(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद)

छठवाँ कड़ी में रउरा लोक कवि के सम्मान खातिर तिकड़म भिड़ावत पत्रकार का बारे में पढ़ले रहीं जे ओकरा बदले में अपना खातिर लोककवि से उनुका ग्रुप के एगो लड़की के डिमाण्ड रखले रहे.
अब ओकरा से आगे पढ़ीं …..


पत्रकार चहले रहित त जइसे मुख्यमंत्री से कह के लोक कवि खातिर सम्मान घोषित करवले रहुवे, वइसहीं उनुका से कहि के तारीखो घोषित करवा सकत रहे. बाकिर जाने काहे अइसन करे में ओकरा आपन हेठी बुझाइल. से चेयरमैन साहब के बतावल रणनीति के ध्यान में राखतो खुद आपनो एगो रणनीति बनवलसि. एह रणनीति का तहत ऊ कुछ नेतवन से फोने पर बतियवलसि आ बाते बात में लोक कवि के सम्मान के जिक्र चलवलसि आ कहलसि कि आप अपने इलाका में एकर आयोजन काहे नइखीं करवा लेत ? कमोबेस हर नेता से ओकरा इलाका मुताबिक जोड़ घटाव बान्ह के लगभग अपने बाति नेता का मुँह में डलवा के ओह नेता से प्रतिक्रियात्मक टिप्पणी ले लिहलसि. एगो मंत्री से कहलसि कि बताईं ओकर गृह-जनपद आ आपके इलाका त सटले-सटल है त काहे नहीं सम्मान समारोह आप अपने इलाका में करवावत ? आपहु के धाक बढ़ी. एगो किसान नेता से कहलसि कि बताईं लोक कवि त अपना गाना में किसाने आ ओकरा माटी के बात गावल करेले आ सही मायने में लोक कवि के सुननिहारो किसाने लोग बा. किसानन में, मेंड़-खेत-खरिहानन में अपना गाना का मार्फत लोक कवि के जतना पैठ बनल बा ओतना पैठ बा केहू के ? ना नू ? त आप एहमें पाछा काहे बानी ? आ साँच पूछीं त एह सम्मान समारोह के आयोजन के संचालन सूत्र सही मायने में रउरे हाथ में रहे के चाही. जबकि मजदूर के एगो बड़हन महिला नेता, जे सांसदो रही, से कहलसि कि साँझ के थाक-हार के लवटल मजदूर लोके कवि के गाना से आपन थकान मेटावेला त मजदूरन के भावना समुझे वाला गायक के सम्मान मजदूरने का शहर में होखे क चाहीं कि ना ? आ जाहिर बा कि सगरी नेता लोक कवि के सम्मान के क्रेडिट लेबे खातिर, आपन वोट बैंक पकिया करे का फेर में लोक कवि के सम्मान अपने-अपने इलाका में करावे के गणित बइठावत बयान मारत गइले. बस पत्रकार के काम हो गइल रहे. ऊ दू एक दिन अउरी एह चरचा के हवा दिहलसि आ हवा जब चिंगारी के शोला बनावल शुरु कर दिहलसि तबहिये पत्रकार अपना अखबार में एगो स्टोरी फाइल कर दिहलसि कि लोक कवि के सम्मान के तारीख एहसे फाइनल नइखे हो पावत कि ढेरे नेता लोग में होड़ लागल बा. हर नेता अपना-अपना इलाका में लोक कवि के सम्मान करवावल चाहत बा. तब जबकि पत्रकार के मालूम रहे कि योजना के मुताबिक लोक कवि के सम्मान उनुके गृह-जनपद में सँभव हो सकेला, सगरी नेतवन के टिपप्णी वर्बेटम कोट कर के लिखल एह स्टोरी से ना सिर्फ लोक कवि के सम्मान के तारीखे घोषित हो गइल बलुक उनुका गृह-जनपद के जगहो के एलान हो गइल. साथ ही लोक कवि के “लोकप्रियता” के प्रचारो हो गइल.

