– डॉ० हरीन्द्र ‘हिमकर’

HarindraHimkar

इतिहास के सचाई ह कि बिहार के चंपारण जिला में अंगरेजन के बनावल निलही कोठियन के अत्याचार आ आतंक से त्रस्त होके राजकुमार शुक्ल साल 1916 में एहिजा के पीड़ितन के सनेसा ले के लखनऊ चहुँपले. ओहिजा गाँधी जी के सरलता, सहजता, सहृदयता से प्रभावित हो के उहाँ से चंपारण आवे के निहोरा कइलन. खुद गाँधी जी एह बारे में लिखले बानी कि ‘राजकुमार शुक्ल चंपारण के एगो किसान रहले. उनका प दुख के पहाड़ टूटल. एही दुख से उनका मन में आइल कि निलहा अत्याचार से सभका के मुक्ति दिआवल जाव. उ चाहत रहले कि हम खुद आ के चंपारण के किसानन के दुर्दशा देखीं. एहसे हम कहनी कि ठीक बा, अपना दौरा में चंपारणो के शामिल करब आ ओहिजा एक दू दिन रुकबो करब.’

एह प शुक्ल कहलन कि, ‘एक दिन बहुत होखी, एक बेर अपना आँखि देखीं त सही!”

चंपारण के इहे यात्रा से गाँधी के ‘महात्मा’ बना दिहलसि. उनका तेज आ ओज में निखार आइल. एहिजा के किसानन के दुर्दशा देखि उ मोहात आ पघिलत चल गइलन आ करुणा आ दया के महात्मा बन गइलन. एहिजा के जन जन से प्यार आ सम्मान पा के उनकर आत्मा बरियार होत गइल. जेनिए जासु ओनिए लाखो लोग गाँधी में सम्मान के भाव से भरल जयघोष लगावसु आ निलहन का खिलाफ आन्दोलन मजगर बनत जाव. गाँधी अपना आत्मकथा में एह बाति के सहजता से सकारत लिखले बाड़न कि, ‘बिहारे हमरा के भर हिन्दुस्तान में जनवलसि. एहसे पहिले हमरा के केहू जानतो ना रहुवे. बीस बरीस ले अफ्रीका में रहला का चलते हम हब्शी बन गइल रहीं. जब चंपारण अइनी त पूरा हिन्दुस्तान जाग उठल. पहिले जानतो न रहीं कि चपारण केने बा ? बाकिर जब एहिजा अइनी त बुझाइल कि बिहारी लोगन के हम सदियन से जानत रहनी आ उहो हमरा के जानत रहले.

वइसे त भोजपुरी का इलाका में अंगरेजन का खिलाफ साल 1857 का पहिलही से आग सुनगत रहुवे. आ एही चलते गाँधी के सफलता भोजपुरी के पूरा इलाका के आस, विश्वास, संघर्ष, उत्कर्ष आ राष्ट्रभक्ति के भावना से भर दिहलसि. गाँव-गाँव से उठल एह आवाज में देश के आजादी के छटपटाहट देखावत जतावत गीतन के धार फूट पड़ल. चंपारण, छपरा, सोनभद्र, गोरखपुर, मिर्जापुर, आजमगढ़, बलिया, गाजीपुर, आरा, सासाराम जइसन जनपदम में ई गीत आजादी के चेतना के लौ जगावे में आग में पड़ल घीव जइसन काम कइली सँ. एही समय रघुबीर नारायण आपन ‘बटोहिया’ गीत लिखनी जवन मशहूर भइल आ जनमानस में देश के प्रकृति, संस्कृति, साहित्य, विचारधारा, दर्शन, शौर्य वगैरह के जानकारी जगवलसि आ लोग के जबान प चढ़ि के गदर के आग अउरी लहकवलसि.

‘बटोहिया’ गीत के ई लाइन आजुओ लोग का जबान पर चढ़ल मिलेला –
सुन्दर सुभूमि भईया भारत के देसवा से,
मोरे प्राण बसे हिम खोह रे बटोहिया.
एक द्वार घेरे रामा हिम कोतवलवा से,
तीन द्वार सिंधु घहरावे रे बटोहिया.
जाहु जाहु भईया रे बटोही हिन्द देखि आउ,
जहवाँ कुहुकि कोईली बोले रे बटोहिया.

