(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 16वी प्रस्तुति)

– गिरिजा शंकर राय ‘गिरिजेश’

गांव में प्राइमरी स्कूल खुलते चारो ओर खुशी के वातावरण छा गइल. एकरा ले पहिले सब डेढ़गांवा जात रहे. जहिया ना जायेके मन करे कोइरिया का संऊफ का खेत में घुसके सब बइठ जाय आ बीचे में गमछा बिछा के तास जमक जा. एक दिन ई खबर स्कूल पर पहुँच गइल आ खेदन मास्टर लइकन का साथे आके खेत में लुकाइल लइकन के पकड़ लिहलन. ओह दिन खूब पिटाई भइल रहे. कइगो बांस के कइन टूट गइली स. केतने जाना का पीठ पर गोहिया पड़ गइल रहे. गांवे स्कूल खुलल त सब एह बात से खुश रहे कि अब लइका पढ़ लिहें स. अब त आवत जात सब देखियो लेई. अब कहाँ सऊफ का खेत में लुकाये के मोका मिली.

राघो मास्टर पहिला मास्टर रहलन जवन स्कूल पर तबादला पर आइल रहलन. पूरा नांव राघव प्रसाद रहे बाकिर राघो मास्टर का नांव से सभ गोहरावे. ठिगना सरीर, गोल चेहरा, आंख पर मोट सीसा के चश्मा, आधा बांहि के खद्दर के कुर्त्ता, खद्दर के धोती, गांधी आश्रमी जूता, रंग सांवर, हाथ में बकुड़ी वाली छड़ी इहे उनकर पहिचान रहे. चलसु त छड़ीसे ठेघत-ठेघत चलसु. बाकिर पढ़ावे में एक नम्बर के रहले. लइका त तारीफ करबे कर सु. स्कूल के नांवो भइल रहे. उनकर गांव एहिजा से पाच-छः किलोमीटर होखी एहसे खली शनीचर के धरे जासु. अतवार के घरके काम करसु, सोमवार के फेनु स्कूल पर हाजिर हो जासु. अक्सर ऊं रुक जासु. स्कूल का बगले में बत्तक बाबू के दुआर रहे. ऊ ओहिजे रुक जासु आ हर लइका कीहें पारी बान्ह देले रहलन. साझ के त खियइबे करे सबेरहू के भार ओही पर रहे. छठवां छः मास केहू के नम्बर आवे एह से सब स्वीकार कइले रहे केहू विरोध ना कइल. घरन में भोजन करत राघो मास्टर घरऊ हो गइल रहलन. गांव में घर-घर के मेहरारू उनकर परिचित रहली स. सबकर उनकरा पर विश्वास रहे. गांव के पंचाइतो करसु. आज काल्हु त घरे-घरे विवाद बा. राघे मास्टर कीहें कवनो न कवनो मामिला आइल करे ऊ ओके सुलझा देसु. एह से गांव के लोग अउरी माने. एकरा बारे में उनकर कवनो सहयोगी डिप्टी साहब से सिकाइत क देले रहे जवना पर मास्टर साहेब के तबादला दूसरा गावें हो गइल रहे. जब ई खबर आइल त गांव के लोग के खिनिस चढ़ि गइल. ऊ लोग प्रधान का साथे जिला परिषद् का चेयरमैन कीहें धरना दे दिहलन. मजबूर होके तबादला रोके क परल. बाद में बेसिक शिक्षा अधिकारी का अधिकार में प्राइमरी स्कूल आ गइल. मास्टर साहब के लोकप्रियता देख के उनकर हिम्मत ना पड़ल कि फेनु कबों उनकर तबादला करो. केतने मास्टर अइलन गइलन बाकिर राघे मास्टर खैरा पीपर हो गइलन आ ना डोललन.

