• (स्व0) शिव प्रसाद सिंह

चइत क रात गाँवे में जब उतरेले एगो नसा जइसन पसर जाला सगरी ओर। सुबह होखे के घंटा भर पहिले हवा में गुलाबी सर्दी होला आ देह में अइसन सिहरन कि लागेला कि आजु के रात भाँग छानि के सूतल रहल ह लोग-बाग। कहाउत हव कि सारा जाड़ा एक कम्बल से कट जाला बाकिर चइत के सुबह क जाड़ काटे खातिर सँवरू अपन बछिया बेच के रजाई बनवलन। आज सबेरे-सबेरे सेवा आ सँवरू दूनो जाने बात बे बात पर लड़ गइलें।
‘देख सँवरुआ’ घरे के चौकठ लांघि के गल्ली में पैर रखते सेवा मिसिर चिल्ला के कहलन- ‘तू काहे के मरले रे पुरसोतमा के?’
‘ससुर ऊ हमार बेटा हौ। ओके हम मारब काटब त, तू सारे कौन होत हउवे। बीच में पड़बे त अइसन कुजगहाँ मारब कि जावत जिन्दगी रोइ रोइ के बितइबे। ससुर खुदै सहका के ओके सिलेमा देखे के भेजले आ अब तू हमके डाँटे आ गइले।’
सँवरू पांडे बोललन- ‘चुपचाप चल जो एहीजां से, नाहीं अच्छा ना होखीं। बरिस दिन पर एकै दाईं आवेले होली। एकै बेर जरेला सम्वत्। तू आज चुप रह। तोर मन बहुत बहसल हव त फगुआ बाद गाँवे के खरिहान में होई हमार तोर दंगल, जेतना पवरा होखे देखइहें, कुछ उठाइ मत रखिहे। जो आज भर अउर मुसुक बनाव आ ऐना में अपने चेहरा देख-देख के मुस्किया ले।’
‘देखा हो मुंशी जी बात तोहरे सामने होत हव’ सेवा मिसिर कहलन- ‘ई नाहीं कि बखत परै त तू बाँये-दाँये झँकिहा। खुल के कहेके पड़ी। जनला! सेवा मिसिर पेड़े के खोंड़रा से ना निकसल हउँअ। मतारी के दूधे के लाज राखबि आ तोहर बढ़ि-बढ़ि के बतिआइब हरमेसा खातिर छोड़ाइ के रहब।’ सेवा बोललन आ जाँघ ठोकलन। ‘तू हमार मुसुक उतरबे, हमरे चेहरवा से हमार मुस्कियाव छीन लेबे स्सारे करमदरिद्दर? तू अपने बेटा पतोह के ना भइले त तू हमार का होबे। कइसन फगुआ आ कइसन संवत्। जब तोर मन में दरार परिए गइल त बरिस दिन का दोहाई का देत हउवे- हो जाव आजे हमार तोर फैसला। सारे तोरे बाँह उखार के तोरे कपारे प ना धइलीं त कहिहे। बकरी के मूत से ई मोछ मुड़वा देब। का गलती कइलस परसोतमा? इहै ना कि आपन मेहरारू लेके बस पर बइठ के चलि गयल बनारस आ दुइठे सिलेमा देख के आ गयल। त तूं का ओकर जान लेबे? स्सारे तोहरे जिन्दगानी में सिनेमा नइखे लिखल त तू का सारे देहात के सिनेमा देखनहरुन के हत्ता करबे?’
‘तू हमरे घरे के ममिला में नाक मत घुसावऽ सेवा मिसिर। अरे हमसे बिना पुछले साला मउगड़ा पुरसोतिमा बनारस गइल। अपने मेहरारू के सिखाय-पढ़ाय के उल्टा पल्लू क साड़ी पहिनवलस। एतना बड़ा नवहँसाई करा देलस आ तू सार ओकरे ओर से लड़े आ गइले हमसे! तू के हउवे रे? हम अपने बेटा पतोह के बखरी में ना हेले देहलीं त तू ओकर असरन सरनदाता हो गइल? बोल स्सारे। सुना हो मुंशी, धियान से सुना- ई दूसरे के ममिला में टाँग अड़ावे के अपराधो कइलस ऊप्पर से सरवा सेखियो बघारत हव। अब बतावा एक ओर त ई बाप बेटा में लड़ावे क चालो चल देलस आ हमके साला करमदरिद्दरो कहत बा। काहे, कौन दरिदरई देखले रे तू हमार? हम सारे तोरी ओरी के नीचे ना बइठली आजु तक। स्सारे जब तोकें गाँव-गिराँव मूरख कहके तोर अँग-डँग रोक देलस त हमही तोर पच्छ रखलीं। हमहीं बोललीं कि ना? बोल सायर माई के नाम ले के। तोर लाज बचवलीं कि ना?’
‘अच्छा चुप रह। ढेर बढ़-बढ़ के बतिअइबे त हम तोहरे पेट में से हाथ भर के दाढ़ी खींच के चौराहा पर धइ देब।’
‘हमरे पेट में कवन दाढ़ी छिपल हव रे’ संवरू पांडे पूछलन। सच कह त तोरे पेटे में जाँघ भर लमकी दाढ़ी हव। तू ससुर उघटा पुरान पर उतरबे त हम तोके बिना नँगिअवले छोरब ना।’
‘हमरे पेट में कवन दाढ़ी हव, अब बताले त हम अपन बात क अरथ तोकें बताइ देब।’
‘अरे कवन बात क अरथ समझइबे। तू अपन बड़वरगी देखावे खातिर अँग-डँग वाली बात हजार बार कह चुकल हउवे। देख सँवरू तू हमार अँग-डँग चालू करा के अपने के बचवेले।’
‘हमरे जजमानन के तोरब बड़ा मुस्किल हव सेउवा। बड़ा मुश्किल। मध्यमा क परीक्षा एही बदे पास कइलीं कि कौना माई क लाल करमकांड करावत क हमार एको सलोक में असुद्ध ना बता सकत?’
