– डा॰ प्रकाश उदय

PrakashUday
भाषा-विज्ञान में जवना के भाषा कहल जाला, तवना में, जवन कहे के होला, जतना आ जइसे, तवन कहा पाइत ततना आ तइसे, त केहू के ‘आने कि’, ‘माने कि’, ‘बूझि जा जे’ भा ‘जानि जाईं जे’ काहे के कहे के परित? काहे के कबो कविता, कबो कहनी, कबो कुछ, कबो कुछ में अपना भाषा के कबो ताने-नवावे, कबो धिरावे-नचावे के परित? काहे के उरेहे परित चित्र, गढ़े परित मूरत, काहे के गोपी लोग के ‘बैननि’ से ‘नैकु’ कहला का बादो ‘अनेकु’ कहे के परित ‘नैननि’ से आ रहल-सहल सब कुछ अपना हिलल-हिया -हिचकीनि- से!

आ जवन कहल जा सकेला, जतना आ जइसे, तवन लिखल जा सकित, ततना आ तइसे, आ लिखलका के पढ़ल जा सकित, ओतना आ ओइसे, त आज मूर्धन्य ‘ष’ के उचार अलोपित ना हो गइल रहित. आ सोचीं, कतना मजा आइत, जब लता जी के गावल गीत अपना लिखइला का बाद पढ़ाइत त उनुके आवाज में पढ़ाइत, ओही लय-लोच के साथे! बाकी कइल का जाव, मनवा से त अक्सर लते जी के लय उठेला, कंठवा से फूटेला त लयवा निकहा लतहरइला लेखा लागे लागेला.

अब ई बात दोसर बा कि कवनो-कवनो अइसनो हालत होला जवना में कह के ना कहाय, लिख के कहा जाला. ईहो बात दोसर बा कि कहलका उड़ जाला, लिखलका अड़ जाला. कि लिखतंग का आगे बकतंग काम ना करे. ईहो कि कहले जीभ ना धराय, लिखले हाथ धरा जाला.

‘आने कि माने’ अतने, कि सभ चहलका कहा ना पावे, सभ कहलका लिखा ना पावे, सभ लिखलका पढ़ा ना पावे. खलिसा ईहे कि चहला से कम कहाला, कहला से कम लिखाला, लिखला से कम पढ़ाला. ईहो कि कबो-कबो चहला से अधिका कहा जाला, कहला से अधिक लिखा जाला, लिखला से अधिक पढ़ा जाला.

अब ई दुख होखे चाहे सुख, दुनिया के कुल्हि भाषा के साथ बा जइसे, तइसे भोजपुरियो के साथे बा. भोजपुरी के साथे अलगा से का बा? जवन बा, तवन, जरूरी त नइखे कि खलिसा भोजपुरिए के साथे होखे, देश-दुनिया के दोसरो कवनो भाषा के साथे हो सकेला. अब ई त ना कहल जा सके कि दुनिया में भोजपुरिए एगो अइसन भाषा बा जवन बात-व्यवहार में अतना बा कि लिखा-पढ़ी में कम बा. ईहाँ एह बात के तनी बिलम के दोहरिया लेबे के काम बा. भोजपुरी लिखा-पढ़ी में कम बा त एसे ना कि लिखा-पढ़ी में कम बा, एसे कि बात-व्यवहार में जादे बा. आ जादे बा त जादे जन आ जादे जगह, दूनों में जादे बा.

अतना जादे जगहन में, अतना जदे लोगन में अतना जादे कहात-सुनात भोजपुरी में जतना लिखाइल-पढ़ाइल बा, जतना लिखात-पढ़ात बा, तवन कम लागत बा, त लागते नइखे खलिसा, बड़लो बा. ना त, भोजपुरी साहित्य में जवन लिखित-लिखात बा तवना में आजो, पाठमूलक उपन्यास-कहानी के तुलना में श्रुतिमूलक कविता आ ओहू में गीतन के गमक सबसे अगवढ़ आ बढ़-चढ़ के ना आइत.

भोजपुरी में लिखे-पढ़े के जवन कठिनाई बा तवना के भोजपुरी में लिखाय-पढ़ाय के एह कमी से जोड़ के देखल जा सकेला. ई एगो मुँहे लागल, काने सटल भाषा के हाथै लगावे, आखे सटावे में आवे वाला कठिनाई ह – आ एकर कवनो काट बा त इहे आ अतने बा कि एकरा लिखाय-पढ़ाय के कमी के कम कइल जाय. दूगो बात केतरी नी गँठिया लेबे लायक बा. एक त ई कि लिखे-पढ़े में कठिनाई के चलते, लिखाय-पढ़ाय में कमी नइखे, लिखाय-पढ़ाय में कमी के चलते लिखे-पढ़े में कठिनाई बा आ दोसर ई कि लिखहीं लायक लिखल जाई, तबहीं पढ़े लायक पढ़ा पाई.