लोक कवि के लय अब कार्यक्रमन में देखते बनत रहे. अइसने एगो कार्यक्रम में पत्रकारो चहुँप गइल. ग्रीन रुम में बइठ के शराब पियत ऊ बेर-बेर कपड़ा बदलत लड़िकियन के देह के कबो कनखी से त कबो सोझे तिकवत रहल. पत्रकार के एह मयकशी में मंच से आवत-जात लोको कवि शरीक हो जात रहलन. दू-तीन गो लड़िकियनो के पत्रकार दू-एक पेग पिया दिहलसि. एगो लड़िकी पर दू चार बेर हाथो फेरलस. एह फेर में ऊ डांसर निशा तिवारिओ के अपना लगे बोलवलसि बाकिर ऊ पत्रकार का लगे फटकल ना. उलुटे आँख तरेरे लागल. पत्रकार कवनो प्रतिक्रिया ना दिहलन आ चुप चाप शराब पियत गइले. जाने ओकर ठकुराई उफना गइल कि शराब के नशा चढ़ गइल कि निशा के देह के ललक ? चादर ओढ़ के कपड़ा बदलत निशा के पत्रकार अचके में पाछा से दबोच लिहले. ऊ ओकरा के ओहिजे लेटावे का फेर में रहलन तबले निशा सम्हर गइल रहे आ पलटि के ठाकुर साहब के दू-तीन झाँपड़ धड़ाधड़ रसीद कर दिहलसि आ दुनु हाथ से पूरा ताकत लगा के पाछा ढकेलत कहलसि, “कुकुर तोर ई हिम्मत !” ठाकुर साहब पियले त रहबे कइलन निशा के ढकेलते ऊ भड़भड़ा के गिर पड़ले. निशा गोड़ में से सैंडिल निकललसि आ ले के बाबू साहब का ओरि लपकले रहल कि मंच पर ई खबर सुन के लोक कवि भागत ग्रीन रुम में अइले आ निशा के सैण्डिल वाला हाथ पाछा से धर लिहलन. कहले, “ई का करत बाड़िस ?” ऊ ओकरा पर बिगड़बो कइले आ कहलें,”चल, गोड़ छू के माफी माँग !”
“माफी हम ना, ई हमरा से माँगसु गुरुजी !” निशा बिफरल, “हमरा से बदतमीजी ई कइले बाड़न.”
“धीरे बोल, धीरे.” लोक कवि खुद आधा सुर में कहलें, “हम कहत बानी माफी माँगऽ.”
“ना गुरुजी !”
“माँग लऽ. हम कहत बानी. इहो तोहरा ला गुरुजी हउवन.” लोक कवि कहलें.
“ना गुरुजी !”
“जइसन कहत बानी फौरन कर ! तमाशा मत बनाव. आ जइसन ई करें करे दे.” लोक कवि बुदबुदइले आ गँवे से कहले, “जइसन कहें वइसन करऽ.”
“ना !” निशा बोललसि त धीरे बाकिर पूरा सख्ती से. लोक कवि इहो गौर कइलें कि अबकी ऊ “ना” का साथे “गुरुजी” संबोधनो ना लगवलसि. एह बीचे पत्रकार बाबू साहब त लुढकले पटाइल रहले बाकिर आँखिन में उनका आगि खौलत रहुवे. ग्रीन रूम में मौजूद बाकी लड़िकी, कलाकारो सकता में रहीं सँ बाकिर खामोशी भरल खीस सबका आँखिन में सुलगत देखि के लोक कवि असमंसज में पड़ गइले. ऊ अपना एगो “लेफ्टिनेंट” लड़िकी के आँखे-आँखि में निशा के सम्हारे के इशारा कइलम आ खुदे पत्रकार का ओर बढ़ चललन. एगो कलाकार का मदद से ऊ पत्रकार के उठवले. कहले, “आपो ई सब का कर देते हैं बाबू साहब ?”
“देखीं लोक कवि, हम अउरी बेइज्जति नइखीं बरदाश्त कर सकत.” बाबू साहब दहड़लन, “तनी पकड़ का लिहनी एह छिनार के त एकर ई हिम्मत !”
