paati78cover

– स्व. आचार्य विश्वनाथ सिंह

(ई दस्तावेजी आलेख एह खातिर दिहल जाता कि भोजपुरी लिखे-पढे़े में लोगन के सहायक-होखो)

भोजपुरी भाषा में उच्च कोटि के साहित्य-रचने करे खातिर ना, ओकर सामान्य रूप से पठन-पाठन करे खातिर आ ओकरा के कलम के भाषा बनावहू खातिर ओकर मानक वर्तनी के निर्धारण आवश्यक बा.

अगर लेखक लोग शब्दन के अपना-अपना ढंग से, आ कबो-कबो बिना ढंगो के, लिखत रही त भाषा का क्षेत्र में भारी अराजकता होई. मानक वर्तनी का अभाव में ईहे होत रही कि ‘लोढ़ा’ लिख दिआई आ ‘पत्थर’ पढ़ लिआई. भाषा का विकास खातिर अइसन स्थिति बहुते अवांछनीय बा.

भोजपुरी बहुत विशाल क्षेत्र में बोलल जाला. बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश आ नेपाल का तराई के बहुत बड़ भूभाग में एकर विस्तार बा. भोजपुरीभाषी क्षेत्र का बाहरो बिहार का राजधानी पटना में, राँची, जमशेदपुर, बोकारो अइसन औद्योगिक नगरन में, आ कलकत्ता, दिल्ली, बम्बई अइसन महानगरन में भोजपुरीभाषी लोगन के बड़ संख्या निवास करेला. भारत का अलावे मारिशस, फीजी, ट्रिनिडाड, सूरीनाम अइसन देशनो में भोजपुरी बोलल जाला आ लोक-व्यवहार के प्रधान भाषा का रूप में ओकर प्रतिष्ठा बा. संसार में भोजपुरीभाषियन के संख्या आठ करोड़ (अब करीब 20 करोड़) बतावल जाला. अइसन व्यापक भाषा में शब्द-रूप के विभिन्नता भइल स्वाभाविक बा आ एह विभिन्नता में शब्द का मानक रूप के निर्धारण आसान नइखे. वाचिक भाषा के प्रवाह नियमन में बान्हल ना जा सके. अधिका से अधिका ई हो सकेला कि ओकरा लिखित रूप के नियमित कइल जाव जेहसे व्याकरण आ कोश के प्रमाणिक स्वरूप बन सके. भाषा के ठीक ढंग से पठन-पाठन होय आ साहित्य-रचना अउर शास्त्र-निर्माण खातिर भाषा के एगो वैज्ञानिक, सर्वसम्मत रूप उपलब्ध हो जाय. एकरा खातिर सबसे पहिले भोजपुरी के मानक वर्तनी निर्धारित कइल जरूरी बा. एकरा बिना भाषा के विकास ना हो सके. वर्तनी के एकरूपता भाषा का वैज्ञानिक भइला के पहिला लक्षण हऽ.

भाषा में वर्णात्मक ध्वनियन के सार्थक प्रयोग होला. ओह ध्वनियन के वर्णमाला का अक्षरन में उतारल वर्तनी के काम ह. लिपि अक्षरन के पोशाक ह. वर्तनी के उपादान ह वर्णमाला. एहसे वर्णमाला का पूर्णता-अपूर्णता अथवा वैज्ञानिकता-अवैज्ञानिकता पर वर्तनी के स्वरूप निर्भर करेला. भोजपुरी भाषा में संस्कृत-वर्णमाला आ नागरी लिपि के व्यवहार कइल जाला – जइसे हिन्दी में होला. संस्कृत-वर्णमाला संसार के सबसे वैज्ञानिक वर्णमाला ह काहे कि ओहमें एक ध्वनि खातिर एकेगो वर्ण बा आ कवनो दोसरा वर्णमाला से ओमें वर्ण-संख्या जादे बा. संस्कृत में वर्तनी के विविधता कहीं-कहीं मिलेला (जइसे-अवनि-अवनी, पृथ्वी-पृथिवी, नारिकेर-नारिकेल), लेकिन ई मूलतः शब्द का मानकीकरण के समस्या ह.