त, भोजपुरी में लिखा-पढ़ी के कठनाई जब बाद के बात बा, ‘कमी’ ओकरा पहिले के बात बा, त चाहीं त ईहे कि पहिलके बतिया प पहिले बतिया लेहल जाय, एह ‘कमी’ के ‘काहे’ में ना बहुत, त थोर-बहुत त चलिए लिहल जाय. असल में, भोजपुरियन के जोर जतना अपन कहला प रहल बा ओतना अपना आ अपने भाषा में कहला प नइखे रहल. असहीं ना भोजपुरी-भूगोल के कतने कवि ब्रजभाषा के भोजपुरी भइला प भाषा वैज्ञानिक लोग के केतने किन्तु-परन्तु लगावे के मोका मिल जाला. अब एकरा के बमड़ई कहे केहू, भा बड़पनई – भोजपुरियन के भरोसा ‘भाव अनूठो’ प रहल बा, ‘भाषा कोउ होय’. ओकरा हमेशा से एगो बड़ जमात में रहे के आदत रहल बा, अकसरुआ भइला के कवनो सजाय से कम नइखे मनले ऊ. भारत से बहरियो, जइसे मारीशस में, भोजपुरी भाषीय के सबसे बड़ जमात, अपना जमात के कुछ अवरु पसारे खातिर क्रियोल अपना लेलस आ अइसे कि भोजपुरी लागल बिसरे. परदेस कमाये गइला प दोसर भाषा-भाषी लोग जले भकुआइल रहेला तले त भोजपुरिया भाई लोग ओह परदेस के भाषा मे ढुक के भितरे से बतियावे लागेला. अब ई बात दोसर बा कि आपन भोजपुरी छोड़वले ना छूटे, आ भाई जी लोग चाहे अंग्रेजी बूके चाहे अरबी, हाँ अक्सर त मुँह बावते चिन्हा जाला कि कहाँ से चल के इहाँ चहुँपल बा लोग.

असहीं, जब राष्ट्रभाषा के रुप मे हिन्दी के बात आइल त भोजपुरिया लोग ओकरा के अइसे अपनावल, अतना अगरा के, अपना भोजपुरी के भइला अतना बिसरा के, कि ईहो बिसर गइल कि हिन्दी ओह लोग के मातृभाषा ना ह, ओकरा के सीखे के होला. आ हिन्दिए ना, कवनो दूसरकी भाषा के सीखे के एके, इकलौता जरिया ह पहिलकी भाषा, मातृभाषा. एह बिसरला से, हो सकेला कि सु-फरलो होखे, बाकिर कु-फरल जादे. ई कु-फरलका हिन्दियो के खाता में गइल, भोजपुरियो के. हिन्दी के खाता में एहू तरे कि ओकर एगो राष्ट्रीय के बजाय प्रादेशिक छवि बन गइल, भोजपुरी के खाता में एहू तरे कि ओकरा अपना लिखाय-पढ़ाय के लते ना लागे पावल. आ आज जब हिन्दी के देशभाषिक पहचान देवे खातिर भोजपुरी के ओकरा से अलगा एगो आपन साहित्य-संपन्न पहचान के पुनरुपरावे के उपाय कइल जाता त अनेक में से एक कठिनाई भोजपुरी के लिखाय-बँचाय के लेके बा.

