paati75

– बिन्दु सिन्हा

किर्र…. दरभंगा सकरी रोड पर सन्नाटा भइला से बस आउर ट्रक के चाल अइसहीं तेज हो जाला. झटका से ब्रेक लेला से खूब तेज चलत ट्रक एक-ब-एक किरकिरा उठल. ट्रक का डाला पर बइठल खलासी बीड़ी पीयत कवनो फिल्मी धुन गुनगुनात रहे. ट्रक रूकल त बींडी फेंक के उ नीचे कूद गइल, भद्दा गारी बकत- ”तोरी….“ सड़क पर चारों ओर खून फइलल रहे. आउर एगो बकरी के बच्चा ट्रक का पहिया के बीच दबाइल रहे. खून देखते ओकरा मुँह से फेर निकलल, ”हे राम! इ का भइल?“
ड्राइवरो आपन सीट छोड़ के नीचे उतर आइल आ पूछे लागल- ”का भइल रे?“

लक्खी एक ओर बइठल खजूर के पत्ता से चटाई बीनत रहे. ट्रक का रुके के आवाज सुनलस आ बकरियन के भागत देखलस त घबरा के सड़क पर चल आइल. बकरी का बच्चा के पहिया का नीचे देख के ओकर त होस हवास गायब हो गइल. ड्राइबर ओकरा के देखलस त कड़क के पुछलस- ”का रे छौंड़ी, ई बकरी के बच्चा तोरे ह?“
लक्खी का समझ में ना आइल कि का कहो. सड़क पर चारों ओ खून फइलल रहे. ओकरा ओह खून के धार में अपना काका के मुँह लउके लागल.
ताड़ी के नशा में धुत्त, ओड़हुल का फूल जइसन लाल लाल आँख ”बाप रे….“ घबरा के उ आपन आँख बन्द क लेलस, ”अब का होई…. काका सुनी त जाने मार दीही. मारे में ओकरा कवनो देर ना लागे.“

लक्खी जनम के टुअर ह. मतारी बाप केहू के नइखे देखले. अब काका काकी के मार गारी ना सहाय त चुपचाप गगरी उठा के बउली के ओर चल जाले. का करी बेचारी, कइसहूँ दिन त काटहीं के बा. बउली का किनारे बइठ के घास फूस तूर के गहना बनावेले, अपने पहिनी, गगरिओ के पहिनाई. गगरी का गरदन में गलबहियाँ देके बइठल बइठल ओकर मन के दुख भुला जाला, गगरी जइसे ओकर सखी सहेली होखे, आपन सब दुख ओकरा से बतिया जाले, ”जान ताड़ू न आज सीतलवा चोरा के गुड़ के भेली खा गइल ह आ मार पड़ल ह, हमरा…. पीठ छिला गइल बा आ बचनुआ क देखलू ह, कइसन चोरा के बकरी दुह लेलस हऽ….“

ऊ निहुर के बकरी के बच्चा के उठावे लागल त खलासी हरभज ओकर हाथ झटक देलस आ अपने बचवा के टांग पकड़ के एक ओर क देलस. ड्राइवर चिचिया के कहलस, ”अरे हरभजवा जल्दी चल, देर होई त ठेकेदरवा लाल पीयर होवे लागी.“ हरभज उचक के ट्रक पर चढ़ गइल.

भर्र…. ट्रक खुल गइल तबो लक्खी उहाँ से हटल ना, चुपचाप ओइजे खड़ा रहे. ओकरा आँख में हरभज क सांवर चेहरा, हृष्ट पुष्ट देंह आ लापरवाह नजर घुमत रहे. ओकर सउँसे देह अकड़त जात रहे. आउर बकरी कहाँ गइली स, उ एकदमें भुला गइल. घर के सब काम धाम करके रोजे दोपहरिया में बकरी चरावे निकलेले, अइसन कबहूँ ना भइल.

