– डॉ अशोक द्विवेदी


कविता के बारे में साहित्य शास्त्र के आचार्य लोगन के कहनाम बा कि कविता शब्द-अर्थ के आपुसी तनाव, संगति आ सुघराई से भरल अभिव्यक्ति हऽ। कवि अपना संवेदना आ अनुभव के अपना कल्पना-शक्ति से भाषा का जरिये कविता के रूप देला। कवनो भाषा आ ओकरा काव्य-रूपन के एगो परंपरा होला। भोजपुरी लोक में ‘गीत’ सर्वाधिक प्रचलित आ पुरान काव्य-रूप हऽ।

जेंतरे हर काव्य-रूप (फार्म) के आपन-आपन रचना-विधान, सीमा आ अनुशासन होला, ‘गीतो’ के बा। दरअसल गीत एगो भाव भरल सांकेतिक काव्य-रूप हऽ, जवना में लय, गेयता आ संगीतात्मकता कलात्मक रूप में रहेला। शब्द-अरथ के सुघर बिनावट का साथ-साथ आंतरिक संगति के एकरा में बहुत महत्व बा। केहू पुरान साँचा में नया ढंग से भावाभिव्यक्ति का परंपरा के आगा बढ़ावेला, केहु पुराना साँचा ढाँचा में कछु नया जोर मिलाइ के अपना समय-सत्य के उकेरेला आ केहू पुराना साँचा तूरि के नया साँचा-ढाँचा गढ़ेला। महत्व तीनों के बा, काहें कि तीनू में अपना समय के जीवन आ परिवेश रहेला। गीत का संरचना में भाषा के सार्थक, सुनियोजित इस्तेमाल गीत के सार्थक प्रभाव (इम्प्रेशन) देला आ ओकरा के असरदार बनावेला। गहिर असर डाले वाला गीतन में वास्तविक जीवन के भाव-सघनता, तरलता आ अनुभूति के गहिर व्यंजना रहेले। कवनो गीत के ‘टोन’, लय आ ध्वन्यात्मक अनुगूँज ओकरा संप्रेषणीयता के अउर बढ़ावेला। लोकगीतन का अनगढ़ संरचना में, मर्म छूवे आ झकझोर वाला शक्ति एही कारन बा। गीत के एगो लमहर परंपरा भोजपुरी क-साहित्य में बा, जवन अधिकतर वाचिक बा। एम्मे लोकजीवन के हूक-हुलास, राग-रंग आ आँच देबे वाला साँच का साथ प्रेम-विरह के मार्मिक व्यंजना बा। पुरुष प्रधान गीत बिरहा, चइता, फगुवा, कहरवा आ नारी प्रधान कजरी, सोहर, झूमर, संझा-पराती, जेवनार, जँतसार, छठ, बहुरा आ बियाह के गीतन में श्रम, सपना, हुलास, हँसल-अगराइल, पीरा आ अहक-डहक; सुनवइया के बरबस खींचे आ बान्हे के सामर्थ से संपन्न बा। इहे ना, देवी-देवतन के मनावन-रिझावन आ आत्मनिवेदन कूल्हि बा एमे। लोककंठ से फूटल, दूर ले, बिना प्रचार-प्रसार के सहजे पसरल भोजपुरी के ई गीति-परंपरा कतने नया साँचा आ लय गढ़लस।

प्रेमरस से भींजल, विरह के पीर से भरल कसक उपजावे वाला भाव प्रधान निरगुनिया, गीतन के सिरजनहार महेन्दर मिसिर एगो नए राग आ गीत-रूप दिहले- ‘पुरबी’। एह गीतन के भावावेग आ लय में भाषा के सीमा टूटि जाले। ध्यान से देखल जाव त ई बात साफ हो जाई कि एह गीतन में भाव-सघनता शब्दन के चुनाव आ बइठाव में कुशल संयोजन बा। लोक-संपृक्ति आ संप्रेषण खातिर कमोबेस एह तरह के शब्दन के इस्तेमाल करहीं के परेला, जवन लोक-व्यवहार में आपन अर्थ गौरव आ आकर्षण राखत बाड़न स। एकरा साथे-साथ भाव-संप्रेषण का अनुकूल एह तरह के लय-विधान बनावे के परेला जवना से भाव-सघन्ता आ अनुभूति के तरलता असरदार ढंग से सुने वाला के हृदय के छू लेव। भोजपुरी के कवि जब गीत लिखे लगलन त लोक प्रवाहित ई गीत-परंपरा कवनो ना कवनो रूप में ओ लोगन के पाछ धइले रहे। भोजपुरी गीतकारन में दोसरा भाषा लेखा कबो नया-पुरान के ताल-ठोंक झगरा ना भइल। अब्बो नइखे। एकर कारन ईहे बा कि ई कवि अपना माटी आ परंपरा से हमेशा जुड़ल-बन्हाइल रहलन स। शिल्प-संरचना बदलल, भाषा प्रयोग के तौर-तरीका बदलल, बाकि गँवई भावधारा नया-नया रूप धइ के संगे लागल रहि गइल। अपना जमीन से कटि के दुनियाँ-जहान का भवँरजाल में अझुरइला से का होइत? भोजपुरी लोक ओके सकरबे ना करित।

