सदमा

  • कृष्णानन्द कृष्ण

रिटायर्ड़ भइला का बादो दीनदयाल जी के दिनचर्या में कवनो बदलाव ना आइल रहे. उहे पूजा-पाठ, सध्या-वन्दन आ खाली समय में कवनो ना कवनो विद्यार्शी के विद्यादान. उनकर इ मान्यता रहे कि दुनिया में सबसे उत्तम दान विद्यादान होला. आदमी के जीवन में इहे एगो चीज बा जवन कबहूँ घटे ना बलुक जतने बाँटब ओतने बढ़ी. एह से उ लइकन के मुफुत में पढ़ावे के काम अबहुँओ करत रहन. मोहन के टास्क बनावे के कह के उ अपने घरकच में लाग गइल रहन, एह हिदायत के साथ कि ओकरा जहाँ दिक्कत होखे आ के पूछ ली.

बहुत दिन से घर के साफ-सफाई ना कइला से अँगना में बहुते घास-फूस आ लतर-पताई जाम गइल रहे. ओकनी के साफ करत-करत पंडित जी अपना पछिला जिनिगी के पन्ना पलटे लागल रहन. कइसे-कइसे उनका एहिजा स्कूल में नोकरी मिलल रहे, ई उहे जानत रहले. कतना दुआरी धाँगे के परल रहे तब जाके नोकरी के मुँह देखे के मिलल रहे. ओह बातन के इयाद आवते उनका रोमांच हो आइल. नोकरी लगला के बाद में बिआह भइल. उ रोज भोरे उठ के नेहा-धोआ के साइकिल से स्कूल जास आ फेरू साँझ के घरे लवटस. फेरू माई-बाबूजी के दबाव में एही शहर में अपना मेहरारु आ लइकन संगे डेरा ले के रहे लगले. अपना छोटहन नोकरी के आमदनी में से काट छपट क के पइसा बचावस. लरिकाईयें से उनका मन के साध रहे कि शहर में आपन एगो छोट-मोट घर जरूर होखे के चाहीं. तब जाके सहर के बाहर बगल वाला गाँव के बाहर ई जमीन लिआइल आ इ घर बनल. ओह घरी इनका घर-परिवार हित-नात आ गाँव के लोग खातिर सुखद अचरज के बात रहे. आ इनका मेहरारू के त जइसे मथुरा-वृन्दावन के राज मिल गइल रहे. निपट देहात, जहाँ से बीसन किलोमीटर दियर के साह पैदल भा साइकिल से चलके आदमी शहर पहुँचत रहे, ओकरा खातिर शहर में घर बनावे के कल्पना कइये के लोग रोमांचित हो जात रहे. बाकिर उनका धुन आ पक्का इरादा के आगे कठिनाइयन सब के ठेहुनिआये के पड़ल रहे. आ प्रकाश के मतारी के त जइसे पर लाग गइल रहे. धइले ना धरात रही. उ भर घर-आँगन में छमक-छल्लो बनल उरत फिरत रही. आ पीछे-पीछे प्रकाशो उनकर अँचरा धइले घुमत रहे. कतना सुन्नर समय रहे. एही कुल्ही बातन में अझुराइल उ साँच के समुन्दर में उभ चुभ करत रहले.

‘अरे पंडित जी! भीतरे का कर रहल बानीं? तनीं बहरी त आईं.’

बाहर से केहू के बोलावे के आवाज सुन के उ ओहिजे से मोहन के कहले – ‘मोहन बेटा, देखऽ त बाहर के चाल कर रहल बा.’

‘गुरूजी, डकमुंशी बाबू आइल बाड़न. रउरे के बोलावत बाड़न. कहत बाड़न कि कवनो टेलीग्राम आइल बा.’

टेलीग्राम के बात सुनते उनका दिल के धुकधुकी बढ़ गइल. परसवें-तरसवें त प्रकाश के चिट्ठी आइल रहे, फेर टेलीग्राम ? जरुर कवनो अनहोनी घट गइल होखी तबे नू तार भेजे के जरुरत पड़ल हा. अपना मन में उठत विचारन के एगो झटका देत उ बुदबुदइले ना, सब ठीके-ठाक होई. ठाकुर जी के किरिपा से सब कुशल-मंगल होई. आ हड़बड़ी में बिना हाथ धोवले उ दुअरा का ओर चल देले.

