(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 19वी प्रस्तुति)

– अनन्त प्रसाद ‘रामभरोसे’

भोजपुरिहा कतनो परेशानी में रहिहन, मोका पावते केहू से हँसी-मजाक करे से बाज ना अइहन. केहू के रिगावल आ रिगला पर लिहाड़ी लिहल, एने का लोगन के एगो मनोरंजन के साधन ह. मान लीं केहू के घरे लगहर के नाँव पर एगो बकरियो ना होखे आ अगिला उनसे माठा माँगे लागो, त ऊ का कहिहन ? एक-दू दिन त कहि दिहन कि माठा नइखे. बाकि जब रोज-रोज उनसे माठा मँगाए लागी त ऊ लखेदबे न करिहन ! चिढ़े वाला भा रिगे वाला अइसने आदमी रिगवनी कहालन.

केहू के हाले चाल दू चार बेर पूछ लिहल जाव – ‘काहो खूब मउज बा नूं’ त ऊ रिग के जवाब दिहन – ‘तुहूं मउज में रहऽ, तोहरा के, के रोकले बा’ ? केहू के देख के जो छींक दीं भा खोंख दीं, त एक दू बेर त ऊ ना बोलिहन, बाकि ओकरा बाद रिग के अस लखेदिहन कि भागे के परि जाई.

एक बेर के बात ह, हम बस से केहू क बरियाती जात रहलीं. पीछे के सीट पर कुछ नवहा बइठल मसखरी करत रहलन. कवनो कहलस – चलऽ लोग, चलते चलत ओइजा खूब बढ़ियाँ-बढ़ियाँ मिठाई मिली. खूब चाँपल जाई. दू-चार सीट आगे बइठल एगो अधबुढ़ कहलन – हँ-हँ चलऽ सन, चलते चलत गरम-गरम अदरखी मिली, खाये के. खूब खइहऽ सन. लइकन खातिर त अतना बहुत रहे. एगो मसाला मिल गइल उनहन के रिगावे के. कुछ देर बाद कवनो कहलस – ए बाबा अदरखिया बा नू ?

बाबा कहलन – चलऽ सन, ओहजे मिली अदरखी.

बस आगे भागल जात रहे. लइकन के दिमाग ओहू से तेज खुराफात में भागत रहे. रुक के फेरू कवनो कहलस – ए बाबा अदरखिया ? ए ससुरा ओइजा नूँ मिली कि हम धइले बानीं – अबकी फेरू बाबा कहलन. थोड़ देर बाद फेरु ऊ अदरखी मँगलस. अइसहीं जब कइ बेर अदरखी माँग चुकल त बाबा के पारा गरम हो गइल. बसे में बिगड़ के खड़ा हो गइलन. लगलन गारी देबे. ऊ त गनीमत रहे कि बस ठसाठस भरल रहे. बाबा आ लइकन के बीच में लोग खाड़ रहे, ना त बसे में बाबा उनके ठीक से अदरखी दे देतन. लइको अइसन कि ऊ माने के तइयारे ना. अब त ओकरा सँगे-सँगे अउरियो लइका उनसे अदरखी मांगे लगलन. बरात से लौटला के बादो लइका उनके देख के उनसे अदरखी माँगे लगलन. जब कवनो उनसे अदरखी माँगे त ऊ गरिआवत दउरस – ले आउ रे भाला, साला के छेद दीं. ई अइसे ना मानी. लइका भाग जा सन आ ऊ कूदत रहि जास.

कुछ बड़ो-बुजर्ग कबो-कबो लइकन से अइसहीं रिगवा के मउज लेलन. पइसा भा मिठाई के लालच देके लइकन से रिगे वालन के रिगवावत रहेलन. एगो गाँव में एगो आदमी घीव मंगला पर रिगे. गाँवें में एगो धनी-मानी बाबू साहेब रहलन, बहुत मजकिहा. एक दिन उनका दुअरा मंदिर के पुजारी अइलन आ ठाकुर जी के दीया-बत्ती खातिर घींव के माँग कइलन. बाबू साहेब कहलन – पुजारी जी. हम त फलाना के घरे घीव खरीद के रख देले बानीं, जाईं माँग लीं. ऊ दे दिहन. पुजारी नां जानत रहलन कि घीव मँगले से ऊ रीगेलन. पुजारी जी उनका दुआर पर गइलन. जा उनकर नाँव लेके बोलवलन. संजोग से ऊ घरे में रहलन. घरे में से बोललन – के हऽ, का बात ह ?