भोजपुरी कवि जवना उछाह से लोकराग आ ओकर पारंपरिक लय-धुन पकड़ि के आपन गीत रचेला, ओही उछाह से एह काव्य-रूप में केहू नया शिल्प-साँचा में अपना माटी के रस-गंध आ सुभावो उरेहेला। लीखि से अलगा हटि के लिखे वाला कवियन में जहाँ परंपरा से बिलगाव भइलो बा, उहाँ ओकर भोजपुरिहा-संस्कार ओके भोजपुरी परंपरा से कटे नइखे देले; जे एहू से कटि गइल, समझ लीं ऊ भोजपुरी के नइखे रहि गइल। बाहर ओकर भले जान-मान भइल, भोजपुरी में ओकर पुछार ना भइल।

स्वतंत्रता-आंदोलन आ सुराज मिलला का बाद ले भोजपुरी कविता क जवन रूप देखे-सुने आ पढ़े के मिलेला ओमे राष्ट्रीय चेतना का अलावा प्रकृति के सुघराई, खेत-खरिहान, मौसम, प्रेम-भावना, जिनिगी के दुख-सुख आ भक्ति के स्वर प्रधान बा। गौर कइला प ई साफ बुझाई कि गँवई जीवन आ प्रकृति एह पूरा कविता-समय के आलंब आ प्रतिपाद्य रहल बा। लोक-गीत लोक-अनुभूति आ ओकरा रुचि-प्रतीति के गीत संसार हऽ। सुख-दुख, सोच-विचार, अनुभव-व्यवहार हर ममिला में लोकधर्मी। किसान-मजूर आ मेहरारू एह संसार के वाहक आ भोक्ता हउवन त घर-गिरहस्थी, खेत, खरिहान, बाग-बगइचा, पोखरा-ताल-नदी आ पहाड़-जंगल एकर क्षेत्र हउवे। एकरा बाद कुछ बा त ऊ परदेस हऽ। बाकिर ई क्षेत्र अब बढ़ि-पसरि के प्रदेश, देश, देश के राजनीति, शासन-प्रशासन, सड़क-संसद, सामाजिक-सांस्कृतिक विघटन, मानवी-रिश्ता आ मूल्यन के बिखराव तक पहुँच गइल बा। एह तरह से ई अपना लोक दृष्टि में आधुनिकता आ उत्तर आधुनिकता के काम भर समेट चुकल बा।

भोजपुरी कवि नकली क्रांतिधर्मिता आ जन-पक्षधरता के भोंपू ना बजावे; ऊ जन-चेतना के वहन करेला। जवन जथारथ बा ऊ बा, आ जथारथ ई बा कि दिन-रात, हाड़तोड़ काम कइला का बाद जो दू घरी कहीं ओठँघे-बइठे आ सपना बुने के संजोग भेंटाला त ओहू कल्पना-विहार का अवस्था में ओकर गरीबी कवनो ना कवनो रूप में झलकेले – चाहे ऊ पेवन आ चकतिये लेखा काहें ना होखो। ऊ धरती-आकास का बीच घटे वाला हर घटना-दुर्घटना के अपना देंहि आ दिल-दिमाग पर अनुभव करेला। ई बात दीगर बा कि ओकर धरती गँवई खेत-खरिहान क धरती ह, आ ओकर दुनिया एह, धरती पर नया-नया रूप धारे वाली प्रकृति के दुनियाँ हऽ –

चन्दा ओढ़वे राति चानी के चदरा
सूरुज उड़ावेला सोने के बदरा
बदरे में चकती लगावे मोरी नइया।
मजे-मजे काम होखे रसे-रसे पानी
ताले-तलइया में बिटुरल बा पानी
सोने क मछरी कि रूपे क रानी
पियरी पहिरि बेंग कइठेले ज्ञानी
इनरासन झूठ करे हमरी मड़इया।
सननन, सन सन बहेले पुरवइया।
(मोती बी0ए0)

