– डॉ॰ उमेशजी ओझा

UmeshOjha

सरोज एगो कम्पनी मे काम करत रहले. अपना पत्नी आ दूगो बेटा, सबीर आ शेखर, का साथे आपन चारिगो आदमी के छोट परिवार में मस्त आ हँसी खुशी से रहत रहले. बाकिर दूनो बेटा आवारा किस्म के रहले. ओह में से उनकर बड़ बेटा बेसी चालाक रहल बाकिर पढ़े लिखे में तनिको धेयान ना देत रहल. एक दिन सरोज अपन बेटन से बोलले कि,
‘अरे, रे सबीरवा, शेखरवा, तहनी के आपन जिनगी के सोचऽ सँ रे. हमरा कतही कुछ हो गइल त तहनी के भिखिओ ना मिली.’
‘अरे बाबुजी, का कहत बानी? हम नौकरी थोड़ही करब. हम त एकेहाली अमीर बनब. देखिलेब.’ – शेखर कहलसि.
‘हँ-हँ, काहे ना. तोहरा जादू के छड़ी जे मिले वाला बा, जेकरा घुमावते आ आँखि बन्द होखते ते करोड़पति बन जइबे.’
‘अइसने होई, बाबुजी.’

कम बोले वाला सबीर अपना भाई आ बाबुजी के बात चुपचाप सुनत रहल. जब सरोज बोलि के चुप हो गइले त कहलसि, ‘अरे शेखरवा, बाबुजी ठीक कहत बानी, हमनी के आपन जिनगी के सोचे के चाहीं.’
‘तू सोचऽ भईया.’
‘एकर मतलब कि ते बाबुजी के बात नइखिस मानत?’
‘एकदम ना.’
‘त ठीक बा, जइसे तोरा रहेके बा रहु.’

शेखर एगारहवी में पढ़त रहले. आपन भाई आ बाबुजी से बात क के अपना इसकुल चलि गइल. सबीर एगो गैराज में काम करत रहले. उहो आपन काम पर चलि गइले. बाकी केकरा मालुम रहे कि सरोज के मुँह से जवन बात निकलत बा आजुए साँच हो जाई. सरोज जब आपन काम प जाये लगले त एगो सड़क घटना में उनकर मौत हो गइल. ओकरा बाद त दुनो भाईयन प पहाड़ टूट गइल. सबीर त कवनो निहन गैरेज में काम क के आपन रोजी-रोटी चलावे लगले बाकिर शेखर घर के आर्थिक तंगी के चलते आपन पढ़ाई छोडि के एगो फूल के दुकान में काम करे लगले.

फूल के दुकान प दिन भर खाली बइठल-बइठल सोचत रहले कि, ‘कहीं से कवनो अमीर घर के लईकी मिल जाइत त ओकरा के फँसा लिहिती आ ओकर सब सम्पति पर कब्जा कर लिहिती जेकरा से जिनगी सवर जाइत.’ ऐही सब उधेड़ बुन में शेखर रहे लगले. एक दिन शेखर के फूल दुकान प बापी आपन मेहरारू श्यामा, बेटी सोनल आ प्रयासी के साथे फूल लेवे अइले. फूल लेत घरी बाते-बाते मे शेखर के मालुम भइल कि बापी एगो बड़ कम्पनी में इंजिनियर बाड़े आ उनका सन्तान में दूगो लइकिये बाड़ी सँ, लइका नइखे. अतना जानकारी मिलला प शेखर के मन मे आपन सपना सकार करे के उम्मीद जाग गइल. कहलसि,
‘चाचा, हमरा दुकान प बढिआ-बढिआ ताजा फूल मिलेला रउरा त फूल के खुबे शौकिन बुझात बानी. अइसन करीं कि आपन पता दे दिही, जब रउरा फूल के जरूरत होई हमरा के फोन क देब हम रउरा घरे फूल पहुँचा देब. जब हमरा से रउरा सभे के जान पहचान हो गइल त रउरा सभे के फूल खातिर दुकान आवे के जरूरत नइखे.’
‘अरे ना बेटा, जब फूल लेबे के मन करि त तहरे दुकान से फूल लेब, कम से कम एही बहाने घूमे के त मिल जाला.’
‘बात त रउरा ठीक कहत बानी, जइसन राउर मरजी, चाचा.’

