(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद)

तेरहवाँ कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं
कि कइसे लोक कवि के भतीजा एड्स के शिकार हो गइल रहुवे. रोजी रोटी कमाए परदेस गइल आदमी कइसे छन भर के आनन्द खातिर भर जिनिगी के दुख बिटोर लेता. लोक कवि के मित्र चेयरमैन साहब सलाह देत बाड़न कि कुछ पुण्य कमाये खातिर कवनो ब्राह्मण के बेटी के बिआह करवा द. एह सलाह पर जब लोक कवि का मुँह से चिहा के निकल गइल कि “का ?” अब आगे पढ़ीं…


‘हँ, तोहरा कवनो बेटी हइयो नइखे.’ चेयरमैन साहब कहले, ‘बेसी पैसा मत खरच करऽ. पचीस-पचास हजार जवन तोहरा श्रद्धा में रुचे जा के बुढ़िया पंडिताइन के दे आवऽ ई कहि के कि बिटिया के बिआह कर दीं !’ ऊ इहो कहलन कि, ‘हमहू कुछ दस-पांच हजार कर देब. हालांकि पचास साठ हजार में लड़िकी के शादी त होत नइखे आजु काल्ह. लेकिन उत्तम मद्धिम कुछ त होइये जाई.’ चेयरमैन साहब कहत रहले, ‘अबहीं तूहीं कहत रहुवऽ कि बिआह ना भइल त बाप का राहे चलि के रंडी हो जाई ! तू इहे सोच ल कि ओकरा के रंडी का राह नइखे जाये देबे के. कुछ तू करऽ, कुछ हमहूं करऽतानी. दू चार अउरियो लोग से कहब, बाकी ओकर नसीब !’

‘बाकिर गांव में एह तरे समाज सेवा करब त बिला जाएब.’ लोक कवि संकोच घोरत कहले, ‘हर घर में कवनो ना कवनो समस्या बा. त हम केकर-केकर मदद करब ? जेकर करब, ऊ त खुस हो जाई. जेकरा के मना करब ऊ दुसमन हो जाई ! एह तरे त सगरी गांव हमार दुसमन हो जाई !’

‘एह पुण्य काम खातिर तू पूरा दुनिया के दुसमन बना लऽ.’ चेयरमैन साहब कहले, ‘आ फेर कवनो जरूरी बा का कि तू ई मदद डंका पीट के करऽ. चुपेचाप कर द. गुप-चुप ! केहू जाने ना !’ ऊ कहले, ‘दुनिया भर के रंडियन पर पइसा उड़ावेलऽ त एगो लड़िकी के रंडी बनला से बचावे खातिर कुछ पइसा खरच कर के देखऽ.’ चेयरमैन साहब लोक कवि के नस पकड़त कहले, ‘का पता एह लड़िकी के आशीर्वाद से, एकरा पुण्ये से, तोहार लड़खड़ात मार्केट सम्हरि जाव !’ ऊ कहले, ‘कर के देखऽ ! एहमें सुखो मिली आ मजो आई.’ फेर ऊ तंज कसत कहले, ‘ना होखे त ‘मिसिराइनो’ से मशविरा ले लऽ. देखीहऽ उहो एहला मना ना करी.’

