– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल

साइते केहू भोजपुरिहा होई जे “अंगुरी में डँसले बिया नगिनिया रे, ए ननदी सैंया के जगा द.” आ “सासु मोरा मारे रामा बाँस के छिउँकिया, ए ननदिया मोरी रे सुसुकत पनिया के जाय.” जइसन पुरबी के लोकप्रिय धुनन से परिचित ना होई. ‘पुरबी’ धुन के जनक आ भोजपुरी के असाधारण कवि महेंद्र मिश्र (महेंदर मिसिर) का आँचर पर जो जेल जाए के दाग ना लागल रहित त साइत आजु ऊ भोजपुरी के रवींद्रनाथ ठाकुर कहइतन. ई बात दीगर बा कि नोट छापला का चलते उनुका जेल जाए का मूल में उनकर राष्ट्रभक्ति रहे. एह बात के गवाह खुद ऊ पुलिस अधिकारियो बा जे उनका पीछा लागिके, विश्वासघात कइके उनकाके पकड़ववलसि जरूर बाकिर उनकर राष्ट्रभक्ति आ दृढ़ चरित्र के ऊहो कायल रहे. कहल जाला कि जेल जात खान गोपीचंद उर्फ जटाधारी प्रसाद जब अत्यंत दुखी होके मिश्र जी से कहले कि- “बाबा, हम ड्यूटी से मजबूर रहीं बाकिर हमरा एह बात के बहुत खुशी बा कि रउँआ अपना देश खातिर बहुत कुछ कइलीं आ आजु देशे खातिर जेल जा रहल बानी. तब मिश्र जी के भरल कंठ से कविता के दू लाइन अनासे निकलि गइल रहे –

“पाकल-पाकल पनवाँ खियवले गोपीचनवा.
पिरतिया लगाके भेजवले जेहलखनवा.”

आ अतना सुनते गोपीचंद उनकर गोड़ ध लिहले. बाद में उनकरो दू गो लाइन लोक में बहुत प्रिय भइल-

“नोटवा जे छापि-छापि गिनिया भँजवल हो महेंदर मिसिर
ब्रिटिश के कइल हलकान हो महेंदर मिसिर.
सगरी जहनवाँ में कइल बड़ा नाम हो महेंदर मिसिर
पड़ल बा पुलिसवा से काम हो महेंदर मिसिर.”

गोपीचंद कहले – “हमरा अफसोस बा कि अपनो मन में देशसेवा के एगो सपना रहे जवन पूरा ना हो पावल काहेंकि हम सरकारी नौकरी में रहीं, बाकिर रउरा महान बानी कि अपना देश खातिर बहुत कुछ कइलीं.“

कहल जाला कि आजादी का लड़ाई में अंग्रेजी हुकूमत के डाँवाडोल करेवाला पंडित महेंद्र मिश्र जाली नोट छापिके स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ल लोगन के आर्थिक मदद कइके आपन एगो अलगे पहचान बनवले रहन. ओह घरी जब रात में सब लोग सूति जात रहे तब आङन का शिव मंदिर में पूजा का बहाने जाइके पंडित जी रात भर नोट छापसु आउर सुबह ऊहे नोट भिखारियन के दे देसु. ऊ भिखारी लोग वास्तव में स्वतंत्रता सेनानी रहन, खाली भेषे भिखारी के रहत रहे. लोगन के कहनाम बा कि महेंद्र मिश्र द्वारा नोट छापे के जानकारी जब अंग्रेजी हुकूमत के भइल त उनुका पाछा ऊ सीआइडी लगा दिहलसि. मिसिरजी के गरुआरी आ घर के चाकरी करत ओह अधिकारियो के तीन साल लागि गइल ई पता लगावे में कि पंडीजी पैसा कब छापेलन. 1924 में उनुका सङही उनकर छपखनो(छापाखाना भी) बरामद हो गइल. ऊ आजुओ सीआइडी का दफ्तर में सजाके राखल गइल बा.

कहल जाला कि महेंद्र मिश्र बक्सर सेन्ट्रल जेल भेजल गइलन बाकिर जेल में ऊ बहुत कमे दिन रहले. जेलो में ऊ संगीत आउर कविता के रसधार बहावत रहसु. उनका एह गुन पर मुग्ध होके ओह घरी के जेलर उनका के अपना डेरे पर राखि लिहले . ओहिजा ऊ जेलर के मेहरारू आउर लइकन-फइकन के आपन लिखल भजन आ कविता सुनावसु आ सत्संग करसु. ओहिजे भोजपुरी के पहिल महाकाव्य आ उनकर गौरव-ग्रंथ “अपूर्व रामायण” रचाइल.

