• दिनेश पाण्डेय

उहाँ का सँगहीं रहनीं। बइठार रहे त चलीं सउदा-सुलुफ का सँगे कुछ मटरगस्तियो हो जाई, एक पंथ दुइ काज। तय भइल जे किराना बाजार मुँहें चलल जाई, फेरू सब्जीहाट होते हुए लवटि आवल जाई।
अब दु अदिमी सँगे चले आ चुप रहे भा एगो बोलते जाय आ दोसरका हुँकारो ना भरे त कइसन लागी? बरदासे ना खाई, उजबुजहट होखी, एहसे कुछ होत रहे के चाहीं। कुछ होत रहे के चाहीं त आखिर का होखो? कवनों मुद्दा त रहो? अइसना बखत के एगो मुद्दा ह – ‘सुखम-सितम’, बाकिर ई चीझ हमबयस में जादे सोहाला। ‘सुखम-सितम’ आतमकहनी आ कि आपबीती के रूप ह जवन दुखात्मक होला। कुछ अनुभवी लो’ के कहनाम कि कहे से पीर पातर हो जाला। ओ दिन कतो केहू कहि गइल कि भाई, भितरा बिखाद-बिकार के अधिकाई होखे त तीनिएगो राहि रहि जाला- बकरऽ, भँकरऽ आ ना त जकरऽ। एकर मतलब ई कि बोल दऽ, अछुधाहि रो लऽ आ ना त जकड़ले रहऽ, साँकल में बान्हि के कहीं भुइँजबरा में कि उपराय ना। एहि में से पहिला दुइगो वमन-विरेचन के तरीका हऽ आ अंतिम दमन के। वमन-विरेचन वाला रीति में दिकदारी ई बा कि कुछ जोग शास्त्री लोग एह तकनीक के बेजायँ इस्तेमाल करे लागेले।
एह बात प एगो घटना इयाद परि गइल एसे तेकरा के सुन लियाव त आगे बढ़ल जाई।

एक दिन कोल्हुआरी में दु जने में हाराबाजी लाग गइल कि एक टीना ऊखि के रस केहू ना पी सके। उहाँ का सनिगर हईं त ताव खा गइनीं आ देखते-देखते भर कनहतर रस उदरस्त। ओ घरी इहे बूझाइल जे अगस्त मुनि के समुंदर सोखे भा जह्नु रिखी के गंगधार घोंखे वाली बात ना त अतिशयोक्ति ह ना कवनो गपोड़ी के गप। ऊखि के रस असहीं मदालस ह, ऊपर से बेहिसाब चढ़ि गइला से उहाँ का पेट आँठी अस तरख भ गइल। राह चलले लाद से टिमटाम आवाज निकले एसे अंजाद इहे भइल जे उदर का ऊपरी भाग में तनीमनी जगह अबहियों बाकी रहे बकि मन असबस करे। उहाँ के कुछ तरकीब सूझल होखी, त लघुशंका के बहाने होने झूँटी के अलोता चलि गइनीं आ निहुरिए होके नरेटी में कुछ करामात कइनीं। फेरू त लागल जइसे खलबला के घइलन पानी बहरी उझील देले होखे केहू। मन हलुक भ गइल।

