– डॉ अशोक द्विवेदी


सोशल मीडिया का एह जमाना में वाट्स ऐप,फेसबुक पर, नोकरी-पेशा आ स्वरोजगार में लागल, पढ़ल – लिखल लोग अभिव्यक्ति के माध्यम का रूप में मातृभाषा के अपनवले बा। ऊ झिझक, ऊ संकोच हट गइल बा जवन भाषाई-इन्फिरियरिटी का कारन बनल लागत रहे। मध्यवर्गी, निम्न मध्यवर्गी परिवार से आइल इन्जीनियर, डाक्टर, वकील, अध्यापक लोग का सँगे नवही पढ़निहार ग्रुप का एह मातृभाषा प्रेम में बहुत कुछ रचनात्मक आन्दोलन के भाव छिपल बा। धड़ल्ले से विचार राखत, पसन्द-नापसन्दगी प्रकट करत एह नवहा ग्रुप में मातृभाषाई आत्मीयता आ स्वाभिमान झलक रहल बा। हालाँकि फेसबुक पर रखात अधिकांश बात- विचार से हमा-सुमा क सहमति जरूरी नइखे, महत्व बस एतने के बा कि लोग संवाद का लिखन्त-पढ़न्त माध्यम का रूप में कहत-सुनत-सीखत लउकत बा। एह अस्मिताधर्मी उद्गार, उछाह वाला लिखन्त में, भाषा-वर्तनी के गल्तियन के नजरन्दाज कइल एसे जरूरी बा, काहें कि ईहो एक तरह के भाषाइये आन्दोलन बा!

भोजपुरी के आपन विशाल शब्द-भण्डार बा। जीवन-जगत का सार्थक क्रियात्मक अभिव्यक्ति खातिर ओकर आपन भाषाई खासियत, भोजपुरी के खास बनावेले। एह लोकभाषा के आपन वाचिक लोकसाहित्य बा, लोककला आ लोकरंग बा। आज सोशल मीडिया का भाषाई आन्दोलन के, भोजपुरी का रचनात्मक आन्दोलन से जोड़ला क जरूरत बा। आजादी का आन्दोलन में राष्ट्रीय एका खातिर, एक भाषा का रूप में हिन्दियो के रचनात्मक आन्दोलन चलल रहे, जवन आगा चल के हिन्दी साहित्य खातिर बहुत उपयोगी साबित भइल। तब खड़ीबोली से उपजल हिन्दी के बनाव-बिनाव आ विकास में, देश के हर भाषा के सहजोग मिलल। हिन्दी पट्टी कहाये वाला प्रदेश-प्रान्तन में आपन आपन भाषा-क्षेत्र आ समाज रहे। अवधी, ब्रजी, भोजपुरी, बुन्देलखण्डी, राजस्थानी, मैथिली, मगही, छत्तीसगढ़ी जइसन कतने बोली भाषा रहली सन। सबका समावेश आ पानी से हिन्दी सजल-धजल। उर्दू होखे भा बंगाली, मराठी, गुजराती सब अपना ढंग आ अपना भाषाई संस्कार से हिन्दी के सँवारल। देश आ ओकरा आन बान शान खातिर सबकुछ समर्पित करे में भोजपुरिया हमेशा से आगा रहल बाड़न। एही से राष्ट्रभाषा आन्दोलन का समय ओ लोगन के अपना मातृभाषा के सुधि ना रहल। बाकिर अतना सब कुछ कइला आ आजादी मिलला का बादो, हिन्दी राष्ट्रभाषा ना बन सकल, अंगरेजी ओकर पोंछ मड़ोरत रहे। तब्बो ले-देके राजभाषा बन गइल । सब जानत बा कि राजसत्ता आ नौकरशाही का सँगे देश के इलीट वर्ग के अंगरेजियत केतना कस के चँपले रहे। ई अंग्रेजी, हिन्दी का आगा खड़ा होके, लोकसत्ता आ ओकरा भाषा सब के चँपलस तवन चँपबे कइलस अउर बहुत कुछ नोकसान कइलस। देश के कवनो साँस्कृतिक भाषा के, अभिव्यक्ति का स्वतंत्रता का लिहाज से, बढ़े आ पनपे के मौलिक अधिकार रहे, जवना पर अंग्रेजी-हिन्दी का पक्षधरन के ध्यान ना गइल। लिखन्त-पढ़न्त वाला रचनात्मक रूप में भोजपुरी कबीर आ गोरखनाथ क भाषा भलहीं कहल सुनल गइल, हिन्दी का इतिहास में तेग अली आ हीरा डोम जइसन रचनिहारो ढुँढ़ाइल, रघुबीर बाबू आ मनोरंजन प्रसाद जी के नाँवों धराइल बाकिर भोजपुरी में, भोजपुरी के रचनात्मकता, आन्दोलन के रूप, आजादी का कुछ समय बादे पकड़लस। लेखन में गति पकड़लस ऊ पछिला पाँच दशकन में। शुरू शुरू में छिटफुट पत्रिको निकलली सन, भोजपुरी खातिर संस्थो बनली सऽ। लोग ओसे जुड़ के भाषाई रचनात्मक आन्दोलन के स्पीड बढ़ावल। दरअसल मंच आ अभिव्यक्ति के अवसर जुटावल आ लोगन के अपना भाषा में साहित्य रचना के प्रोत्साहनो दिहल माने राखेला।