“धीरे बोलीं बाबू साहब.” लोक कवि बुबुदइलन, “बाहर हजारन पब्लिक बइठल बा. का कही लोग ?”
“चाहे जवन कहें, हम आजु माने वाला नइखीं.” बाबू साहब कहलें, “आजु ई हमरा नीचे सूती. बस ! हम अतने जानत बानी.” नशा में ऊ बोललन, “हमरा नीचे सूती आ हमरा के डिस्चार्ज कराई. एकरा से कम पर कुछुवो ना !”
“अइसहीं बात करब ?” लोक कवि बाबू साहब के गोड़ छूवत कहलें,”आप बुद्धिजीवी हईं. ई सब शोभा नइखे देत आप के.”
“आपके शोभा देत बा ?” बाबू साहब बहकत कहलें, “आपके हमार सौदा पहिलही हो चुकल बा. आपके काम त डन हो गइल आ हमार काम ?”
बाबू साहब के बात सुन के लोक कवि के पसीना आ गइल. तबहियो ऊ बुदबुदइले, “अब इहाँ इहे सब चिल्लायब ?” ऊ भुनभुनइलन,” ई सब घरे चल के बतियाएब.”
“घरे काहे ” एहिजे काहे ना ?” बाबू साहब लोक कवि पर बिगड़ पड़लन, “बोलीं आजु ई हमरा के डिस्चार्ज करी कि ना ? हमरा नीचे सूती कि ना ?”
“ई का बोलत बानी ?” लोक कवि हाथ जोड़त फुसफुसइलन.
“कवनो खुसफुस ना. क्लियर-क्लियर बता दीं हँ कि ना ?” बाबू साहब के कहना रहे.
“चुपाइबो करब कि अइसहीं बेइज्जति कराएब ?”
“हम समुझ गइनी आप अपना वायदा से मुकरत बानी.”
लोक कवि चुपा गइलन.
“खामोशी बतावत बा कि वादा टूट गइल बा.” बाबु साहब लोक कवि के फेर कुरेदलन.
लेकिन लोक कवि तबहियो चुप रहलन.
“त सम्मान कैंसिल !” बाबू साहब उहे बार फेर जोर से दोहरवलन, “लोक कवि आपका सम्मान कैंसिल ! मुख्यमंत्री के बापो अब आपके सम्मान ना दे पाई.”
“चुप रहीं बाबू साहब !” लोक कवि के एगो साथी कलाकार हाथ जोड़त कहलसि, “बहरी बड़हन पब्लिक बिया.”
“कुछ नइखे सुने के हमरा !” बाबू साहब कहलें, “लोक कवि निशा कैंसिल कइलें आ हम सम्मान कैंसिल कइनि. बात खतम.” कह के बाबू साहब शराब के बोतल आ गिलास एक-एक हाथ में लिहले उठ खड़ा भइलन. कहलें, “हम चलतानी.” आ ऊ साँचहु ग्रीन रूम से बहरी निकल गइलन. माथे हाथ धइले लोक कवि चैन के साँस लिहलन. कलाकारन के हाथ का इशारा से आश्वस्त कइलन. निशा का माथ पर हाथ राख के ओकरा के आशीर्वाद दिहलन, “जियत रहऽ” फेर बुदबुदइलन, “माफ करीह !”
“कवनो बाति ना गुरुजी !” कह के निशा अपनो ओर से बात खतम कर दिहली बाकिर लोक कवि रो दिहलें.भरभर-भरभर. लेकिन जल्दिये ऊ कान्ह पर राखल गमछा से आँखि पोंछलें, धोती के निचला कोर उठवले, हाथ में तुलसी के माला लिहले मंच पर चहुँप गइले. उनुकरे लिखल युगल गीत उनुकर साथी कलाकार गावत रहलें, “अँखिया बता रहीं हैं लुटी कहीं गई हैं.” लोक कवि अपना गोड़ के गति देत तनी थिरके के कोशिश कइलें आ एनाउंसर के इशारा कइलें कि उनुका के मंच पर बोलावो.