एह आँतरकथा के अंत इँहवें ना भइल। जिन जने बीस रोपया से हाथ धो दिहले रहलन उनुकर मन सहजे एह बात के माने प तइयार ना रहे। आखिर ई अजगुत भइल कइसे? उहाँ का एके सुरुके कनहतर भर रस घींचि कइसे गइनीं? ऊ बेरि-बेरि उनुकर लाद आ कनहतर के आयतन के अनुमानित भेयार करस बकि दुनों में कवनों तालमेल ना बुझाय, तबहूँ आँखि के सोझे के चीझ प कवनि बात के वहम? गुर के कराह उतरल कुछ देर भ गइल रहे। खुरपा से उलट-पुलट होत गुर केसोन्ह-मीठ गंध से ऊ अगतहीं मनभरू हो चुकल रहन। मन में आइल जे गुर त बड़ी गर्हुअन होखेला तुरते मुँह बन्हा जाला अदिमीं के। छटाक भरि से जादे खाए में हाथ ठाढ़ हो जाई। ऐन इहे ऊ बखत रहे जब उहाँ के फेरु नजर आ गइनीं। देखले कि बदला बदे नीमन मोका बा त दाँव खेल दिहले- ”रवों, सभे जानऽतानी जे रस पनछूछुर चीझ ह, पानी पचे में कव घरी लागेला? बाकी गुर ना चली।”
उहाँ के भाव सहजे रहल, हँ, भँव में थोरके बाँकपन जरूर आइल, ठीक ओसहीं जइसन गरु लपटेल काँप क ओरि बढ़त बगेरी के देखि के बहेलियन के भँव में होला।
”रस त पी-पचा लिहलीं, हई दु भेली गुर खा लीं त बीस रोपया राउर।”
”पक्का?”
”पक्का।”
उहाँ केशुरू भ गइल रहीं। नाधा त आधा, आधा त साधा, ममिला खतम। देखते-देखते दु भेली टटके सुसुम गुर याने कम-से कम चार सेर पेट का भीतर।
”लावऽ हेने बीस रोपया।”
शर्त बदवेाला के मुँह उचरुँग अस भ गइल रहं। हँ, ए बेरि फरक ई परल कि रस जइसन गुर के सहज वमन ना होखल आ उहाँ का लाद तनी बिगरि गइल।

बात होत रहे विरेचन तकनीक के दुरुपयोग के। आरे भाई, जब मनई देह बा त सुख-दुख लगले रही। चानक जइसन नीतिविद् के कहनाम जे कवन कुल में दाग ना लागल, बियाधि से के बाँचल, कामागि में के ना झुराइल आ सुख के सुरूर में हरमेसे के डूबल रहल? एहि बात के जानेला सभे बकि कुछ लोग अपना के दुनिया के सभसे दुखी जीव समुझे के अभ्यस्त होलें। एकरा पीछे सामनेवाला के सहानुभूति अरजे के लोभ कहीं भा आपन उपलब्धि के गोपित राखे के उद्देश्य। जहवें बइठिहनि कि बीपत के बखान शुरू। ए में कुछ अइसन शातिर होलें कि आपन दुख सुनावत-सुनावत सुनेवाला के सभकुछ मूँड़ ले जइहें आ पतो ना चली कि उनुका सँगे कतिना धोखा भ गइल? सुदर्शन के कहनी के खतरनाक डँकइत खडग सिंघवा एही रीति से नू बाबा भारती के घोड़ा छीनि ले गइल रहे?

ए तरे’ के अरमाना गप के दोसरका मुद्दा ह परनिन्दा। परनिंदा आ परमानंद में महज कुछे धुनि के फरक बा। संत सरीखा कुछ जीव तेकर मनाही करेलें आ एहिके कुटेब के दायरा में राखेलें। असल बात कुछ अउरी बा। अदिमी जवनि चीझ से जादे खउफ खाला तेकरा से दूर रहे के कोशिश करेला आ अइसना के नाँव निखिध खाता में इंदराज क दिहल जाला। संतन के हरमेंसे ई डर सतवलस कि कहीं उनुकर भितरिया लँगउटी ना उतर जाव, एसे बाँचे बदे ऊ समूची दुनिया में मुनादी करत फिरेलें कि परनिंदा बड़ी गर्हित चीझ ह, एसे ताने रहल जाव। केहू के कुछो लउकबो करे त जुबान प ना आवे, काहे से कि ई गलीज चीझ ह नू जी। सच्चाई अइसने रहित त रहीम खाननखाना जइसन सुलुझल अदिमीं निंदक के, अँगनई में मड़ई छवा के, नियरे राखे के सलाह काहे खाती दिहिते। बेगर साबुन-पानी खरचले सुभाव निरमल हो जाय त केहू का एतराज? संतत्व खाती सुभाव के निरमलता त अनिवार गुन ह फेरु निंदा से भड़के के ओजह अउ का हो सकेला? आ हई तुलसी बब्बा, उहाँ का त हदे क दिहले बानीं! छाती ठोंक के कह रहल बानीं कि हँ, उहाँ का निंदक हईं आ अइसन-वइसन ना, एह काम में उहाँ का महारत हासिल बा। ई पटुता अनकर ऐगुन के सहस्सरमुख बखाने तक लागू बा, आपन निंदा सुन के त मथफोरउवलो हो सकेला –
”जानत हौं निज निज पाप जलधि जिय, जल सीकर सम सुनत लरौं।
रज सम पर अवगुन सुमेरु करि गुन गिरि सम रज ते निन्दरौं।।”