मोती बी0ए0 अपना काव्य-संग्रह ‘सेमर के फूल’ में फेंड़, फूल, सुगना आ झुलनी जइसन प्रतीकन से जीवन-दर्शन के अन्योक्तिपरक प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति त कइलहीं बाड़न, खेती-बारी आ किसान-जीवन के यथार्थ चित्रो उरेहले बाड़न। एम्मे कल्पना के हवाई उड़ान आ रुमानी छिछिलपन नइखे – खेतिहर जीवन के एगो जियतार चटक रंग बा, जवन अपना लालित्य आ रागात्मकता से लसल बा। मोती बी0ए0 गँवई जीवन के कुशल चितेरा बाड़न। एही से उनका गीतन में प्रकृति के सुघराई का साथ-साथ किसान के संघर्ष, दुख-दरिद्रता आ अवसाद के मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति भइल बा –

पुसवा आ मघवा बिपतिया के खनिया
एही में होले वसूली लगनिया
साहब के कुड़की सभापति के घुड़की
ढेबुआ की खातिर उजारे पलनियाँ
हाकिम-दइब हतियार हो सजनी!
(मोती बी0ए0)

ई अनायास नइखे कि प्रकृति के प्रति भोजपुरी कवियन के गहिर लगाव गीतन में चित्रित भइल बा। हिन्दी के काव्य-धारा में आइल बदलाव, भोजपुरियो के प्रभावित कइले बा। अनिरूद्ध, हरेन्द्रदेव नारायण, भोलानाथ गहमरी, प्रशान्त आदि कुल्हि कवियन पर हिंदी के छायावादी संस्कार आ प्रवृत्ति झलकेले। बाकिर शब्द-संयोजन, भाषा क चित्रकारी, प्रेमभावना आ रहस्यवादी प्रवृत्ति का बावजूद गीत में एगो खास किसिम के लोकज संवेदना, लगाव आ सह-अनुभूतियों देखे के मिली –

टुटही मड़इया के अइसन कहानी
अदहन का पानी में खउले जवानी
रोवेला छौंड़ा मजूरवा, मेहरिया
देखे बजरिया के राह
सँझिया के उसरल बजार!
(अनिरूद्ध)

बिना छुवल बाजेला सितार !
पतझर में दरद, माघो में पिरीत गीत
बरखा में गाईले मल्हार !
(हरेन्द्रदेव नारायण)

सजधज के सोनकिरिन उतरे मुड़ेरिया
ओठ पर धरे केहू गुलाब के पँखुरिया
टाँकि गइल सात रंग बिंदिया लिलार के।
(भोलानाथ गहमरी)

भोलानाथ गहमरी के गीत-संसार, प्रकृति आ प्रेमपूरल जीवन के सुघराई आ मनोहारी प्रतीति के संसार हऽ। लय, गेयता, संगीत, रागबोध से भरल उनका गीतन में लोकज संवेदन का कारण एगो चटक क्षेत्रीय रंग आ अपनापन आ गइल बा। ‘बयार पुरवइया’, ‘अँजुरी भर मोती’ आ ‘लोकरागिनी’ में घर-अँगना, खेत-खरिहान का साथ-साथ प्रेम के लौकिक आ अलौकिक दूनों रूप देखे के मिली। जहाँ उनकर गीत छायावादी, रहस्यवादी प्रेम भावना के छोड़ि के लोकज रूप धइले बा, ओम्मे दोसरे आकर्षण आ गइल बा –

महुवा के फूल झरे पलकन के छँहियाँ
सारी रात महके बलमु तोरी नेहियाँ
— — — — —
कीचड़ से नीलकॅंवल दियना से कजरा
चिटुकी भर नेह से सँवर जाला जियरा।
(भोलानाथ ‘गहमरी’)

छायावादी रहस्यलोक आ ‘बलमुआ’, ‘पियवो’ का संसार से बाहर निकल के जहाँ भोजपुरी गीत देश, समाज, खेत-बधार आ बेवस्था के आपन विषय बनवले बा, उहाँ ओकर भाव-भूमि लोकज हो गइल बा। एही से एह गीतन में आर्त्त आ त्रस्त जन के सुख-दुख, आस-निरास, पीरा आ आक्रोश मुखरित भइल बा। एह गीतन में भोजपुरी के साहित्यिक बाकि प्रकृत रूप प्रगट भइल बा। सुराज का बाद आमजन के दारुण स्थिति भोजपुरी गीतन में कुछ एह तरह से प्रकट भइल कि ओ से गहिर निराशा आ अवसाद के झलक साफ लउके लागल –

हमनी का आह से जे धुआँ उठी ओकरा से
लोक काँपि जइहें सरग भरि जइहें
गाँव-गाँव मड़इन से आगि उठी लपलप
देखत-देखत में महल जरि जइहें।
(रामविचार पाण्डेय ‘बिनिया-बिछिया’)

