– सौरभ पाण्डेय

भोजपुरी के भासाई तागत भर ना, बलुक एकर आजु ले बनल रहला के तागत प केहू निकहे से सोचे लागो आ अंदाजे लागो, त ऊ एह बात प ढेर अचकचाई जे ई भासा कतना काबिल, आ कतना लोचगर भासा हऽ ! भासा के तौर प भोजपुरी लोचगर बिया तबे ई आजुओ ले बनल बिया। एह कहनाम से एइजा दू बात जाहिर होता। एक, जे ई निकहा पुरान भासाई परम्परा के जियत-सम्हारत भासा हऽ। दोसर, एह भासा के जीवनी-शक्ती निकहा दमगर बिया। ई भासा कइसन बोलनिहारन के भासा हऽ, ई भोजपुरिहा समाज के भा एह जवार-समाज से बहरी जाई के बसल भोजपुरिहा मनई लोगन के जियत देखि के बूझल जा सकेला।

इस्थिती आ परिस्थिती चाहें कतनो मुकाबिल ठाढ़ काँहें ना होखो, भा अनसुना बेवहार करत होखो, एगो भोजपुरिहा कतनो प जी के, आ आगा देखबि, त ओही में निकहे रहि के, आ फेरु ओह इस्थिती-परिस्थिती प जीत के देखा देही। जौन ऊ अपना जिनिगिये में ना जीत सकल, त ओकर पूता भा ओकर पोता ओह इस्थिती-परिस्थिती में जीति के देखा दीहें। ई होला जियत मनस के मनई के तागत। इयाद पारल जाव मारिशस, गुयाना, सुरीनाम अइसन देसन के। भोजपुरिहा पूता-पोता लोग ओह देसन के सरकारी बिधी-बिधान के अनुसार राजा भइल बा लोग। जिये के लकम मन में बसवले कुली, हमाली आ मजूरी करत बाप-दादा-परदादा के पूता-पोता लोग आजु ओह समाजन के, ओह देसन के सामाजिक, सांस्कारिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनैतिक, बैचारिक, अने सभ तरहा के पहलुअन प आपन गहिर छाप छोड़त ओजुगा के मालिक-मुख्तार, गुप्ता-गुप्तार आ साहेब-सरकार भइल बा लोग। आ अपनो देस नइखे भुलाए के। एगो औसत भोजपुरिहा अजादी के साठ-पैंसठ बरिस बादो जवन परिस्थिती में जियेला, ऊ अछछ गरीबी कहाले। बाकिर जवना ढङ से ऊ परिवार सम्हारत अपना जियते भर बनल रहेला, ऊ ओकर कतनो पर जी जाए के तागते कहाई। ई कइसे होला ? भा ई कइसे होत आ रहल बा ? भोजपुरिहा मनई के ई तागत मिलेला ओकरा आपन जमीनी संस्कार से। एही संस्कार आ बेवहार के ढोअनहार ओकर भासा होले। आ भोजपुरिहा के आपन माईबोली ओकरा जिये के भरोसवे भर ले ना देले, बलुक मनई के निकहे चेतावत, ओकरा मन में भरोसा बइठावत जिये आ बनल रहे के बिधी-सुधी सिखावेले। ई हऽ तागत, संस्कार के सान प चढ़ल कवनो जियत भासा के ! कवनो जियत भासा के बनावट आ बुनावट बूझे के कोरसिस करीं जा, जान जाइब जा, जे भासा के अस्तर प लोचगर भइल का कहाला ! एक से एक भाव खातिर शब्दन के गठन मिलि जाई। कारन, जे भोजपुरी एगो भासा के तौर प निठाह जीवन जियत लोक-समाज-परिवार के सङे-सङे बेक्तीगतो भाव के बोल के बतावे में बिसवास करेले। ई बोलिये अइसन हऽ। जतना पर्यायवाची शब्द भोजपुरी में बड़ुए, ओतना संसार के आउर कवनो भासा में होखी, संदेहे बा।