पता चलल मास्टर साहेब बेमार बाड़न. गांव भरके मरद-मेहरारू उनकर हाल-चाल लेबे खातिर गांव पर जमि गइलन. जे जाव फल फूल का साथे जाव. एतना फल आइल कि महिनवन मास्टर खइलन. गांव के नेह देखके ऊ निहाल रहलन. राघो मास्टर का तीन लइकिये रहली. तीनों क बहुत मानस. केहू लइका के बात करे त ऊ कहसु का लइका का लइकी. कुल्हि भगवाने के बनावल ह. नइखऽ सुनले कहल जाला कि लइकी जनमें ले त दू खनदान जुटे के बात होले. लइका जनमेंला त घरके देवालि दरक जाले. अंगना में डड़वार उठे के तइयारी हो जाले. मास्टर क बड़की लइकी का बियाह में सगरे गांव से नेवता गइल रहे, जवन बेटी के बियाह के भारे ना मास्टर पर पड़े दिहलस. देखते-देखत अउरी दूनो लइकिन के बियाह मास्टर क दिहलन. घर वर बड़ा अच्छा खोजले रहलन.

समय पांखि लगा के उड़त रहे. एक दिन खबर आइलि का राघव मास्टर रिटायर हो गइलन. गांव भर में ई बाति फइल गइल. जे सुने ऊ मास्टर कीहें आके पूछे. बाद में एगो शनदार विदाई समारोह के आयोजन कइल गइल रहे. सभकरा घरसे भेंट आइल. केतने आदमी त समारोह में बोलत के मास्टर साहब के स्नेह क चरचा करत भोंकारि मार के रोवे लगलन. मास्टर सबके धीरज बन्हावत कहलन ”आइल गइल त संसार के नियम ह. हमनी का सभे एह नियम में बन्हाइल बा. स्कूल से विदा होत बानी रउरा मन से कहां विदा होत बानी. हमरा मनमे आ रउरा मन में हमनी का सदा बसल रहब जा. जब बोलाइब तब हम आइब. केतना दूर गांव बंटले बा. आ सांचो रिटायर भइला का बाद काज-परोज में त मास्टर अइबे करसु ओहू तरे जब मन अगुता त भागल उधरनपुर चल आवसु. लोग उनकर ओहितरे भाव करे जइसे पहिले सब करत रहे.

मास्टर गांव में आवसु जेही कीहे मन करे ओकरा कीहें भोजन के कढ़वा देसु बाकिर रहसु बत्तके बाबू के दुआर पर. चाह-पानी के बेवस्था उनकर ओहिजा परमानंद रहे. रिटायर भइला पर पेंशन मिले. ऊ दूनो बेकति खातिर बहुत रहे. मास्टराइन एतना किफायत कके खरच करसु कि ओहू में बच जा. जमीन जवन रहे तवन मास्टर तीनों लइकिन का नांवे करवा दिहलन. एहसे उनकर दयाद उनकरा पर बड़ा नराज रहलन. उन्हन खतिर राघो मास्टर ले खराब आ खनदान के दीया बुझावे वाला केहू दूसर ना रहे. बाकिर मास्टर का एकर कवनो चिन्ता ना रहे. ऊ अपना धुन में रमल रहलन. गांव में तनिको जीव घबड़ाय त उधरनपुर के रास्ता धरसु. कबों कबों मास्टराइनो आ जासु. शादी बियाह में त मास्टर साहेब परधान रहसु. का का जलपान में बनी, खाये में का का रही. भण्डार के बेवस्था कइसे रही, परोसे वाला कइसन रहिहन जवना से खाना जियान न होखे ई कुल्हि के बेवस्था में राघो मास्टर क भूमिका प्रमुख रहे. मड़वा में कवनो बात बिगरे ना एह पर उनकर विशेष ध्यान रहे. कवनो मुद्दा उठ जा त ओके हल करावे में ऊ जीव जान लड़ा देसु.

