सरस्वती के महान सपूत सूर्य कान्त त्रिपाठी ‘निराला’

nirala

– ओमप्रकाश अमृतांशु

कवि, उपन्यासकार, कहानीकार, निबंधकार के साथे-साथे चित्रकारो निराला, जिनकर पूरा नाम सूर्यकांत त्रिपाठी निराला रहुवे, आपन जनमदिन बसंत पंचमी के मनावत रहलें. सरस्वती के साधक निराला खड़ी-बोली हिन्दी में जेतना कविता सरस्वती पे लिखलन, शायद केहू ना लिखल. सरस्वती के मंदिर, पूजा-पाठ के कर्मकाण्ड़ से बहरी निकाल के खेत-खरिहान में श्रमजीवी किसानन के सुख-दुःख भरल जीवन श्रेत्र में स्थापित कइलन. सरस्वती के ढ़ेर सारा अभूतपूर्व भाव देखे के मिली निराला के कवितन में.

हरी-भरी खेतों की सरस्वती लहराई,
मग्न किसानो के घर उन्माद बती बधाई ।

अइसहीं बसंत के भाव में डूब के निराला अपना आप के प्रकृति में समाहित कर लेत रहलें। उनकर हद्वय से बसंत के भाव कुछ अइसने निकलत रहे –

सखि, बसन्त आया।
भरा हर्ष वन के मन,
नवोत्कर्ष छाया।
किसलय-वसना नव-वय लतिका
मिली मध्ुर प्रिय-उर तरू-पतिका,
मधुप-वृन्द बन्दी-पिक स्वर नभ सरसाया।…….

निराला के काव्य रचना समाजिक भावो से ओत-प्रोत रहे. हर कविता में समाज के दर्शन रहे, समाजिक चिंता रहे. शब्द-भाव अपरिचित ना रहे. उनकर लिखल कविता ‘भिक्षुक’ हमनिके जब स्कूल में पढ़त रहीं जा, त लागत रहे कि कलेजा छलनी हो जाई.

वह आता
दो टूक कलेजो को करता पछताता,
पथ पर आता।

पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी-भर दाने को-भूख मिटाने को
मुँह पफटी-पुरानी झोली का पफैलाता-
दो टूक कलेजो को करता पछताता पथ पर आता।

साथ दो बच्चे भी है सदा हाथ पफैलाये,
बायें से वे मलते हुए पेट को चलते,
और दाहिना दया-दृष्टि पाने की ओर बढ़ाये।
भूख से सूख होंठ जब जाते
दाता-भाग्य-विधता से क्या पाते?
घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते।

सूर्य कान्त त्रिपाठी ‘निराला’ के जनम 21 फरवरी 1886 ई0 के बंगाल के मेदनी पुर में भइल रहे. पिता के नाम पं. रामसहाय रहे आ उ बंगाल के महिषादल राज्य में मेदनिपुर जिला में नौकरी करत रहलें. हाईस्कूल पास क के निराला संस्कृत आ अंग्रजी साहित्य के अध्ययन कइलन. हाईस्कूल पास कइला के बाद लखनऊ आ ओकरा बाद उन्नाव जिला के अपना गाँव गढ़कोला आ गइलें. निराला के रूचि संगीत, घूमे-फिरे, खेले आ कुश्ती लड़े में रहे. तीन साल के उमिर में माताजी के देहांत हो गइल. बंगाल में रहला चलते निराला के मातृभाषा बंगला रहे. पत्नी मनोहरा देवी के कहला पे हिन्दी सिखलन. बीस साल के उमिर में पत्निओ के स्वर्गवास हो गइल. 16-17 साल के उमर में पिता के असमय मृत्यु हो गइल रहे.

क्रान्तिकारी विचार धारा के धनी ‘निराला’ ढ़ेर सारा घिसल-पिटल परम्परा के तुड़ के समाज के नया रास्ता देखवलन. छन्द, भाषा, शैली, भावसम्बंधी नया दृष्टि के नया कविता के नया दिशा देवे में महत्वपूर्ण योगदान दिहलन. घोर आर्थिक संकटो में निराला शब्द आ भाव के राजा रहलन. विषम परिस्थितिओ में कवनो समझौता ना करत अपना तरीका से जीवन के आन्नद लिहलें.

निराला सचमुच निराला पुरूष रहलें. हिन्दी साहित्य में निराला के हमेशा विशेष स्थान दिहल जाई. एह महान साहित्यकार के आजु उनुका जनमदिन प हार्दिक श्रद्धांजलि.

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