का कइल जाय, लिखे-पढ़े के जवन मोसल्लम अभ्यास बनल भोजपुरियन के, तवन हिन्दी के साथे. तवना हिन्दी के साथे जवन साहित्य-भाषा बनल मुद्रणोत्त्र का जमाना में, ओकरा चाल से चाल, ताल से ताल मिलावत. अब भोजपुरी का करो, अपना स्वरुआ सुभाव से चल के ‘तें चल्’ लिखो कि हिन्दी के व्यंजनुआ सुभाव के बले ‘तू चलऽ’? भोजपुरी में त ‘चल’ आ ‘चलऽ’ के अलावा ‘चलि’ आ ‘चलु’ खातिरो जगहा बा. ‘फलनवा चलि गइले’ खातिरो जगहा बा आ ‘चलु चिलनवा, तोरा के देख लेब’ खातिरो. बनारस ओर आके त भोजपुरी एकरा साथे एगो ‘चला’ अवरु जोड़ देला आ चाहेला कि एह ‘चला’ के आ हिन्दी के ‘चला’ के (जइसे ‘वह चला’) के ‘आ’ अतहत मत पढ़ल जाय. मुश्किल ई बा कि बरियात में ‘घोड़ा चली’, ‘हाथी चली’ के जवन ‘चली’ बा, ओह चली में जवन ‘ली’ बा, ओह ‘ली’ में जवन ‘ई’ बा, तवना के तनी अवरु बढ़ा के, तनी अउरु दिर्घिया के अगर ई कहीं कि ‘अब तू त चली जा’ त मतलब होई कि ‘अब तू त चलिये जा’, ‘अब तुम तो चले ही जाओ’. अब सोचीं कि ऊ दीर्घ से तनी कम दीर्घ पढ़ल जाय, भा अइसे लिखल जाय कि ऊ दीर्घ से तनी जादे दीर्घ पढ़ल जाय. एकर एक उपाय त ई बा कि कुछ संकेत बना लेहल जाय, ऊपर-नीचे कुछ खड़ी-पड़ी रेखा लगावे जइसन. बकिर ई कुल्ह चले वाला नइखे. सरलता से जटिलता के तरफ चलल ना आसान बा ना उचिते बा. उहो ओह जुग में जवन वर्णमाला से बहरिआव खातिर छटपटात बुझाता, जवन उकार-इकार तक लगावे के झंझट से बाँचत रोमन में एसमेसियावत बा! ह्रस्व ‘ए’ आ ह्रस्व ‘ओ’ वाला संकट हिन्दियो के साथे बा, आ एह संकट से बचे के पढ़निहार लोग खातिर कुछ नियम-कानून बनावल जा सकेला. आचार्य विश्वनाथ सिंह अपना ‘मानक भोजपुरी वर्तनी’ में कुछ बतलवलहूँ बाड़े. लिखे में कुछ लोग कुछ प्रयोग अपनी तरफ से चलावल, जइसे ‘चलऽ’ लिखे खातिर विकारी के बदले ‘अ’ लिख के चलअ, ई ना चलल. कुछ लोग पढ़निहारन प तनी जादहीं भरोसा क के खाली च आ ल लिख के छोड़ देहल, लोग जरुरत के मुताबिक ‘चल’ पढ़ लेवे चाहे ‘चलऽ’. एक उपाय त ई हो सकेला कि ‘चलऽ’ लिखे खातिर ‘च’ आ ‘ल’ के एके माथे, एके शिरोरेखा में ना लिखके, फरके-फरके लिख देहल जाय – च ल. बाकिर अइसे छितरइला प लिखनिहार-पढ़निहार दूनो छितराये लगिहें. अइसना में पंच बीचे के राहें चलल ठीक मनिहें. हिन्दी में ‘चल’ लिखाला त ‘ल’ के ‘अ’ ना पढ़ाय त हिन्दिए के साथ पढ़े के अभ्यास में आइल भोजपुरिया पढ़वइया से ई उमेद राखल कि ऊ ‘ल’ के ‘अ’ के साथे पढ़ी, ठीक ना होई, आ ठीक ना होई एह उमेद का साथे ‘ल’ में हल के निशान लगावल. व्यंजनान्त खातिर हल लगवला से जादे व्यावहारिक होई अ-स्वरान्त खातिर विकारी लगावल. ‘चलऽ’ से काशिका वाला ‘चला’ के कामो सँपर जाई.