बटिया निरेखत नयन पथराइल
हमरी दुअरिया सुरजवा ना आइल
कवनी नगरिया रे रहिया घेराइल
बापू के सपना के टूटल गुमान!
टूटि गइल थून्ही कोरो, ढहली मड़इया
फाटल करेजा पर लगान के चढ़इया
मनवाँ में पीरा बा नयनवाँ में लोर बा
केने बा समाजवाद जेकर भइल सोर बा!
(जगदीश ओझा ‘सुन्दर’, जुलुम भइले राम)

जगदीश ओझा ‘सुन्दर’ अपना गीत-संसार में गँवई समाज का साथ-साथ पूरा देश के आंतरिक दुर्व्यवस्था के चिन्दी-चिन्दी उघार देत बाड़न। ‘जुलुम भइले राम’ कविता-संग्रह में अइसन कई गो मार्मिक आ मन के झकझोरे वाला गीत बाड़न स, जवना में जथारथ के खाली जस के तस नइखे परोसल गइल, बलुक ओकरा तह में घुसि के असलियत के उघारे के कोसिस कइल गइल बा। नोंचात-चोंथात आ चूसल जात आम आदमी एह गीतकार के अइसन हड्डी अस लागत बा जेके जुल्मी आ शोषक कुक्कुर लपटि के नोचे में लागल बाड़न –

केहू माँगे घूस केहू माँगे नजराना
केहू माँगे सूद मूरि, केहू मेहनताना
कुकुर भइले जुल्मीजन, हाड़ भइल जिनिगी
नदी भइल नैना, पहाड़ भइल जिनिगी।
(जगदीश ओझा ‘सुन्दर’)

एम्मे शक नइखे कि एह दौर के गीतकारन के सर्वाधिक प्रिय विषय प्रकृति रहल बिया। गँवई परिवेश के करीबी दर्शन अपना आप में सुन्दर आ ललित बा, बाकि अपना संवेदना आ अनुभूति के लोक व्यवहार आ अनुभव से जोरि के ओकर प्रभावपूर्ण प्रस्तुति कइल कठिन बा। भोजपुरी गीतन में ई प्रभावान्विति, एगो खास किसिम के चमक का साथ उभरल बा –

ललकी थरियवा में दियना के जोति लेके
उतरल आवेला बिहान।
सनन सनन जब बहेले बेयरिया
टटिया के ओटवो उड़ावेले चुनरिया
बदरा के देखि-देखि बिहरेला प्रान रे
(प्रभुनाथ मिश्र, ‘हरियर हरियर खेत में’)

रितु-अनरितु में कवन विधि तुलिहें
गरमी के दिन में गुलाब कइसे फुलिहें
संग-संग सनके लागी तपति बयार हो…
कवन वन गइलै?
(रामजियावन दास ‘बावला’, ‘गीतलोक’)

कारिख का कोखी से लाल किरिनि के जनम कहाई
धुरियाइल धरती का आँचर में मोती बिटुराई
दमकी हीरा दिन दुपहरिया सरग-पताल सिहाई
जीतत चली जिनिगिया रन, मन मउवति के मुरुछाई।
(अविनाश चंद विद्यार्थी, ‘सुदिन’)

निमिया के गछिया से फूस के मड़इया पर
उतरेला सोना अस भोर
(रामनाथ पाठक ‘प्रणयी’)

फजीर के अँजोर के प्रतीकात्मक ढंग से चित्रित करे के परंपरा भोजपुरी गीतन में सुरुवे से बा। भोजपुरी गीतकारन के अभिजात नगर जीवन के बनावटी दुनिया, संवेदना आ रस से हीन जिनिगी में कवनो रुचि नइखे। ऊ जवन देखत सुनत अनुभव करत बा ऊ दुनियाँ खेत-बारी, नदी, पहाड़ के गति से बनल दुनियाँ हऽ। ऋतु परिवर्तन का साथ सजे-सँवरे, जरे-झउँसे वाली प्रकृति से ओकर अटूट रिश्ता बा। बोवाई, रोपनी, सोहनी आ कटिया-दँवरी में लागल खेतिहर मजूरन के उछाह, उमंग, चिन्ता-फिकिर आ पीड़ा के ई कवि अपना हिया का आँखि से देखत बाड़न स। कभी-कभी आधुनिकता का चकाचौंध में मजा लूट रहल लोगन के देखि के ओकरा भीतर खीझि अउर असंतोषो, उभर जाला, बाकि आखिरस फेरु ओही गँवई संसार का कारुणिक नियति के साक्षात्कार कइल, जइसे ओकर मजबूरी बा आ एकरा चलते आक्रोशो बा –

कुहूँकत-कुहुँकत बीति गइले जुगवा
गरजि-गरजि अब गाउ रे कोइलिया।
(प्रभुनाथ मिश्र)

सटल पीठ से पेट जहाँ पर
जहाँ भूख से उठल करुन स्वर
दाल भात पर नजर परल बा
दूलम सतुआ साग कोइलिया,
ई गरीब के बाग कोइलिया।
(रामनाथ पाठक ‘प्रणयी’)