लोक कवि मिसिराइन से त मशविरा ना कइलन बाकिर लगातार एह बारे में सोचत रहलन आ एक दिन अचानके चेयरमैन साहब के फोन मिला के कहले, ‘चेयरमैन साहब हम पचास हजार रुपया खर्चा काट-काट के जोड़ लिहले बानी !’
‘काहे खातिर बे ?’
‘अरे, ओह ब्राह्मण के बेटी के रंडी बने से बचावे खातिर !’ लोक कवि कहले, ‘भूला गइनी का ? अरे, ओकरा शादी खातिर आप ही त बोलले रहीं !’
‘अरे, हँ भाई. हम त भुलाइये गइल रहीं !’ ऊ कहले, ‘चलऽ तू पचास देत बाड़ऽ त पंद्रह हजार हमहू दे देब. दू एक अउरियो लोगन से दस बीस हजार दिलवा देब. कुछ अउरियो करतीं लेकिन हाथ एने तनी तंग बा, मेहरारू के बीमारी में खर्चा बेसी लाग गइल बा. तबहियो तू जहिया कहबऽ पइसा दे देब. एतना पइसा त अबही हमरा पासे बा. कवनो लौंडा के भेज के मंगवा लऽ !’
‘ठीक बा चेयरमैन साहब !’ कह के लोक कवि उनुका किहाँ से पंद्रह हजार रुपिया मंगवा लिहलन. दू जगह से पांच-पांच हजार अउर एक जगह से दस हजार रुपिया चेयरमैन साहब अउरी दिलवा दिहलन. एह तरह पैंतीस हजार रुपिया ऊ आ पचास हजार रुपिया आपन मिला के कुल पचासी हजार रुपिया ले जा के लोक कवि पंडिताइन के दिहलन. ई कहि के कि, ‘पंडित जी के बड़ उपकार बा हमरा पर. नतिनी के बिआह ख़ातिर ले लीं ! ख़ूब धूमधाम से शादी करीं !’

बाकिर पंडिताइन अड़ गइली. पइसा लेबे से मना कर दिहली. कहली कि पंडित जी तोहरा पर का उपकार कइलन हम नइखीं जानत. बाकिर ई तोहार एहसानो हम ना लेब. ऊ माथ पर पल्लू खींचत कहली, ‘गांव का कही भला ? केकर-केकर ताना सुनब ! बेटवा के कलंक क ताना अबहिन ले नइखै ख़त्म भइल. त अब नतिनी ख़ातिर ताना हम नाई सुनब.’ ऊ कहत रहली, ‘ताना सुनले के पहिलवैं कुआं में कूद के मरि जाइब !’ कह के ऊ रोवे लगली. कहली, ‘पंडित जी बेचारे जेल भले भुगत रहल बाटैं बकिर उन के केहु कतली नइखै कहत. सब कहेला जे उनुका के गलत फंसावल गइल बा ! त उनुका इज्जत से हमरो इज्जत रहेले. बाकिर बेटा बट्टा लगा गइल त करम फूट गइल !’ कह के पंडिताइन फेर रोवे लगली. कहली, ‘एतना रुपया हम राखब कहां ? हम नाई लेब !’
‘आखि़र दिक्कत का बा ?’
‘दिक्कत ई हवे कि सुनीलें तू लड़िकिन के कारोबार करेलऽ अउर हमर नतिनी ई कारोबार नाहीं करी. ऊ नाईं नाची कूदी तोहरे कारोबार में !’
सुनिके लोक कवि एक बेर त सकता में पड़ गइले. बाकिर कहले, ‘आप के नतिनी के हम कहीं ना ले जाइब.’ लोक कवि पंडिताइन के दिक्कर समुझत कहले, ‘बिआहो आपे अपना मर्जी से जहां चाहीं, जइसे चाहीं तय कर के कर लेब. बाकिर ई पइसा रख लीहीं आप. कामे आई !’ कह के लोक कवि पंडिताइन का गोड़ पर आपन माथा राख दिहलन, ‘बस ब्राह्मण देवता क आशीर्वाद चाहीं !’
बाकिर पंडिताइन अड़ली त अड़ली रह गइली. पइसा लिहल त दूर, छुअबो ना कइली.
लोक कवि दुखी मन से वापिस लवटि अइलन.