सन्धि का प्रसंग में जरूर वर्तनी के अनेकरूपता संस्कृत में देखल जाला, जेकर कारण ई हो सकेला कि सन्धि का वर्ण-विकार के उच्चारण लोग भिन्न-भिन्न ढंग से करेला (जइसे-वाक़् हरिः त्र वाग्हरि: आ वाग्घरि:; तत् हविः त्र तद्हविः आ तद्धविः). लेकिन वर्तनी का एह छूट से अर्थबोध में कवनो कठिनाई ना होखे, अउर अइसन उदाहरणो सीमित संख्या में बाड़न स. सबसे बड़ बात ई बा कि संस्कृत में वर्णमाला के वैज्ञानिकता का कारण वर्तनी उच्चारण का अनुसार निर्धारित होला, अर्थ का अनुसार या व्युत्पत्ति का अनुसार ना. ई विशेषता हिन्दी, भोजपुरी आ ओह सब भषन में बा जेकर वर्णमाला संस्कृत से लिहल गइल बा. उर्दू आ अँगरेजी में वर्तनी के समस्या जटिल बा. उहाँ वर्णमाला के अवैज्ञानिकता का चलते शब्दन के वर्तनी रटके चाहे मन में बइठाके याद राखे के पड़ेला. उर्दू में ‘स’ ध्वनि खातिर एगो अक्षर बा-से, आ दोसर बा-सीन, आ तीसर बा-साद. साबित लिखे के होई त से; सबक, सरकार आ सल्तनत लिखे के होई त सीन; आ सन्दल, सब्र आ सन्दूक लिखे के होई त साद के प्रयोग होई. ताला में ते लागी, आ तलब, तरीका आ तोता में तो. एगो तबीयत लिखी त पहिलका त खातिर तो आ दोसरका खातिर से आई. ओइसहीं ज ध्वनि चार तरह से लिखल जाई. हजार लिखाई जे से; जात आ जैल लिखाई जाल से; जमानत आ हाजिर लिखाई जाद से; आ नाजिर लिखाई जो से.

अँगरेजी में वर्तनी के समस्या अउर विकट बा. उहाँ एगो क ध्वनि चार तरह से लिखाला. कैट (cat) c से, कोरस (chorus) ch से, काइट (kite) k से, आ कोरम (quoram) qu से. ईहे ना, ओही सी (c) के प्रयोग कहीं ‘स’ खातिर एस (s) के प्रयोग होई. फेन, ओही सी-एच (ch) से च से मिलत-जुलत ध्वनि लिखाई-जइसे चान्स (chance) में, आ ओकरे से ‘श’ ध्वनिओ लिखल जाई-जइसे शोफर (बींनििमनत) में, जब कि श खातिर सामान्य रूप से एस-एच (sh) के प्रयोग होला. बाकी अँगरेजी-वर्तनी में सामान्य रूप से कहाँ होला कुछ! ओही श खातिर कबो सी-आइ-ओ-यू (ciou) होई – जइसे प्रेशस (precious) में, त कबो एकदम से टी-आइ-ओ हो जाई- जइसे नेशन (nation) में. डोर (door), पुअर (poor) आ पूल (pool) में क्रमशः ओ, उअ आ ऊ ध्वनियन खातिर समान वर्तनी-विधान बा. पुट (put) का उ आ बट (but) का अ खातिर एकेगो यू (u) के प्रयोग होला.