जनजीवन के दुर्दशा आ दुख के चित्रण करत खा भोजपुरी कवि ओकरा उल्लास, उमंग, उछाह अउर सुघराई के नजरअंदाज नइखे करत, काहें कि ओकरा जथारथ में ईहो बा। जवानी, प्रेम आ हुलास परिस्थिति का मुताबिक अपना जनवादियन लेखा खाली भूख आ रोटी आ कल्पित क्रांतिधर्मिता के ई कवि अपना गीत में नइखन स थोपत, इहाँ त सुघराई आ प्रेम अपना तिताई का साथ सोझा आवत बा, प्रेम, विरह, गरीबी आ दुख के अभिव्यक्त करे में प्रकृति ओकर आलंबन-उद्दीपन बनत बिया –

जड़वा के रतिया, गरीबवन के छतिया
पछुवा बहेला बिछीमार।
xx xx xx
अँगिया में धधकत बा अगिया गरिबिया के
अँखिया में छलकत बा लोर।
xx xx xx
चुपके चोर चोरा ले भागल सरबस माल जवानी
टूटल नीन, नेह के घइला फूटल, ढरकल पानी।
xx xx xx
दिन भर उड़ेला मैना
थाकि जाला दूनो डैना
दुनियाँ छिपल बाटे जलवा पसार के
घरवा में घूमे गोरी सँझवत बार के!
(रामनाथ पाठक ‘प्रणयी’)

रागात्मक अनुभूति के कोमल व्यंजना आ कल्पनाप्रवण भावुकता भोजपुरी के पुरनका अधिकांश कवियन में रहल बा। कहीं-कहीं ई बौद्धिक चेतना आ ज्ञानात्मक संवेदना से लसि के उभरल बा, त कहीं निछक्का रागात्मक आ संवेदनात्मक रूप में। संदर्भ-चित्र, भाव-चित्र आ रूप-चित्रन से सजल एह गीतन में गीतकार के आत्मानुभूति, गहिर भावबोध आ अभिव्यक्ति-कौशल देखे लायक बा। भोजपुरी काव्य भाषा के साहित्यिक रूप एह तरह के गीतन में अउर निखरि गइल बा –

घटा हटा निकले रथ ताने धनु सतरंगी
किरन-रास खींचे रवि पहिया नाचे जिनगी
उड़े धजा विहग पाँति फर-फर बन, मग-संगी।
(अनिरूद्ध)

बाहर के साँकल के पुरवाई झुन से बजा गइल
आँगन के हरसिंगार दुअरा के महुवा जस
चू-चू के माटी पर अल्पना सजा गइल।
(पाण्डेय कपिल, ‘भोर हो गइल’)

मधुवन झउँसि गइल फुलवन के
झाँवर भइल सुरतिया
कुंअना गइल पताल,
ताल-तलइन के दरकल छतिया
सिकुरि-सिकुरि अझुराइल नदिया
गतरे गतर सेवार के।
पानी अतरल धार के।
(जगन्नाथ, ‘पाँख सतरंगी’)

इन्द्रधनुष में सात रंग कूँची से भरे चितेरा
जाल डाल सागर में डोरी खींचे चतुर मछेरा
के वंशी के सुर फूँकेला भौंरन के गुंजार में।
(गणेशदत्त ‘किरण’, ‘अंजुरी भर गीत’)

गोरकी बिटियवा टिकुली लगा के
पुरुब किनरवा तलैया नहा के
चितवन से अपना जादू जगा के
ललकी चुनरिया के अँचरा उड़ाके
तनिक लजा के आ हँस-खिलखिला के
नूपुर बजावत किरिनिया क निकलल!
(रामेश्वर सिंह ‘काश्यप’)

लोकधर्मी भावभूमि पर, लोकराग में ठेठ लोकज ढंग से रचाइल-बिनाइल गीतन के त बाते कुछ अउर बा। एम्मे भोजपुरी के आपन संस्कार आ पहिचान झलकत बा। भाषा के सुभाव का लेहाज से ई गीत जइसे बेमेहनत के सहजे बहरिया गइल बाड़न स। एह गीतन में ठेठ शब्दन के सुघर सार्थक प्रयोग अउर असर डालत बा –

छनियाँ पर लतरल बा झिंगुनी तरोइया
दुअरा बरधिया के जोर
अठिया बँड़ेरिया गुटुरगूँ परेउवा
बचवा भइल अँखफोर।
(बलदेव प्रसाद श्रीवास्तव)

भरल घइलवा सनेहिया के ढरकल
दूधे नहाइल नगरिया
बीचे बजरिया में छवि के हेराइल
रस में गोताइल नजरिया
झूम उठल मस्ती में गँवई सिवान रे।
उतरल तलइया में गोर-गोर चान रे!!
(जगन्नाथ, ‘पांख सतरंगी’)

