईं तैयारी करीं. इहां समय बर्बाद काहें कर तानीं.’
फेर जुगेसर का ओर देखके कहलन – ‘तू तइयार होख. हमनी एके गो साइकिल पर चलल जाई.’
विपत्ति जइसे आवेला ओकरा सहे के बेंवतो भगवान दे देले. पांच दिन बाद बाबूजी के लेके सब लोग लवटि आइल. उनका के सहारा लेके चलावे फिरावे के पड़े. अपना हाथ से खाए के कोशिश करे के पड़े. डॉक्टरो कहले रहे अइसने करे के.

माई के श्राद्ध बीत गइल जइसे तइसे. सब हीत पाहुन चल गइल लोग. चाचो चल गइले. जाए का बेर जुगेसर के लम्बा चौड़ा उपदेश दे गइले. साथ में इहो रहे अब कुछ नौकरीओ चाकरी के कोशिश करे के चाहीं. कालेज त अभी बंदे रहे लेकिन जुगेसर एतना दिन रहे के ना सोचले रहस. एह सब में गांव वाला चाचा चुपचाप रहस. जब सब लोग चल गइल जुगेसर पूछलन – ‘अब का होई चाचा?’

जिन्दगी में पहिला बार चाचा से बतियावत रहस जुगेसर. चाचा उनका पास आके फुसफुसइलन – ‘बनकटा से एक आदमी भउजी का श्राद्ध में आइल रल. कहत रल ओकर हाल ठीक नइखे. बाप त कबे मर गइले. एगो बेटा कहां भाग गइल बा. भाई भउजाई का देखी.’
चाचा रुक गइलन. जुगेसर सब जोड़ के बात समझ गइलन. जेकरा के सभे बुड़बक समझत रहल ओकरो मन में कतना बड़ तूफान दबल बा. फेर कहलन – ‘अच्छा चाचा, चाची के यदि बोलावल जाव त इहां आ जइहन ?’
-‘आवे के त पूरा मन बड़हीस लेकिन केहु का जाए के पड़ी तबे आई. बडक़ी मनबढ़ू ह शुरुए के.’
-‘के जाई लावे?’
-‘जाए के त हमरे चाहीं.’
दोसरे दिन चाचा गांव के एगो आदमी के साथ लेके चल गइलन. बाबूजी इशारा से पुछलन – ‘ऊ कहां गइले ह ?’
जुगेसर बतवले – ‘चाची के ले आवे.’
बाबूजी के चेहरा लाल हो गइल. ई बात जइसे उ कइसे हजम करस. जुगेसर धीरे-धीरे उनके ठंडा कइलन.

घरे के कारबार एक तरह खिसके लागल. एक महीना कइसे बीत गइल पता ना चलल. न जाने पटना के का हाल होई. अर्चना के त अब तक एडमीशन हो जाए के चाहीं. अब त कालेजो चालू हो गइल होई. गांव त जुगेसर का कबो अच्छा ना लागत रहे. अबकी त अच्छा लागे के कवनो कारन ना रहे. बाबूजी आपन काम धंधा करे लागल रहले. चले में तनिक तकलीफ होखे. एक दिन बाबूजी से कहलन – ‘अब हमरा जाए के पड़ी.’

बाबूजी खाली माथा हिला दिहलन. जुगेसर अब उनका खातिर अनजान बन गइल रहस. उनका से कवनो आशा त उनकर कबे टूट गइल रहे. शाम के सात बजे वाला स्टीमर से उतरलन महेन्द्रघाट जुगेसर. एगो रिक्सा क के डेरा पहुंचलन. कांध पर किताब के झोरा. माथा मुड़ल. विचित्र चेहरा दीखत रहे. बैकुण्ठजी के बंद दरवाजा पर दस्तक दिहलन. भीतर से आवाज आइल – ‘के ?’
-‘जुगेसर प्रसाद.’
-‘आव तानी.’
आवाज सुनके लागल अर्चना हई. लेकिन दरवाजा पूजा खोललस. चिरपरिचित उत्साह से चहकल – ‘प्रणाम सर.’ ओकर नजर ठहर गइल. जुगेसर के अइसन हालत के अंदाज उ ना कइले रहे.