ओकरा बाद शेखर उ लोगन के आपन दुकान प रोज आसरा देखे लगले. दू महीना बाद फेरू बापी आपन बेटी सोनल का साथे शेखर के दुकान प फूल लेबे अइले. उ लोगन के देखते शेखर खुश होत कहले, ‘आईं-आईं, चाचा, ढेरि दिन के बाद दुकान प आवत बानी.’
‘हऽ, शेखर पहिले ई बताव कि कइसन बाडऽ बेटा? ऐने कुछ दिन से शहर मे ना रहनी ह जेकरा चलते दुकान प ना आवे सकनी.’
‘अच्छा चाचा, कहीं कवन फूल लेब?’
‘बस दू चार गो गुलाब फूल दे दऽ.’
‘कइसन बाड़ू सोनल, चाचा जी ना रहीं त कम से कम तू आ जइतु फूल लेबे?’
‘ठीक बानी, बाबुजी घर मे ना रहीं, आ घर मे ईंहा के छोडिके अवरू केहु फूल के शौकिन नइखे एहि से ना अइनी.’

संजोग कि कुछ दिन बाद बापी अपना परिवार के साथे शेखर के घर का सामनही वाला घर भाड़ा प ले के रहे आ गइले. दोसरा दिन शेखर जब सबेरे उठले त उनकर नजर सोनल प पडल. सोनल के देखते शेखर खुशी से कूदे लगले. सोनल के लगे जाके चिहाइल कहलें, ‘अरे सोनल, तू एहिजा कइसे? आ अतना सबेरे?’
‘काहे का हो गइल? हम एहिजा नइखी आ सकत का, कवनो बात बा का?’
‘अरे ना बाबा, काहे नइखू आ सकत. हम त खुशी पागल हो रहल बानी कि अब हमार सपना जल्दी पूरा हो जाई.’
‘कवन सपना, आ कइसन सपना?’
कुछ देर चुप रहला के बाद शेखर तपाक से बोलले, ‘तहरा से प्रेम बिआह करेके सपना.’
सोनल के काठ मार दिहलस. ई शेखरवा का बोलत बा, कहीं ई पागल त नइखे हो गइल. पहिलहु अजब करते रहे. बाकिर कुछ कहली ना, चल गइली.

अब शेखर, बापी के घरे आवे जाए लगले. आ सोनल के एक नजर देखे खातिर रोज सोनल के घर के अगल-बगल चक्कर लगावे लगले. धीरे-धीरे दुनो में पेयार के बिया अंकुरे लागल आ कुछ दिन बाद सोनल शेखर से बतवली कि उनकर बाबुजी उनका के पसन नइखन करत. काहे कि उ फूल के दुकान में काम करत बाड़े. एह प शेखर फूल के दुकान के नोकरी छोड़ दिहले आ एगो कम्पनी के ठीकेदार का लगे काम करे लगले. ठीकेदार के नोकरी में शेखर के बढिया पइसा मिले लागल बाकिर दुकान में काम करे का दौरान उनकर दोस्ती नशाबाजन से हो गइल रहे आ शेखरो के लत धरा गइल रहे. जेकरा से उनका आपन मेहनताना मे मिलल पइसो कम पडे लागल रहे. काम प रहे के चलते शेखर के आपन ईयारो लोग से भेंट ना होत रहे. तीन चारि महिना नोकरी कइला का बाद शेखर आपन नोकरी छोडि दिहले. आ फेरू से ओही फूल के दुकान के प आ गइले. अबकि हाली शेखर आपन फूल के दुकान खोल लिहले. एक दिन शेखर अपना दुकान ला फूल लेवे कलकता गइले त देरि राति के वापस अइले. खाना खाके सुत गइले. रोज निहन ओहू दिने शेखर सुति के उठले त सबेरे-सबेरे अपना घर के दुआरि प निकली के सोनल के खोजे लगले. बाकि ओह घर मे केहु ना लउकल. एह प शेखर जोर से चिलईले, ‘माई, सामने वाला घर मे केहु नइखे?’
‘काहे, का बात बा? काहे पुछत बाड़ऽ?’
‘ना, कवनो बात नइखे. बस ना लउकल हा लो लोग त पूछ देनी ह.’
‘का कहीं, बस अतने जानत बानी कि उ लोग घर खाली क के कहीं चलि गइल. कहाँ गइल लोग सेमालुम नइखे.’

कय दिन ले शेखर ओह लोगन के पता करत रहले. एह बीच बुझाव कि उ पागल हो गइल बा. दू चारि दिन बाद शेखर के मालुम भइल कि बापी के एगो सड़क घटना मे एगो गोड़ काटे के परल ह, आ एहि बीचे उ कम्पनी से ई.एस.एस. ले के कम्पनी के क्वाटर में परिवार के साथे रहत बाड़न. पहिले से जान पहचान होखे के चलते फेरू से शेखर उ लोग के घरे आवे जाए लगले.