एह तरह से अँगरेजी में एक ध्वनि खातिर अनेक अक्षर अलगा-अलगा भा एके साथे, आ अनेक ध्वनियन खातिर एक अक्षर भा अक्षर-समूह- ई दूनों ढंग के विचित्रता बा. आ एह दूनों का ऊपर सबसे बड़ अद्भुत बात ई बा कि उहाँ अक्षर कबो-कबो मौन हो जालन स, याने उन्हनीके लिखल त जाला बाकी उच्चारण ना कइल जाय; जइसे नॉलेज (knowledge) में के (k), न्यूमोनिया में पी (p), थाइसिस (phthysis) में पी-एच (ph). साइकॉलोजी (psychology) के हिज्जे पिसाइ-का-लोगी मशहूर बा. मतलब ई कि अँगरेजी में शब्दन के सुनके उन्हनी के शुद्ध-शुद्ध लिखल तबे सम्भव होला जब उन्हनीका लिखित रूप के पहिले से जानकारी होखे आ हर शब्द के वर्तनी ठीक-ठीक याद होखे. शब्द का लिखित रूप से ओकर उच्चारण स्पष्ट ना भइला से अँगरेजी-शब्दकोश में हर शब्द के उच्चारण ध्वनिलिपि में लिखल जाला. हिन्दी-संस्कृत में, चाहे भोजपुरिओ में, अइसन अटपटाह जरूरत ना पडे़. ईहे ना, अँगरेजी के बड़-से-बड़ विद्वान आ भाषाशास्त्री एक उच्चारणवाला भिन्नार्थक शब्दन के सुनके तब ले ना लिख सके जब ले ओकरा प्रसंग आदि से अर्थ के जानकारी ना हो जाय. राइट के उच्चारण सुनके बिना अर्थ जनले कोई ई ना तय कर सके कि ऊ कइसे लिखाई – right (=सही, अधिकार) कि rite (= धार्मिक क्रिया) कि write (= लिखे के क्रिया) कि wright (= बनावेवाला).

अइसन सैकड़न उदाहरण मिलिहन स. अँगरेजी के विद्वान एह बात के स्वीकार करेलन कि ओकरा वर्तनी में अनियमितता आ भ्रामकता बा. ओकर विकास अनियमित ढंग से भइल बा आ ओकर कवनो सुसंगत प्रणाली नइखे स्थापित हो सकल 1 . अँगरेजी में शब्दन के वर्तनी याद करे खातिर रटे के, बार-बार लिखके अभ्यास करे के आ मन में बइठावे के तरीका बतावल जाला. तबो अइसन होला कि बड़का-बड़का भाषाशास्त्री लिखत खानी कवनो-कवनो शब्द के वर्तनी का बारे में भ्रम में पड़ जालन आ शब्दकोश देखेलन. गुड इंग्लिश (Good English), बेटर इंग्लिश (Better English) आ द बेस्ट इंग्लिश (The Best English) अइसन भाषा-विषयक पुस्तकन के विद्वान लेखक जी.एच. वैलिन्स साफ स्वीकार कइले बा कि हमरा आज ले डेयरी (dairy = दुग्धशाला) आ डायरी (diary) में वर्तनी के भ्रम हो जाला 2.

संस्कृत आ हिन्दी में शब्दन के वर्तनी रटे के कवनो जरूरत ना पड़े. इहाँ शब्द के उच्चारण सुनके ओकराके लिखे में आ लिखल शब्द के सही रूप में पढ़ देवे में सामान्य साक्षरता से बेसी भाषाज्ञान के जरूरत नइखे आ ओह शब्द का अर्थ-ज्ञान के त एकदमे जरूरत नइखे.

1. English spelling is irregular and confusing. It developed haphazardly and became fixed before a reasonably consistent system had established itself.
(Hans P.k~ Guth: Words and Ideas, Chapter 12, pp 281.)

2. I myself always hesitate between dairy and dairy.
G.H.k~ Vallins : Better English, Chapter VII, pp 109.

हिन्दी आ भोजपुरी में वर्तनी के समस्या प्रायः समान कारणन से पैदा होला. कुछ मुख्य कारण निम्नलिखित बाड़न स –

(i) ध्वनि-परिवर्तन का अनिवार्य ऐतिहासिक प्रक्रिया में संस्कृत का कइएगो ध्वनियन के उच्चारण अब मूल रूप में नइखे हो पावत (जइसे-ऋ,ष, ज्ञ) बाकी उन्हनी से बनल तत्सम शब्द हिन्दी में चलऽ ताड़न स आ भोजपुरी में भी उन्हनीके ग्रहण कइल जरूरी बा; जइसे-ऋषि, ज्ञान. एहसे उच्चारण आ वर्तनी में भेद हो जाता.