जड़वा के खेतवा पर चढलि जवनियाँ
गेहुवाँ पर बरसल सोनवाँ के पनियाँ
बुँटवा में तिसिया धधाइल रे
आइल बसंत रितु आइल रे!
(राहगीर, ‘भोजपुरी के गीतकार’)

नइहर मोर लइसे जलभर बदरा
मोरे ससुरे ओइसे लहरे सिवान हो!
अपने आपन करीं केतना बखान हो
सासु मोरि धरती, ससुर आसमान हो!
(हरिराम द्विवेदी, ‘नदियो गइल दुबराय’)

अँगना में तुलसी के बिरवा परल घवाइल बा
पुरवा का लहरा में कइसन दरद सनाइल बा
अमरइया के छाँह ठाढ़ हो गइल काढ़ के फन!
कहाँ निरेखीं आपन सूरत, दरक गइल दरपन।
(भगवती प्रसाद द्विवेदी)

जगमग जरेले किरिनिया के बाती
अँगना में आवेला अँजोर।
चनिया के चदरा चनरमा बिछावे
जोन्हिया के अँग-अँग गहना गुहावे
गोरकी के बढ़ि जाले आजु बड़कई
बुलुक बुलुक बुलुकावेले करियई
अँखिया से आवेले अँसुइया के धरिया
ओसिया ओही क हवे लोर!
(मुख्तार सिंह ‘दीक्षित’)

गोबरा से लीपल अँगनवा निहारे
ए राजा, अबकी कमइया मुआर
फाटत करेजवा के सबुर धरइहऽ
ए रानी हमनी के हईं बनिहार!
(मधुकर सिंह)

शिल्प आ भाषा के बिनावट का दिसाईं सतर्क गीतकारन में परंपरा से कछु अलगा हटि के प्रगति, प्रयोगधर्मिता आ नया अभिव्यक्ति देबे क छटपटाहट लउकत बा। हिन्दी में आइल नवगीत के नवधारा के प्रभाव का कारन ई गीतकार अपना रचना में बिम्ब, प्रतीक आ संकेत का जरिये गीत में नया रंग भरे के उतजोग कइले बाड़न। हिन्दी में ई काम कहीं शहरी शब्द-संजोजन से आ कहीं लोकज शब्द आ मुहावरन का प्रयोग से संभव भइल, बाकि भोजपुरी में गाँव, प्रकृति आ जनजीवन का भाव-भंगिमा के नया लय, नया शब्द-योजना, प्रतीक आ रूप-चित्र का साथे परोसला का कारण एह गीतन में अभिव्यक्ति के एगो नये सुघराई प्रगट भइल –

ललकी किरिनया के डेंगिया में बइठल
जुड़वा खोलत मुसुकाय
जुड़वा तोपाइल दहकत देहियाँ
अगिया पियत भहराय
सँसिया के बहे जे बयार
सखि रे धरती के भरे अँकवार!
(उमाकांत वर्मा, ‘गीत जे गूँजल’)

पुरुब क्षितिज पर/फूल भोर के खिले
गगन उजराये
फूल साँझ के जूड़ा में खिले
बने इंजोरिया, गाये…
किरिन पाँख में ले लपेट
चिरई फुनगी पर जाये!
(विश्वरंजन, ‘एक पर एक’)

पोंछ गइल आँतर के/गढ़ुवाइल बात
सिकहर पर झूल रहल/बसियाइल रात
झाँक रहल गीतन के रागिनी अरूप!
छितराइल सुधियन के एक पसर धूप!
(पी0 चंद्रविनोद, ‘केतना बेर’)

किलकारी नदियन के
गोद में पहाड़ी के
थथमल बा रूप के हिरन!
आँगन में पसरेला अँजुरी भर धूप
मरुआइल चंद्रमुखी/मरुवाइल रूप
सूरज पर पहरा परे!
फूल हरसिंगार के/मन का चउतरा पर
चुपे चुपे रात भर झरे!
(परमेश्वर दुबे ‘शाहाबादी’)

गाँव होखे भा कस्बा आ शहर – ओकर विसंगतिपरक आ अभावपूरित, अमानवीय माहौल साधारण आदमी के दुख, परेशानी आ चिन्ता के अउर बढ़ा देले बा। गाँव अब पहिले वाला गाँव नइखे। ओकर भोलापन, सोझबकई, आपुसी भाईचारा धीरे-धीरे बिला रहल बा। प्रकृति आ ओकरा सुभाव से रँगल पुरनकी रागात्मक संवेदना आ ओसे जोराइल अपनापा, शहरी कुप्रभाव आ राजनीतिक छल-छहंतर का आँच से झुलस रहल बा। अइसना में भोजपुरी गीत के ‘थीम’ लय आ उद्देश्य काहें ना बदलित ? ओकरो पर ओइसहीं प्रभाव परल –