अंगना से दुआर तक आवे में उ कतना जुग अपना में जी ले लन, ना कहल जा सके. बाकिर मन के भीतर के भय के अपना चेहरा पर ना झलके देले आ डकमुंशी से टेलीग्राम लेके, मोहन के पढ़े के हिदायत देत फेर अपने अंगना में लवट अइले. सउँसे गिरदउल अइसन घर आँगन भाँय-भाँय काटे धउड़त रहे. प्रकाश के मतारी के मरला के बाद से त उ अउर अकेले हो गइल रहले. अकेले एक-एक पल पहाड़ अइसन लागेला, कटले ना कटे. प्रकाश के मतारी जीयत रही त दिन भर एने ओने कुछ ना कुछ खुर-खार करत रही. कबो प्रकाश के फोटो से बतिआइहें त कबो नाती-नतिनी के बारे में. कहे के मतलब कि दिन भर कुछ ना कुछ करत रहीहें. पूरा घर अकेले गुलजार कइले रहत रही. उनकर इ सब कइल उनका अच्छा लागत रहे बाकिर कबो कबो बनावटी क्रोध देखावत उनका पर गोसातो रहले. एकरा बाद के त फेर मत पूछीं. मुँह लटका के बइठ जइहें. आ लगीहें टिसुना चुआवे. आ ओह घरी उनका खूब मजा आवत रहे. उ मुसकियात कनखी से जब प्रकाश के मतारी का ओर देखीहें त उ चोन्हा लागावत बोलिहें – ‘राउर इहे आदत हमरा नीक ना लागे.’

उ ठठात हँस के कहिहें – ‘प्रकाश के मतारी इहे नू जिनिगी हऽ. कबो धूप कबो छाँह!’

इहे कुल्हि सोचत उ घर का भीतर आ गइले आ धम से चउकी प बइठ गइले. सामने बिछवना पर छितराइल चिट्ठी आ लिफाफा प उनकर नजर अँटक के रह गइल. चिट्ठी के साथे प्रकाश के बेटा के फोटो भी पड़ल रहे. उ फोटो उठा ले लें. ठीक प्रकाश प गइल बा. एकदम ओकरे लेखा गोरनार आ गोल मटोल. फोटो देखत-देखत उ अतीत के गुफा में भटके लागल रहले. अँगना में धउरत ढिलमिलात प्रकाश, ओकरा पीछे भागत प्रकाश के मतारी. कतना आनन्द से भरल-पुरल सुख के दिन रहे.

इंजिनियरिंग के उच्च शिक्षा के पढ़ाई के बाद जब प्रकाश के अमेरिका जाये के भइल त उनकर आ प्रकाश के मतारी के गोड़ धरती पर ना पड़त रहे. बाकिर ओह खुशी के भितरे मन के एगो कोना में एगो चोरो बइठल रहे जे रह-रह के साँप अइसन फुफकारतो रहे. कहीं अइसन ना होखे कि लइका हाथ से बेहाथ हो जाय. बाकिर अपना मन के तोख-बोध धरावस प्रकाश के भीतर हम जे संस्कार डलले बानीं उ अतना कमजोर नइखे. हमरा अपना प भरोसा राखे के चाहीँ. उनका इयाद आवत बा रात में सुतला में प्रकाश के मतारी बउआत रहली – ‘ए जी रउवा मरद मानुस हईं करेज कड़ा कर लेब, बाकिर हम मतारी हईं हम अपना मन के कइसे मनाईं? कहीं अइसन त ना होई कि प्रकाश हाथ से बेहाथ हो जइहें. बेहाथ हो जाई त हम त आपन परान तेज देब.’ ओह दिन त उनका के तोख-बोध धरा के उ मना लिहले रहले. बाकिर उनका मन में उठत शंका के दरिआव में उहो थोरे घरी खातिर डूब गइल रहले. आ दूनो परानी के बीच एगो अनजान चुप्पी कब आ के बइठ गइल रहे एकर पता ओह लोग के ना चलल रहे.