चेयरमैन साहब के घरे जाके उनुका के उनुकर दिहल पैंतीस हजार वापिस करे लगलन त चेयरमैन साहब भड़कले, ‘ई का हो गइल रे तोरा !’
‘कुछ नाहीं।’ लोक कवि उदास होत कहले, ‘दरअसल हमार गांव हमरा के समुझ ना पवलसि !’
‘भइल का ?’
‘तबकी सम्मान के बाद गइल रहीं त लोग नचनिया पदनिया कहे लागल रहे !’
‘अबकी का भइल ?’ चेयरमैन साहब लोक कवि के बात बीचे में काटत कहले.
‘अबकी लड़िकियन के दलाल बन गइनी !’ कह के लोक कवि रोवलें त बा बाकिर अनसा जरूर गइले.
‘के बोलल तोरा के लड़िकियन के दलाल ? ओकर ख़ून पी जाएब !’ चेयरमैन साहब खिसियात कहले.
‘नाहीं केहू एकदमै से दलाल शब्द नाहीं बोलल !’
‘त ?’
‘लेकिन ई कहल कि हम लड़िकियन के कारोबार करीलें ।’ लोक कवि निढाल परत कहले, ‘सीधे-सीधे एकर मतलब दलाले नू भइल ?’
‘के बोलल कि तूं लड़िकियन के कारोबार करे ल ?’ चेयरमैन साहब के खीस फफनाइले रहल.
‘अउर के !’ लोक कवि कहलें, ‘उहे पंडिताइन कहली आ ई पइसा लेबे से मना कर दिहली.”
‘काहे ?’
‘पंडिताइन कहली कि सुनले बानी कि तू लड़िकियन के कारोबार करेलऽ आ हमार नतिनी ई कारोबार नाहीं करी !’ लोक कवि खीझियात कहले, ‘बताईं, हमनी का सोचले रहीं कि ओकरा के गरीबी के फेर में रंडी बने से बचावल जाव आ पंडिताइन उलटे हमरे पर आरोप लगा दिहली कि हम उनुका नतिनी के रंडी बना देब !’ ऊ कहत रहले, ‘तबहियो हम खराब ना मनलीं. ई सोच के कि पुण्य के काम में बाधा आई. त एकरा के बाधा मान के टार गइनी. फेर हम इहो बतवनी कि उनुका नतिनी के हम कहीं ना ले जायब आ कि बिआहो ऊ अपना मर्जी से जहां चाहसु करसु. हमरा से कवनो मतलब नइखे. उनुका गोड़ पर माथा राख के कहबो कइनी कि बस ब्राह्मण देवता क आशीर्वाद चाहीं !’
‘एकमे बऊड़म हउव तू !’ चेयरमैन साहब कहले, ‘देवी के देवता कहबऽ आ आशीर्वाद मँगबऽ त के दी ?’
‘एहमें का गलत हो गइल ?’ लोक कवि दरअसल चेयरमैन साहब के देवी देवता वाली बात समुझले ना.
‘चलऽ कुछऊ गलत ना कइलऽ तू !’ ऊ कहले, ‘गलती हमरा से हो गइल जे एह काम ख़ातिर तोहरा के अकेले भेज दिहनी.’
‘त का अब आप चलब ?’
‘हँ हमहू चलब आ तूहूं चलबऽ.’ ऊ कहले, ‘लेकिन दस बीस दिन रुक के.’
‘हम तो नाहीं जाएब चेयरमैन साहब !’ लोक कवि कहले, ‘जबे गांव जानीं बेइज्जत हो जाइले !’