भोजपुरी भासा के इतिहास के ढेर लोग आपन-आपना ढङ से सोधले बा। बाकिर, ई सभे एकमत होई, जे पाली भासा के बाद भारतीय भूखण्ड में एकर सोरि अवहट्ट भा अप्रभंस के समै तक चहुँप जाले। जहँवाँ से एह भासा के जीवनी-शक्ती खातिर खाद-पानी मिलत आ रहल बा। एही अप्रभंस भासा के भरत मुनी (विक्रम तीसर सदी) ’देसभासा’ कहसु। एह बिन्दू प आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कहत बाड़े – ’वररूची के ’प्राकृतप्रकास’ में अप्रभंस भा अवहट्ट के कतहीं नाँव नइखे।’ एही सुर में शुक्लजी आगा बतावत लउकत बानीं – ’बाण अपना ’हर्ष चरित’ में संस्कृत कवियन के सङे-सङे भासा के कवियनो के चर्चा कइले बाड़े।’ ई कवन भासा हऽ ? इहे हऽ भोजपुरी के आदि सरूप। तबके परभाव आ भाव-शब्द जीयत-अपनावत भोजपुरी आपन रूप धरत गइल बिया।

बौद्धधर्म के जब फाड़ होखल सुरु भइल त एकर एक रूप वज्रयान नाँव से देस के पुरबी भाग में फइलल। एह संप्रदाय के कर्मकाण्ड के लेके तबके समाज में भयंकर हँड़भङ मचल रहे। खैर, एह प चर्चा नइखे करे के। एही सम्प्रदाय में चौरासी सिद्ध भा जोगी लोगन के उठान भइल मनाइल बा। हमार धेयान ओही लोगन आ उनका सदी-शताब्दी में समाज के भासा प बा। कुछ सिद्धन भा जोगियन के रचना त अवहट्ट के खालिस सरूप में भइल करे, बाकिर ढेर जोगी लोगन के पद-रचना ओही ’देसीभासा’ में भइल करे जवन तबे आजु के पूर्वांचल आ बिहार के पच्छिम-दक्खिन में बोलल जाय। जोगी लोग आपन संदेसा आ आपन मत के ’रहस्यवाद’ के बिन्दू लोगन के बीचे फैलावत रहले, त ऊ आपन बात राखे खातिर आपन भासा ऊहे राखसु जवन तब एह क्षेत्र के आम भासा रहे। सरहपा, जिनकर जीवनकाल 690 बि०स० मानल जाला, के पद के नमूना प धेयान दीहल सही होखी।
जेहि मन पवन न संचरई, रवि-ससि नहीं पवेस।
तहि बट चित्त बिसाम करू, सरेह कहिअ उवेस ।।
घोर अधारे चंदमनी, जिमि उज्जोअ करेइ ।
परम महासुह एखु कने, दुरिअ असेस हरेइ ।।

ओही लगले सिद्ध कण्डहपा जोगी के साधना खातिर एगो डोमिन के अवाहन देखल जाव –
गंगा जँउना माझे रे बहई नाइ।
ताहि बुड़िलि मातंगि पोइआ, लीले पार कराइ ।।
बाहतु डोंबी, बाहलो डोंबी, बाट त भइल उछारा।
सदगुरु पावे पऽए जाइब, पुणु जिणउआरा ।।

ई डोमिन भा ब्राह्मणेतर जाती के भा नीच कहाए वाली जतियन के मेहररुअन के साधना में का जोगदान आ जरूरत भइल करे, ई कूल्हि एह आलेख के सीमा से बहरी के बिन्दू बाड़न सऽ। एही लगले 990 बि०सं०
के बाद कुक्कुरिपा के एगो रचना देखीं जा –
ससुरी नींद गइल, बहुड़ी जागऽ ।
कानेट चोर निलका गइ मांगऽ ।।
दिवसइ बहुणि काढइ डरे भाऽ ।
रति भइले कामरू जाऽ ।।