ओह दिन राघो मास्टर जिलेबा भउजी कीहें बइठल रहलन. एहर ओहर के बात होत तीरथ-बरत पर बतकही होखे लागल. भउजी कहली मास्टर साहेब ! रउरा त खुदे दूसरा के गियान देइला हमका समुझाईं. अनपढ़-गंवार हई बाकिर एतना जानीला कि ई दुनिया मोह माया ह. आपन करतब कइला का बाद एह मोह का बंधन से निकले के चाही. एह तइयारी में तीरथ एगो कड़ी हउवन स. तीरथ कइला से मन में विराग जनमेला. रउरो कुछ तीरथ क आईं. हम त इहे कहब ई कुल्हि मोह माया के बाजार छोड़ी. अब त राउर तीरथ करे के उमिरो हो गइल बा.

भउजी के बात सुनके राघो मास्टर का चेहरा पर एगो हल्लुक हंसी आइल फेनु कहे लगलन – रउरा ठीके कहत बानी हम ओकरा खिलाफ नइखी बाकिर आपके बतावत बानी कि हम ‘कन्या तीर्थ’ कइले हईं. तीन-तीन बेटिन के कन्या दान कइले हईं. शास्त्रन में लिखल ह कि –
तिस्त्र कन्या यथान्याय पालयित्वा निवेद्य च
न पिता नरके याति नारी वा स्त्री प्रसूयिनी.
अर्थात् जे तीन कन्याओं को विधिवत पाल-पोस कर उन्हें योग्य वर को ‘दान’ करता है. उसे नरक की प्राप्ति नहीं होती. मुझे गर्व है कि मैंने अपनी तीन बेटियों का दान दिया है. एतना कहला का बाद मास्टर साहेब का चेहरा पर एगो तेज चमक गइल, जवना में संतोष झलकत रहे. ऊ कहले एह तीर्थ कइला का बाद अब के तीर्थ करे. एहसे बड़हन तीर्थ कवनो नइखे. लोग कहेला कि बेटा उद्धार करेला हम एके सोच के तनिको चिन्तित नइखी. काहें कि अपना लइकिन पर हमरा गर्व बा. उन्हनी का हमार सबकुछ बाड़ी स. उन्हन बिना हम जीये के कल्पना ना क सकी.

राघव मास्टर कहलन – हमहूं रउरा से उहे कहलीं ह जवन हमरा मन में आइल ह. लइका-लइकी में हम कवनो फर्क ना करी. आ ई त भगवान के मरजी ह. ऊ ना जानत होखिहें कि बेटा ना भइला से एकर मुक्ति ना होई ? अगर एके जानत होइतन त बेवस्था करतन. ई कुल्हि आदमी के बनवल ह. भगवान के त जबरन घुसेड़ दिहल बा.

भउजी फेनु बिचहीं में टोकली, मास्टर जी, हमार ई ना विचार रहल. ओकरा पीछे एगो भावना रहलि ह. जमीन-मकान लइकिन का नावें तूं झटके में क दिहल. तोहार दयाद जनबे ना कइलन. अगर बात फूट गइल रहित त तोहके ऊ कबों ना लिखे दिहले रहतन स. एह बात के लेके बड़हन बवण्डर उठि गइल रहित. एह बात पर गांव भर उन्हन का साथे बा. गांव में कवनो दूसरा कुरी के लोग भा नवासा ना रहे दिही लोग. तूं अकेल पड़ जइब. ई सही बा कि कानूनी रूप से राउर पछ मजबूत बा बाकिर समाजो त कवनो चीज ह. ऊ नराजगी अबही आजो बा. हम चाहत रहलीं ह कि तीरथ का नाव पर कुछ दिन हटि जइतीं त मामिला ठंढा जाई. फेनु के केके पूछत बा.

मास्टर साहब हंसत कहलन – अरे हमार केहू कुछ ना करी. रउरा हमार हित-मीत बानी एही से हमार भलाई सोचत बानी. अबहीं बात होते रहे तबले एगो लइका आइल आ कहलस कि बत्तक बाबू बोलवले ह. मास्टर साहेब तुरते बत्तक बाबू का दुआर पर अइलन. बत्तक बाबू कहलन – हई छांगुर भई बइठल बाड़न. एह लोग में बंटवारा रउरा काहें नइखी करवा देत. कहत बाड़न कि कई दिन ले धउरत हई बाकिर मास्टर साहब के मोके नइखे लागत.