बाबू साहेब जवन घिउआ रखले बाड़न ऊ हमके दे द ! पुजारी कहलन. भीतर से आवाज आइल – आवऽ भीतरे ले लऽ.

पुजारी जी जब भीतर गइलन त मरद-मेहरारू दूनों उनका पर टूट परलन. दू-चार हाथ लागते बाप-बाप करत ओइजा से भाग चललन. पंडित जी अवाक रहि गइलन कि आखिर अइसन कवन बात हो गइल कि मरद मेहरारू दूनो एक्के बेर पर गइलन स. पुजारी जी खुनुसइले बाबू साहेब के दुआर की ओर चलि दिहलन.

बाबू साहेब त कुल्हि बुझते रहलन. उनका आवे के पहिलहीं घर में से मजिगर घीव एगो डिब्बा में मँगवा के दुअरा चउकी पर रखवा दिहलन. अपना नौकर के कुछ सिखा के ऊ दुआर छोड़ के हटि गइलन. पुजारी जी तमतमाइले बाबू साहेब के दुआर पर अइलन. नौकर उनके देखते गोड़ लगलस आ कहलस – रउआँ रस्ते में होखब, तले उनकर लइका घीव दे गइल हा. ऊ बतावत रहले हा कि ओकर बाबू के दिमाग तनी गड़बड़ा गइल बा, डाक्टर के देखावे के बा. घीव रखि के जल्दिए में लौट गइल हा. बाबू साहेब ओही के देखे गइलन ह. कहलन हा कि पुजारी जी आइब त ई घीव दे दीहऽ. पुजारी जी का अब बुझाइल.

जे केहू के रिगावेला ऊहो मामूली आदमी ना होला. ओकरो में कुछ विशेषता होला. अइसन आदमी बहुत पिटमरू होलन. केहू कतनो खुनुसाय भा गारी देव, एह आदमी पर कवनो असर ना होला. खुनुसाए के त अइसन आदमी नाँवे ना जाने. केहू के रिगावतो समय ऊ बहुत सतर्क रहेलन. रिगवनी भाई के लपकते भाग खड़ा होलन. अइसन आदमी बहुत बेवहारिक आ शिष्टो होलन. जेके ई रिगावेलन उनहूँ के कहीं देखिहें त गोड़ जरूर लगिहें – गोड़ लागीं बाबा भा गोड़ लागीं काका. बाबा-काका त सोचिहन अब ई सीध हो गइल बा बाकिर मोका पावते फेरु उनके रिगावे से बाज ना अइहन. कुछ रिगवनियो अइसन होलन कि जले उनके केहू रिगावे ना आ भर पेट गरिया ना लेव, तले उनके चैने ना आवे. एगो रिगवनी भाई के जब दिन भर केहू ना रिगावे त सांझि खा दुअरा बइठल अंड़िचे लागस – आज बड़ा बढ़िया से दिन बीतल, कवनो ससुरा आजु ना रिगवलस. ई सुनते लइका फेरु रिगावे शुरू क दे सन आ ऊ लागस गरिआवे.

बहुत दिन पहिले के बात ह. कवनो गाँव में एगो रिगवनी के लड़िका रिगावल करँ सऽ. कवनो नवसिखुआ लइका रिगवलस त धरा गइल. रिगवनी भाई उनकर मरम्मत क दिहलन. लइका घरे रोअत गइल त ओकर बाबू गाँव के जमींदार से जाके शिकायत कइलन आ पीटे वाला रिगवनी के दण्ड देबे के निहोरा कइलन. जमींदारो साहेब बहुत खुनुसइलन. कहलन – बतावऽ, तनीं रिगवला खातिर लइका के मारे के चाहीं भला. रिगवनी के दरबार में हाजिर कइल गइल. रिगवनी के साथे जे गइल रहे ऊ लोग इनकर सिपारिस कइल. ओह लोगन के कहनाम रहे कि गारी आ मार के अनमख माने वाला के केहू के रिगावहीं के ना चाहीं. जे रिगावेला ऊ मारो खाये भा गारी सुने खातिर तइयार रहेला. जमींदार साहेब एह दलील से संतुष्ट ना भइलन. एक हफ्ता बाद दूनो पक्ष के आवे के कहि के उठि गइलन.