एही कड़ी में, एही तर्ज प प्रिंसिपल मनोरंजन प्रसाद सिंह साल 1920-21 में ‘फिरंगिया’ गीत रचलन. एह गीत में अंगरेजन के अत्याचार के सही चित्रण भइल बा –
सुन्दर सुघड़ भूमि भारत के रहे रामा,
आजू इहे भइल मसान रे फिरंगििया.
अन्न, धन, जन, बल,बुद्धि सब नास भइल,
कवनो के ना रहल निसान रे फिरंगिया.

जहवाँ के लोग सब खात न अघात रहे
रुपिया से रहे मालामाल रे फिरंगिया.
उहे आजु जेने-जेने अँखिया घुमा के देखीं,
तेने-तेने देखीले कंगाल रे फिरंगिया.

चंपारण के एगो किसान बेतिया दरबार जा के आपन दर्द एह गीत में सुनवलसि –
राम नाम भये भोर,
गाँव निलहा के भइलें.
दहतर में सब धान,
गोयड़ा में नील बोअइलें.
भये आमिल के रान प्रजा सब भयउ दरबारी
मिलजुल लूटे गाँड गुमस्ता औ पटवारी.

एही कड़ी में के अगिला गीत रहे –
चलु भईया, चलु भईया सभेजन हिली मिली
सुतल जे भारत के भाई जगाईं जा.
अमर के किरति बड़ाई दादा कुँवर के
गाई गाई चलु सुतल भाई के जगाईं जा.

एगो अउर गीतकार चंपारणवासियन के दरद एह गीत में बतवलन –
परल बा टिकसवा के बोझ
धरमवा के खून भइल.
चलीं चलीं गाँधी महाराज,
देखीं अजबे कानून भइल.

चंपारण सत्याग्रह राष्ट्रीय आन्दोलन के पहिला डेग रहल. ओह दौर में गाँधी में देशवासियन के भरोसा एह गीत में झलकत बा –
जबसे भइलें गाँधी बाबा के जनमवां
सुन हे भारतवासी.
देसवा होखे लागल आजाद
सुन हे भारतवासी.
देसवा कारण गाँधी गइले जेलखनवां
सुन हे भारतवासी.
करे खातिर देसवा आजाद
सुन हे भारतवासी.

गाँधी के जेल गइला से जनमानस से जेल यातना के डर खतम हो गइल रहे आ इहे भाव एह गीत में उभरल बा –
गाँधी के आइल जमाना,
देवर जेलखाना में गइलें.
जबसे जमे सरकार बहादुर
भारत मरे बिना दाना.
देवर जेलखाना में गइलें.
हाथ हथकड़िया बा गोड़वा में बेड़िया
देसवा पर भइलें दिवाना,
देवर जेलखाना में गइलें.

आजादी ला जेल गइले खेतिहर के पत्नी के मन के भाव एह गीत में देखीं –
जेवना लिहले कुंजन में खड़ी
कब होइहें सुरजवा जी.
गाँधी चलन मन भावे सजन,
कब होइहें सुरजवा जी.
पनिया लिहले कुंजन में खड़ी
कब होइहें सुरजवा जी.

गाँधी आ खादी से एह इलाका के लोग के कतना गहीर भावनात्मक लगाव रहे, एकरो के सैकड़ो लोकगीत में सुनल जा सकेला –
रंगल खादी के चुनरिया लहरदार बा,
पहिरऽ दिल तोहार बा ना.
चुनरी बाटे तीन पटिया
ओमे लागल बा किनरिया
ओह में सगरो गाँधी बाबा के जयकार बा
पहिरऽ दिल तोहार बा ना.

गाँधी अपना चंपारण प्रवास का दौर में एहिजा के दलितन के जवन पीड़ा देखले ओहसे उनका आश्रम आ रोजगार सिखावे वाल स्कूल खोले के दिशा में सोचे के मजबूर होखे के पड़ल. चंपारण के नजरअंदाज कइल आ अनबढ़ धरती गाँधी के आर्थिक सोच के जननी बन गइल. गाँधी के एह खुदराज वाली सोच के असर एह गीतन में देखल जा सकेला –
मोरा चरखा के टूटे ना तार,
चरखा चालू रहे.
गाँधी बाबा चललें दुलहा बनके
दुलहिन बने सरकार,
चरखा चालू रहे.