रोज जाके बापी के हाल चाल पूछत रहले. एह बीच शेखर आ सोनल के बातचीत बढ़त चलि गइल. शेखर सोनल के प्यार में पागल हो गइले. कतही उनकर मन ना लागत रहे. जहवाँ काम करस वोहिजा से दो चारि महीना में काम छोडि देत रहले. बीच-बीच में शेखर सोनल से उनकर बाबुजी के धन जायदाद के बारे में पुछत रहले. बात-बात मे शेखर के सोनल बतवली कि उनकर बाबुजी उनका नाम से एक लाख रूपया बैंक में जमा करवा दिहले बाडन. इ सुनिके शेखर के मन मे पहिले से पोसात लालच अब जनम ले चुकल रहे. अब उ सोचे लगले कि ओकरा के साकार कइसे कइल जाउ. जब सोनल के नाम प एक लाख जमा कइले बाड़न त उनका ई.एस.एस. में अउरि पइसा मिलल होई. कवनो उपाई से अगर सोनल से बिआह क लेत बानी त जीवन सुधर जाई. सोचत सोचत शेखर एगो योजना बनवले कि काहे ना सोनल के लेके भागि जाईं आ ओकरा से बिआह क लिही. कम से कम सोनल के लगे जवन पइसा बा उ त उनकर हो जाई. एहि योजना मे सोनल के भगा के बंगाल ले गइले आ वोहिजा एगो मंदिर मे बिआह क लिहले.

‘सोनल, आजु से हमनी के एगो नया जिनगी के शुरूआत बा.’
“हँ, शेखर.’
‘अइसन करी जा कि आजु के राति हमनी के एगो ईयादगार राति मनाई जा. जवन जिनगी भर ईयाद रहो.’
‘ठीक बा शेखर.’

दोसरा ओरि बापी के आपन बेटी के खोज-खोज के बुरा हाल होत रहे. थाकि-हारि के बापी आपन बेटी के अगवा करे के केस करे खातिर थाना के ओरि चल दिहले. तबहीं उनकर मोबाईल फोन के घण्टी बाजल. ‘हेलो, के बोलत बा?’
‘हम बाबुजी, गोड़ लागत बानी, हम सोनल बोलत बानी.’
‘कहाँ बाडू बेटा? अबही तकले फोन काहे ना कइलु ह? तहरा मालुमो बा कि तहार माई कतना बेचैन बाड़ी?’
“हँ बाबुजी, रउरा सभे बिना एको छन मन नइखे लागत. अबही बंगाल आइल बानी आ बढिआ से बानी.’
‘तू बंगाल कइसे गइलु हा, आ केकरा साथे? हम त तहरा के अगवा करे के केस करे थाना जात रहनी ह.’
‘ना बाबुजी, अइसन मत करबि. हम शेखर के साथे आइल बानी आ हम रउरा से माफी मांगत बानी. हमनी के दुनो बिआह क लेनी जा.’
‘का बोललु हा? बिआह?’
‘हँ बाबुजी.’
‘हमरा आ अपना माई से बिना पुछले? तू त हमनी के सभ खुशी प पानी फेर दिहलु. आजु से समझिह कि हमनी के तहरा खातिर मरि गइल बानी.’
‘ना बाबुजी, अइसन मत कहीं.’