भिखारी ठाकुर के गुरू

महेंद्र मिश्र आम जनता के रुचि आउर संस्कार के परिष्कार करे खातिर भिखारी ठाकुर के  सिखवलन कि आध्यात्मिक प्रसंग आउर भजनो कीर्तन से समाज के उद्धार कइल राष्ट्रभक्तिए में आई. उनुका ढेर मौलिक आ कल्पित प्रसंगन का सङही गीतन के धुन का नींव पर भिखारी ठाकुर अपना लोक नाटकन के शानदार इमारत खड़ा कइलन. महेश्वराचार्य के ई कहल बिल्कुल जायज लागता कि “जो महेंदर ना रहितें त भिखारी ठाकुर ना पनपते. उनकर एक-एक कड़ी लेके भिखारी भोजपुरी संगीत रूपक के सृजन कइले बाड़न. भिखारी के रंगकर्मिता आ कलाकारिता के मूल बाड़न महेंदर मिसिर, जेकर ऊ कतहीं नाम नइखन लेले . महेंदर मिसिर भिखारी ठाकुर के रचना-गुरू आ शैलीगुरू बाड़न. लखनऊ से लेके रंगून तक महेंदर मिसिर भोजपुरी के रस माधुरी छींटके उर्वर बना देले रहलन, जवना पर भिखारी ठाकुर पनप गइलन आ जम गइलन हाँ.” (भोजपुरी सम्मलेन पत्रिका, फरवरी, 1990, पृष्ठ-31)

महेंदर मिश्र के साथी समकालीन बुजुर्ग आ भिखारी ठाकुर के जीवित समाजी लोगन से बातचीत (भदई राम, शिवलाल बारी आउर शिवनाथ बारी से दिनांक 23-5-1992 के साक्षात्कार) का आधार पर डॉ.सुरेश कुमार मिश्र आ डॉ.रवीन्द्र त्रिपाठी बतावतारे कि भिखारी ठाकुर के बरिसात महेंदरे मिसिर के दरवाजा पर बीतत रहे. महेंदरे मिसिर भिखारी ठाकुर के झाल पकड़े सिखवलन. महेश्वराचार्य त अतना तक मानतारे कि महेंदर मिसिर के “टुटही पलानी” वाला गीते भिखारी ठाकुर के “बिदेसिया” के नींव बन गइल.

भोजपुरी राम काव्य परंपरा के प्रमुख कवि

महेंद्र मिश्र सही मायने में प्रेम के जीवन जियले रहन. साइत इहे कारन बा कि उनका शृंगारिक कवितन में एगो खास प्रकार के रोमांटिक संवेदना बाटे. ओहिजा जो प्रेम के कोमलता लउकताटे त भक्तिपरक रचनन में भक्त कवियन नियन मानव नियति के चिंतो देखात बा.

“अपूर्व रामायण” का संदर्भ में मिश्रजी पर लेखनी चलावेवाला लोग उनकर तुलना तुलसीदास से भी कइले बाड़न. कुछ लोग त उनका के राम काव्य परंपरा के प्रमुख कवियो मानल जाए के ओकालत कइले बाड़न. ओह लोगन के कहनाम बा कि जइसे तुलसीदास परंपरा से आवत संस्कृत का जगहा अवधी भाषा के प्रयोग कइलन आउर रामकथा के जन-जन तक पहुँचवलन, ओसहीं महेंद्र मिश्र भी भोजपुरिए भाषा में अपना कथावाचक शैली में जीवन भर रामकथा के प्रचार-प्रसार कइलन. लोकप्रसिद्ध त ईहो बा कि जब ऊ अपना संगीतात्मक शैली में रामकथा सुनइहें त बीस-बाइस हजार श्रोता मंत्रमुग्ध होके उनकाके रात भर सुनत रहिहें. छपरा के एगो शिवमंदिरे में कवि अपना नश्वर शरीर के तजलन. एहमें सचाई चाहे जतना होखे बाकिर एगो बात त साफ हो जाता कि महेंद्र मिश्र के पहचान के दायरा खाली पुरबी तक सीमित नइखे कइल जा सकत. उनुका भक्ति काव्यधारा पर भी विचार ओतने जरूरी बा. मिश्र जी का भक्ति काव्य में तुलसीदास नियन समन्वयन भी देखल जा सकता. राम, शिव, हनुमान आदि विभिन्न देवी-देवतन का भजन आ चरित्र-गायन का सङही उनुका निर्गुन गीतन में कबीर पंथ भी घुलल-मिलल लागता.