अब जब ‘चल’ के साथे चलिये देले बानी जा त चलीं, कुछ दूर अवरु चलल जाय, आ चल के पहुँचल जाय ‘चलऽता’ तक. एह ‘चलऽता’ के ‘ल’ के बाद विकारी ना लगावे के परित, अगर हिन्दी के ‘चलता है’ के ‘चल्ता है’ पढ़े के लत ना लागल रहित. एह लत का चलते हालत ई बा कि ‘नासऽता’ के ‘नासता’ लिखला प ‘नास्ता’ पढ़ात देरी ना लागी. ओइसे ‘चलऽता’, ‘घूमऽता’ जइसन शब्दन में विकारी लगावे से बाँचे खातिर, आ भरसक बाँचही के चाहीं, एगो व्यावहारिक उपाय ई बा कि ‘चलत बा’, ‘घूमत बा’ लिखल जाय. एहू से कि धीरे धीरे कुछ लोग खातिर विकारी लगावल भोजपुरी में लिखला के चिन्हासी बन गइल बा आ ऊ लोग ‘ल’, ‘द’, ‘त’, ‘प’, ‘हँ’ जइसन एकाखरियो शब्दन प अद-बद के विकारी लगा देला – तू दऽ, तू लऽ, पेड़ पऽ…. . द-ल के केहू दऽ-लऽ लिखे, तवना से बढ़िया बा कि कुछ भोजपुरी क्षेत्रन मे प्रचलित द्या भा देउ-लेउ भा देव-लेव लिखाय. भोजपुरी लिखनिहार पढ़निहार लोगन के भोजपुरी के अलग-अलग इलाका में चले वाला अलग-अलग शब्द-रुपन के जानकारी रखला से लिखे-बाँचे के कठिनाई के पार करे में कुछ सहूलियत जरूर होई. ई जानत रहला प कि ‘जाइब’ छपरा में ‘जाएब’ हो जाला, कहीं-कहीं ‘जाएम’ आ काशी में ‘जाब’, कि ‘गइलीं’ भा ‘गइनीं’ बलिया में ‘गउईं’ हो जाला – अवरू ना त तुक-ओक मिलावे के कामे त अइबे करी. देवरिया देने कुछ संज्ञा शब्दन के स्वरान्त राखल जाला ह्रस्व एकार लगा के. ‘बापे के बात माने के चाहीं’, माने बाप के बात माने के चाहीं. एही एकार के तनी भ दीर्घ क लीं त ‘बापे के बात माने के चाहीं’ माने ‘ बाप की ही बात माननी चाहिए’.

ई कुल्ह जानकारी लिखल-पढ़ल के ओतना कठिन ना रहे दी, बाकिर ई कुल्ह जानकारी लिखले-पढ़ले से होई. आ ई मान के चले के परी कि हिन्दी के साथे हमनी के जतना आगे आ गइल बानी जा ओकरा से पाछा हट के अपना समस्या के सझुराईं जा, अइसन कइला से अझुरहटे जादे होई. हिन्दी के भोजपुरिहा लोग बड़ा खुला मन से बहुत कुछ देले बा आ ओतने खुला मन से ओ लोग के लेबहूँ के पड़ी, गुमाने गुमसइला के जरुरत नइखे. हर तत्सम के फोर-फार के तद्भव बना देला में कवनो बहादुरी नइखे, बलाते ‘ही’ ‘भी’ मत लिखल जाय बाकिर जरुरत परला प इन्हनियो के लिख मारे से बाज मत आवल जाय. एह सिलसिला से एहू बात के जोड़े के चाहीं कि भोजपुरी में लिखा-पढ़ी के कमाये खातिर अरकच-बथुआ-अँउजा-पथार पत लिखाय लागे, लुगरी गँथले केहू बजाज ना बनी. ईहो ना कि आज से छींकबो करब त भोजपुरिए में! जवन भोजपुरिए में सुबहित-सोगहग लिखा सकेला, तवने भोजपुरी में लिखाय, त ओकरा के पढ़हीं के पड़ी, ओकरा के लिखे खातिर लिखनिहार लिखे के कुल्हि कठिनाई पार क लीहें, ओकरा के पढ़े खातिर पढ़निहार पढ़े के कुल्हि कठिनाई के पार क लीहें.

भोजपुरी-भाषी लोग के एह कुल्हि कठिनाई से पार पावे खातिर ई इयाद राखे के परी कि ऊ लोग दू भाषी ह, आ एह दुभाषीपन के सधले रहे के होई. आज जवन भोजपुरी लिखे-बाँचे के कठिनाई बा तवन एसे ना कि ऊ लोग हिन्दी अपना लेहल, एसे बा कि ऊ लोग भोजपुरी बिसरा देहल. एकरा चलते ऊ लोग ना भोजपुरिए के रहल, ना हिन्दिएके भइल. अब अगर भोजपुरी के इयाद करे के फेरा में ऊ लोग हिन्दी बिसारे लागी त जवनो बा तवनो चल जाई. जरुरी बा कि दूनो चप्पू चले. आ बराबर चले. नाय एकअल्गी मत होखे. कबो एने ओलार, कबो ओने ओलार के हाल मत होखे. संतुलन बनल रही त ईहो मिल जाई, ओने के कठिनाई के काट एने मिल जाई.

ई कुल्हि बात भोजपुरी लिखे-बाँचे के कठिनाई आ काट प बतियावे के भूमिका भर. पैंतरा भर रहल हा. असल बात, आ सिलसिलेवार, अभी बाकी बा. बात के बकिए रहला के मोल ह.


हिन्दी विभाग, श्री बलदेव पी॰जी॰ कालेज, बड़ागाँव, वाराणसी.


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