ओकरा बाद बापी अपना बेटी के एको आवाज ना सुनले आ फोन काट दिहले. आ थाना के गेट से वापस घरे आ गइले. घरे आके अपना पत्नी से सोनल के बारे मे बतवले. श्यामो अपना पति के बात के साथ दिहली आ सोनल से बात कइल छोड दिहलि. जब सोनल आ शेखर बंगाल से आइल लोग त शेखर सीधे सोनल के अपना घरे ले गइले. एके शहर के रहे के चलते बापी जादा दिन तकले सोनल से नाराज ना रह पवले. एक महीना होत-होत सब कुछ बराबर हो गइल. धीरे-धीरे सोनल आ शेखर, बापी के घरे आवे जाए लगले. एह बीच शेखर आपन मकसद भुलाइल ना रहले. एक दिन शेखर सोनल का साथे ससुराल गइले. ओहिजा जाते सोनल ‘रउरा सभे बइठीं, हम चाह बना के ले आवत बानी’ कहि के रसोई घर मे चलि गइली. आ शेखर अपना सास श्यामा अउर ससुर बापी का साथे पहिलके रूम मे बइठ गइले. थोड देर में सोनल चाह लेके आ गइली. शेखर मौका के तलाश में रहले रहन. धीरे से कहले ‘बाबुजी, हम राउर दामाद हईं. हमरा लगे कवनो नोकरी नईखे. अइसन करीं कि कम से कम डेढ़ लाख रूपया दिहीं जेकरा से एगो कार लेके भाड़ा प चलाईं जेहसे हमनी के रोजी रोटी ठीक से चल सके.’
‘बिल्कूल ना. तू हमरा बेटी से बिआह कइले बाड़ऽ. कइसे रखबऽ तू समझऽ. हम एगो फुटलो कउड़ी ना देब. अपना बलबुते प कमा के देखावऽ. कहीं अइसन त ना सोचले रहलऽ कि सोनल से बिआह क के हमार जायदाद ले लेबऽ?. अनकर धन प बिकरम राजा वाला हाल होखे.’
बापी के बात सुनिके शेखर के बड़ी खराब लागल. कहले, ‘ठीक नइखीं करत बाबुजी. बहुत खराब होई.’
‘धमकी देत बाड़? जा जवन होई देखल जाई.’

घरे आके शेखर आखिरी चाल अपना पत्नी प चलले, ‘सोनल तहरा नाम प जवन पइसा बा ओकरा प त हमरो अधिकार बा नू? काहे कि बिआह भइला प मरद मेहरारू के हर सामान प बराबर के हक हो जाला. अइसन करऽ कि तू उ पईसा हमरा के दे दऽ. अइसे ना त करजे समझि के दे द. कमा के तहार पइसा वापस क देबि.’
‘अरे ना, अइसन नइखे हो सकत, उ पइसा त अबहींओ बाबुजी के अधिकार मे बा. जब हमरा मिली तब नू. बाकि रउरा कइसन मरद बानी कि अपने कमाए का जगह हमरा बाबुजी से पइसा माँगत बानी आ हमरा पासे जवन जमा पूंजी बा ओकरा के बरबाद करे प तुलल बानी?’

एने बापी के कम्पनी के नियम के अनुसार उनका एगो आश्रित के नोकरी मिले वाला रहे. जेकरा खातिर आपन छोट बेटी प्रयासी के बी.सी.ए. करवावत रहले. एकरा अलावे प्रयासी के नोकरी खातिर कम्पनी मे पंजियनो करवा देले रहले. एह बात के जानकारी भइल त शेखर एक दम पागल हो गइले. सोचे लगले कि अब उ आपन ससुराल के वारिस कवनो हालत मे बनिए के रहिहें. शेखर आपन मन के बात अपना ईयार लोग के बतवले. बात सुनला के बाद शेखर के दोस्त रिंकू कहले, ‘अइसन करीं जा कि तहरा ससुराल के सब लोग के मारि दिहींजा. बस तू आ तहार मेहरारू बचबऽ खनदान के वारिस!’
‘शायद तू ठीक कहत बाड़ऽ रिंकू . बिना एकरा कवनो दोसर उपाय नइखे लउकत.’

अगहन महिना के हाड़ कँपावत जाड़ा मे शेखर आपन बनावल योजना मुताबिक अपना पत्नी सोनल के ले के राति मे ससुराल गइले आ सोनल के छोडिके आपन फूल के दुकान प चलि गइले. दुकान से लवटि के सोनल के अपना घरे छोडले. त सोनल बोलली, ‘शेखर चलीं, खाना खा लिहि जा.’
‘ना सोनल. तू खाना खा लऽ. हमरा खाना खाए के मन नइखे. हमरा अपना कुछ ईयारन से काम बा. तू खाना खाके सुत जइहऽ हमरा आवे मे तनिका देरि होई.’
‘ठीक बा’, सोनल जादे जिद ना कइली.

राति मे सोनल के नीन शराब के महक से टूटल. जगली त देखली कि बगल में शेखर एगो सेण्डो गंजी आ कच्छी पहिरले सुतल बाडे. सोनल शेखर के जोर से हिलावत पूछली, ‘अतना राति ले कहाँ रहीं? आ रउरा मुँह से ई शराब के बदबू, पी के आइल बानी?’
‘ओहो! काहे हल्ला करत बाड़ू? चुप चाप सुतऽ. हम कहीं जाईं, कुछुओ करि वोह से तहरा कवनो मतलब ना राखे के चाहीं.’
‘अरे, काहे मतलब ना राखे के चाहीं? आखिर हम पत्नी हई राउर. बताइब कि ना?’
‘ ना! का करबू?’
‘रउरा माई के बोलावत बानी.’
शेखर अनसात कहले, ‘अरे का सुनल चाहत बाड़ू? तहरा माई बाबुजी आ बहिन के दाब से काटि के आवत बानी.’
‘का बकत बानी? मजाक काहे करत बानी ?’