‘देखऽ, नेक काम ला बेइज्जत होखे में कवनो बुराई नइखे. एगो नेक काम हाथ में लिहले बाड़ऽ त ओकरा के पूरा कर के छोड़ऽ.’ ऊ कहले, ‘फेर तू हर बाति में इज्जत बेइज्जत मत खोजल करऽ ! ओह बेर नचनिया पदनिया पर दुखी हो गइलऽ तू. सम्मान के सगरी मजा ख़राब कर दिहल.’ तनिका रूक के ऊ फेर कहले, ‘ई बतावऽ कि तू अमिताभ बच्चन के कलाकार माने लऽ ?’
‘हँ, बहुते बड़हन कलाकार हउवन ऊ !’
‘तोहरो ले बड़हन ?’ चेयरमैन साहब मजा लेत पूछलें.
‘अरे कहां हम चेयरमैन साहब, अउर कहवाँ ऊ ! काहें मजाक उड़ावत बानीं.’
‘चलऽ केहू के त तू अपना ले बड़हन कलाकार मनलऽ !’ चेयरमैन साहब कहलें, ‘त इहे अमिताभ बच्चन जब 1984 में इलाहाबाद से चुनाव लड़ले बहुगुणा का खि़लाफ त का अख़बार, का नेता सबही इहे कहत रहल कि नचनिया पदनिया ह चुनाव का जीती ! हँ, थोड़ बहुत नाच कूद ली. लेकिन ऊ बहुगुणा जइसन दिग्गज के जब धूड़ि चटा दिहले, चुनाव हरा दिहलन त लोग के मुँह बंद हो गइल.’ चेयरमैन साहब कहलें, ‘त जब एतना बड़हन कलाकार के ई जमाना नचनिया पदनिया कह सकेला त तोहरा के काहे नाहीं कह सके ?’ ऊ कहले, ‘फेर ऊ इलाहाबाद जहवाँ अमिताभ बच्चन के घर बा, ऊ अपना के इलाहाबादी मानेला अउर इलाहाबाद वाले ओकरा के से नचनिया पदनिया. तबहियो ऊ बुरा ना मनलें. काहेकि ऊ बड़का कलाकार हउवें. सचमुच में बड़का कलाकार. ओकरा में बड़प्पन बा. ‘ ऊ कहले, ‘तूहूं त अपना में बड़प्पन ले आवऽ आ तनिका मोलायमियत सीखऽ !’
‘बाकिर पंडिताइन….!’
‘कुछउ ना. पंडिताइन तोहरा के कुछ ना कहली. ऊ त अपना नतिनी के हिफाजत भर करत बाड़ी. ओहमें बुरा माने के बात नइखे.’ ऊ कहले, ‘दस बारह दिन बाद हम चलब तोहरा साथे. तब बात करीह. अबही घरे जा, आराम करऽ, रिहर्सल करऽ अउर ई सब भुला जा !’
अउर साचहु लोक कवि चेयरमैन साहब का साथ कुछ दिन बाद एह नेक अभियान पर एक बेर फेरु निकललन. चेयरमैन साहब तनिका तरीका से काम लिहलन. पहिले ऊ लोक कवि के साथे ले के जेल गइलन. ओहिजा पंडित भुल्लन तिवारी से मिललन. पंडित जेल में रहले जरूर पर माथा पर उनुका तेज मौजूद रहे. विपन्नता के चुगली उनुकर रोआं-रोआं करत रहुवे बाकिर ऊ कातिल ना हउवन, इहो उनुकर चेहरा बतावत रहे. ऊ कहे लगलन, ‘दू जून भोजन खातिर हम जरूर एने-ओने जात रहीं बाकिर कवनो अन्यायी का सोझा, कवनो मतलब, कवनो छल खातिर मूड़ी गिरा दीं ई हमरा खून में नइखे, नाही हमरा संस्कार में !’ ऊ कहत रहले, ‘रहल अन्याय-न्याय के बात, त ई ऊपर वाला के हाथ में बा. हम खूनी हँई कि ना, एकर इंसाफ त अब ऊपरे का अदालत में होखी. बाकी रहल एह जेल के अपमान के बात त जरूर कहीं हमरा कवनो पापे के ई फल हऽ.’ साथ ही ऊ इहो जोड़लन, ‘अउर इहो जरूर हमरा कवनो पापे के कुफल रहे कि गोपला जइसन कुकलंकी हमरा वंश में जनमल !’ ई कहत उनुकर आंख डबडबा गइल. गला रुंधिया गइल. फेर ऊ फफक पड़लन.
