भोजपुरी पंचायत पत्रिका के बहाने भोजपुरी प्रकाशन पर चिन्तन

भोजपुरी स्वाभिमान के प्रतीक मासिक पत्रिका “भोजपुरी पंचायत” के अक्टूबर अंक के अगर राज ठाकरे पर केन्द्रित कहल जाव त बेजाँय ना कहाई. महाराष्ट्र केहु के बपौती ना ह, माफ करब असल मथैला ह “किसी की बपौती नहीं मुबंई” आ लेख हिन्दीए में बा, लेख आ अउरिओ ढेरहन सामग्री महाराष्ट्रे विवाद पर केन्द्रित बा.

एह पत्रिका के हर अंक हमरा के सोचे पर मजबूर कर देला कि का आगे चल के भोजपुरी के नियति इहे होखे वाला बा कि भोजपुरी के बात भोजपुरी छोड़ के हिन्दीए में कइल जाई? एह मुद्दा पर कवनो विरोध करे के जरूरत ना होखे के चाहीं काहे कि पत्रिका घोषित रूप से हिन्दी के पत्रिका हिय. अन्तर अतने बा कि एकरा प्रकाशन संपादन में भोजपुरी के खासमखास लोग शामिल बा. अब चाहे ऊ भोजपुरिया गुरू मनोज श्रीवास्तव होखी, मनोज भावुक होखीं, प्रभाकर पान्डेय, डा॰ रमाशंकर श्रीवास्तव भा खुद कुलदीप श्रीवास्तव होखसु. सभे लोग भोजपुरी ला समर्पित आ भोजपुरी में काम करे में आपन पहचान बना चुकल बा. एहमें से केहु के भोजपुरी प्रेम पर सवाल ना उठावल जा सके काहे कि ई लोग कवनो दिने भोजपुरी में काम करे वाला लोगन में अगुआ मानल जा सकेला. सवाल उठत बा कि अइसन कवन कारण बा कि भोजपुरी के कवनो पत्रिका एह तरह नियमित ना हो सकल, कुछ दिन ले निकलल फेर ओकरा के जम्हुआ छू दिहलसि?

एक बात त साफ लउकत बा कि पत्रिका का पीछे बड़हन हाथ बा जे चलते धन के कमी कतहीं नइखे झलकत. पत्रिका सुन्दर ढंग से साफ सुथर तरीका से समय पर प्रकाशित हो रहल बिया. बाकिर का खालिस भोजपुरी में अइसन कवनो पत्रिका प्रकाशन करे वाला हाथ ना मिल सके? जइसे कि भोजपुरिया गुरु मनोज श्रीवास्तव के पत्रिका भोजपुरी संसार आ बलिया से प्रकाशित होखे वाली पत्रिका पाती के अगर अइसन संरक्षक मिल जासु त सोना में सोहागा वाला बात होखी. पाती त देर सबेर त्रैमासिक रूप से छपत रहत बा, भोजपुरी संसार पत्रिका का बारे में ढेर दिन से कवनो जानकारी नइखे मिल पावत.

एक बात जवन हम महसूस कइले बानी तवन ई बा कि पत्रिका के प्रकाशक संपादक आ पत्रिका के संरक्षक का बीच जबले बढ़िया समन्वय ना बनी तबले कवनो पत्रिका ढेर दिन ले ना निकालल जा सकी. संरक्षक के आपन हित होला आ संपादक के आपन विचार. एह हित आ विचार का बीच के राह निकालल जरूरी बा.

तबले रउरा “भोजपुरी पंचायत के अक्टूबर अंक” के आनन्द लीं.

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5 Comments

  1. संपादकजी, संभव होखे त अँजोरिया पर इ जानकारी दीं (भोजपुरी में निकलेवाली पत्रिकन की बारे में) की भोजपुरी संसार, भोजपुरी जिनगी, पाती, द संडे इंडियन भोजपुरी अउर भी अगर कवनो पतरिका बानी सन…ओ कुल की बारे में …ओ पत्रिकन के संरक्षक, संपादक से बात करीं की भोजपुरी की पत्रिका निकलले में ओ सब की सामने मूल समस्या का बा…पाठक के समस्या बा कि आर्थिक की कुछ अउर।। ओ लोगन के विचार इहाँ अइले की बाद सायद कुछ लोग ए बारे में सोंचले पर मजबूर होई….काँहे की हमरा लागता की कुछ भोजपुरी पत्रिकन के जवन मंडल बा (संपादक मंडल आदि) ओमें जुड़ल लोग नाम खातिर त ओमे बा पर उ कवनो विशेष सहयोग नइखे लोग करत…..हमरी खेयाल से पत्रिका निकलले में ओइसन आदमी के मंडल में राखे के चाहीं जे तन्मयता से लागल रहो…ओकर आपन काम समझो..पत्रिका अच्छा होई त पाठकन के प्रतिसाद जरूर मिली..खाली संपादक मंडल में देखावे खातिर कथित (हम फेन से अझुरातानी कुछ लोगन से..हा हा हा हा) मानल-जानल भोजपुरियन के नाव डाल देहले से पतरिका थोड़े चली…मेहनती लोगन के जोड़ी…जे सही माने में राउर सहायता क सके।..जय भोजपुरी।।।