जुगेसर भांप गइलन. कहलन -‘माई मर गइल ओही से माथ मुड़वले हईं. पापा कहां बानी?’
-‘पापा त दीदी के एडमीशन करावे दिल्ली गइल बानी. सोमवार के आइब. रउरा ऊपर चलीं. हम चाय ले आवतानी.’
धीरे-धीरे सीढ़ी चढक़े जुगेसर ऊपर अइलन. कमरा के चाभी खोलके खिडक़ी खोललन. बड़ा ही थकान लागत रहे. बिछावन खोलके लेट गइलन. दरवाजा खुलले रहे. ऊ थोड़ा देर आंख मुंदलन. तभी खुलल दरवाजा खट्-खट् के आवाज भइल. पूजा चाय लेके खड़ा रहे. एक झटका उठ बइठलन. पूजा के कुर्सी पर बइठे के इशारा कइलन. चाय बढ़ाके पूजा कुर्सी पर बइठ गइल.

जुगेसर चाय के घूंट लगाके बात करे के नीयते से पूछलन – ‘कब से गइल बानी प्रसाद सर.’
-‘सात दिन हो गइल. दीदी के एम्स में एडमीशन खातिर गइल बानी.’
-‘बहुते अच्छा खबर बा. आ तहार का भइल.’
-‘हमार वोमेन कॉलेज में एडमीशन हो गइल बा.’
-‘कवन विषय लेलू ह?’
-‘पापा ना मननी ह. साइंस में एडमीशन भइल ह. बायलोजी में.’
जुगेसर का समझे में देर ना लागल. एगो संतान के सफल भइला पर मां-बाप समझेलन सब बच्चा ओइसने होई. लेकिन अइसन आशा अधिकांश रेगिस्तान के पानी में बदल जाला.

आज पूजा बड़ी खुलके बतिआवत रहे. जुगेसरो बहुत दिन का बाद खुलके बात कइलन. चाय कब के खतम हो गइल रहे. पूजा प्लेट उठाके जाए खातिर खड़ा भइल. पुछलस – ‘सर, आज हम खाना बनावतानी. रउआ खाये बाहर मत जाइब.’
नियम मान के जुगेसर कहलन – ‘ना ना तू तकलीफ काहे उठइबू. हम बाहर खा आइब.’
-‘वाह रे. रउरा खइला से हमरा तकलीफ होई.’ पूजा औरताना अंदाज से कह भइलस.
जुगेसर का गंभीर चेहरा पर मुस्कुराहट के एगो झलक दीख गइल. एक बार कालेज खुलल त जुगेसर पूरा तरह व्यस्त हो गइलन. फस्ट ईयर में उनकर विश्वविद्यालय में दूसरा स्थान रहे. ‘डू और डाई’ ए उनका खातिर स्लोगन हो गइल. कालेज में जबहीं क्लास ना रहे उ पुस्तकालय चल जास. बैकुण्ठो जी से ज्यादा कुछ बात ना हो सके. ओह दिन डेरा रात के दस बजे पहुंचलन. आवे में बरखा होत रहे. भींग गइल रहस. दरवाजा पूजे खोललस. ऊ सीधा ऊपर गइलन. देह पोंछ के पायजामा पहिनलन. सर्ट डलहीं जात रहस कि देखलन गेट पर चाय लिहले पूजा खड़ा बानी. ऊ शरमा गइलन.

-‘का जरूरत रल.’ बड़ा कष्ट से कह पवलन.
-‘रउवा का चीज के जरूरत बा सर हम समझ सकीला. लीं चाय पीहीं जल्दी-जल्दी. हम खाना ला रहल बानी.’
तबहीं जोर के छींक आइल जुगेसर का.
-‘समझ में हमरा आइल कि रउवा चाय के केतना जरूरत बा. अदरखो डलले बानी.’ पूजा मुड़ के चल गइली.
चाय पीयत-पीयत जुगेसर आज पहिला दफा पूजा का बारे में सोचलन. कतना खुलल बिया. अर्चना का ठीक उल्टा.

