मातृभाषा के महत्व

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’

JaiKantSighJai

कवनो व्यक्ति,समाज,देश भा राष्ट्र के बनावे-जनावे के जबरदस्त जरिआ होले ओकर आपन भाषा. ओकर आपन मातृभाषा आ राज/राष्ट्रभाषा. दुनिया के आन देश ओकरा संस्कृति, शिक्षा, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान वगैरह के ओकरे भाषा के जरिए जान-समझ के मान-सम्मान देला. आज जहाँ आउर देश अपना भाषा के माध्यम से अपना संस्कृति, शिक्षा, शोध, दर्शन आ ज्ञान-विज्ञान सम्बन्धी उपलब्धियन के बता-जता के मान-सम्मान पा रहल बा, ताल ठोक-ठोक के अपना भाषाई स्वाभिमान के अस्मिताबोधक डंका पीट रहल बा, उहँवे आपन प्रभुता-सम्पन्न देश (राष्ट्र) भारत देश में भा बिदेश में अपना गुलामी काल के थोपल आंग्लभाषा (अँगरेजी) में आधुनिक शिक्षा, संस्कृति आ ज्ञान-विज्ञान वगैरह अर्जित क के दुनिया से मान-सम्मान के आशा राखऽता. नाम-रूप के बाद कर दीं त भाषा के आधार पर दुनिया के देश ना बता सके कि सामने वाला आदमी आजाद देश के नागरिक बा आकि यूरोपीय गुलाम देश के.

भारत के कवनो आधुनिक शिक्षाविद्, अर्थशास्त्री, दार्शनिक, राजनायिक, राजनेता भा केहू तथाकथित बुद्धिजीवी देश भा विदेश के कवनो छोट बड़ मंच से अँगरेजी में आपन बात राखेलें त बुझाला कि आजुओ भारत भाषा के स्तर पर गुलामे बा. देश आउर भाषा के आजादी में से कवनो एक के चुने के हालत में भाषा के आजादी चुने के बात कहत शहीदे- आजम सरदार भगत सिंह के कहनाम रहे कि जदि भाषा आजाद हो गइल त देश बहुत दिन तक गुलाम ना रह सके आ जदि आपन भाषा गुलाम भा पिछड़ल रह गइल त बहुत दिन तक देश के आजादो नइखे राखल जा सकत. संस्कृत के एगो श्लोक बा – “मातृभाषां परित्यज्य येऽन्यभाषामुपासते. तत्र यान्ति हि ते यत्र सूर्यो न भासते. ” मतलब, जे अपना मातृभाषा के त्याग के आन का भाषा के अपनावेलें अथवा ओकर उपासना करेलें, ऊ घोर-अछोर अंधकार के गतलागुत (गर्त) में पहुँच जालें. ऊ ओहिजा पहुँच जालें, जहँवा सूरज के प्रकाशो ना होखे.

पश्चिम आ भारत के भाषा-संस्कृति का फरक के खूब नजदीक से जाने महसूस करे वाला स्वामी विवेकानन्द, महर्षि अरविंद, रवीन्द्र नाथ ठाकुर, महात्मा गाँधी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस वगैरह सभे एह मरम के जानत रहे तबे त ऊ लोग बार-बार अपना भाषा-संस्कृति के अपनावे पर जोर देवे. हर वैचारिक मतभेद के बावजूद नेताजी गाँधी से भाषा के स्तर पर एकमत रहलें. बाकिर, दुर्भाग्य अइसन पिठिअवलस आ अस पटकनी दिहलस कि देश के संविधान बनत घरी एह में से केहू मौजूद ना रहे आ देश ओकरे हवाले हो गइल, जेकर कपड़ा पेरिस में धोआत रहे आ जे दिनभर अँगरेजिए मे ओकात रहे आ सुतलो में अँगरेजिए में बिसनात रहे. मतलब, ऊ देह से त भारतीय रहे, बाकिर दिल-दिमाग से खांटी अँगरेज रहे.