‘मत रोईं !’ कह के लोक कवि उनुका के सांत्वना दिहलन आ हाथ जोड़ के कहलन कि, ‘पंडित जी एक ठो विनती बा, हमार विनती मान लीं !’
‘ई अभागा पंडित का तोहार मदद कर सकेला ?’
‘आशीर्वाद दे सकीलें.’
‘ऊ त हरमेस सभका साथे बा.’ ऊ रुकलन आ कहले, ‘बाकिर एह अभागा के आशीर्वाद से का तोहार बनि सकेला ?’
‘बन सकेला पंडित जी !’ लोक कवि कहले, ‘पहिले बस अब आप हां कह दीं.’
‘हँ बावे, बोलऽ !’
‘पंडित जी एगो ब्राह्मण कन्या के बिआह करावे के पुण्य पावल चाहत बानी.’ लोक कवि कहले, ‘बिआह आप लोग अपने समाज में अपने मर्जी से तय करीं. बाकिर खरचा बरचा हमरा उपर छोड़ दीं.’
‘ओह ! समझनी.’ भुल्लन पंडित कहले, ‘तू हमरा पर उपकार कइल चाहत बाड़ऽ !’ ई कहत भुल्लन पंडित तल्ख़ हो गइले. कहले, ‘बाकिर कवना खुशी में भाई ?’
‘कुछु ना पंडित जी, ई मूरख हऽ !’ चेयरमैन साहब कहले, ‘नाच गा के त ई बड़ा नाम गांव कमा चुकल बा अउर अब कुछ समाज सेवा कइल चाहत बा. एक पंथ दू काज ! ब्राह्मण के आशीर्वाद आ पुण्य दुनु चाहत बा.’ ऊ कहले, ‘मना मत करब !’
‘बाकिर ई त पंडिताइने बतइहें.’ तौल-तौल के बोलत भुल्लन पंडित कहले, ‘घर गृहस्थी त अब उहे देखत बाड़ी. हम त कैदी हो गइल बानी.’
‘लेकिन मीर मालिक तो आप ही हईं पंडित जी !’
‘रहनी.’ ऊ कहले, ‘अब नइखीं. अब कैदी हईं.’
मुलाकात के समयो खतम हो चुकल रहुवे. भुल्लन पंडित के गोड़ छू के दुनु जने जेल से बाहर अइलन.
‘घर में भूजी भांग नाईं, दुआरे हरि कीर्तन !’
‘का भइल रे लोक कवि ?’
‘कुछु नाई. ई पंडितवे एतना अड़ियाते काहें हैं ? हम आजु ले ना समुझ पवनी.’ लोक कवि कहले, ‘रसरी जर गइल बाकिर अईंठन ना गइल. जेल में नरक भुगतत बाड़न, पंडिताइन भूखों मरत बाड़ी. खाए खातिर गांव में चंदा लागत बा. बाकिर हमार पइसा ना लीहें !’ लोक कवि खीझियात कहले, ”घीव दै बाभन नरियाय! कहां फंसा दिहनी चेयरमैन साहब। अब जाए दीं. ई पइसा कहीं अउर दान दे दिहल जाई. बहुते गरीबी बा. पइसा लेबे ख़ातिर लोग मार कर दीहि.”
‘घबराते काहें बाड़ऽ !’ चेयरमैन साहब कहले, ‘तनिका धीरज राखऽ !’

