भोजपुरी के पहिल ललित निबंध

– भगवती प्रसाद द्विवेदी

BhagawatiPdDvivedi
ओइसे त हिन्दी में निबंध-युग के श्रीगणेश 1850 से मानल जाला आ हिन्दी निबंध के जनक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के कहल जाला. हालांकि भारतेन्दु युग का पहिलहूँ निबंध लिखाते रहे आ ओह घरी के निबंधकारन में राम प्रसाद निरंजनी महर्षि दयानन्द आ श्रद्धाराम फुल्लौरी वगैरह के नांव सरधा से लिहल जाला, बाकिर ओह लोग के निबंध अध्यात्म आ दर्शन से किछु बनल-बनावल बिन्दुअने के छुअत अउर विस्तारित करत रहलन स. एह लोग का अलावा राजा लक्ष्मण सिंह आ राजा शिव प्रसाद सितारेहिन्द के नाँव आदर से लिहल जाला. चूँकि भारतेन्दु एह विधा के माँजि के चमकवलन आ बेवस्थित अउर साहित्यिक रूप देले रहलन एह से उन्हुका के एकर जनमदाता मानल जाला. एह संदर्भ में डा॰ विवेकी राय के कहनाम गौरतलब बा –

‘सभका बाद भारतेन्दु के जवना वजह से ऊँच पीढ़ा दे के हिन्दी निबंध का पिता का रूप में आदर दीहल जाला, ऊ ई ह कि इहाँ का ओकरा के व्यवस्थित, व्यापक, परिनिष्ठित, व्यावहारिक आ शुद्ध साहित्यिक बना के ओकरा भाषा-शैली के स्थिर कइलीं. एह काम में भारतेन्दु का पत्रकार प्रतिभा क बहुत लाभ मिलल. ई बाति कहल सही होई कि भारतेन्दु युग का निबंधन पर पत्रकारिता क भरपूर छाप बा आ संगे-संगे पश्चिम क प्रभाव पचि-पचा के, हिन्दी का माटी-पानी में घुलि-मिलि के रंग बन्हले बा.’(1)

बाकिर भोजपुरी में निबंध लिखे के शुरुआत तब भइल रहे, जब हिन्दी निबंध विकास-यात्रा के लमहर दूरी तय क के बहुत आगा बढ़ि चुकल रहे. चूँकि भोजपुरी में ऊहे लोग लिखत रहे जे, हिन्दियों के रचनाकार रहे, एह से ऊ लोग हिन्दी का निबंध-लेखन के प्रवृति, प्रकृति आ विकास से बखूबी वाकिफ रहे. नतीजा ई भइल कि हिन्दी के बनल बनावल उपजाऊ जमीन भोजपुरी के भेंटाइल आ पोढ़ते से एकर शुरुआत भइल. ओह घरी ललित निबंध के दौर रहे. नतीजतन, भोजपुरी में ललिते निबंध से निबंध-लेखन के आरंभ भइल. हर तरह से कसल-मंजल आ परिपक्व पहिलका भोजपुरी निबंध 1947 में लिखाइल रहे. ‘पानी’ शीर्षक से रचाइल ओह पहिल निबंध के प्रकाशन ‘भोजपुरी’ के पहिलका अंक में भइल रहे. निबंधकार रहली आचार्य महेन्द्र शास्त्री. उहें के ओह पत्रिका भोजपुरी के संपादको रहलीं. पत्रिका के प्रकाशन 1948 के बरसात काल में भइल रहे आ एकर खाली एकही अंक निकलि पावल रहे.(2)

निबंधकार क परिचयः-
नाँव :- आचार्य महेन्द्र शास्त्री
पिता के नाँव :- वैद्य लक्ष्मी पाण्डेय
जनम :- ओह घरी के सारन (अव सीवान) जिला के रतनपुरा गाँव में.
जनम-तिथि :- 16 अप्रैल, सन् 1901 ई॰.
पढ़ाई :- 1906 से 1922 ई॰ ले बनारस में. काशी विद्यापीठ से शास्त्री के उपाधि. बाद में विशारद, काव्यतीर्थ (कोलकाता से), साहित्याचार्य आ दर्शनाचार्य के उपाधि मिलल.
पेशा :- सन् 1922 से 1970 ले वाराणसी, हरिद्वार, हरिहरपुर, हाजीपुर, गोरेया कोठी, महाराजगंज (सीवान), बंगरा वगैरह के संस्कृत विद्यालय, महाविद्यालय में अध्यापन/पटना के बिहार सांस्कृतिक विद्यापीठ के प्राचार्य.
विविध :- साहित्य, शिक्षा आ समाज-सेवा के दिसाई आचार्य जी के खास योगदान रहल. बालिका-शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा आ दहेज-प्रथा खतम करावे खातिर एड़ी-चोटी के पसेना एक कइलीं. साहित्यिक चेतना जगावे खातिर कवि सम्मेलन करवावे पर खूब जोर देत रहलीं. नामी स्वाधीनता-सेनानी.
लेखन के विधा :- हिन्दी आ भोजपुरी में समान अधिकार से निबंध, व्यंग्य, कविता विधा में लेखन खातिर प्रसिद्धि मिलल. संस्कृतो में लेखन आ संपादन के काम कइलीं. भोजपुरी के पहिलकी मुकम्मल पत्रिका ‘भोजपुरी’ के संपादन कइलीं.
प्रकाशित कृति : मूलतः कवि-व्यंगकार आचार्य महेन्द्र शास्त्री के भोजपुरी, हिन्दी आ संस्कृत में प्रकाशित कृति रहली स :
1. भोजपुरी कविता-संग्रहः भकोलवा (1921)
2. चोखा (1950)
3. धोखा (1962)
हिन्दी-भोजपुरी कविता संग्रह :
1. हिलोर (1928)
2. आज की आवाज (1947)
हिन्दी कविता-संग्रह : छुआछूत, प्रदीप (1957)
संस्कृत के संपादित कृति :
1. संस्कृत-सार (1929)
2. संस्कृतामोद (1950)
3. सूक्ति-संग्रह (1952)
निधन : 31 दिसम्बर, 1973 ई0.