तरकुल के छाँह भइल जिनिगी!
रेत भइल नदी के कहानी
डभकत बा दिन जइसे अदहन के पानी
चूल्हा के धाह भइल जिनिगी!
(सत्यनारायण, ‘काव्या’ 93)

जिनिगी का बखरा में घाव के अगोरिया
कबहूँ अन्हार घेरे कबहूँ अँजोरिया
राति राति जोगवल कुँवार
सपनवाँ दुअरिये तँवाला!
(रिपुसूदन श्रीवास्तव, ‘काव्या’ 93)

महँगी के बहँगी पर देह के सुखौता
बेकल जवानी पर जीभि के सरौता
हाथ का तिजोरी में, दउलत पसेना के
पेट में बा लंका-दहन!
(परमेश्वर दूबे शाहाबादी, ‘उरेह’-5/6)

सपना के होला जहाँ होलिका दहनवा
मनवाँ में खउलेला प्रीति अदहनवा
मयगर ऊ अँचरा के छाँव कहाँ रे,
दउर-दउर खोजीला गाँव कहाँ रे!
(कुमार विरल, ‘पाती’-6)

मन गिरगा भटक रहल लूह चले ताल में
सपनन केपाँख फँसल कवन महाजाल में
सोझहीं धनकत बाटे पुलुई जजात के!
(अशोक द्विवेदी, ‘पाती’-6)

देवता घूमत बा उघार खोरी-खोरी
गोड़ तर फाटेला दरार चारू ओरी
मुट्ठी भर बीया के हो गइल तबाही
आसा के खेती में लागलि बा लाही
आँखी से आँसू ना गिरल करे ठार!
(आनन्द संधिदूत, ‘एक कड़ी गीत के’)

भोजपुरी कविता जेंतरे अपना ठेठ शब्द संस्कार आ मुहावरेदारी का संगे भोजपुरी के भाषिक तेवर; नाटकीयता आ सांकेतिकता के इस्तेमाल से, अपना गीत-‘संरचना देखि के – ओकरा बिनावट से निसरत अर्थ गांभीर्य आ व्यंजना देखि के। दुख आ पीड़ा के ओकरा कारन आ परिवेशगत विसंगति का साथे उकेरे में भोजपुरी के गीतकार सफल रहल बाड़न। लोकधुन के काव्य रूप होखे भा नया संरचना-शिल्प के, गीत रचत खा भोजपुरी गीतकार के काव्यानुभूति जमीनी जथारथ आ लोकमुहावरन से अपना के संपृक्त क के आपन आकार ग्रहण करेले।

अपना भागे कुदिन तबाही
जलन घुटन ठहराव
ठंढा सूरज धनकत गाँव!
(गंगा प्रसाद अरुण, ‘पाती’-22)

कोख के करेज कहीं कुहुँके पलुहारी पर
धनियाँ के ध्यान जाके अटकल बनिहारी पर
अजबे ई मनवा परल पसोपेस में!
(दक्ष निरंजन शंभु, ‘एक पर एक’)

जाड़ा गरमी बरखा न जनतीं
गोहूँ ओसवलीं त भूसा बनलीं
काहें बरध सब खेतवा चरलें
हम भइलीं कउड़ी के तीन
केकरे नाँवे जमीन पटवारी
केकरे नाँवे जमीन!
(गोरख पाण्डेय, ‘भोजपुरी के नवगीत’-7)

समय बहेंगवा बेलगाम
मोर फाटल फाँड़ न बूझे
एह अन्हार जंगल में कवनो
ऊजर राह न सूझे
चिरई केतनो आस जोगावे बाकिर
रोजे जाल फँसे!
(अशोक द्विवेदी, ‘पाती’)

छोट-मोट आदमी के नियति बा कि ऊ जवन आस-बिश्वास आ भरोस लेके आपन जांगर तूरेला, बेवस्था का बिरोधाभासी घटाटोप में, घेराइ के जहाँ के तहाँ पहुँच जाला, कबो-कबो त ओकर कूल्हि सपना जथारथ का चकाचउँध से छिन्न-भिन्न हो जाला। एह कारुणिक स्थिति के भोजपुरी गीतकार अलग-अलग कोण से देखे आ देखावे के कोसिस कइले बा लोग। अपना जमीन आ काव्य-परंपरा से अंदरूनी रिश्ता बना के कुछ कहे का प्रक्रिया में जदि प्रयोगधर्मिता आइलो बा तबो गीत के कड़ी आ संगति टूटल नइखे। सजग कलात्मक रचाव का कारन ई गीत अउर अर्थगर्भ आ असरदार हो गइल बाड़न स। गीत में जहाँ कहीं नाटकीयता आ कटाक्षपूर्ण व्यंग्य व्यंजित भइल बा, उहाँ जथारथ का विसंगति के उघारत ई असर कुछ अउरी बढ़ जाता –