फिर चेयरमैन साहब लोक कवि के घरे चहुँपले. लोक कवि के घर का रहे, पूरा सराय रहे. उहो लबे सड़क. दरअसल लोक कवि से गांव के लोग के जरतवाही के एगो कारन उनुकर ई पकवा मकानो रहल. छोट जाति के आदमी का लगे अइसन बड़हन पकवा मकान बड़ जाति के लोगन क त खटकते रहे, छोटको जाति के लोगन से हजम ना होत रहुवे. चेयरमैनो साहब एह बात पर अबकी दफा गौर कइलन. बहरहाल, थोड़ देर बाद ऊ लोक कवि के उनुका घरे छोड़ के अकेले उनुका गांव में निकललन. कुछ जिम्मेदार लोग से, जिनका ऊ जानतो ना रहले, भेंट कइलन. उनुकर मन टटोरलन. फेर आपन मकसद बतवलन. बतवलन कि एकरा पाछा कुछ अउर बा, बस मन में आइल मदद के मनसा बा. फेर एह लोगन के ले के लोक कवि का साथे ऊ भुल्लन तिवारी का घरे गइलन. पंडिताइन से मिललन. उनुका खुद्दारी के मान दिहलन. बतवलन कि जेल में पंडितो जी से ऊ लोग मिलल रहे. आपन मनसा बतवले रहे त पंडित जी सब कुछ आपे पर छोड़ दिहलन. फेर उनुकर चिरौरी करत कहलन कि, ‘रउरा मान जाईं त समुझीं कि हमन के गंगा नहा लिहलीं.’ पंडिताइन कुछ बोलली ना. थोड़ देर ले सोचली फेर बिन बोलले आंखे आंख में बात गांववाल न पर छोड़ दिहली. गांव के एगो बुजुर्ग कहले, ‘पंडिताइन भौजी, एहमें कवनो हरज नइखे !’
‘जइसन भगवान क मर्जी!’ हाथ ऊपर उठावत पंडिताइन कहली, ‘अब ई गांव भर क बेटी ह !’
लेकिन पइसा पंडिताइन ना लिहली. बतवली कि जब शादी तय हो जाई तबहिये पइसा का बारे में देखल जाई. फेर गांवही के दू लोग के सुपुर्दगी में ऊ पचासी हजार रुपिया रखवा दिहल गइल. दू तीन लोग शादी खोजे के जिम्मा लिहल. सब कुछ ठीक-ठाक करा लोक कवि अउर चेयरमैन साहब ओहिजा से उठले. चलत-चलत लोक कवि पंडिताइन के गोड़ छुअलन. कहलन कि, ‘शादी में हमहूं के बोलावल जाई !’
‘अ काहें नाहीं!’ पंडिताइन पल्लू ठीक करत कहली.
‘एतने ले नाहीं. कुछ अउरियो उत्तम मद्धिम, घटल बढ़ल होई, उहो बतावल जाई !’
‘अच्छा, मोहन बाबू!’ पंडिताइन के आंखिन में कृतज्ञता झलकल.
लोक कवि अपना गांव से जब लखनऊ ला चललन त उनुका लागत रहे कि साचहु बड़हन पुण्य के काम हो गइल. ऊ अइसने कुछ चेयरमैन साहब से बुदबुदा के बोलबो कइलन, ‘साचहु आजु बड़ा खुसी के दिन बा !’
‘चलऽ भगवान का दया से सब कुछ ठीक-ठाक हो गइल !’ चेयरमैन साहब कहले. आ ड्राइवर से कहलन, ‘लखनऊ चलऽ भाई !’
लेकिन एह पूरा प्रसंग पर अगर कवनो एक आदमी सबसे अँउटाइल रहे, सबले बेसी दुखी रहे त ऊ रहल लोक कवि के छोटका भाई जे कमलेश के पिता रहे. कमलेश के पिता के लागत रहल कि कमलेश के मौत के अगर केहू एक आदमी जिम्मेदार रहल त ऊ गोपाल रहे. आ ओही गोपला के बेटी बियाहे के बेमतलब के खरचा ओकर बड़का भाई मोहन करत रहे जे अब लोक कवि बनल इतराइत चलत बा. कमलेश के पिता के ई सब फूटलो आँखे ना सुहात रहे. बाकिर ऊ बेबस रहे आ चुप रहल. आ ओकरे बड़ भाई ओकरा छाती पर मूंग दलत रहे. नाम गांव कमाए खातिर. बाकिर एने लोक कवि मगन रहले. मगन रहले अपना सफलता पर. कार में चलत ठेका ले-ले के ऊ आपने कवनो गानो गुनगुनात रहले. गदबेर हो चलल रहे. डूबत सूरज के लाल गोला दूर आसमान में तिरात रहल.
लेकिन ऊ कहाला नू कि ‘बड़-बड़ मार कोहबरे बाकी !’
उहे भइल.
सिरिफ पइसा भर से केहु के शादी ब्याह तय हो जाइत त फेर का बात रहीत ? लोक कवि आ चेयरमैन साहब पइसा दे के निश्चित हो गइलन. लेकिन बात साचहु में निश्चिंत होखे के रहल ना. भुल्लन पंडित के नतिनी के शादी एतना आसानी से होखे वाला ना रहल. बाप गोपाल के कलंक अब बेटी के माथे डोलत रहे. शादी खातिर वर पक्ष से सवाल शुरू होखे से पहिलही एड्स के सवाल दउड़त खड़ा हो जाव. कतहिओ लोग जाव, चाहे गांव के लोग होखे भा रिश्तेदार, उनुका से पूछाव कि, ‘आप बेटी के पिता हईं, भाई हईं, के हईं ?’ लोग बतावे कि, ‘ना, गाँव के हईं, पट्टीदार हईं, रिश्तेदार हईं.’ त सवाल उठे कि, ‘भाई, पिता कहां बाड़ें ?’ बतावल जाव कि पिता के निधन हो गइल बा आ कि ….! अबहीं बात पूरो ना होखे तबले वर पक्ष के लोग खुदही बोल पड़े, ‘अच्छा-अच्छा ऊ एड्स वाला दोखी कलंकी गोपला के बेटी ह !’ वर पक्ष के लोग जोड़े, ‘ऊ गोपाल जेकर बापो कतल के जुर्म में जेल काटत बा ?’
रिश्तेदार, पट्टीदार जे ही होखे बेजवाब हो जाव. एकाध लोग तर्को देव कि एहमें लड़िकी के का दोष ? लेकिन एड्स जइसन भारी शब्द के आगा सगरी तर्क पानी हो जाव, आ वर पक्ष के लोग कसाई !