भारतबसिया हो, गाँधी के सनेसवा मन में रखीह
खेत खेता बांगा बोअवइह, रूपिया होइहें ढेर
सूतवा काति के कपड़ा बिनिहऽ, मति करीह तू देर.
भारतबसिया हो…
गाँव गाँव पंचायत करिके, झगडा लीह फरियाइ,
अपने घर के निन्दा गिल्ला, पर घर काहे जाई?
भारतबसििया हो…

चरखा मंगाइब हम सईंया के घिरिआई के
बृन्दाबन पठाई के ना.
काते हमर पड़ोसिन घर में, सँझिया भोरे आ दुपहरिया में
हमके लजवावे गाँधी बात बताई के
ऊँचनीच समुझाई के ना.

चारू चउखाड़ा में गाँधी पुकारे
कइसे आई सुरजवा,
बलम हमे ला द चरखवा जी.
जबसे चरखवा गँउवा में अइलें
बिगड़ल करम बनि गइलें.
बलम हमें ला द चरखवा जी.
सुतवा काति काति जइबो बजरिया
कइसन सुदिन आई गइलें.
बलम हमें ला द चरखवा जी.

एहिजा के सहज-सरल लोग के मन में आजादी ला लड़े वाला वीरन के छवि त्यागी, तपस्वी, योगी आ महात्मा के रूप में स्थापित हो गइल –
गाँधी बाबा जोगििया, जवाहर बैरगिया,
राजिन्दर बाबू भइलें साधू आ फकिरवा,
हो राजिन्दर बाबू ना..

सादगी आ सहजता से भरल गाँधी के सर्वहारा वर्ग ला खड़ा भइल देखि के शिवभक्ति ला प्रचलित नाचारी धुन पर ई गीत फूट पड़ल –
एह पार गंंगा कि ओह पार जमुना
बीचही में नईया लागी गइले
गाँधी के कोठा अटारी उनुका मनहु ना भावे,
जेहलवे मन भावे बाबा गाँधी के.

लोकप्रचलित धुन पर रचल ई सभ गीत हताश आ निराश जनता के झकझोर के जगा दिहलसि. एही कड़ी में साल 1942 के आंदोलन का समय जनकवि रामदेव द्विवेदी ‘अलमस्त’ अपना गीतन से जनता के जगावल शुरु कइलन –
तोरा घरवा में पइसल बाटे चोर
अँजोर क के देख भईया ना.
जहवाँ जनमल वीर शिवाजी, रामकृष्ण अवतार.
ओही ठाँव पर हाय विधाता, अइसन अत्याचार.
काहे भइले मरद गमखोर, अँजोर क के देख भईया ना.
मोती, लाल, जवाहर लुटलख, सोना चानी गहना
मुँह खोले पर मारे धावे, उलुटे लादे लहना
कहे बाकी बाटे तोहरा इहाँ मोर, अँजोर क के देख भईया ना.

‘अलमस्त’ के ई गीत अंगरेजी साम्राज्य के विस्तार नीति के परत खोलऽता –
बंदर बड़ा होशियार
बेचे अइलें ऐनक ककही
बन गइले ठिकदार,
बशदर बड़ा होशियार.

अपना लोगन के जगावे ला लिखल ‘अलमस्त’ के ई व्यंग रचना अनुपम बा –
गुमल आजादी देर से आइल
दूर से आइल नियरा रे.
जागऽ जागऽ दाँत चियरा रे.

आजादी मिले के उमीद का साथही ‘अलमस्त’ लोग के आजाद भारत में पाँख पसार के उड़े के आतुरता चिन्हत लिखलन –
देखऽ दुनिया बदलल जाता, नया दिन आवत बा.
उगत किरिनियाँ में धुरिया लुटावत बा.
जाग जाई लोग सब, भाग जाई सोग सब
आई कहिया जोग उहो काग उचरावत बा.
देखऽ दुनिया बदलल जाता, नया दिन आवत बा.
मलहा के छँवड़ा अबके, बोलत नइखे तनिको दबके.
उड़त चिल्ह गड़िया पर कनखी चलावत बा.
देखऽ दुनिया बदलल जाता, नया दिन आवत बा.