(ii) ध्वनि-परिवर्तन का क्रम में हिन्दी आ भोजपुरी में कुछ अइसन ध्वनियन के प्रयोग होता जे संस्कृत में ना रही स बाकी प्राकृत आ अपभ्रंश में जेकर आविर्भाव हो गइल रहे (जइसे ह्नृस्व ए, ह्नस्व ओ; म्ह, न्ह के मिश्र व्यंजन के ध्वनि), आ ओह परम्परा से अउर उन्यत्त से भी हिन्दी ओ भोजपुरी में इन्हनीके आगमन भइल (जइसे-घेराव, तेलचट्टा, ओसारा, कोइरी, सम्हाल या सम्हार, कान्हा). वर्णमाला में वर्तमान व्यवस्था का अनुसार इन्हनीके जवन वर्तनी बा ओहसे इन्हनी के सही उच्चारण ना हो पाई (जइसे-तेलचट्टा में से के उच्चारण खेल का खे अइसन; कोइरी में को के उच्चारण कोदो का को अइसन; सम्हार आ कान्हा में म्ह आ न् हके उच्चारण सम्भार में प्रयुक्त संयुक्त व्यंजन म्भ अइसन हो जाई).

(iii) हिन्दी में विदेशीय भषन से आइल कुछ ध्वनियन के तत्सम रूप में भी बोले आ लिखे के आग्रह कइल जाला (जइसे-क, ख, ग, ज, फ, आ). काबिल , खराब, गरीब, जरूरत, फेल, डॉक्टर अइसन शब्दन के मूल उच्चारण का अनुसार लिखे के व्यवस्था परिनिष्ठित उच्चारणे खातिर ना, कबो-कबो अर्थबोधो खातिर जरूरी हो जाला (खुदाई से ख, दाई के, गोरी से गोरी के आ बाल से अँगरेजी शब्द बॉल के अर्थ ग्रहण करे में कठिनाई हो सकेला).

(iv) संस्कृत संयोगात्मक भाषा रहे, बाकी ऐतिहासिक आ भाषा-वैज्ञानिक कारणन से हिन्दी आ भोजपुरी तक आवत-आवत भाषा के स्वरूप वियोगात्मक हो गइल बा. एहसे वर्तनी-विधान में ई प्रश्न उठेला कि विभक्तियन के संज्ञा या सर्वनाम का साथे लिखल जाव कि ओहसे अलगा. अइसने प्रश्न संयुक्त क्रिया, पूर्वकालिक क्रिया, उपसर्ग, प्रत्यय, अव्यय, समास आदि का प्रसंगो में उठेला. हालाँकि एहमें निश्चित नियम ना रहलो से अर्थबोध में गम्भीर गड़बडी के अवसर शायदे कहीं आवे, तबो वर्तनी के वैज्ञानिक आ मानक स्वरूप का विचार से ई प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाला.

(v) हिन्दी आ भोजपुरी के उच्चारण-प्रणाली संस्कृत से भिन्न हो गइल बा. अकारान्त शब्दन के इहाँ हलन्त उच्चारण होला (कमल के कमल्, संसार के संसार्) बाकी वर्तनी संस्कृत-उच्चारण का अनुरूप चल रहल बा. एह उच्चारण का आधार पर हलन्त शब्दन के लिखे में केहू-केहू हल् के चिन्ह ना देवे (भगवान, श्रीमान). सन्धि का प्रसंग में एकरासे कठिनाई पैदा होला काहे कि हिन्दी में सन्धि के सब नियम संस्कृत से लिहल गइल बाड़न स. ओह नियमन का अनुसार शब्दन का वर्तमान उच्चरित रूप के छोड़के उन्हनीके परम्परागत लिखित रूप के सन्धि स्वीकार करे के पड़ेला (सम्भवतः ईहो एगो कारण ह कि तद्भव शब्दन का बीच सन्धि के कवनो नियम हिन्दी-व्याकरण में नइखे बतावल गइल). एह तरह से वर्तनी आ उच्चारण में तालमेल के अभाव वर्तनी के अवैज्ञानिक बना देला. संस्कृत में ऐ, औ के उच्चारण अइ, अउ नियन रहे. हिन्दी आ भोजपुरी में ऊ बदलके अए, अओ नियन हो गइल बा. अब ऐन्द्रिय, ऐश्वर्य में ऐ के उच्चारण पैर नियन आ मौर्य, लौकिक में औ के उच्चारण और नियन होला. प्रश्न उठऽता कि ऐ, औ से अए, अओ ध्वनि के काम चलावल जाव कि ना, काहे कि अइ, अउ उच्चारण वाला शब्द भोजपुरी में, आ हिन्दिओ में बहुत बाड़न स.