एनाउंसर वइसने कइले. लोक कवि मंच पर चहुँपले आ साजिन्दा लोगन के इशारा कर के कहरवा धुन पकड़ लिहले. फेर भरल गला से गावे लगले, “नाचे न नचावै केहू पइसा नचावेला.” गावत-गावत गोड़ के गति दिहले बाकिर गोड़ त का मनो साथ ना दिहलसि. अबहीं पहिलके अंतरा पर रहले कि उनुका आँखिन से फेर लोर ढरके लागल. लेकिन ऊ गावते रहलन, “नाचे न नचावै केहू पइसा नचावेला”. एह समय उनुका गायकी में लये में ना, उनका गोड़ के थिरकलो में एगो अजबे करुणा, लाचारी आ बेचारगी समा गइल रहे. ओहिजा मौजूद सुननिहार-देखनिहार एहू सब के लोक कवि के गायकी के एगो अविरल अंदाज समुझले बाकिर लोक कवि के संगी-साथी भउँचको रहले आ ठकुआइलो. लेकिन लोक कवि असहज रहतो गायकी के सधले रहलन. हालांकि सगरी रियाज रिहर्सल धराइल रहि गइल रहे संगत दे रहल साजिन्दन के. लेकिन जइसे कि लोक कवि के गायकी बेचारगी के लय थाम लिहले रहुवे संगतकारो “फास्ट” का जगहा “स्लो” हो गइल रहलें बिना संकेत, बिना कहले. अउर ई गाना “नाचे न नचावै केहू पइसा नचावेला” सांचहू विरले ना यादगारो बनि गइल रहे. खास कर के तब अउर जब ऊ ठेका दे के गावसु, “हमरी न मानो…” बिल्कुल दादरा के रंग टच दे के तकलीफ के जवन दंश ऊ बोवत रहले अपना गायकी का मार्फत ऊ भुलाये जोग ना रहलो ना रहे. ऊ जइसे सबकुछ से बेखबर गावत रहले आ रोवत रहले. लेकिन लोग उनुकर रोवल ना देख पावत रहे. कुछ लोर माइक तोप लेव त कुछ लोर उनुका मिसरी जइसन मीठ आवाज में बहल जात रहे. कुछ सुधी सुननिहार उछल के बोलबो कइलें, “आजु त लोक कवि कलेजा निकाल के राखि दिहलें !” उनुकर गायकी साँचहू बहुते मार्मिक हो गइल रहे.