धीरे-धीरे शहर गाँव में, देखा कइसन धँसे लगल हौ
सास के मुँह पर नई बहुरिया उलटे पल्ला हँसै लगल हौ!
(कैलाश गौतम, ‘पाती’,22-23)

लोकतंत्र अबरा के मेहर
ई मेहर सबकर भउजाई
सुनि लऽ भाई!
(सत्यनारायण, ‘कविता’ 4)

काम बाटे कतना ले बीने के बरावे के
रतिया बिछावे के अँजोरिया सुखावे के
हाँके के बा तरई उड़ावे के बा चान
हमें सोचहूँ न देत बाटे पेट के पहाड़!
(आनन्द संधिदूत, ‘पाती’-6)

घर लूटे क साजिश होत बा दुआरे
मुखिया चुपचाप कहीं बइठल पिछुवारे
अँगना क लोग भइल काठ क गिलहरी!
(कमलेश राय, ‘पाती’ 22)

उपवन-उपवन बगिया-बगिया
नाच-नाच गावे कागा
कोइल नजर बचा के भागल
ना केहू पीछा आगा
गरम हवा के गश्त तेज बा
अमराई के छाँव तले।
(सूर्यदेव पाठक ‘पराग’, ‘कविता’-6)

भोजपुरी गीत के अपना भावभूमि, प्रतिभा, दृष्टि आ रचना-कौशल से नया-नया भंगिमा आ ऊँचाई देबे में कतने पुरान आ नया गीतकार लागल बाड़न, ओह सब लोगन के एह छोट आलेख में समेटल कठिन बा। गीत के भाव-भंगिमा बनावे में जुटल एह लोगन में माहेश्वर तिवारी, पाण्डेय आशुतोष, ब्रजभूषण मिश्र, प्रकाश उदय, रामेश्वर प्रसाद सिन्हा ‘पीयूष’, रिपुंजय निशान्त, दयाशंकर तिवारी, शम्भुनाथ उपाध्याय, हरिवंश पाठक गुमनाम, आनन्द संधिदूत, कमलेश राय, गंगा प्रसाद ‘अरुण’, भगवती प्रसाद द्विवेदी आदि के नाँव लिहल जा सकेला।

भोजपुरी के पत्र-पत्रिका खासकर ‘भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका’, ‘पाती’, ‘समकालीन भोजपुरी साहित्य’ आ ‘कविता’ स्तरीय ढंग के गीत प्रकाशित कर रहल बाड़ी सन। भोजपुरी गीतकारन के नजर अब आज के जिनिगी के जद्दोजहद, संघर्ष, विचार-दर्शन आ ओह अमानवी स्थितियो पर जा रहल बा, जेमे आदमी के जुझला-जोतइला आ आत्मसंघर्ष का संगे-संगे ओकर असहाय अवस्था, किंकर्त्तव्यविमूढ़ता आ संवेदनहीन मनःस्थिति आ-जा रहल बा। एम्मे शक नइखे कि कुछ खास राजनीतिक विचार-आग्रह में रचाइल गीतन में, सत्यानुभूति आ मौलिक संवेदन का बजाय, बनावटी जथारथ आ पूर्वाग्रही सोच के उरेह गीत का आंतरिक संगति में नइखे बइठ पावत। एह नाते अइसन रचनाकार ‘गीत’ के दिसाईं विरोधी रुख अपनावत हिंदी के अतुकान्त कविता का सपाटबयानी का ओर मुड़ रहल बा। बाकिर, अरसा से भोजपुरी कविता के सजावे-सँवारे में लागल समर्थ गीतकार एहू खातिर चिन्तित लउकत बाड़न कि अत्यधिक आधुनिकता के मोह, प्रयोगशीलता आ चमत्कार-सृजन का चक्कर में भोजपुरी संस्कृति आ भोजपुरी के काव्यात्मक भाषाई-खासियत मत छूट जाव; जन-जन का कंठ से प्रवाहित- सुनवइया के आंदोलित करे वाला ऊ राग-रागिनी, धुन आ लय मत तिरोहित हो जाव, जवना खातिर भोजपुरी जानल-पहिचानल जाले।

(भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका पाती के जनवरी 2017 अंक से साभार)


(भोजपुरी साहित्य सम्मेलन पत्रिका के ‘गीत-विशेषांक’ (वर्ष 2000) में छपल आलेख, जवन बाद में ‘धार के खिलाफ’ गीत-संकलन का पीठिका के रूप में 2001 में छपल)

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