समय अपना तरह से बीते लागल. घरे से बाबूजी के चिट्ठी आइल जवना के सार रहे अब एह अवस्था में उनकर इच्छा बा एक बार बहू के मुंह देखे के. जुगेसर पढ़ के रख दीहलन. उनका मुंह से एतने निकलल-‘जाहिल कहीं के.’ एने फाइनल परीक्षा के तारीख फेर बढ़ गइल. ई खबर के उनका जिन्दगी में ज्यादा महत्व रहे. अब बड़ा मुश्किल लागत रहे समय निकालल. ई त बैकुण्ठ प्रसाद जी रहस कि पइसा के अभाव खटकत ना रहे. अभी ऊ त भाड़ा लेहल बंद कर देले रहस, एक बेरा खाइल भी उनके इहां हो जाव. एक दिन अखबार में एगो खबर निकलल रहे. समस्तीपुर के पास कवनो स्कूल में साइंस के शिक्षक के जरूरत रहे. जुगेसर अइसहीं एगो दरखास्त भेज दिहलन. हठात् पता चलल परीक्षा एक महीना के अन्दर करावे के ऊपरी आदेश आइल बा. यूनिवर्सिटी में अफरा-तफरी मच गइल. जुगेसर फिर से किताब कापी में मन लगा दीहलन.

पूजा के नाम त बीएसी में लिखा गइल लेकिन ओकरा मां-बाप के पूरा दबाव रहे मेडिकल कम्पीट करे के. ओकर हालत बेचारी जइसन हो गइल रहे. पहिले त पढ़तानी बोलके जुगेसर का सामने किताब पसार के घंटन बइठल रहे. अब त ऊहो बंद रहे. चाय- खाना पहुंचावे का नाम से उनका पास जाये के बहाना ढूंढत रहे. जुगेसर के पढ़ाई में एकाग्रचित्त देख के ओकर अंतर जुड़ाय जाव.

ओने जुगेसर के परीक्षा समाप्त भइल आ एने मेडिकल प्री-टेस्ट के तारीख निकलल. एही बहाने उनका पटना रहे के एक्सटेंशन मिल गइल. बैकुण्ठजी खुदे कहलन-‘जुगेसर जी, आप यदि ई एक महीना पूजा के देख दीतीं त का जाने कहीं भगवान के कृपा हो जाइत. जुगेसर का अच्छा तरह समझ रहे पूजा खातिर समय निकालल असंभव बा. तबहियो बैकुण्ठ जी के उपकार का बदला चुकावे के इच्छा से राजी हो गइलन.

एक तरह से रिलैक्स अनुभव करत रहस जुगेसर. तबहीं एगो लिफाफा आइल उनका नाम से. भेजे वाला के पता के जगह पर एगो हल्का सा मुहर रहे. खोललन. अंदर से एगो चिट्ठी निकलल. प्रेषक मूलचंद जैन उच्च विद्यालय, समस्तीपुर. स्कूल उनका के पन्द्रह दिन के अन्दर ज्वाइन करे के अनुरोध कइले रहे. मासिक वेतन 400 रुपया. जिन्दगी में पहिला नौकरी के पत्र पाके अलग तरह के अनुभव होला. पूछे-पाछे वाला त हिसाब रहले ना रहे. ऊ मने-मने जाये के तैयार हो गइले. अभी रिजल्ट में भी देर रहे. पूजा के पढ़ावे के जवन बाधा रहे ओकरो समाधान हो गइल. ओकर परीक्षा भी एक महीना के अन्दर ही हो जाये वाला रहे.