ई गाना अबही खतमो ना भइल रहे कि लोक कवि दोसरा गाना पर आ गइले, “माला ए माला, बीस आना के माला !” फेरु कई देवी-देवता, भगवान से होखत ऊ कुछ महापुरुषन तक माला महिमा के बखान करत एह गाना में तंह, करुणा आ सम्मान के कोलाज रचे लगलन. कोलाज रचते-रचत अचानक ऊ फेरु से पहिले वाला गाना, “नाचे न नचावै केहू पइसा नचावेला” पर आ गइलन. सुधि लोग के बुझाइल कि लोक कवि एक गाना से दोसरा गाना में कुछ फ्यूजन जइसन करत बाड़न, भा कवनो नया प्रयोग, नया स्टाइल गढ़त बाड़न. लेकिन साँच ई रहे कि लोक कवि माला के सम्मान के प्रतीक बतावत ओकरा के पइसा से जोड़ के अपना अपमान के रुपक रचत रहलें. अनजानही. अपना मन के मलाल के धोवत रहले.

कुछ दिन बाद चेयरमैन साहब बाबू साहब आ लोक कवि के बीच बातचीत करवावल चहले बाकिर दुनु में से केहू तइयार ना भइल. दुनु का बीच तनाव बनल रहल. तबहियो घोषित तारीख पर जब लोक कवि सम्मान लेबे अपना गृहनगर जात रहले त एक दिन पहिले ऊ बाबु साहब से फोन करके बहुते विनय से चले के कहलन. लेकिन बाबू साहब सगरी फजीहत का बावजूद निशा के भुलाइल ना रहले. छूटते लोक कवि से पूछ लिहलें, “निशा भेंटाई ओहिजा ? साथ चली ?”
“ना.”
त बाबुओ साहिब “त फेर सवाले नइखे उठत” कहत फैसला सुना दिहलन, “निशा ना त हमहू ना आपहू ना.” आ ऊ अउरी झनकत कहले “भाँड़ में जाईं आप आ आपके सम्मान !” आ फोन राख दिहले.
लोक कवि मायूस हो गइलन.
निशो कलाकारन का टीम का साथ लोक कवि के गृहनगर जाये वाला रहे. लेकिन बहुत सोच-विचरला का बाद लोक कवि अंतिम समय में निशा के जाये से मना कर दिहलें. निशा पूछबो कइलसि, “काहे ” का बाति बा गुरुजी ?”
“समुझल करऽ” कहके लोक कवि ओकरा के टरकावे चहलें बाकिर ऊ मानल ना अड़ल रहल. बेर-बेर ओकरा पूछला से लोक कवि ओकरा पर बिगड़ गइलें, “अबहीं त ना कह दिहले बाड़न, लेकिन अगरी कहीं ओहिजा आ गइलन तब ?”
“के गुरुजी ?”
“बाबू साहब. अउर के ?” लोक कवि बुदबुदइले, “का चाहत बाड़ू ओहिजो वितंडा खड़ा होखे, रंग में भंग हो जाव सम्मान समारोह में” कह के निशा के ओकर मेहनताना देत कहले,”हई लऽ आ घरे चलि जा.”
“घर में लोग पूछी त का कहब कि कार्यक्रम में काहे ना गइनी ?” ऊ मायूस हो के बोलल.
“कह दीहऽ कि तबियत खराब हो गइल. दूई-चार ठो दर्द बोखार के गोली खरीद के बैग में राख लीहऽ.” लोक कवि कहलें आ कुछ रुक के बोललें,”अब तुरते एहिजा से निकल जा.”
फेर लोक कवि मय दल बल का साथ अपना गृह नगर खातिर चल दिहलें.