पसगैबत के गप के अउर कइयकगो मुद्दा बाड़ँऽ सँ बाकिर तेकर बखान अनेरे विस्तार दीही, काहे से कि एक त ओ में से अधिकांश के घुसपइस एही दुनो में हो जाता, दोसरे, जब कहे के मकसद पूरन हो जाय त गयरजरूरी बकवाद के का दरकार? त चलींजा ओहिजे जहवाँ बात के छोर छूटल रहे।

तय ई भइल कि किराना बाजार मुँहें जाई अदिमी आ सब्जीहाट देने होते वापिस घर लवटि जाइल जाई। त चलि देल अदिमी। कुछ देर त चुप्पा रहल फेरु उहाँ का कंठ खुलल- ”जानऽ ताड़ऽ हो?”
हामी के इंतजार के कवनो जरूरत ना रहे से उहाँ का फेरु शुरू भ गइनीं – ”ससुर जमाना बहुते खराब चल रहल बा।” हम अचकचा के एने-ओने देखनीं कि लाम मौन के दरमियान ई जमाना कहवाँ से आ गइल? आ मान लेनीं कि आइयो गइल त ओकरा में खराबी वाली बात कुछ बुझाइल ना। हमार चेहरा प अवसि के अबूझ भाव आइल होखी तबे त उहाँ के बात साफ कइनीं- ”बूझऽ कि जे, जहवें बा, हसोथहीं में लागल बा।”

साँच कहीं त बात अभियो मगज में ना आइल रहे बाकिर उहाँ का लगवहिए शुरू रहीं – ”बस ओसरि मिले। बेटिहा बानीं त दहेज सरापय बेटहा हर्इं त परताप के चिन्ह, बेरोजगार बदे भठजुग बाय बारोजगार बदे कृतजुग, जनता बानीं त कुराज बा भाई आ नेता बानीं त अह्ह अइसन सुराज कब भइल? विद्यार्थी पढ़ाई प कम वजीफा आ देश समाज के फिकिरे तनी जादहीं मुअत बाड़े, हम मजूरा हर्इं, सरकार रोजी-रोटी-आसरे काहे नइखे देत? खेतिहर के करज माफी के आस बा, चिकित्सक मनई देह प तंत्र-साधना में लीन बाड़े, ओकील नियावघर में विधिमंत्र के सुदीरघ संपुट पाठ करऽ ताड़े, नियाव देवी के आँखि प झोंपनी बा आ उनुकर हाथ के टकौरी के पलड़ा ओजनगर देने लरक गइल बा। शिक्षक लरिकन के दिमाग के सामपट्टी प आड़ी-तिरछी डँड़ारी खाँचत दुपहरी के खिंचड़ी के जनमारू खुशबू में मगन बाड़े, बैपारी के मकसद धनजोरी रहि गइल….। कहवाँ ले कहीं हो? घर-घर देखा, एके लेखा। बस, गोटे में समुझ लऽ कि सभे केहू, जे जहवें बा तहवें हसोथहीं में लागल बा खाली मोका मिले के चाहीं।”