एह सिद्ध जोगी लोगन के रचना भा जनता बीच उपदेसन के भासा ऊहे भासा रहे जवना के भरत मुनी ’देसभासा’ कहले बाड़न। आगा चलके एही भासा के नाथ सम्प्रदाय के पुरबिया जोगी लोग अपनवलस। धेयान से देखला प ई कइसे ना कहाउ जे इहे भोजपुरी प्रोटोटाइप सरूप रहे ? भा, ई कइसे ना कहाउ, जे एह भासा में पूर्वांचल के लोक-भासा के शब्दन भा भासा-बिन्यास के अस्थान नइखे मिलल ? एह बात प एगो बात अउरी साफ भइल बा, जे ओह घरी के ढेर जोगी लोगन के उपदेस खातिर अपनावल गइल भासा आ गीत वाली भासा में फरक भइल करे। इहे, भा अइसने फरक कबीर तक के रचना में लउकेला। कबीर के पद भा गीत-रचना पुरबी भासा में भइल करे – ’मन ना रङावे, रङावे जोगी कपरा !’ कबीर के साखी आ रमैनी के भासा पुरबिये भासा बिया। ई पुरबिया भासा अउरी कुछऊ ना, साफ-साफ देखल-बूझल जाव, त भोजपुरिये के पुरान सरूप के तौर प लउकी।

कहे के माने ई, जे भोजपुरी के मौजूदगी आ भासाई दसा लमहर समै से चलल आ रहल बा। एकर निठाह होसगर-जागल साहित्य गते-गते समृद्ध भइल बा। ई भासा तबके समै से लेके आजु ले एक बरोबर बहत आवऽतिया। हतना लमहर काल आ वाचिक परम्परा के बेवहार से भोजपुरी में भाव के अनुसार किसिम-किसिम के शब्द अपनावे आ गढ़े के तागत आ उदारता दूनो बढ़त गइल। चूँकी भोजपुरी के नेंव तबके ओह ’देसीभासा’ के सरूप में बड़ुए जेकर सोरि मागधी से रस पावत लउके। इहे मागधी आगा चलि के अदर्ध्मागधी के सरूप धइलस।

भोजपुरी के सुरुआत एही ढङ से भइल बा। देस-समाज में ढेर कूल्हि ऊँच-नीच, नीमन-बाउर देखत-भोगत ई भासा बनल आ रहल बिया। इहे लोचगर भासा के निसानी हऽ। भासा के तौर प भोजपुरी लोचगर रहे, तबहीं नू ई आजुले जियत बिया ! आजु कतना अइसन राज्याश्रय से वंचित भासा कूल्हि बाड़ी सऽ जवना के अइसन लमहर इतिहास बड़ुए ? आ, जे व्याकरण के सान प चढ़ल अपना समृद्ध बुनावट आ निकहा लमहर परम्परा के बनवले चलल आ रहल बिया ? साँचहूँ सोचे के परी। भासा के इहे बिसेसता ओकरा बोले वालन के प्रवृती आ बिसेसता बनि जाले। इहे कारन बा जे भोजपुरिहा जहँवाँ गइले आपन वर्चस्व बनाइ के रहले। ना ई भासा मूअल, ना लोग थहरइले।