मुख्यमंत्री लोक कवि के समारोहपूर्वक पाँच लाख रुपिया के चेक, स्मृति चिह्न, शाल आ स्मृतिपत्र दे के सम्मानित कइले. महामहिम राज्यपाल का अध्यक्षता में. तीन गो कैबिनेट मंत्री आ पाँच गो राज्यो मंत्री समारोह में बहुते मुस्तैदी का साथ मौजूद रहले. कई गो बड़का अधिकारियो. सम्मान पावते लोक कवि एने ओने देखले आ बेबस रो पड़ले. हँ, एह सम्मान के सूत्रधार बाबू साहब ना आइल रहले. लोग समुझल कि खुशी के लोर हऽ लेकिन लोक कवि के आँखि मंच पर, मंच का आसपास आ भीड़ में बाबू साहब के बेर-बेर खोजत रहल. बाबू साहब हालांकि ना कह चुकल रहलन तबहियो लोक कवि के बहुते उमेद रहे कि बाबू साहब ओह समारोह में उनुकर हौसला बढ़ावे, बधाई देबे अइहन जरुर. आ लोक कवि बाजार के वशीभूत होके भा दबाव में अइसन ना सोचत रहलन, बलुक दिल का गहराई से श्रद्धा में डूबल भावुक हो के सोचत रहले. आ हिरनी जस आकुल उनुकर आँखि बेर-बेर बाबू साहब के हेरत रहल. भीड़ो में,भीड़ से बहरो. आगा-पाछा, दाँया-बाँया दशो दिशाईं में देखसु आ बाबू साहब के ना पा के बेकल हो जासु. एकदमे असहाय हो जासु. बिल्कुल वइसहीं जइसे कि भोलानाथ गहमरी के एगो गीत के नायक के विरह लोक कवि के एगो समकालीन गायक मुहम्मद खलील गावल करसु, “मन में ढूंढ़ली, जन में ढूँढ़ली ढूँढ़ली बीच बजारे हिया-हिया में पइठ के ढूंढ़ली ढूंढ़ली बिरह के मारे कवने सुगना पर मोहइलू आहि हो बालम चिरई.” लोक कवि खुदो एह गाना के आकुलता के सोखत रहले, “छंद-छंद लय-ताल से पूछलीं पूछलीं स्वर के मन से किरन-किरन से जा के पूछलीं पूछलीं नील गगन से धरती आ पाताल से पूछलीं पूछलीं मस्त पवन से कवने अतरे में समइलू आहि हो बालम चिरई.” ऊ कुछ बुदबुदातो रहले मन ही मन फुसुर-फुसुर. बहुते लोग समुझल कि लोक कवि ई सम्मान पा के विह्वल हो गइल बाड़े. बाकिर उनुकर संगी-साथी उनुका मर्म के कुछ-कुछ समुझत रहले. समुझत रहले सम्मान समारोह में मौजूद चेयरमैनो साहब लोक कवि के आँखिन में समाईल खोज, खीझ आ सुलगन के. लोक कवि के आँख बाबू साहब के खोजत बाड़ी सँ एह आकुलता के चेयरमैन साहब ठीक-ठीक बाँचत रहलन. बाँचत रहलन आ आँखे-आँखि में तोसो देत रहलन कि “घबरा जिन, हम बानी नू !” चेयरमैन साहब जे मंच का नीचे आगा राखल कुर्सियन पर बइठल रहले आ बगल के दोसरका कुरसी खाली रखले रहलन ई सोच के कि का पता बाबू सहबवा साला पहुँचिये आवे लोक कवि के एह सम्मान समारोह में.

लेकिन बाबू साहब ना अइले.
तबहिये संचालक लोक कवि के गावे खातिर नेवत दिहलने. लोक कवि कुछ-कुछ मेहराइल, कुछ-कुछ खुशी मन से उठलन आ माइक धइलन. ढपली लिहलन आ एगो देवी गीत गावे लगलन आ बाद में गावे लगलन, “मेला बीच बलमा बिलाइल सजनी”. एह गाना के नायिका का विषादे में ऊ आपनो अवसाद धोवे लगलन.

कार्यक्रम का अंत में मुख्यमंत्री लोक कवि के जनपद के एगो सड़क के नाम उनुका नाम पर राखे के घोषणा कइलन त लोग थपड़ी बजा के खुशी जतावल. कार्यक्रम खतम भइल त लोक कवि मंच से नीचे उतरले आ ओहिजा चेयरमैन साहब के गोड़ छुवले. कहलें,”आशीर्वाद दीं !” चेयरमैन साहब लोक कवि के उठा के अँकवारी बान्ह लिहलन आ भावुक हो के कहलन,”घबरा मत, हम बानी नू. सब ठीक हो जाई.” ऊ दिलासा देत कहले.