लेखन के एगो मरजादा होखेला ना त दरअसल उहाँ का समूचा बक्तब सवाँस बिहून रहे जवना में कवनों अल्प, अर्द्ध, पूर्ण विराम ना रहन सँ आ ना सवाली अथवा अचरज क भाव रहे। बतकही के ना कवनों कारन रहे ना परोजन एसे चुपचाप सुनले में भलाई रहे। असहूँ हतना कालचिंतन एके बेरि भरभरा के दिमाग में आ गइला से उहाँ हँड़होर मचल रहे, थिरता आवे तब नू कवनों प्रतिक्रिया दियाय? उहाँ का साइत प्रतिक्रिया के कवनों चाहो ना रहे एही से त बेगर इंतिजार के फेरु शुरू भ गइल रहीं –
”घनघोर काइयाँ समय बा। भरल हुजूम में आँखि मून लऽ आ झिटिकी फेंकऽ, जेकरे प गिरी नू, समुझऽ कि उहे तिसमार खाँ हवें। हर अदिमी के हाथ में कइगो चेहरा बा, किसिम-किसिम के चेहरा। एके धेय कइसे कउड़ी जोरीं? गिरहथ के गिरह गाँठे के चाह बा, संत माया ठगिनी के तिनगुनिया फाँस में परमसुख जोह रहल बाडें, सामाजिक क्रियावादी आ सुधारक समाज के गति में अरथ के खोज करत समाज के कपरकिरिया क रहल बाड़ें, चाँड़ बुधिगर लोग तापवशित घर में जर-जंगल-जमीन बदे जहरबेरी क बिचड़ा तैयार क रहल बाड़ें।”

इहाँ ले आवत-आवत या त आवेश भा बिखाद से उहाँ के सुर मंद होत गइल आ गवें-गवें निसबद परि गइल। सड़क प भीड़ जादे भ गइल रहे। दुनो किनारे के दोकान पैदल पथ तक पसर आइल रहन सँ, शेष एकतिहाई जगहा ठेला, खोमचा, फेरीवालन के दखल में रहे। बीच के थोरके जगह में पैदल, गाडी़-छकडा़, आवारा गाय-गोरू सभे समिलाते सरकत रहन। बिछुरे के आशंका से उहाँ प आँखि गड़वले पिठिअवले जाए के सेवाय कवनो चारा ना रहे। सारा विचारक्रम भीड़ के कोलाहल में कतो गुम भ गइल रहे। उहाँ के चूरा के ठेला लगे मोलावत नजर अइनीं।

”का हो चूरा कइसे?”
हाथ बेलचा के शक्ल में ढल गइल रहे। दाम सुने के इंतिजार के करो? बेलचा चलल आ चूरा का ढेरि से जतिना चूरा जद में आ सकत रहे, पलक झपकते कोकाच का भीतर। ठेलावाला के कुछ कसमसहट भइल बाकि ठंड परि गइल। एसे अगते कि ऊ कुछ दाम-वाम बके उहाँ का चूरा चुभुलावत बलबलइनी ठीक ओसहीं जइसे ऊँट भा कवनों पनक्कड़ –
”ओहो-हो-हो, ई त बासमती नइखे बुझात। बासमती नइखऽ रखले का? अच्छा कवनों बात ना, हमरा उहे चाहत रहल ह।” उहाँ के दोसर ठेला का ओरि बढ़ गइल रहीं। चार-पाँच ठेला घुमला के बादो उहाँ का बासमती ना भेंटल। मन में आइल जे उहाँ का अनुभवी ठहरनीं, बासमती के पहिचान देखिए-सूँघ के हो जाला, हर बेरि बेलचा बिधि के का दरकार रहल ह? बासमती चूरा कइयक जगे रहे बाकिर ओहर उहाँ का नजर एको दफा काहे ना गइल? एक बेरि गइबो कइल त दोकानदार का लाख आश्वस्त कइला के बावजूद उहाँ का नजर में ओकर प्रभेद उन्नत ना रहला से सउदा ना पटल आ ई सभ बारीक परीक्षण बेगर बेलचा बिधि के हो ना सकत रहे। अब ले उहाँ के चित्त से चूरा उतर चुकल रहे, एसे तेकर खरीदगी के इरादा स्थगित भ गइल।