‘का जी, का सोचे लगलीं? कवनो बात के चिन्ता मत करीं. हँसी खुशी बेटा के भेजे के तइयारी करीं. भावी के आगा केहू के वश ना चले. जे दइब सोचले होइहें, उहे नू होई.’

प्रकाश के मतारी के आवाज सुन के उ वर्तमान में लवट आइल रहले. मन में त उनको डर रहे कि बेटा अगर पढ़ लिख के ओनिए बस जाइ त बाप दादा के डीह प एगो दिया-बाती करे वाला ना रह जाई. बाकिर घरे राख के लइका के जिनगी के साथे खेलवाड़ो त ना कइल जा सकत रहे. लइका के भविस के बात सोच के उहो चुप लगा गइल रहले. आ फेरू त घर में कबहूँ ना खतम होखे वाला सन्नाटा पसर गइल रहे.

उनका इयाद पड़त बा जब प्रकाश के मतारी ई सुनली कि प्रकाश ओहिजे अपना संगे पढ़े वाली कवनो अंगरेज मेमिन से बिआह क लेले बा त उनका दिल के बहुत बड़ सदमा पहुँचल रहे. उनका चेहरा से खुशी गाएब हो गइल रहे. उ जे गुम्मी सधली से टूटल ना. आ एही हूक में उ परान त्याग देली. उ अपना मन में कतना अरमान आ सपना पलले रही प्रकाश के बिआह पोता-पोती के लेके. उ सब साध के सपना ओस के बून अस बिला गइल रहे. प्रकाश के अमेरिका गइला के बाद रोजे फुरसत में बइठला प उ प्रकाश के बारे में घंटन चरचा करिहें. महल्ला में जब केहू के बेटा के बिआह होई त उहो प्रकाश के बिआह के बारे में बइठ के घंटन बतिअइहें. पतोह के उ का दीहें आ हम का देब. ओह गहना आ सामान के लिस्ट बनइहें. आ फेरू एकाएक चुपा जइहें जइसे केहु उनका के सुतला से अचके जगा देले होखे. आ अपना मूढ़ मति पर धीरे-धीरे मुसकइहें. एही तरे जिनगी के गाड़ी कबो तेज, कबो मधिम गति से धीरे-धीरे सरकत आगे बढ़त जात रहे. परब-तेवहार के दिन त जइसे उनका खातिर दुसमन भ गइल रहे. ओह दिन उ दिन भर गुमसुम आ उदास एने ओने मछिआइल फिरिहें. बाकिर मन के एगो कोना में उमेद के किरिन टिमटिमात रहे जवना के डोरी पकड़ के उ झूलत रही. ओह दिन त उहो चनक के सीसा अस चूर चूर हो गइल रहे जब प्रकाश के बिआह के खबर उनका मिलल रहे. टोला-महल्ला में निकलल मोसकिल हो गइल रहे. उ अपना के घर के भीतरी कैद क लेले रही. बहुते समझवला बुझवला के बाद त उ कहले रही – ‘प्रकाश के बाबू, अब एह घर के चउकठ से हमार अरथिये निकली हम ना.’ आ इहे भइबो कइल.

मतारी के मरला के खबर मिलला पर प्रकाश अपना मेहरारू के साथे आइल रहे. बेटा-पतोह अइसन ना, मेहमान अइसन पुछार करे खातिर. ओकरा पाले समय के अभाव रहे. उ ओकरा के मतारी के हवाला देके बहुत समझवले रहन, लोक-लाज के भयो देखवले रहन, बाकिर प्रकाश समय के कमी के बहाना बना के ना मानल रहे. उनका इयाद पड़त बा उनका बहुत समझवला पर प्रकाश कहले रहे – ‘एह अंधविश्वास आ रूढ़ि के परम्परा के तूड़ीं. भला एह दुनिया में जेकर अस्तित्वे खतम हो गइल ओकरा खातिर रो रो के समय बरबाद कइला से का फायदा? ई त कोरा भवुकता आ मुर्खता बड़ुए. बाबूजी दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गइल आ रउवा सभे ओही परम्परा के डोरी से बन्हाइल बानीं.’