अब एह प सवाल उठऽता, जे एह कूल्हि में हिंदी कहँवाँ रहे ? हिंदी भासा के तब ना लिपी रहे, आ ना व्याकरण रहे। ना कवनो मानल क्षेत्र रहे। हिंदी खातिर खलसा भाव रहे। ओकरा में व्यापक भासा बन जाये के संभावना रहे। बलुक एही प लोगन के धेयान बनल रहित। आजु जे ’हिंदी-हितैषी’ लोग भोजपुरी के लिपी आ व्याकरण प सवाल करत टंटा खड़ा कर रहल बा, खलसा सइ-सवा सइ बरिस पहिले हिंदी के गती काहें नइखे देखत लोग ? तब त भोजपुरी के लिपियो रहे आ व्याकरण त रहबे कइल। का बे व्याकरने के एह भासा में रचना होत रहे, साहित्य लिखात रहे ? आ, ई भासा अतवत बड़हन क्षेत्र में फइलल रहे ? एह सवालन से आँखि चोरावल कुतर्के के जनम दीही। एही से हिंदी के बिकास के लेके अनेरिया के कुतर्क हो रहल बा। लोग सही सवालन से आँखि चोरा रहल बाड़े।

हिंदी के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अद्भुत जोगदान रहल बा। एह बात से कवनो केहू के संदेह केने बा ? एकर भाव सभ पुरोधा लोग आ देस स्तर के नेता लोग मनले बा। बिसेस क के अ-हिंदी भासा-भासी पुरोधा आ नेता एकर भाव मनले बाड़े। बाकिर, एह हिंदी के कहँवाँ त अंगरेजी के हटावत संपर्क भासा के तौर पर बढ़ावल जाइत, एकरा माईभासा के नाँव देबे के बेकूफी चल निकलल। जवना जमीन, परंपरा आ भासा से हिंदी के खाद-पानी मिलत आवऽता, ओही जमीन, परंपरा आ भासा प खन्ती चले लागल। बिद्वान लोग एगो पुरान पोढ़ भासा के हाँहखा के जनमल भासा हिंदी के बोली, सहयोगी आ जाने का-का बतावत गाल करे लगले।

ई गाल कइल अब हिंदिये पर भारी पर रहल बा। एह गलती के जतना हाल्दे से दुरुस्त क लियाव, नीमन रही। भोजपुरी खातिर त नीमन होइबे करी, हिंदियो खातिर नीमन होई। झूठ के मुलम्मा प भासा के, के कहे, कुछऊ के उत्थान ना होखे। हिंदी भोजपुरिहा क्षेत्र के माईभासा हऽ, एह कहनाम से जतना हाल्दे निजात पा लियाव, ओतने नीमन रही।

बाकिर ईहो ओतने साँच बा, जे अब खलसा पुरनके के गावत-पीटत रहला से भोजपुरी के भलाई नइखे होखे के। कारन ई, जे ई भासा ढेर नीमन-बाउर दौर से गुजरत आपन दसा प निकहा नजर चाहत बिया। रचनात्मकता आ लेखकन के रचनाधर्मिता के लेके कतना तरह के मत-मंतव्य बनत रहल बा। बाकिर पाछिल पचास-साठ बरिस में भोजपुरी मेहरारू, अँगना आ रसोई के भासा भर बनिके रहि गइल बिया। एकर व्यावसायिक दम ओह तरी टाँठ नइखे, जइसन कबो भइल करे। तवना प स्वतत्रंता मिलला के कुछ पहिले से लेके स्वतंत्रता मिल गइला के बाद ले हिंदी के उत्थान के फेरा में भोजपुरिहा बेटा-पूता लोग एक सीमा से बहिरी जाइ के हिंदी के बनावे में आपन जोगदान देले बा। एह जोगदान के बड़हन फाएदा हिंदी के मिलल बा।