कार्यक्रम से निबट के ऊ कलाकारन के बिदा कइलन आ खुद तीन चार गो गाड़ियन का काफिला संगे अपना गाँवे चहुँपलन. आजु ऊ सरकार से दिहल सरकारी लालबत्ती वाला गाड़ी में गाँवे आइल रहलन. साथ में चेयरमैनो साहब रहले अपना अंबेसडर समेत. बाकिर अंबेसडर छोड़ ऊ लोक कवि का साथ लोक कवि के लाल बत्ती वाला गाड़ी में बइठलन. कार्यक्रम में लोक कवि के गाँव के कई लोग, नाते-रिश्तेदार आइल रहले तबहियो ऊ गाँवे अइलन. गाँव के डीह बाबा के पूजा अर्चना कइलन. गाँव के शिवमंदिरो में गइले. शिवजी के अक्षत जल चढ़वलन. पूजा पाठ का बाद बड़ बुजुर्गन के गोड़ छूवले आ अपना घर “बिरहा-भवन”, जवना के ऊ बहुते रुपिया खरच कर के बनववले रहलन, जा के चौकी बिछा के बइठ गइलन. चेयरमैन साहब खातिर अलगा से कुरसी लगवलन. संगी-साथियन खातिर दोसर चौकी बिछवले. ऊ लोग अबही जर-जलपान करते रहल कि धीरे-धीरे लोक कविका घरे पूरा गाँव उमड़ पड़ल. बड़-बूढ़, लड़िका-जवान, औरत-मरद सभे. लोक कवि के दुनु छोट भाईयन के छाती फूला गइल. तबहिये चेयरमैन साहब लोक कवि के एगो भाई के बोलवलन आ दस हजार रुपिया के एगो गड्डी निकाल के दिहले. कहलन कि, “पूरा गाँव में लड्डू बँटवा दऽ.”
“अतना पइसा के !” लोक कवि के छोट भाई के मुँह बवा गइल रहे.
“हँ सगरी पइसा के.” चेयरमैन साहब कहले, “हमार अंबेसडर ओहिजा खड़ा बिया, ड्राइवर के बोलऽ कलि हम कहले बानी. ओकरे से शहर चलि जा आ लड्डू ले के तुरते आवऽ.” फेर चेयरमैन साहब बुदबुदइले, “लागत बा ई सार अतना पइसा एकबेर में देखले नइखे.” फेर घबरइले आ अपना गनर से कहले, “जा, तुहूं साथे चलि जा, ना त एकरा से कवनो छीन झपटि लीहि !”


फेरु अगिला कड़ी में


लेखक परिचय

अपना कहानी आ उपन्यासन का मार्फत लगातार चरचा में रहे वाला दयानंद पांडेय के जन्म ३० जनवरी १९५८ के गोरखपुर जिला के बेदौली गाँव में भइल रहे. हिन्दी में एम॰ए॰ कइला से पहिलही ऊ पत्रकारिता में आ गइले. ३३ साल हो गइल बा उनका पत्रकारिता करत, उनकर उपन्यास आ कहानियन के करीब पंद्रह गो किताब प्रकाशित हो चुकल बा. एह उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं” खातिर उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान उनका के प्रेमचंद सम्मान से सम्मानित कइले बा आ “एक जीनियस की विवादास्पद मौत” खातिर यशपाल सम्मान से.

वे जो हारे हुये, हारमोनियम के हजार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाजे, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास), बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एक जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह), सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां), प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित), आ सुनील गावस्कर के मशहूर किताब “माई आइडल्स” के हिन्दी अनुवाद “मेरे प्रिय खिलाड़ी” नाम से प्रकाशित. बांसगांव की मुनमुन (उपन्यास) आ हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण) जल्दिये प्रकाशित होखे वाला बा. बाकिर अबही ले भोजपुरी में कवनो किताब प्रकाशित नइखे. बाकिर उनका लेखन में भोजपुरी जनमानस हमेशा मौजूद रहल बा जवना के बानगी बा ई उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं”.

दयानंद पांडेय जी के संपर्क सूत्र
5/7, डाली बाग, आफिसर्स कॉलोनी, लखनऊ.
मोबाइल नं॰ 09335233424, 09415130127
e-mail : dayanand.pandey@yahoo.com

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