गुरहट्टा शुरू रहे त उहाँ के नीमन गुर के खोज में लाग गइल रहीं बाकिर उहाँ लाएक उम्दा गुर अंत ले कतो ना भेंटल। जवन ‘देखल’ गइल तवन बेसवाद रहे, नुनछाह, किनकिनाह रहे, सेवर, तरख ना त लटोर रहे, सोडा मारल गोर रहे ना गँवढ़ के करियठ। कहीं पसनो परल त दाम में अगलगी। ”आखिर हतना खोट अछइत खरीदगी कइसे हो सकत रहे? बगेर गुर खइले अदिमी जीही ना, अइसन कवनों बात त नइखे। अरे, तनी गुर के चाह-चुह मजिगर बनेला ना त हेने तकलो के का जरूरत?” जाहिर बा कि अछता-पछता के सही, बाकि गुर कीने के इच्छा धइले-के-धइले रहि गइल रहे।

”सइ सइ उधामत का बाद अदिमीं दु पाई जोरि पावेला, असहीं सेतिहे में ओके गँवावल के चाही? सउदा पटावल एगो कला हऽ जवन सभके वश के चीझ ना हऽ। सहता रोवे बेरि-बेरि महँगा रोवे एके बेरि। जमाना बड़ा चंठ बा, तनिका आँखि का लागल कि डिब्बा गोल। जेकरा में चेत नइखे तेकरा के हबके में एन्हनि के कतना देर लागी? देखे जोग ई बात बा कि सभ थडकलसिया गुर रखले बाड़नसँ आ दाम चाहीं चोख, बैकूफ केहू अउरी के बनइहऽ जा, इहाँ त नाक प मछियो बइठेली त ढेर तजबीज कइला का बादे।”

आगे कुँजड़िन मोढ़ा प डगरा सजवले कँचगर चना (कचरी) बेंचत रहीजा। अबहीं अगताह रहे। ”बेमौसम के फसिल के सवाद लिहल आमजन के कूबत के चीझ ना हऽ। असहूँ बेसीजन के उपज में असली गंध आ सवाद कहवाँ? ई खालिस हिरिस ह। ई सभ दुलमरिए अदिमीं कीन पइहें, जेकरा पासे पइसा अफरात आवत बा, एकलमरिया के कहवाँ बेंवत? ऊ त पाई-पाई के रस लिहले चाही, तुच्छ जीभ के चक्कर में गाढ़ कमाई लुटावे के हिम्मत ओकरा भीर ना हो सके।” तबहूँ जानकारी ताजा राखे के लिहाजे दाम समुझल जरूरी रहे। एहिजा बेलचा तकनीक के इस्तेमाल माफिक ना रहे त फाँका-फँकी मुफीद परल। बिना एकरा कइसे पता चली कि ई असली कचरी ह कि मोअल हरियर बूँट? ए बेरि त अगतहीं से साफ रहे कि उहाँ का कचरी कीने के कवनो इरादा ना रहे बस जानकारी ताजा करे के उद्देश्य रहे तवन दु-चारि जगे मोलभाव के बाद पूरन भ गइल रहे। ”भला कहीं, ताजा कचरी में अँखुवा फूटेला? बकि कहऽ कुछो, हवे ई ललचौना चीझ। किस्सा ह कि बोवाई में हरवाह फाँक लेवे, हराई में चिरर्इं चुन ल सँ, बित्ता भ के भइले ना कि सगखोंटनी टुँग लँ सँ, गोटाए का चलले कि सइसइ नजर, गदरइले त होरहा के झोलझाल, तंग आ के चनानंद बरम्हाजी लगे ओरहन ले के चहुँप गइले। हतिना बड़वारी सुनि के बरम्होजी के बरदास ना भइल त हाथ बढ़ाइए देनीं। चनानंद मनसा भाँप लिहले रहलन एसे उहाँ से घसकल चहले। रगेदा-रगेदी में उनुकर नाक बरम्हाजी के चुटकी में धरा गइल। जान त छोड़ा लिहलें बाकी इचिका झटका लागे से नकिए तनी कज भ गइल।” उहाँ का मुँह के मांसपेशी में थोरके हरकत भइल रहे जइसन कुछ चुभुलावत बखत होला, लागल कि गलफर में बाँचल-खुचल कचरी-कन के कुरेद के स्वादगंध के पुनरास्वादन कइनीं हँ। काहे से कि उहाँ का चेहरा प अधतिरपित आनंद के भाव रहे। उहाँ के गोड़ अनियासे ‘चाह का दोकान’ का ओरि बढ़ गइल रहे।