जाये के समय जवन सीन भइल ओकर कल्पना जुगेसर का ना रहे. पहिला बार बैकुण्ठ जी के पत्नी उनका सामने अइली. साथ में बैकुण्ठ जी आ पीछे-पीछे पूजा. सबकर दिल भरल रहे आ आंख डबडबाइल. केहू कुछ बोल ना पावत रहे. हिम्मत कर के जुगेसर ही कहलन – ‘अरे हम त एगो किरायेदार रनी ह, का भइल रउरा सब के?’
नदी के बांध जइसे टूट गइल. बैकुण्ठ जी त सिसके लगलन. पूजा भाग के नीचे चल गइल. बैकुण्ठ जी के स्त्री कइसहूं कहली-‘हँ बाबू, इहे सुने के रल. तू हमनी के मकान मालिके समझल एतना दिन.’
जुगेसर का बुझाइल का गलती बोल गइलन. जवन मन माई का मरला में ना पसीजल रहे एके बार सब बांध टूट गइल. ऊ आवेश में उनकर जोड़ल हाथ पकड़ लीहलन – ‘ना चाची. हम कइसे भुला पाइब रउवा लोग के. आ हम हमेशा खातिर जात थोड़े बानी. रउरा नाहियों चाहब त रउरा सब के छोड़ के जीये के सोचिओ ना सकीला.’
धीरे-धीरे वातावरण कुछ हल्का भइल. बैकुण्ठ जी संभल गइल रहस. कहलन – ‘अच्छा चलल जाव. स्टीमर के समय भइल जात बा.’
जुगेसर आपन छोट-छोट सामान एगो बैग में रखले रहस. ओकरा के उठावे खातिर बैकुण्ठ जी झुकलन. जुगेसर भाग के बैग लीहलन. उनका स्त्री के पैर छूवे खातिर बढ़लन. खड़ा होके कहलन – ‘हम कुछ दिन में आवते बानी.’
बैकुण्ठजी आगे-आगे, पीछे उनकर स्त्री, बीच में जुगेसर. नीचे उतर के जुगेसर कहलन – ‘अरे एक बार हम अपना स्टूडेंट क त डंटले जाईं.’
बैकुण्ठ जी पूजा के कमरा के ओर मुखातिब भइले. जुगेसर अन्दर गइले. पूजा तकिया में मुंह डाल के औंधे मुंह लेटल रहे. जुगेसर आवाज दिहलन-‘पूजा.’
ऊ फटाक से उठ के खड़ा भइल. आंख लाल-लाल भइल रहे. जुगेसर आगे बढक़े ओकरा सर पे हाथ रखलन – ‘ठीक से परीक्षा दीह. हम जल्दिए लवटब.’
फिर मुड़ के घर से बाहर निकललन. बैकुण्ठजी से बिदा लेवे के चहलन लेकिन ऊ रिक्सा पर बइठा के ही बिदा कइलन.

समस्तीपुर स्कूल के मैनेजमेंट अच्छा रहे. मुश्किल इ रहे कि साइंस टीचर ज्चादा दिन टिकस ना. जुगेसरो के देख के बुझा गइल ईहो ज्यादा दिन रुकिहन ना. लेकिन मजबूरी. अच्छा लडिक़ा साइंसे पढ़े चाहस. स्कूले परिसर में रहे के व्यवस्था हो गइल. स्कूल के चपरासी रहे खानो बना देव.