राघो मास्टर कहलन – बत्तक बाबू उधरनपुर में कवनो परिवार अलगा होला त ना जानी काहें हमार मन दुखित हो जाला. पूरा गांव एक परिवार बा एह में कवनो टूटन हमके नीक ना लागे बाकिर जब चलावं नइखे त हम बटवारा त कराइये देव. चलऽ छांगुर लट्ठा आ जरीब लेले चलिहऽ. लट्ठा-कठा होखी तवन जोड़ घटाके निकाल देब. छांगुर के लेके राघो मास्टर बंटवारा करावे चल गइलन.

ओह दिन पूरा उधरनपुर में कोहराम मच गइल रहे. सबेरे मुनेसरा खबर लियउवे कि राघो मास्टर मू गइलन. काल्हु साझ ले ठीक रहले ह. खाना खाके राति के सुतुवन त मस्टराइन से कहत रहुवन उधरनपुर गइले कई दिन हो गइल बा. काल्हु ना होखे त तूहूं चल. मास्टराइन हामी भर दिहुवी. आज सबेरे जब मास्टर साहेब ना उठलन हा त ऊ जगावे गइली ह. मास्टर साहेब पांचे बजे उठ जात रहलन ह. जब झकझोर के उठउवी त मास्टर साहेब क मूंडी एक ओर लटकि गइल रहुवे. सुतले में उनकर प्राण शरीर छोड़ दिहले रहुवे. गांव के लोग राघो मास्टर का गांवे पर उनका घरे पहुंच गइल. कई अदमी आ मेहरारू भोंकार मारि के रोवत रहुए.

राघो मास्टर के लाशि टिकठी पर कफन ओढ़ाके सुतावल रहुवे. क्रिया कर्म करे से, दाग देबे से देयाद इनकार क देले रहुवन स. दयादन के कहनाम रहुए कि लाश हमनी का श्मशान घाट पहुंचा देइब जा बाकिर मुखाग्नि हमनी का ना देइब जा. मास्टराइन रोवत सुसकत लोगन से हथजोरिया करत रहुवी बाकिर केहू तनिको ना पसिजुवे. सब सोचमें रहुवे कि का होई. एही बीच में उनकर तीनों बेटी, दमाद एगो वकील साहब का साथे चहुँपले. वकील साहब कहलन कि राघो मास्टर के अंतिम इच्छा रहल ह. हम ओके सुना देत बानी ओही का अनुसार किरिया कर्म होखी. वकील साहब पढ़े लगले – ‘हम राघवेन्द्र प्रताप पूरा होशोहवास में लिख रहल बानी कि हमरा मुअला पर हमरा मुंहे आगि हमार बेटी दमाद दीहे. खासतौर पर ई काम छोटकी बेटी आ दमाद का जिम्मा सौंपत बानी. बाकी क्रिया कर्म हमार दूनो बेटी दमाद करिहें. दयाद लोग हमार लाश मत छुई. हमरा कवनो पछतावा नइखे. बेटिन पर हमरा गर्व बा.’

वकील साहब पढ़ि के चुपा गइलन. इहे भइबो कइल. राघव मास्टर क लोक परलोक दूनो पूरा भइल. पुरान रूढ़ि तूरि के नया बिचार के स्थापना का सांथ.


पिछला कई बेर से भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के पूरा के पूरा अंक अँजोरिया पर् दिहल जात रहल बा. अबकी एह पत्रिका के जनवरी 2012 वाला अंक के सामग्री सीधे अँजोरिया पर दिहल जा रहल बा जेहसे कि अधिका से अधिका पाठक तक ई पहुँच पावे. पीडीएफ फाइल एक त बहुते बड़ हो जाला आ कई पाठक ओकरा के डाउनलोड ना करसु. आशा बा जे ई बदलाव रउरा सभे के नीक लागी.

पाती के संपर्क सूत्र
द्वारा डा॰ अशोक द्विवेदी
टैगोर नगर, सिविल लाइन्स बलिया – 277001
फोन – 08004375093
ashok.dvivedi@rediffmail.com

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