भीड़ तनी जादे रहे। एक देने खाली तख्ता देखि के बइठे के जगह बनावल गइल। कुछ देर में टेल्हा ‘चाह’ दे गइल। ‘चाह’ के सुड़सुड़ान का सँगहे एने-ओने के बात होत रही सँ बाकि तेकर कवनों लगातार कड़ी ना रहे। असहूँ हेह किचाइन में कवनो गम्हिराह बात ना हो सकत रहे। चलती दोकान रहे, से सुभावतन जुटान जादे होखे। ‘चाह’ के सवाद मजिगर रहे। खूब अँउटल ललछहूँ गढ़गर दूध में उम्दा कड़क ‘चहपत्ती’ के खुशबू से तोस होखे। उहाँ का ‘चाह’ पी के गिलास मेज प ध दिहले रहीं। बुझाइल जे गिलास के पेनीं में एकाध घूँट अबहीं बाकी होखी। उहाँ का कुछ बोलत रहलीं बकि कचबच में कुछ बूझाय, कुछ ना। असहूँ अंजाद त इहे रहे जे कवनों काम के बात ना होखी, एसे बूझे के कोशिश के बजाय बूझे के ढोंग जादे कारगर रहे। उहाँ के हाव-भाव से ना लागल कि बोले के इकलौता मकसद, श्रोता तक विचार चहुँपावे के ज्ञात जरूरत, से बोलत होखीं। धेयान कहीं अनजान बिन्दु प रहे, ओठ हरकत में रहे, बीच-बीच में एगो माँछी एमें बिघिन डाले। ऊ साइद उहाँ का नाक प बइठे के बेंवत में रहलि। मूँड़ी झँटला के बादो ऊ घूरफिर ओहरे मेंड़राय। कुछ देर अगते के उहाँ के कहल बात कि ”हिंहाँ त नाक प मँछियो बइठेली त ढेर तजबीज कइला का बादे”, इयाद परि गइला से साइद भितरा ले आ के मुसकान के रेख चेहरा प फइलल होखी, काहे से कि उहाँ के सचेतन-अचेतना क मुदरा में चहुँप गइल रहीं जवन एगो घातक अनहोनी के संकेत रहे। हम टोह में रहलीं कि आखिर मँछिया गइल केने? एकर एगो अउरि ओजह रहे, ऊ रहे ई देखे के ललसा कि एगो नन्हीं चुक्की माँछी उहाँ के नाक में कतना दम करि सकेले आ ओहि हालत में उहाँ का पलटक्रिया का होखी? ए बेरि उहाँ का आपन बँयवारी हाथ खलिहा गिलास के मुँह प एह तरे ढँपले रहलीं जइसे पिलुआ-फतिंगा गिरे से रछया के उपाय बदे लोग करेलें। अचके उहाँ का रोस खा के गिलास के मेज प पीटे के तेज आवाज का सँगहे उठनीं। मुँह से तेज आ अबूझ सबद जइसन निकलल बाकि भीतर से उठत जोरदार हूल में गुम भ गइल। एक हाथ से पेट के ऊपरी हिस्सा पकड़ले आ दोसरका से गिलास का ओरि इशारा करत उहाँ के तेजी से बहरी जा चुकल रहीं। दोकान मालिक धउड़ल गिलास का ओरि लपकलें। उत्कंठा से गिलास के भीतर झाँकल गइल।

पेनी में बाँचल गाढ़ छल्हिगर ‘चाह’ के सतह प पाँख छितरवले मुअल माँछी उतरात रहे।


लेखक संपर्क –
आवास – 100/400, रोड नं0 2, राजवंशीनगर, शास्त्रीनगर, पटना-23

(भोजपुरी दिशाबोध के पत्रिका पाती के जून 2019 अंक से साभार)

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