प्रकाश के बात सुन के उनकर हाथ उठ गइल रहे बाकिर स्थिति के नजाकत के देखत मन मसोस के रह गइल रहे. आ प्रकाशो तुरते दिल्ली लवट गइल रहे. ओकरा बाद से उनका जिनगि के उद्देश्ये बदल गइल रहे. अपना के दिन भर अझुरवले रखे खातिर उ लइकन के पढ़ावे के काम शुरु क देले रहले. लइकन के रहला से घर भरल पूरल रहत रहे आ उनका जीवन के अकेलापन उनका के तंग ना कर पावत रहे. बाकिर एने फेर उनका शांत जीवन के सरोवर में हलचल पैदा हो गइल रहे. एह तार के पहिले एगो चिट्ठी आइल रहे. माजरा उनका समझ में ना आवत रहे.

‘गुरूजी! गुरूजी!’

मोहन के आवाज से उनका सोचे के सिलसिला टूट गइल रहे. उ ओहिजे से पूछलन – ‘का ह ए मोहन बेटा?’

‘गुरू जी, एक जगे समझ में नइखे आवत.’

मोहन के टास्क समझा के उ फेर अँगना में आ गइले. ओसारा में चूल्हा प गरम होखे खातिर दूध चढ़ा के घर के भितरे गइले त बुझाइल जे चउकी पर रखल तार उनका के मुँह बिरावत होखे. उ तार खोलल ना चाहत रहले. कइसे दो कहल बा जे मोरा राम के से कवना काज के. भला अब तार खोल के का करिहें. जेकरा तार देख के खुश होखे के रहे, जे हमार जिनगी रहे उ त अलोपित हो गइल रहे. अब का? बाकिर मन त मने होला. उ बार बार कुरेदत रहे ला. आग-पाछ देख के उ तार उठवले. उलट-पुलट के देखले. एक बेर प्रकाश के मतारी का फोटो का ओर देखले. उनका बुझाइल जइसे उ कहत होखस – ‘अरे रउवा त बाप नूँ हईं, रउवो उहे गलती करब. जिनगी भर दोसरे खातिर जरत रहलीं. संकोच मत करीं. तार उठाईं आ खोल के देखीँ.’

उ तार खोले खातिर उठवले. उनकर आँखि डबडबा गइल रहे. हाथ कांपत रहे. तार खोलला प ओकर मजमून पढ़के उ भीतर तक हिल गइल रहले. अब उनका अपने में खोट नजर आवे लागल रहे. ना त प्रकाश के सोच अतना घटिया कइसे हो गइल. तार के मजमून रहे – ‘पापा ओहिजा के सब जर-जमीन बेंच के तूंहूँ एहीजे चल आवऽ. अब ओइसन पिछड़ल आ गंदा जगह प रहला के कवनो अर्थ नइखे’.

ई पढ़ते उनकर मन खीसी भूत हो गइल. उनका हिरदय के बहुत बड़ सदमा पहुँचल. उ बुदबुदइले – ‘प्रकाश, तूँ एतना नीचे गिर जइब हमरा एकर कयास ना रहे. प्रकाश आपन देश, आपन जनम भूमि सरग ले बढ़ के होला. हम एहिजा जइसन बानी, जवना हाल में बानीं, खुश बानीं. तोहार खुशी तोहरे मुबारक होखो. अब त हमरा तोहरा के आपन बेटो कहे में शरम बुझात बा.’

चूल्हा प रखल दूध फफा के गिर गइल रहे जवना के जरनाइन गंध से उनकर ध्यान टूटल. उ टेलीग्राम उठा के चिंदी-चिंदी क के मोरी में फेंक देले. बाहर अइले त देखले मोहन अपना कापी प झुकल तन्मयता से आपन टास्क बनावत रहे.

उ ओकरे एकटक देखत रहले.

(अँजोरिया में बहुत पहिले प्रकाशित कहानी)