फेरु अगिला कड़ी में


लेखक परिचय

अपना कहानी आ उपन्यासन का मार्फत लगातार चरचा में रहे वाला दयानंद पांडेय के जन्म ३० जनवरी १९५८ के गोरखपुर जिला के बेदौली गाँव में भइल रहे. हिन्दी में एम॰ए॰ कइला से पहिलही ऊ पत्रकारिता में आ गइले. ३३ साल हो गइल बा उनका पत्रकारिता करत, उनकर उपन्यास आ कहानियन के करीब पंद्रह गो किताब प्रकाशित हो चुकल बा. एह उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं” खातिर उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान उनका के प्रेमचंद सम्मान से सम्मानित कइले बा आ “एक जीनियस की विवादास्पद मौत” खातिर यशपाल सम्मान से.

वे जो हारे हुये, हारमोनियम के हजार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाजे, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास, बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एक जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह, सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां, प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित, आ सुनील गावस्कर के मशहूर किताब “माई आइडल्स” के हिन्दी अनुवाद “मेरे प्रिय खिलाड़ी” नाम से प्रकाशित. बांसगांव की मुनमुन (उपन्यास) आ हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण) जल्दिये प्रकाशित होखे वाला बा. बाकिर अबही ले भोजपुरी में कवनो किताब प्रकाशित नइखे. बाकिर उनका लेखन में भोजपुरी जनमानस हमेशा मौजूद रहल बा जवना के बानगी बा ई उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं”.

दयानंद पांडेय जी के संपर्क सूत्र
5/7, डाली बाग, आफिसर्स कॉलोनी, लखनऊ.
मोबाइल नं॰ 09335233424, 09415130127
e-mail : dayanand.pandey@yahoo.com

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