ई पहिलहीं से जानकारी बा, जे सुरुआती हिंदी आ पुरनकी भोजपुरी के बिकास एकही भासा-रूप के गरभ से नइखे भइल। बाकिर ईहो साँच बा, जे हिंदी में भोजपुरी के शब्दन के (देसज शब्द) अउलाह प्रयोग भइल बा। शब्दन के अइसन आवाजाही कवनो भासा के अनुभासा साबित ना कऽ सके। जबकि हिंदी के बात करेवाला आ भोजपुरी के बिरोध करे वाला लोगन के एगो छोट जमात एही आधार प बलाते भोजपुरी के हिंदी के अनुभाग भा बोली जतावे में लागल बा। एह अतार्किक सोच के सुरुआत आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी से सुरु भइल आ डॉ० रामबिलोचन शर्मा के समै तक आवत-आवत पकठा गइल। हिंदी के पौढ़ आ पुरान साबित करे के फेरा में अइसन बिद्वान लोगन के उत्साह आंचलिक भासा कूल्हि के संकट के कारन बनि गइल। आ आजु, ओही लकीर के पीटि-पीटि के नारा बनावल जा रहल बा, जे भोजपुरी हिंदी के बोली हऽ। जबकि एह बात के केनियो से साबित ना कइल जा सके। हिंदी के महावीर प्रसाद द्विवेदी ना मिलल रहिते, त हिंदी के पद्य प्रवाह में भासाई पोढ़पन के आवे में अबहीं पाँच-सात जुग अउरी लागल रहित। हिंदी ब्रज भासा भा भोजपुरी भासा के कान्हे आपन राहता तय करत फिरित।

खैर, जवन भइल तवन भइल। एह गलत बात के, जे भोजपुरी हिंदी के बोली हऽ, हर-हमेसा पुरजोर ढङ से नकारल जरूरी बा। आ पूरा गर्व आ गुमान से भोजपुरी भासा के प्रयोग करे के बा। हिंदी के बिकास में भोजपुरी भासा के जवन शब्दन के प्रयोग भइल बा, ऊ भोजपुरी भासा के गहराई आ समृद्धी के नमूना हऽ। बाकिर एह गर्व आ गुमान में हिंदी भासा के बिरोध नइखे करेके। हमनी के हिंदी से ना कबो बिगाड़ रहल बा, आ ना बिगाड़ होखी। जे, जइसन बिगाड़ हिंदी के ’उत्थान’ में लागल नवहा पुरोधा लोग भोजपुरी से ठनले बा। हिंदी भासा के संबंध भोजपुरी भासा से शासक आ शोषित वाला ना बनावे के चाहीं।

सोचे के त बात ई बा, जे अंगरेजी भारत में संपर्क भासा काहें बनल रहो ? एह प त सवाले नइखे उठत? ई अस्थान हिंदी के काहें ना दिहल जाव ? राज्यवार भा क्षेत्र बिसेस, अने अंचल, में जवन समृद्ध भासा बाड़ी सऽ, उन्हनीं के लसारि के हिंदी के परचम फहरावे वालन के कमनजर से अनघा क्षोभ होला। हिंदी बनो आ बढ़ो। एह में कवन बेजाईं ? बाकिर, का ई हिंदी भाव-शब्द आ संप्रेषण से धनी आ व्याकरन सम्मत बाकिर आंचलिक भासा कूल्हि के लहास प फुफुंदी लेखा जीही ? तब त हमनी के ओइसन निर्दयी हिंदी ना चाहीं ! अपना भूभाग में अंगरेजी कम रहे जे हिंदियो ओही तरी भासा-बेवहार के नासत हड़कंप मचाई ? कवनो समाज के भासा सैकड़न सालन से ओह समाज के बेवहार आ प्रवृती के भावनात्मक आ चारित्रिक उत्पाद होले। भासा के मरले खलसा शब्द ना मुअऽ सऽ, बलुक ओह समाज के संस्कार, बेवहार आ प्रवृती मू जाले। हिंदी के झंडाबरदार लोग ई बात काँहें नइखे बूझत ? हिदी के राष्ट्रभासा त बनवा ना सकल लोग, उत्तर भारत के कौ गो ना राज्यन में हिंदी के माईभासा के मुखवटा ओढ़वावत, भरम जरूर पैदा क रहल बा लोग। कहे के जरूरत नइखे, जे अइसना लोगन के हाँथे हिंदी के औपनिवेशिक रूप जरूर मिल रहल बा, जवना के मुख्य गुन बाद-बाकी भासा के दमन होला। इहे त अंगरेजी के गुन बड़ुए। जहँवें अंगरेजी गइल, ओह जगहा के मूल भासा के वजूदे मिटा गइल। का एही तोहमत सङे हिंदियो के जियावल आ बढ़ावल जाई ? का हिंदी अपना भासाई सरूप से हतना कमजोर बिया, जे आन्ह भासा के समृद्धी से ई आपन रूप-संस्कार ना बचा पाई ? हमरा त ई केनियो से नइखे लागत।