एक बेर बात बात में पंडित जवाहर लाल नेहरू लार्ड माउंटवेटेन से कहले रहस कि भारत के हम अंतिम अँगरेज शासक सिद्ध होखब. उनकरे खुटचाली रहे कि संविधान के धारा- 343(1) में त जनता के खुश करेला हिन्दी के ओकर अधिकार देहल गइल, बाकिर, गवें से हिन्दी के प्रभावहीन क के अँगरेजिअत लादे खातिर ओही संविधान में धारा -343(2) आ 343 (3) के बेवस्था करके वरदान के अभिशाप में बदल देहल गइल आ देश के विविध मातृभाषा, प्रांतीय भाषा के विकास का संगे-संगे सब का सम्यक् समन्वय से सिरजल देश के सम्पर्क भाषा हिन्दी के राजकाज के भाषा अउर राष्ट्रभाषा बनावे वाला गाँधी के सपना सपने रह गइल. देश तब से ओही गुलामपन के ढोवत अपना भाषिक स्वाभिमान के ताखा पर राख के अँगरेजिए मे अलबला रहल बा आ अमेरिका-यूरोप भारत का एह भाषिक-सांस्कृतिक-बौद्धिक-आर्थिक गुलामी के देखके मनेमन मुस्का रहल रहल. कबो-कबो त ऊ देश भारतीय लोग का अँगरेजी ज्ञान के सराह के फुलावतो रहेला. एकरे खातिर भोजपुरी में एगो कहाउत चलेला -“बुरबक सरहले आ कोदो बिदहले.”

भारत बहुभाषी देश ह. हर क्षेत्र आ प्रांत के आपन मातृभाषा होले. जवन अपना भाषा-भाषी का संस्कार-विचार आ ज्ञान-विज्ञान सबके पोषण करेले. अपना मातृभाषा के सीखे-बोले खातिर केहू का व्याकरण पढ़े के जरूरत ना पड़े. ऊ अपना अबोधावस्था से लेके सबोध होखे तक अपना माई-बाप, परिवार-पटिदार आ पड़ोस-परिवेश के बीच पलात-पोसात अर्जित करत जाला. ओकरा जरिए ऊ परम्परागत ज्ञान आ सांस्कृतिक सम्पदा के संगिरहा करत जाला फेर ओकर मातृभाषा ओकरा वेदना-संवेदना के जनावे-जतावे के स्वाभाविक माध्यम बन जाते.

आजादी के समय एह देश में सरकारी आंकड़ा के मुताबिक छोट-बड़ 1652 गो भाषा आ बोली बोलल जात रहे. तबके प्रभावी नेता लोग अपना-अपना प्रभाव के सदुपयोग-दुरुपयोग करत सुविधा के हिसाब से बिना कवनो मानदंड तय कइले ओकरा में से चउदह मातृभाषा/भाषा के भारतीय संविधान का आठवी अनुसूची में ई कहके डाल दिहले जे एकनी के विकासात्मक सहयोग से देश के सम्पर्क भाषा भा राजभाषा हिन्दी समृद्ध होई. अबहीं तक तीन-तीन संविधान-संशोधन के जरिए आउर आठ गो क्षेत्रीय भा प्रांतीय भाषा के एह अनुसूची में डाल के ओकनी का विकास खातिर अनेक तरह के सरकारी सहयोग दिहल जा रहल बा. सरकार के तर्क पुरनके बा कि एह भाषा सबका विकास से हिन्दी आउर समृद्ध होत जाई. ई सोच गाँधी जी के रहे कि देश के तमाम बोली-भाषा के शब्द, कहाउत, मुहावरा वगैरह के सम्यक् समन्वय आ संयोजन से देश के सम्पर्क भा राष्ट्रभाषा हिन्दी समृद्ध होत जाई. बाकिर, गाँधीजी के मृत्यु के बाद उनका विचार के दरकिनार करत 14 सितम्बर, 1949 के देश के संविधान सभा पूर्वी दिल्ली आ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बोली मतलब खड़ी बोली के हिन्दी बतावत भारत के राजभाषा घोषित कर दिहलस. तब से हिन्दी देश के सम्पर्क भाषा के रूप विकसित ना हो सकल आ फेर सीमित क्षेत्र के बोली खड़ी बोली के राजभाषा भा राष्ट्रभाषा घोषित भइला के देश के दक्षिण आ पूर्वी भाग में हिन्दी का एह स्वरूप के लेके विरोध शुरू हो गइल. कुछ-कुछ विरोध त उत्तर आ मध्यो भारत में तब शुरू हो गइल जब उत्तर आ मध्य भारत का तमाम मातृभाषा सबके स्वाभाविक अधिकार के छीन के हिन्दी के उत्तर भारत के मातृभाषा आ सउँसे उत्तर भारत के हिन्दी पट्टी घोषित कर दिहल गइल.