ओही गाँव में एगो आदमी रहलन – भुआली. ऊ बड़ा बुद्धिमान रहलन. केहू के रिगावे में त बड़ा तेफा रहलन, बाकि जब एह रिगवनी पर आफत आइल त ऊ चिंतित हो गइलन. एके कसहूँ बचावे के उपाय सोचे लगलन. ऊ मने मन एगो योजना बनवलन. कवनो से कहलन – जा जमींदार साहेब से तनी चटनी माँग ले आवऽ, उनका घरे बड़ा नीक चटनी बनेला. उनसे कहिहऽ – भुवाली काका के घरे तिलकहरू आइल बाड़न, तनी चटनी दीं.

लइका गइल त जमींदार साहेब अपना मेहरारू से चटनी मांग के दे दिहलन. चटनी सचहूं बड़ा नीक रहे, गड़ी-किसमिस कुल्हि डालल रहे ओमे. जब लइका चटनी ले के आइल त भुआली कहलन – ई तूंहूँ चाट लऽ. लइका के जीभ से त पानी चुअते रहे, ऊ चाट लिहलस. भुआली कहलन – जा तनीं अउर चटनी माँग ले आवऽ. कहिहऽ – तनी अउर दे दीं, खाये वाला आदमी ढेर बाड़न. लइका गइल आ तनी अउर माँग ले आइल. भुआली परीक गइलन. अब रोजे-रोज लइकन के जमींदार साहेब के घरे चटनी खातिर भेजे लगलन. दू चार दिन में जमींदार साहेब उबिया गइलन.

भुआली गाँव के अउरियो लइकन के जमींदार साहेब से चटनी माँगे के सिखा दिहलन. उनहन से कहलन – जमींदार साहेब के घरे अतना बढ़िया चटनी बनेला कि चिखले पर बुझाई. जेही उनसे माँगे जाला ओके दे देलन. अब त सगरी लइका उनसे चटनी माँगे लगलन. जमींदार साहेब रीके. चटनी के नाँवे सुनत लखेद लेस. धीरे-धीरे एक हफ्ता बीत गइल. दूनो पक्ष जमींदार साहेब के दरबार में हाजिर भइल. एक ओर एगो आदमी कपार पर घइली लेले खड़ा रहे. जमींदार साहेब पुछलन – ई घइली में का ह ? घइली वाला आदमी बोल ता – सरकार ई चटनी ह, भुआली भेजलन हा. ई सुनते जमींदार साहेब ओके पकड़ के पीट दिहलन. अब जब ऊ फैसला करे अपना आसन पर बइठलन त दूनो ओर के आदमी बारी-बारी से आपन बात कहे लागल. रिगवनी के ओर से सफाई देबे के जब पारी आइल त भुआली कहलन – ए सरकार रउएँ रिगावे वाला के मार दिहलीं त का राउर फाँसी होई ? ऊ रिगवलस, ओकर सजा ऊ पा गइल. रिगावल एही खतिर नूं जाला. जेकरा गारी-मार के लाज रही, ऊ रिगइबे काहें करी ?

जमींदार साहेब के भुआली के बात ठीक बुझाइल. आपन फैसला सुनावत ऊ रिगावे वाला से मुसुकियात कहलन – जा भाग जा एइजा से, अब मत रिगइहऽ ना त ई फेरु तोहरा के पीट दिहन. तूँ अभी नवसिखुआ बाड़ऽ.


पिछला कई बेर से भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के पूरा के पूरा अंक अँजोरिया पर् दिहल जात रहल बा. अबकी एह पत्रिका के जनवरी 2012 वाला अंक के सामग्री सीधे अँजोरिया पर दिहल जा रहल बा जेहसे कि अधिका से अधिका पाठक तक ई पहुँच पावे. पीडीएफ फाइल एक त बहुते बड़ हो जाला आ कई पाठक ओकरा के डाउनलोड ना करसु. आशा बा जे ई बदलाव रउरा सभे के नीक लागी.

पाती के संपर्क सूत्र
द्वारा डा॰ अशोक द्विवेदी
टैगोर नगर, सिविल लाइन्स बलिया – 277001
फोन – 08004375093
ashok.dvivedi@rediffmail.com

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