निबन्ध-परिचय :

भोजपुरी के प्रारंभिक निबंध ‘पानी’ के भावात्मक निबंध का कोटि में राखल जा सकेला. पानी के बेगर जिन्दगानी के कल्पनो नइखे कइल जा सकत. तबे नू रहीम के कहे के परलः

रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून
पानी गये न ऊबरे मोती, मानुस, चून.

सऊँसे प्रकृति, जीवन आ सृष्टि खातिर जरूरी पानी पर निबंधकार बड़ा बारीकी से भौगौलिक, वैज्ञानिक, दार्शनिक आ सामाजिक पक्षन के सारतत्व के चुटीला अंदाज में रखले बा. पानी माने पान करे लाएक भा पीए जोग तरल. एकर किछु अउरो माने-मतलब होला- शान, धार, तेजी, गति, रूप, रस, रंग-रोगन. पानी का बहाना से सेहत, सफाई, चिकित्सा, प्रदूषण पर बड़ा बेबाकी से मूलभूत सवाल उठावल गइल बा. बाकिर आजुओ पानी के मोल कहाँ बूझल जात बा. लेखक एकरा महातमे से सहज से निबंध के शुरुआत करत बा.

‘पानी के मोल ना समुझल जाला. ई ना रहीत तब बुझाइत. पानी छुअला बिना कामो चली त पिअला बिना खराई होखे लागी. कंठ सूखे लागी, जान जाए लागी.

आचार्य शास्त्री जी परमात्मा खानी व्यापक पानी के परमेश्वर के पहिला सृष्टि बतवले बानी. निबंध का आखिर में लालित्य से भरल पाती खास तौर से अखियान करे जोग बाड़ी स –

‘बरसात ना रहे त रितुराज बसन्त के भी अंत हो जाई. बरसात में पेड़-पौधा, कीड़ा, मकोड़ा सभ राजा बन जाला ढाबुस के शास्त्रर्थ, झींगुर के गीत, भगजोगनी के खेल देखले बनेला. जब आकाश में बादल नाच-नाच के मृदंग बजावे लागे तब जमीन पर मोर गा-गा के नाचे लागेला. तरह-तरह के फूल खुशी से मुस्करा उठेला. कदम दिगमिग हो जाला. घास पा के दूधो-दही पानी खानी बढ़िया जाला. ‘भादो के दही कांदो’ मशहूर है. झूलन देखे वृन्दावन तक धावा बोलल जाला. सावन के शोभा मनभावन.शोभा-सागर कृष्णचन्द्र के जन्म-लीला भी एही रितु में भइल. कवि कालिदास के सबसे बढ़िया कविता ‘मेघदूत’ मेघ के ही दूत बना के तैयार भइल. विश्व कवि रवि बाबू ओहीं ते राह ताकस जैसे कामी अपना कामिनी के. पानी से तीर्थ, पानी से प्रतिष्ठा. पानी पर पोथा लिखा सकेला. पानी ना रहे त जिन्दगानी कवना काम के. जेकरा आंख में पानी ना, उहो कवनो आदमी ह?’

विचारक सिपाही सिंह श्रीमंत ‘पानी’ के विवेचन करत साफ-साफ लहजा में कहले बानीं- ‘विषयपरक, विरणात्मक आ विवेचनात्मक श्रेणी में आवेवाला ‘पानी’ नामक निबंध के रचयिता आचार्य महेन्द्र शास्त्री जी बानीं. 1948 में इहाँ का अपना एक अंकी पत्रिका ‘भोजपुरी’ में पानी अइसन विषय पर कलम उठा के गंभीर नमूना देवे के प्रयास कइली बाकिर गंभीरता का उहाँ से पटरिए ना बइठत रहे. शास्त्री जी के एह पहिलके निबंध में विषय से जुड़ल विवेचन के दक्षता, भाषा के कसाव आ प्रवहमानता, शैली के बांकपन अउर चुटकी लेबे के अंदाज सहजे देखल-परखल जा सकेला. उहाँ के मन का मउज के नमूनो बा इ शुरूआती निबंध, जवना में वैज्ञानिकता, दार्शनिकता आ चिन्तन-प्रक्रिया के दर्शन एके संगे कइल जा सकेला.

संदर्भ :
1. भोजपुरी निबंध निकुंज : प्रकाशक : अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, पटना (11 भूमिका)
2. भोजपुरी (द्वैमासिक) : संपादक : महेन्द्र शास्त्री, प्रकाशक : भोजपुरी कार्यालय, कदम कुआँ, पटना- 3

<hr />(शीघ्र प्रकाश्य ‘भोजपुरी निबंध: विकास आ परंपरा के एगो अंश.’)


प्रस्तुत लेख भोजपुरी अमन से लीहल गइल बा.

 

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