ओकर काकी बकरी का बच्चा क मरल सुनलस त दउड़ल आइल आ लागल लाते-मुक्के ओकर खबर लेवे, ”हरामजादी, एही खाती तोहरा के पालपोस के एता बड़ कइनी कि तू हमरे गला में छूरी लगाव, आज तोरा जीअत ना छोड़ब, चल घरे, त बतावतानी. सेतिहा के खा-खा के दिमाग बउरा गइल बा.“

काकी के हाथ तनी ढील भइल कि लक्खी सीधे भागल उहाँ से बउली के ओर. दुनिया जहान में आउर ओकरा कहीं जगह ना रहे. बउली का किनारे बइठ के पानी में गोड़ लटका देलस. पानी में काई जमल रहे, ओकरा गोड़ में लपटा गइल तबो उ हटल ना, ठण्डा पानी बड़ा अच्छा लागत रहे, देह में लागल घाव क पीरा एकदमे भुला गइल. सउँसे बउली मखाना के पत्ता से भरल रहे. ओकर मन करत रहे कि गर्दन तक पानी में उतर जाईं, खूब डुबकी लगाईं बाकिर मखाना के काँट वाला पत्ता देख के डेरा गइल बाप रे… डुबकी लगवला पर त सउँसे देह छिला जाई, खून बहे लागी. खून के इयाद परल से फिर ओकरा सड़क पर के बात इयाद आ गइल, हरभज के साँवर चेहरा आँख का सामने घूम गइल. डुबकी लागवे के इरादा छोड़ के उ पीछे मुड़ल त रधिया पर नजर पड़ गइल. रधिया मखाना के एगो बड़का डाढ़ तुरले भागल जात रहे. उ पुकरलस, ”अरे रधिया, सुन त, कहाँ भागल जा ताड़े.“
रधिया रूक के ओकरा के सन्देह से देखे लागल त उ फेर कहलस, ”अरे भाग मत. आव इहाँ बइठ के मखाना के फर खाइल जाव. दू चार गो आउर डाड़ तूर ले आव.“
”ना बाबा, रधिया एने ओने देख के कहलस, सुन्दर काकी देखीहन त चाम खींच लीहन इहाँ ना बइठब.“
”अरे मजाल बा चाम खींच लेबे के…. ….आव आज मन भर मखाना खाइल जाव.“

अन्हार भइला पर लक्खी लुकत छिपत घरे लौटल, उहँ…. काकी देखबो करी त का करी, केतना डेराईं, जेतने डेराइला ओतने काकी आँख देखावेले. ऊ चुपचाप आके एगो कोना में बइठ गइल. रात भइल. घर के सब लोग खा पी के सूत गइल. ओकरा के केहू खाये के ना पूछल. सीतलवा के उ एतना मानत रहे, अपना मुँह के कौर निकाल के दे दी बाकी आज उहो ना पुछलस. लक्खी अईंठ के रह गइल, खाली पेट भला नींद आवेला? ओकरा रह-रह के इयाद पड़े, ड्राइबर कहत रहे, जल्दी कर हरभज, देर होई त ठीकदरवा के लाल पीअर आँख देखे के परी. त ई ट्रक एह राहे रोज जाला माटी ढोवे. ट्रक के हरियर डाला पर बइठल….ओकर खेयाल भटके लागल. हरभज रोज ओह रास्ते जात होई. कहीं फेर कवनो दिन एगो बकरी के बच्चा ट्रक के नीचे आ जाई त ट्रक रूक जाई, उ हरभज के फेर देख सकी. ड्राइबर गारी बकी त का, काका मारी पीटी त का, हरभज त फेर उतर के ओकरा सामने आ जाई, ओकर हाथ झटक दीही. ओकर सउँसे देह सिहर उठल.

बकरियन के चरे के छोड़ उ अपना खेयाल में डूब जाय. सड़क पर चले वाला सब ट्रक ओकरा हरियरे रंग के लउके, बुझाय सब पर हरभज बइठल बा. सांझ हो जाय, बकरी सन मिमियात घरे पहुँच जाय तबो ओकरा होस ना होखे. अब ओकरा केकरो से डर ना लगे. काकियो से ना, उहँ का करिहें काकी. सड़क पर आवत ट्रक देख के ओकर करेजा धड़के लागे, हाथ गोड़ फूले लागे. कहीं अइसन ना होले कि ट्रक रुक जाय आ हरभज उतर के ओकरा सामने चल आवे. अइसन भेस में ओकरा के देख के ऊ का कही, फाटल साड़ी, लट्टा भइल केस, बेवाय फाटल गोड़. रसोई में से तेल लेके चुपचाप माथा में लगा लेवे, पाटी चोटी कर के अयना में आपन मुँह देखे त मन करे, तनी टीका लगालीं, लाल टीका लगवते मुँह भक-भक करे लागी अंजोरिया अइसन. फाटल साड़ी के सीपुर के चिकन बना लेबे.