(vi) समान श्रुतिवाला ध्वनियन में मानक उच्चारण के निश्चय ना हो सकला से हिन्दी आ भोजपुरी में चाहिए-चाहिये, आई-आयी अइसन वैकल्पिक वर्तनी मिलेला. एकरा में एकरूपता खातिर कवनो नियम जरूरी बा.

(vii) संस्कृत में अनुस्वार का विकल्प में ओकरा बादवाला वर्ण के पंचमाक्षर का प्रयोग के विधान बा (जइसे-श3क्र, चञ्चल, कण्टक, मन्दिर, सम्बल). वर्तनी का सुविधा खातिर हिन्दी आ भोजपुरी में एकराके अनुस्वार करे के प्रचलन हो रहल बा. वर्तनी के वैज्ञानिकता का दृष्टि से ई विचारणीय बा कि एहमें से कवनो एगो के मानक स्वीकार कइल जाव कि विकल्प से दूनों चलत रहे.

(viii) हिन्दी आ भोजपुरी में अइसन शब्दन के संख्या काफी बा जिन्हनीके कवनो मानक रूप निश्चित नइखे भइल (गर्म-गरम, सर्दी-सरदी, बर्फ-बरफ, फु र्स त -फु र सत, वापिस-वापस, दिल्ली-दे ह ली, केरल-केरला). एहसे इन्हनीके मानक वर्तनी समस्या बन गइल बा.

भोजपुरी में ऊपर बतावल सामान्य कारणन का अतिरिक्त वर्तनी-समस्या के एगो विशेष कारण भी बा. ऊ ह भोजपुरी के आपन उच्चारण-पद्धति. भोजपुरी के उच्चारण-पद्धति खड़ी बोली से भिन्न त बड़ले बा, मगही, मैथिली, बँगला आदि से भी भिन्न बा. भोजपुरी में अ के उच्चारण मुँह के ईषद्वर्पुल (कुछ गोल) करके होला. बँगला आदि से भी भिन्न बा. भोजपुरी में अ के उच्चारण मुँह के ईषद्वर्तुल (कुछ गोल) करके होला. बँगला में अ प्रायः ओ नियन बोलल जाला, मैथिली में गोलाई बहुत कम रहेला, भोजपुरी में ह्नस्व ओ से भी हलुक अल्प ओ का आस-पास ओकर उच्चारण रहेला. भोजपुरी के दोसर प्रवृत्ति ह-शब्द का आदि या मध्य में आवेवाला अ, इ, उ, के विलम्बित उच्चारण कइल. एह उच्चारण-पद्धति का चलते भोजपुरी के बहुत-सा शब्दन का मानक वर्तनी खातिर हिन्दी से अलग हटके विचार करे के पड़ी. मानक भोजपुरी-वर्तनी के निम्नलिखित मुख्य सिद्धान्त होइहन स –

(i) वर्तनी यथासम्भव उच्चारण का अनुरूप होय. नया ध्वनियन खातिर वर्णमाला आ लिपि में आवश्यकतानुसार अइसन व्यवस्था कइल जाय, जे अस्वाभाविक ना लागे.

(ii) वैकल्पिक भा अस्पष्ट उच्चारण का स्थिति में वर्तनी के निर्णय ना भइला प शब्द का व्युत्पत्ति पर भी विचार कइल जाय.

(iii) टंकण आ मुद्रण में अनावश्यक कठिनाई ना होखे, एकर यथासम्भव ध्यान राखल जाय.

(iv) जहाँ वर्तनी के एक से अधिका विकल्प उपस्थित होय उहाँ हिन्दी का वर्तनी के निकट रहल उचित होई-अगर भोजपुरी-उच्चारण से ओकर विरोध ना होखे.

(v) अगर हिन्दी के वर्तनी मानक ना होखे त ओकराके स्वीकार ना कके भोजपुरी-उच्चारण का अनुकूल वर्तनी-विधान कइल जाय.

(भोजपुरी दिशाबोध के पत्रिका ‘पाती के 78 वां अंक’ से साभार)

Advertisements