आजादी मिलला का बाद जनतंत्र में जनता के राजा रानी बने के जवन सपना बोवल गइल रहे ओकरा के साकार ना होत देख, ‘अलमस्त’ गवलें –
इहवाँ गाँधी बाबा अइलें
हमनी के आशा दे गइलें.
मिटी गरीबी, हालत सुधरी
आपन राज मुलुक में भइलें.
चेरी ना भइली रानी, अबकी एहू राजे पाटे
चल रे बैला बाटे बाटे.

आजादी के आगम के धमक सुनिए के लोग गावल शुरू क दीहल –
भारत में अइल सुराज
चलू रे सखी, देखन को.
काहि चढ़ि आवत भारत माता
काहि चढ़ि आवे सुराज
चलू रे सखी, देखन को.
हाथी चढ़ि आवत भारत माता
डोली में आयो सुराज
चलू रे सखी, देखन को.
घोड़ा चढ़ि आवे वीर जवाहर
पैदल गाँधी महाराज
चलू रे सखी, देखन को.

गाँधी के बा पसरल सगरे किरतिया
कई दिहलें देसवा आजाद.
भागी गइलें गोरा पापी डाकू रे लुटेरवा,
हमनी के मिलल सुराज.

गाँधी के शहादत प पूरा के पूरा भोजपुरिया इलाका कराह उठल रहे. एह कराह के भाव एहिजा के गीतो में देखे के मिलेला –
बापू के सुरतिया
नाहीं भुले दिनवा-रतिया,
जियरा पागल भइलें ना.
नाचे अँखिया के समनवा
जियरा पागल भइलें ना.

नाथूराम गोड्से कइलसि महासंत पर वार
मानवता के छतिए पर उ कइलसि तीन प्रहार.
लोगवा रो रो पीटे छतिया
जियरा पागल भइलें ना.

आ गाँधी के मरला का बादो लोग गाँधी के पुकारत रहल –
गाँधी ! आव एक बार
हम पुकार करीलें.
बापू ! कहँवा तू हमार
हम पुकार करीलें.
देश के दिहलऽ जे आजादी उ भुलाई गइल बा.
तू सुझवलऽ जवन राह, ऊ बेराई गइल बा.
लेल फेरू अवतार
हम पुकार करीलें.

एह तरह राष्ट्रीय आन्दोलन से शुरू हो के गाँधी के शहादत के बीसियों बरीस बाद ले सत्याग्रह, चरखा, खादी, निलही कोठियन के शोषण अत्याचार, गाँधी के हत्या आ सुराज के सपनन के टूटे बिखरइला के गावत देखावत सैकड़ो गीत भोजपुरी इलाकन में लिखल आ गावल गइल.

चंपारण के निलही कोठियन के अंगरेज साहबन के शोषन तंत्र के चूर चूर कइला के गाँधी के साहसिक कदम से एहिजा के लोगन में साहस आ भरोसा के बीज अँकुरा गइल. एह साधारण लउके वाला आदमी के असाधारण साहस आ बेकाबू लागत फिरंगियन के सोझा एगो अधनंग निहत्था फकीर के निडरता देखि के जनमन के भाव के सोता फूट के बह निकलल आ संस्कार गीत से लगाइत ग्राम गीतन तक में गाँधी आ गाँधी के प्रयोगन के चरचा सहजता से खुशी आ उमंग के तरंग पर बहे लागल आ गीत गवाए लगली सँ. एह साहित्य सरिता संगे चल के गाँधी अउर भारत के आत्मा के देखल समुझल जा सकेला.


डॉ० हरीन्द्र हिमकर
अध्यक्ष हिंदी विभाग
के० सी० टी० सी० कॉलेज, रक्सौल, पूर्वी चम्पारण, बिहार ८४५३०५
मोबाइल :- 09430906202
भोजपुरी एवं हिंदी भाषाओं में नियमित लिखत रहीले. एगो भोजपुरी खण्ड काव्य ‘रमबोला’ आ एगो बालगीत संग्रह ‘प्यारे-गीत हमारे गीत’ प्रकाशित हो चुकल बा.

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