भोजपुरी के रवींद्रनाथ ठाकुर

‘गीतांजलि’ का संदर्भ में ई कहल जाला कि रवींद्रनाथ ठाकुर का गीतन में आन सांसारिक कवियन के गीत नियन हृदय के कमजोरी के रंगीन चित्रण नइखे आ नाहीं ओहमें विरह, विषाद अउरी विक्षेपग्रस्त मन के बिलापे बाटे. ओहमें त अलौकिक आशा, खुशी आ अँजोर के आभा बा. ‘गीतांजलि’ में संग्रहीत सभे गीतन के भाव-भूमि आध्यात्मिक रहे, बाकिर उनका समग्र काव्य के भाव-भूमि में विविधता बाटे. गद्य से पद्य तक के विभिन्न विधन आ विषयन पर उनकर लेखनी जमिके चलल बिया. उनकर  जमीनी संबंध आम आदमी से कम रहे बाकिर उनकर लिखल एक-एक शब्द सभका से सहजता में जुड़ि जाला. एह विराट व्यक्तित्व के नक्षत्र पुरुष बनावे में अइसे त साहित्य का सङही संगीत आ कला के भी बड़हन हाथ बा, बाकिर ‘रवींद्र गीतिकाव्य आ रवींद्र संगीत के सृजन’ उनकाके  महारथी बनवलसि.

महेंद्र मिश्र का व्यक्तित्व पर जो एक नजर डालल जाव त साफ बुझाता कि उनका गीतन आ गायन के अलग कइके देखला पर अन्याय हो जाई. संगीत उनका आत्मा में बसत रहे, एहीसे आम आदमी से लेके प्रबुद्ध वर्ग तक, दरबार से लेके कोठा तक उनकर आ उनका गीतन के गुनगुनाहट के व्याप्ति रहे. उनकर लेखनी जमिके चलल बिया त खाली कविता पर. उनकर गद्य-लेखन अप्राप्य बा ; जो होइबो करी त ओहसे उनकर पहचान नइखे. काव्य में सरसता आउर पूर्वी गीतन का तरल अनुभूति से उनकर विशेष पहचान बनल. मिश्रजी का मन में संगीत प्रेमी साहित्य सर्जक आ राष्ट्र के जिम्मेदार नागरिक के द्वंद्व हमेशा चलत रहे. उनकर हृदय खींचत रहे संगीत के आरोह-अवरोह का ओर त मस्तिष्क राष्ट्रीय आंदोलन आ ओहमें शरीक हजारों-लाखों व्यक्तियन के त्याग का ओर. महेंद्र मिश्र के गतिविधि दूनो में लउकता. ई कहल कठिन बा कि कवना में उनकर जोगदान कम रहे- “ को बड़ छोट कहत अपराधू.” .

मिश्रजी का काव्य में समस्या का सङही कर्तव्य बोध भी साफ-साफ लउकता. उनकर कर्तव्य बोध कब भावना के तरलता में बदल जाता, पते नइखे चलत –

“एतना बता के जइह कइसे दिन बीती राम
केकरा प छोड़ि जाइबि टुटही पलानी,
केकरा से आग माङबि केकरा से पानी.”

नोट छापेके उनकर मजबूरियो उनका गीतन में साफ लउकतिया-

“हमरा नीको ना लागे राम गोरन के करनी
रुपया ले गइले,पइसा ले गइले,ले सारा गिन्नी
ओकरा बदला में दे गइले ढल्ली के दुअन्नी.”

एह तरह से राष्ट्र आ समाज का प्रति अति संवेदनशील महेंद्र मिश्र के लोकस्वीकृत गीत आ संगीत (खासकर ‘पुरबी’ धुन के प्रणयन) का साथे स्वतंत्रता आंदोलन में भी उनुकर जोगदान उनुकाके एगो नक्षत्र पुरुष बनावता आ उनुका बिशाल व्यक्तित्व के रवींद्रनाथ ठाकुर का सोझा खड़ा करत बा.

ई खेद के विषय बा कि आजुओ महेंद्र मिश्र के ना त स्वतंत्रता सेनानी के दर्जा मिलल बा, ना उनका घर के राजकीय संग्रहालय घोषित कइल गइल बा. आजु जहाँ बहुत जरूरी हो गइल बा उनका पर अलग-अलग नजरिया से शोध कइल, ओहिजे समाज आ सरकार से ईहो अपेक्षा कइल जाएके चाहीं कि मिश्रजी के प्रतिभा, लगन, रचनाधर्मिता आ देशसेवा के भावना के जल्दिए मूल्यांकन कइल जाई आ उचित सम्मान प्रदान कइल जाई. साइत तबे भोजपुरी के एह रवींद्रनाथ ठाकुर के असली चेहरा देश आ विदेश में राष्ट्रीय गौरव के चमकदार नक्षत्र का रूप में स्थापित होई.

(साभार- हेलो भोजपुरी, मार्च, 2017)

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