काकी के नजर में कुछ छिपल ना रहे. लक्खी के बदलत रंग-ढंग देख के ओकरा माथा ठनकल, ”बाप रे, छऊँड़ी कहीं कुल में दाग ना लगा दे, अब जल्दिये बिआह सादी कर देबे के चाहीं?“
काका कहले, ”हम बइठल नइखीं, बर खोज लेले बानी, हरिहर के त देखलहीं बाड़ू, खेती बारी त बड़ले बा, दुआर पर दू तीन गो लगहर बा, लखिया का कवनो दुख ना होई.”
“हरिहर के त बहुत उमिर बा, चार-चार गो लइका बाड़े स.“
काकी कहली त काका हँसे लगलें, ”अरे का भइल बहुत उमिर बा त, कहाउत ह जब साठा तब पाठा, कइसन हट्टा-कट्ठा देह बा, देख के मन जुड़ा जाला…. आ सबसे बड़ बात बा कि बियाह में एको पइसा खरचो ना पड़ी कुल खरच हरिहर करीहें, ऊपर से पाँच सौ रुपयो देवे के कहलन ह.“

काकी सुन के फुला गइली. पाँच सौ रुपया मिली त अपनो दुआर पर एगो लगहर हो जाई. जे सुने से कहे, काका काकी होखे त अइसन, लक्खी घर में रानी बन के रही, ओकरा कवनो दुख ना होई.

लक्खी सब के बात सुने लेकिन बोले ना. ओकर एगो अलगे दुनियां रहे, जवना में हर घड़ी हँसी छितराइल रही. लाल लाल गुलाब… अब हरभज के इयाद आई चारों ओर गुलाबे गुलाब महक उठी, बुझाई कि गुलाब के फूलवारी में भुला गइल बा.

अपना खेयाल में मगन लक्खी के होस ना रहल कि उ का कर देलस. बकरी के बच्चा सड़क पर दम तूड़त रहे. चारों ओर खून फइल गइल रहे. ट्रक रुकल त डाला पर से कूद के हरभज ओकरा सामने आ गइल, आ कस के एक चांटा मरलस ओकरा गाल पर, ”काहें रे डाइन, ई बचवा तोर दुसमन रहे का कि जान के एकरा के ट्रक के नीचे डाल देले? अब जे अइसन करबे त झोंटा पकड़ के तोरो के एही चक्का के नीचे पीस देब, बुझले ह का?“

लक्खी के चेहरा लाल हो गइल. गाल पर अंगुठी के लाल निशान उग आइल. ड्राइवर ऊपरे से बोललस, ”अरे छोड़ हरभज, का बात के बतंगड़ बनवले बाड़े, अबेर होता.“
”ना डरेवर साहेब, बात के बतंगड़ नइखीं करत, ई डाइन जान के बचवा सबके ट्रक के ओर हूरपेट देले, आज हम अपना आँखि देखनी ह.“

हरभज फेर चउक के डाला पर चढ़ गइल. लक्खी एकटक ओकरा क देखत रहे. ओकर सउँसे देह अकड़ गइल. ट्रक आँख से ओझल हो गइल तबो ओकरा होस ना भइल, बुझाय गाल पर कुछ चिन्गारी अइसन बर रहल बा….. हरभज के चाँटा के लाल निशान आउर लाल हो गइल, गाल जइसे सेनुरिया आम होखे.

आज लक्खी के बिआह ह. दुआर पर सहनाई बाजऽता. लाल चुनरी पहिरले लक्खी बइठल बा आ अँचरा के लाल छोर में खोज रहल बा लाल खून, लाल गुलाब, लाल निशान. हरभज के थप्पड़ के निशान जइसे गाल ना करेजा पर उग गइल होखे, ऊ अब कबहूँ ना मिटी.


(पाती पत्रिका के अंक 75 ‘प्रेम-कथा-विशेषांक’ से साभार)


पोखरा, हाजीपुर (वैशाली), बिहार

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