कुछ प्रतिनिधि पत्र पत्रिका – जइसे भोजपुरी, भोजपुरी कहानियाँ (बनारस), अँजोर, उरेह, साहित्य सम्मेलन पत्रिका, भोजपुरी अकादमी पत्रिका (पटना), पाती (बलिया), भोजपुरी लोक (लखनऊ),समकालीन भोजपुरी साहित्य (देवरिया), भोजपुरी माटी (कोलकाता) आदि अपना बल बेंवत भर भोजपुरी लेखन के ललक जगवली सन आ स्तरीय लेखन खातिर प्रोत्साहित कइली सन।

भोजपुरी का नियति के सबले बड़का विडंबना रहे जनगणना में भोजपुरियन के मातृभाषा ‘‘हिन्दी’’ लिखवावल। माने लोगन का मातृभाषा वाला कालम में, भोजपुरी का बजाय हिन्दी लिखल आ लिखवावल। आज जबकि भोजपुरी भाषा के एगो सुगढ़, सुघ्घर साहित्य-भंडार तइयार हो चुकल बा आ ऊ आठवीं अनुसूची में शामिल भइला खातिर छटपटातो बिया, त कुछ लोगन क एगो छटंकी ग्रुप एगो नये वाद-विवाद के जनम दे दिहले बा। कुछ महान आत्मा अइसनो लोग बा, जे बिना पढ़ले जनले, भोजपुरी साहित्य में कविता का बढ़ियइला से चिन्तित बा। ओ लोगन के किसिम किसिम के अन्तर्विरोध आ चिन्ता भोजपुरिहन के माथा गरम करे में कवनो कसर नइखे छोड़त। एह लोगन के ई लागत बा कि भोजपुरी भाषा साहित्य पछोरल पइया हवे ! ई कि अगर एके मान्यता दिहल जाई, त हिन्दी के नइया डूबि जाई ! जइसे हमनी अस भोजपुरियन का भीतर हिन्दी से प्रेम हइये नइखे …मय ठीका उहे लोग लेले बा हिन्दी के। अइसनका लोग के हिन्दी प्रेम पर हम सवाल नइखीं उठावत, बाकि ओहू लोग के हमनी का हिन्दी प्रेम पर अँगुरी ना नु उठावे के चाहीं। हमनी का मातृभाषा का स्वीकार्यता पर, बेमतलबे कुराग अलापि के ऊ लोग कवनो भाषा भाषी के मिले वाला नैसर्गिक न्याय के गला घोंटत बा। स्वतंत्र भारत में, जवना भाषा के बोले वालन क संख्या बीसन करोड़ होखे, ओह भाषा के मान्यता के विरोध के मतलब साइत ओह लोगन के नइखे बुझात। एही क्रिया का प्रतिक्रिया में भोजपुरिहन में आक्रोश बढ़ल जाता ।

होखे के त ई चाहीं कि देश के हर संपन्न भाषा के, जवना के आपन समृद्ध रचनात्मक साहित्य बा आ ओकरा बोलवइयन क संख्या करोड़ो में बा, ओकरा लोकतांत्रिक अधिकार के सम्मानपूर्वक स्वीकार कइल जाव ।
ओके प्रोत्साहन आ मान्यता से वंचित कइला क मतलब असन्तोष बढ़ावल ! भोजपुरी के रचनात्मक आन्दोलन विषय पर चर्चा परिचर्चा, बात-बतकही का दौरान हमरा ई समझ में आइल कि कवनो भाषा के रचनात्मक आन्दोलन अन्ततः ओह भाषा के समृद्धि आ महत्व के दरसावेला, ओकरा सृजनात्मता के गति देला। भोजपुरी के, दोसरा कवनो भाषा से कवनो तरह के विरोध नइखे। होखहूँ के ना चाहीं। देश आ देश का बाहर के जतना भाषा सीखे जाने के अवसर मिले, सीखे आ ओकरा साहित्य के सरधा सम्मान से पढ़े के चाहीं, बाकि भुलाइयो के अपना मातृभाषा के व्यवहार छोड़े के ना चाहीं। अगर हमनी अपना भाषा के कुछ देहल चाहत बानी जा, त दोसरा भाषा से लेहल सीखे के परी। सब समझत बूझत बा कि ‘‘विविधता में एकता’’ माने जाने आ ओकरा के स्थापित करे वाला ई देश, ‘भाषाई-वर्चस्व’ वाला अँगरेजी फार्मूला के कबो स्वीकार ना करी। भोजपुरी अपना बोले वाला आ लिखे पढ़े वाला का कारन आगा बढ़त रही। केहू जानो भा मत जानो, मानो भा मत मानो बाकिर साँच आखिर साँच होला आ ओकर आँच तनी तिक्खर होला !


(भोजपुरी दिशाबोध के पत्रिका पाती के 84 वाँ अंक से साभार)

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