आखिर में सोनल बकबक करत सुत गइली. सुबेरे-सुबेरे सोनल के भसुर सबीर सोनल के उठवले.
‘सोनल! सोनल! जल्दी उठऽ. तहरा घरे कुछ हो गइल बा.’

सोनल हड़बड़ा के उठली आ भसुरे के साथे आपन माई बाबुजी के लगे गइली. वोहिजा देखली कि उनकर माई , बाबुजी आ बहिन के गर्दन धड से काटि दिहल बा. ओकरा बाद त सोनल के होस उड गइल कि का साँचो उनकर पति अइसन काम कइले बा?’

उ वोहिजा से रोअत आपन घरे आ गइली. जब दुबारा उ अपना पति से पुछली त जवाब मिलल, ‘हँ, खबरदार केकरो से कुछुओ कहलू त. तहरो हाल उहे कर देब. अरे, ई काहे नइखू सोचत कि अब हमनिए के सभ सम्पति के मालिक बानी जा. अब कवनो दिक्कत ना होई.’
‘छी! ई का कहत बानी! कमाए का जगहा प हमार माई बाबुजी के मारि के अरजल सम्पति कवना काम के? रउरा त आलसी आ कामचोर निकलनी आ अमीर बने के चक्कर मे लालच के मकड़जाल मे अइसन फँसनी कि निमन बाउर के ज्ञाने ना रहल.’

दुनो पति पत्नी में एही बात लेके तकरार होखे लागल. आखिर में सोनल सरकारी गवाह बन गइली आ घटना के पूरा जानकारी पुलिस के दे दिहली. पुलिस शेखर के पकडिके ले गइल. जब पुछताछ होखे लागल त शेखर बतवले कि, ‘जब आपन रोजी रोटी खातिर आपन ससुर से पइसा मंगनी त उ देवे से मना कर दिहले. जेकरा बाद आपन ईयारन के कहला प ओह लोग के मारे के योजना बनवनी. योजना के मुताबिक एगो ईयार माँस काटे वाला दाब लेके आइल. आ चारो ईयार राति के बापी के क्वार्टर के पीछे से दिवाल फानि के रसोई घर के खिड़की खोलिके घर के भितरी घुसनी जा. घर के भीतर बापी, श्यामा आ प्रयासी गहिया नीन में सुतल रहे. तब एगो खच के आवाज आ छटपटाहट प बापी जागी गइले. उ चिलाए आ विरोध करे लगले. एह पर हम आपन ईयारन के साथे मिलके दाब से अनगिनत वार बापी के मुँह आ मुडी प क के, उनकर हत्या कर दिहनी. ओकरा बाद प्रयासीओ जाग गइली आ चिलइली त उनको गरदन प दाब मार के एके वार में मूड़ी धड़ से अलगा क दिहनी.’

पुलिस शेखर के बयान मुताबिक खून में सनाइल कुरता बरामद कइलसि आ उनका के चारो दोस्त समेत पकडि के जेल भेज दिहलस.


(सत्य घटना प आधारित एह कहानी के पात्र आ जगहन के नाम बदल दिहल गइल बा. समानता मात्र संयोग हो सकेला.)

लेखक परिचय
वाणिज्य में स्नातकोत्तर, बी॰एच॰एम॰एस॰, आ पत्रकारिता मे डिप्लोमा लिहले उमेश जी ओझा साल 1990 से लिखत बानी. झारखण्ड सरकार में कार्यरत उमेश जी के लेख आ कहानी अनेके पत्र पत्रिकन मे प्रकाशित होत रहेला.
ई कहानी एगो साच घटना प आधारित बा. एकर सचाई के देखत एकरा मे स्थान आ पात्रन के नाम बदल दिहल गइल बा.

संपर्क सूत्र :
डॉ॰ उमेश जी ओझा,
39, डिमना बस्ती, डिमना रोड, मानगो, जिला – पूर्वी सिंहभूम (जमशेदपुर)
पिन – 831018
मोबाइल – 09431347437
email – kishenjiumesh@gmail.com

Advertisements