मातृभाषा आ भाषा के मामला बहुत संवेदनशील होला. पंथ आ मजहबो ले अधिका संवेदनशील होला मातृभाषा के मुद्दा. एक इस्लाम मजहब के माने वाली जनता अपना मातृभाषा के मुद्दा पर अपने देश के दू टुकड़ा कर दिहलस. एगो के नाम ह पाकिस्तान आ दूसरा के, जवन अपना मातृभाषा बंगला खातिर ओह पाकिस्तान से अस्तित्व में आइल, बंगला देश. देश के केन्द्रीय आ प्रांतीय सरकार के सम्यक् भाषा-नीति बना के हर छोट बड़ मातृभाषा के विकास खातिर ईमानदार पहल करेके चाहीं. काहे कि अपना बहुभाषिकता के बावजूद भारत सांस्कृतिक-धार्मिक रूप से काल्हूँ एक रहे, आजो बा आ आगहूँ रही. हर छोट-बड़ भारतीय मातृभाषा आ बिकसित भाषा में एके सांस्कृतिक-धार्मिक आ आध्यात्मिक तथ्य अउर कथ्य के अलग-अलग ढंग से बरनन कइल गइल बा आ आगहूँ कइल जात रही. एह तरह से बहुभाषिकता एह देश के कमजोरी ना, बल्कि एकर मजबूती आ खूबी होत रहल बिआ.

अपना -अपना मातृभाषा आ बोली के विकास खातिर विकसितो देश भाषा-नीति बनाके काम करत रहेला. जइसे अमेरिका स्पेनिश, फ्रेंच , जर्मन, टैगोलोक, कैटोनीज वगैरह भाषा आ बोली के माध्यम से विद्यालय-विश्वविद्यालय स्तर के पढ़ाई होले आ ओह सबके विकास खातिर सरकार के ओर से समुचित बेवस्था कइल जाले. अँगरेजी शिक्षा आ शासन के भाषा बिआ. ई बेवस्था भारतो में संभव बा. देश के तमाम बोली आ भाषा के समन्वय से अर्जित भाषा हिन्दी भारत के राष्ट्र- भाषा के रूप में सम्मान पावे आ सउँसे देश के एकमात्र प्रथम राज- भाषा बने अभिव्यक्ति क्षमता से सम्पन्न विश्वविद्यालय स्तर तक अध्ययन -अनुसंधान जुगुत हर प्रांतीय भाषा हिन्दी के अलावे ओह प्रांत के सह राजभाषा भा दूसरकी राजभाषा बने.

अँगरेजी के भारत के सह राजभाषा (बेवहारिक रूप में प्रमुख राजभाषा) के आसन से जतना जल्दी उतार दिआई, ओतने जल्दी भारत विश्वशक्ति बन पाई. हमरा कहे के अभिप्राय ई नइखे कि अँगरेजी के विद्यालय-विश्वविद्यालय में पढ़ावल ना जाव. भाषा-साहित्य आ विदेशी ज्ञान-विज्ञान अउर अनुसंधान के सम्यक् ज्ञान के साथ-साथ विदेश- सेवा खातिर ओकर पढ़ाई जरुर होखे बाकिर, देश के शासन-प्रशासन, न्यायालय विधि-बेवस्था वगैरह खातिर हिन्दी आ देशी प्रांतीय बोली-भाषा के बेवहार होखे. एही उद्देश्य ला गाँधी जी तबे कहले रहस कि “दुनिया से कह द लोग कि गाँधी अँगरेजी भुला गइल.”