जुगेसर खातिर ई नया माहौल रहे. शुरू में थोड़ा झिझक लागल लेकिन लडिक़न के मनोविज्ञान समझे में उनका देरी ना लागल. आवत-आवत दूगो चिट्ठी लिखलन – एगो बैकुण्ठ प्रसाद जी के, दोसर बाबूजी के. बाबूजी के जवाब आइल – ‘दिल बड़ा खुश भइल तहरा नौकरी के खबर पा के. एक बार आव. हमार त भगवान के जइसन इच्छा बा चल रहल बा.’
एक दिन ऊ क्लास में पढ़ावत रहस कि चपरासी आके बतवल केहू उनके से मिले आइल बा.
उनका से ईहां के मिले आयी? सोचत-सोचत ऑफिस में अइलन.
एगो आदमी कुर्सी पर बइठल रहे. जुगेसर हाथ जोड़लन – ‘हम पहचननी ना आपके.’
-‘अरे बबुआ, तू कइसे पहचनब हमके. हम तहरा मामा के सम्बंधी हईं. तहार ममो आवत रलेह लेकिन हम सोचनी ह पहिले देख त आईं तहरा के.’
-‘का बात बा?’ जुगेसर सच में कुछ समझ ना पवलन. पास में ही हिन्दी टीचर तिवारी जी रहस. पान खाइल मुंह उठाके कहलन – ‘जोगेश्वर बाबू शादी-वादी करियेगा कि नहीं..?’
तिवारी जी का थूके खातिर बाहर जाये के पड़ल. आके कहलन – ‘अरे भाई. शादी करिये. हम लोगों को बारात में ले चलना नहीं भूलिएगा.’
तिवारी जी समय के नजाकत समझ के बाहर चल गइलन. जुगेसर कुछ बोलस एकरा पहिले ऊ सज्जन कहे लगलन – ‘बबुआ देख. तहरा पास सैकड़ों प्रस्ताव आई लेकिन हमरा जइसन बड़ा मुश्किल बा. के बा हमरा टक्कर के जिला में. दुआर पर दूगो भैंस बा. अभी हाले में टैक्टरो लेनी ह. तहार एगो साला बीएसएफ में बा. मुखिया के चुनाव त समझ ऊ पंडितवा के पालटिक्स से हार गइनी हं. तू चनपटिया स्टेशन पर केहू से कह रामसुन्दर प्रसाद कीहां जाये के बा. बीसो आदमी संगे लाग जइहन…’

का-का कहलन जुगेसर का कुछ समझ में ना आइल. उनका चुप होखे के इन्तजार में जुगेसर के धैर्य टूट गइल. कहलन – ‘अच्छा ठीक बा. लेकिन अबही हमरा शादी के कवनो प्लान नइखे. अबही तक हमार खुद ठीक नइखे.’
-‘तू आपन हमरा पर छोड़ द. तहार एम.ए. के रिजल्ट निकल जाये द. अपने जात के एगो कालेज खुल रहल बा. हम बात कइनी हं एमएलए साहेब से. अपने जात हउवन. पचास हजार लीहन प्रोफेसर बन जइब. ई साला स्कूल के मास्टरी कवनो चीज बा?’
अब जुगेसर का एगो रास्ता निकललन पिंड छोड़ावे के. हाथ जोडक़े विदा करे के मुद्रा में कहलन – ऊहे त हमहूं सोच तानी. एमएससी के रिजल्ट आ जाव त सोचल जाई ई सब. अभी त बडक़ा बेल घूरे में बा.’
ऊ सज्जन आपन जीत निश्चित समझ के चले के तइयार भइलन. बरदान देवे के मुद्रा में कहलन – ‘तू निश्चिन्त रह. अरे हीरा के केहू कोइला से ढक सकेला. आ एक बार सम्बंध होखे द ना. समझब ससुराल का होला.’
उनका गइला पर जुगेसर धम्म से बइठलन. हाथ सर पर चल गइल.
जब चपरासी गिलास में पानी लाके के दिहलस, पानी पीके मुंह से आवाज निकलल – ‘बाप रे.’
एक दिन इच्छा भइल त समस्तीपुर कालेज में गइलन जुगेसर. केमिस्ट्री विभाग में पता करे कि के के लेक्चरार बा. ऊहां गइला पर पूछे के ना पड़ल. उचक के देखलन त विनय पांडेय जी रहस. जब ऊ एमएससी में भर्ती भइलन त ऊ फाइनल में रहस. हास्टले में परिचय भइल रहे. बड़ा ही सीधा-सादा रहस. सबका मालूम रहे जातिवाद के कारण उनका फर्स्ट क्लास फर्स्ट ना मिलल रहे.


(बाकी फेर अगिला कड़ी में)


आपन बात


भोजपुरी में लिखे खातिर हमार आपन स्वार्थ निहित बा. हमरा दूसरा कवनो भाषा में लिखे में हमेशा डर लागल रहेला. आ भोजपुरी माई के गोद जइसन बा. हम जानतानी कि भले माई से दूर बानी, बहुत दूर, लेकिन उनके पास जाइब त ऊ हमरा के डटीहन ना, हमार गलती माफ कर दीहन.

– हरेन्द्र कुमार

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