अतिथि संपादक के कलम से…

भारत के सामाजिक व्यवस्था एगो अइसन अत्याधुनिक व्यवस्था बा जेकरा चलते आजो इ देश के वंचित समाज घोर कष्ट में जीवन जीये खातिर बाध्य बा. जाति व्यवस्था, जेकरा ऊपर धरम के मोहर लागल बा, उ ‘कैंसर’ जइसन भयानक बेमारी लेखा लाइलाज होके बार-बार फूट पड़ेला. आजो 2012 में भी हमनी के देश के चारों कोना में इ व्यवस्था के भयानक रूप में प्रत्यक्ष देखऽ तानी जा.

समाज के निचला तबका के साथे आजो जवन बेवहार होता उ मानवता के नाम पर कलंक हऽ. “भोजपुरी जिंदगी” खाली भोजपुरी भाषा अउर क्षेत्र से जुड़ल विषय लेके एकांगी पत्रिका नइखे. इ पत्रिका आपन राष्ट्रीय स्वरूप के ओर अग्रसर हो रहल बीया. हमनी के इ पत्रिका के इ नवका अंक देख अपने सभे इ सहज रूप से अनुमान लगा सकऽतानी जा कि आपन राष्ट्रीय दायित्व के लेके अउर भोजपुरी जइसन समृद्ध भाषा के विश्व स्तर पर अन्य भाषा के समक्ष लाये खातिर इ पत्रिका के भूमिका केतना महत्वपूर्ण होत जाता.

विश्व कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर अपना साहित्य के माध्यम से आपन देश के नाम रोशन क के भा खाली नोबेल पुरस्कार पाके विख्यात ना भइलन बाकिर मानवता के पोषक विचारधारा खातिर विश्वविख्यात भइलन. इ पत्रिका अइसन महान साहित्यकार अउर चिन्तक के ऊपर विशेषांक निकाल के फिर एगो नवका सामाजिक चेतना खातिर अउर भरत के नवनिर्माण खातिर आपन योगदान देवे खातिर अग्रसर हो रहल बिया. आशा बा साहित्य के विभिन्न विधा से पूर्ण अउर सामाजिक चेतना से परिपूर्ण साहित्य पढ़ के निश्चित रूप से रउरा लोग में नवचेतना के संचार होई. हमार कामना बा कि गुरू रवीन्द्रनाथ ठाकुर के अनछुअल पहलू के पढ़े के बाद रउरा लोग भी इ पत्रिका के आगे बढ़ावे में आपन योगदान जरूर देम.
राउर आपन,
प्रो. शत्रुघ्न कुमार
निदेशक, भोजपुरी भाषा, साहित्य एवं सांस्कृतिक केन्द; इग्नू, दिल्ली


भोजपुरी जिनगी के नयका अंक अप्रेल जून साल २०१२ के अंक में कविगुरू रविन्द्र नाथ टैगोर से जुड़ल सामग्री दिहल गइल बा. एह अंक के संपादन प्रसिद्ध वरिष्ठ दलित साहित्यकार प्रो॰ शत्रुघ्न कुमार कइले बानी. उपर के लेख उनही के लिखल ह. बाकी पूरा अंक पीडीएफ फाइल में एहिजा मौजूद बा. पढ़ीं आ आपन राय भेजीं.

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