एही सम्यक् विचारन, बेवहारन आ चिंतन के कारन गाँधी जी महान आ अनुकरणीय-वंदनीय बन गइलन आ उनकर तथाकथित अनुयायी रहनुमा अउर राजनेता लोग क्षेत्रीय/ प्रांतीय आ दलीय नेता बनके जनता का घृणा के पात्र बन जाता लोग. कुर्सी से उतरते जनता घासो नइखे डालत. भारत सरकार गाँधी के भाषा नीति, शिक्षा-नीति, हिन्द स्वराज वगैरह के भारतोपयोगी राज्य- बेवस्था आ आधुनिक राजकाज आ विधि-बेवस्था के बीच संतुलन बनाके ईमानदारीपूर्वक काम करे लागी, ओही छन से भारत के छवि विश्वपटल पर अपने आप निखरे लोगी. गाँव में अनुभवी लोग कहेला – एके साधे सब सधे, सब साधे सब जाए. जदि गाँधी के मातृभाषा महिमा, ग्राम स्वराज, हिन्द स्वराज के साध लिआए त भारत के इंडिया कबो पछाड़ ना पाई. बल्कि दूनो एक दोसरा के परस्पर सहयोग करत आगे बढ़ पाई. बाकिर, बिना मातृभाषा आ देशी भाषा सब के समुचित सम्मान-अधिकार देले ई सब गूलर के फूल जइसन बा.

केहू आर्थिक रूप से केतनो सम्पन्न-समृद्ध हो जाव. जदि ओकर मातृभाषा आ राष्ट्रभाषा विपन्न बिआ त दुनिया ओकरा के कबो हिरदय से सम्मान ना दी. भारत के नामचीन इतिहास के विद्वान डॅा० रघुवीर के विदेशी प्रवास के अनभव जान लीं. रउरो मातृभाषा आ देश के अपना राष्ट्रभाषा का महत्व के बोध हो जाई .

डॅा० रघुवीर हर बेर अइसन फ्रांस पहुँच के अपना आत्मीय राजवंश के परिवार में ठहरल रहस. ओह परिवार के एगो छोट बच्ची उनका से घुलमिल गइल रहे. अंकल अंकल कहे आ उनकर खूब सेवा करे. ऊ बच्ची उनका सेवा- टहल में लागल रहे, ओही बीच उनका भारत से भेजल एगो चिट्ठी मिलल. बाल सोभाव बस ओह बच्ची के मन भइल कि देखीं त भारत अतहक देश के भाषा आ लिपि कवना तरह के होते. डॅा० रघुवीर टाले के चहलें. बाकिर ओह बच्ची का हठ के सामने उनका झुके के पड़ल.

ओह चिट्ठी के बाँचते ओह बच्ची के मु्ँह लटक गइल. ओकरा मुँह से हठात निकलल – अरे ई त इंग्लिश में लिखल बा. रउरा देश के कवनो आपन भाषा/मातृभाषा नइखे का ? डॅा० साहेब के कुछ कहते ना बनत रहे. ऊ लइकी उदास हो के भीतर चल गइल. अपना मतारी के ई बात बतवलस. दूपहर में सभे एके संगे भोजन कइल. बाकिर, डॅा० रघुवीर का पहिले जइसन उत्साह आ चहल पहल ना बुझाइल. भोजन के बाद ओह परिवार के के मलकिनी डॅा० रघुवीर से बहुते उदास मन से कहली – डॅा० साहेब! अगिला बेर से रउआ कहीं आउर जगह ठहरे के बेवस्था कर लीं. जेकर कवनो आपन भाषा भा मातृभाषा ना होला, ओकरा के हम फ्रेंच, असभ्य, बर्बर आ तुच्छ कहिले. अइसन लोग से हमनी कवनो तरह के सम्बन्ध ना राखीं.