    • प्रिय प्रभाकर जी,
      राउर निर्देश सिर माथे. कोशिश करब कि जल्दी से जल्दी एह तरह के जानकारी जुटा पाईं. बाकिर एहमें कुछ समय लाग सकेला. अउरियो पाठक लोग से एह दिसाईं सहयोग के आशा रही.
      आपके,
      ओम

  2. संपादकजी, सादर नमस्कार।

    रउरी दिल के पीरा हम समझ सकेनी। जे केहू भी, जहाँ भी होई अगर भोजपुरी ओकर माई बिया त ओकरी दिल में इ बात जरूर आई की आखिर काहें भोजपुरी में कवनो पत्रिका आदि के नियमित परकासन नइखे हो पावत। इहां रउरी बतावल हर एक बात से हम सहमत बानी अउर राउर लेख पढ़ले की बाद हमार घाव भेन से हरिहरा गइल बा। भोजपुरी के दिसा त ठीक लउकता पर दसा ठीक नइके लागत…काहें की भोजपुरी के आवाज बुलंद करेवाला में बहुत सारा धनिक-मानिक लोग बा..पर हमरी समझ में अबहिन ले इ नइखे आवत की हाँ ना इ लोग भोजपुरी में कवनो पत्रिका निकलले की पक्ष में बा लोग चाहें भोजपुरी में निकले वाली पत्रिकन के ही आर्थिक मदद क के ओके नियमित बनवले के परयास करता लोग।। हम बहुत पहिलहीं से कहि रहल बानी की भोजपुरी के अउर समृद्ध बनवले के ताक बा…ए में अधिकाधिक पतरीका, पेपर, किताब, आदि निकलले के ताक बा…जेतना लोग एकरी मान्यता के ले के परेसान बा ओकरी आधा अगर एकर दसा सुधरले में रहित त ए कल्यान निश्चित हो जाइत…खैर ..देखीं कुछ समाधान त निकलबे करी…खैर..भोजपुरी में पत्रिका निकाले वाला एक आदमी के हम अपनी औकात की अनुसार 5 सौ रूपया महीना दे सकेनीं काहें की हम पइसा की मामला में हम अपनी औकातेभर क पाइबि…दूसरी बात भोजपुरी पंचायत के हिंदी में निकलले की पीछे इ मंसा बा की भोजपुरी के बात-विचार, ओसे जुड़ल समस्या, संस्कृति आदि अभोजपुरी लोगन के भी पता चलो…अब भोजपुरी में लिखल 2-3गो लेख देबे के पहल भी पत्रिका कइले बिया…..खैर पर कहीं न कहीं इहो बात बटले बा कि भोजपुरी की पत्रिकन के आर्थिक मदद भी मिलल मुस्किल बा…ए हु वजह से भोजपुरी के बात हिंदी में कहल जाता। ……भोजपुरी पंचायत हिंदी में निकलतिया…इ अच्छा बा..पर भोजपुरी में भी कवनो समसामयिक, साहित्यिक, चिंतक पतरिका निकले के चाहीं…अउर ए में भोजपुरी से जुड़ल संस्थानन के आगे आवें के चाहीं…जय भोजपुरी।।

    • प्रिय प्रभाकर जी,

      भोजपुरी ला समर्पित एगो सक्षम संस्थान बनावे के सपना ढेर दिन से मन में पोसले बानीं. बस रउरा जइसन दस बीस जने अउर मिल जाँय त एगो सार्थक प्रयास के सुरुआत हो सकेला. बस तनी धीरज धइले राखे आ एह सपना के जिअवले राखे के जरूरत बा.
      राउर,
      ओम

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