एकर माने ई, जे ई सभ बवाल हिंदी के नवहा उछाह में बउराइल झंडाबरदारन के कमती सोच आ छाँछर समुझ के कारन हो रहल बा। एह लोगन के लगे ना संवेदना बा, आ ना कायदे से अध्ययन आ तर्क बा। एकरा बावजूदो ई लोग हिंदी के नाँवें आपन दोकानदारी चला रहल बा। अइसन लोग हिंदी के बढ़ावा नइखे देत। बिकास नइखे करत। बलुक हिंदी के खिलाफ दुसमन पैदा क रहल बा लोग। अबले का त हिंदी के मुखालफत अ-हिंदी भासा-भासी करत रहलन। आजु हिंदी प्रदेस कहाए वाला राज्यन में हिंदी आ ओह अंचल के भासा के बीच डेंड़ार घिंचा रहल बा। सही मानीं, त हिंदी-प्रदेसन में भोजपुरिहा लोग हिंदी के लेके कवनो अवाज ऊँच नइखे करत। बलुक बिरोध होता असंवेदनशील, अतार्किक आ बेबुद्धी के अहंकारी हिंदी-हितैसी लोगन के खिलाफ। ई लोग संख्याबल के दोहाई देत हिंदी के कद लहान करत, सभ आंचलिक भासा के मर्सिया पढ़े के उत्जोग करि रहल बाड़े। हिंदी संपर्क भासा होखो, आ ऊ भारत के हर राज्य में बोलल आ बूझल जाव, एह से केहू के का बिरोध होखी ? हिंदी के उत्थान में भोजपुरिया बिद्वान लेखकन के कमती जोगदान रहल बा ? जवन आंचलिक भासा समृद्ध बाड़ी सऽ, ओकनी के बढ़ावे आ जियावे के निकहा उत्जोग होखो। गहन गहीर उपाय कइल जाव जे भासा के साहित्य आ शब्द-धन बहिराव। हिंदी संपर्क भासा होखो आ भोजपुरी, मैथिली, अवधी आदि अपना-अपना राज्यन के भासा होखऽसऽ। फेरु काँहें केहू हिंदी के बिरोध करी आ अ-हिंदी भासी राज्यन में बवाल मची ? ई ना कइल गइल त, हिंदी के दोसर राज्य के लोग काँहें अपनाई, जब ओह राज्य के भासा हिंदिये सङे ’राजभासा’ मनाइल बिया?

मारिसस में फ्रेंच, क्रियोल आ अंगरेजी के बावजूदो भोजपुरी आ हिंदी के मान्यता दिहल गइल बा। नेपाल में नेपाली का सङे-सङे मैथिली, भोजपुरी आदि के मान्यता दीहल गइल बा। सबले बड़ बात ई बा, जे नेपाल में भासा के लेके कवनो बवाले नइखे ! जबकि ओजुगो हर क्षेत्र के आपन-आपन भासा बड़ुए। भासा के लेके अइसन समरसता खलसा राजनीति कइले ना आवे।


एम-2/ए-17, ए०डी०ए० कॉलोनी, नैनी,
इलाहाबाद – 211008 (उप्र)


भोजपुरी दिशाबोध के पत्रिका पाती के सितम्बर 2017 अंक से साभार

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