डॅा० रघुवीर अवाक् होके सब सुने खातिर मजबूर रहस. परिवार के मलकिनी आगे बतवलस कि हमार मतारी लॅारेन प्रदेश का ड्यूक के बेटी रहली. जर्मन के सम्राट उहँवा जबरन फ्रेंच भाषा के माध्यम से शिक्षण बंद कराके सभका ऊपर जर्मन भाषा थोप देले रहस. तब हमार माई एगारह साल के रहे आ उहाँ के नामी कान्वेन्ट इस्कूल में पढ़त रहे. एक बेर जर्मन के महरानी ओह इस्कूल के निरीक्षण करे अइली. ऊ कवनो एक विद्यार्थी से जर्मन के राष्ट्रगान सुनावे के कहली. हमरा माई के छोड़के केहू का जर्मन के राष्ट्रगान इयाद ना रहे. हमार मतारी खूब सुन्दर ढंग से शुद्ध शुद्ध जर्मन राष्ट्रगान सुना दिहलस. महारानी हमरा मतारी पर खूब खुश होके ईनाम माँगे के जिद्द करे लगली. अंत में हमार मतारी उनका से पूछलस कि जवन हम माँगेब, ऊ रउआ देहब ? एतना सुनते महारानी खीसे काँपत कहली – “रे लइकी! तोरा पता नइखे कि हम एह देश के महारानी हईं. हमार कहल झूठ ना होखे, तूँ माँग के त देख. एतना सुनते हमार मतारी कहलस -” हे महारानी जी, जदि रउआ सचमुच अपना बचन के पक्का बानी त हमार एगो प्रार्थना बा कि अब आगे से हमरा एह प्रदेश के सब काम-काज, शिक्षा -दीक्षा खाली फ्रेंच में होखो, जर्मन में ना.”

एतना सुनके महारानी अचम्भा में पड़ गइली. खीसे काँपे लगली. उनकर आँख लाल हो गइल. बाकिर ऊ करस त का करस, बचन हार चुकल रहस. उनका कहे के पड़ल – ऐ लइकी! नेपोलियन के सेनो जर्मनी पर कबो इतना कठोर प्रहार ना कइले रहे, जतना तें शक्तिशाली जर्मनी साम्राज्य पर कर देले बाड़े. जर्मनी के महारानी तोरा अइसन छोट बच्ची से बचन देके हार गइल. ई हम जिनगीभर ना भुला सकीं. जर्मनी जवन अपना बाहुबल से जीतले रहे, ओकरा के तूँ अपना बिबेक आ बानी से फेरु जीत लिहले. अब हम भलीभाँति जान गइनी कि लॅारेन प्रदेश अब अधिका दिन जर्मनी के अधीन ना रह सके. एतना कहके महारानी तेजी से उल्टे पाँव लौट गइली. डॅा० रघुवीर, एह घटना से रउआ आभास हो गइल होई कि हम कइसन मतारी के बेटी हईं. हम फ्रेंच भाषा-भाषी संसार में सबसे अधिक मान-सम्मान आ गौरव अपना मातृभाषा के दिहिले, काहेकि हमनी खातिर राष्ट्र प्रेम आ मातृभाषा प्रेम में कवनो अंतर नइखे. हमार आपन भाषा मिल गइल, त आगे चलके हमनी के जर्मनी से आजादियो मिल गइल. डॅा० रघुवीर! रउआ अब जरूर समुझ गइल होखब जे हम का कहे के चाहत बानी. डॅा० रघुवीर लमहर सांस लेत मुट्ठी भींच लेलन. जइसे कुछ मन ही मन संकल्प कइले होखस.

एकरा के कहल जाला भाषिक गौरवबोध आ मातृभाषिक अस्मिताबोध.

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