‘त का हम मध्यमा फेल हईं? हमहूं त सँगवे पास कइले हईं कि ना मध्यमा?’
‘देखा हो मुंसी, एके हम मध्यमा फेल कहलीं हं? बतावा तू’ सेवा कहलन- ‘हम एके फेल कहलीं हं?’
‘हे पंडित बाबा, हमार पिंड छोड़ऽ तू लोग। तोहन लोगन के बीच में आके के आपन मुँह चुँथवाई। एतना देर से तोहन लोग क बात सुनत हईं बाकिर हम के ईहे ना पता चलल अबहीं तलक कि तू दुनो जने लड़त काहे बाटऽ। कवन बात क झगरा होत हौ ई?’
‘भाग स्साले मुंसिया’ सँवरू पांडे दूनो हथेली से अइसन घस्सा मरलन कि ऊ मुंशीजी डेराय के गल्ली में भगलन। दुनो ठठाके हँसलन। ‘भाग स्साले, सच्चो बड़ बुरबक बाड़े। एकरा पते नइखे कि हमहन काहे लरत र्हईं। अच्छा सँवरूआ रह जो। हम कौनो दूसर बिचवइत खोज के ले आइब घंटा आध घंटा में। तू ई मत समझ ले कि तोरे डर से हम ई बात कह रहल हईं। हमरे पर विसवास ना होत होय त कवनो दोसर बिचवइत तूंही जा के ले आव। आज हमार तोर त फैसला होई के रही।’
‘त तू अपन जज ले आवऽ हम आपन। दूनो के बिचवइत बराबर होवे के चहिहन। हव कि ना।’
‘हौ त, पर जब ले एक्को बिचवइत फँसी नाहीं तब तक का हमहन के सांती मिली?’
‘हमरी ओर से त तोके सान्ती नाहिये मिली।’
‘त हम का तोके छोड़ब। हमरियो ओर से तोके सांती ना मिली।’
ओही बखत मिसराइन आ पँडाइन बाहर आ गइलिन- ‘तू बहसल का बाड़ऽ। ई सेउवा क अतियाचार अब सहात नइखे। तू अपन दुआरी दक्खिने ओर खोल ल। जवन गोसैया का मर्जी होई, होवे द। लोग बाग कहेलन कि दखिन मुँहे दुआर असगुन कहाला बाकिर पूरूब रहिके रोज सेउवा से किच-किच के करी?’
‘अरे बाह भौजाई! कइसन नियाय कइलू ह? बाह बाह।’ सेवा बोललन।
‘तू पागल हवऽ।’ मिसिराइन बोललीं- ‘तू अपन दुआर उत्तर के खोल ल। बन्द करऽ पच्छिम ओरी क दुआर। उत्तर न त सही कहाला न गलत। मेझराह सगुन हव। मगर ए कदजिम्मी से रोज झाँव-झाँव कइला से त अच्छै न रही।’
‘तबै तोहन लोगन के सान्ती मिली?’ मिसिर आ पांडे पूछलन।
‘ई सान्ती के हव रे मिसराइन? ई दूनो सान्ती खातिर एतना लड़ाई काहे छेड़ले बाड़न लोग?’
‘तू खुदै पता चलावऽ पंड़ाइन। हमहूं के कुछ न कुछ गड़बड़ लागत बा। केहू न केहू के पेट में दाढ़ी जरूर छिपल बा।’
‘दाढ़ी?’
‘हँ पड़ाइन, दाढ़ी?’
‘हे भगवान।’ पंड़ाइन सिसके लगलीं आ लिलार पीटत घरे में घुस गइलीं।
‘कारे बुड़बक सेउवा। देखले का का अरथ होत हव शान्ती के?’
‘ईहौ ससुरी घुस गइल घरे में, अब का कयल जाव सँवरू भइया।’
‘हमरे बिचवइत से काम चलि जाइ कि दूगो खोजे के परी?’ सँवरू मुस्किया के पूछलन।’
‘अरे हँसी ठट्ठा मत समुझऽ एके। तोहार देह ओनच के रख देही भौजइया। सगरी मटरगस्ती हवा हो जाई।’
‘त तू का अइसहिं छूट जइबा? तोहरो चूल्ल ढीला कइके मानी मिसरइनियाँ। धत्तेरे के। एतना नीक दिन बीतै जात रहल ह कि ई किरकिरा हो गइल। अब चला कौनो बिचवइत खोजा।’
‘तोहंऊं त खोजा भइया।’
‘त का एक बिचवइत से काम ना चली?’
‘कइसन पागल बाड़ऽ हो, बौड़म। मरद-मेहरारू के झगरा में एक बिचवइत रख के हुल्लड़ करइबऽ का?’
‘हँ यार, हमहूँ कबौ, कबौ बेवकूफ नियर बोल देहिला। हाँ अलगे अलगे अपना मामिला के सुलझावे खातिर बिचवइत बुलावे के परी?’
बड़ी मुस्किल भइल। लाख कोसिस कइलो प मुंशी के अलावा सेवा के केहू दोसर बिचवइत ना मिलल। सँवरू पूरे गाँव में घूम अइलें बाकिर केहू दोसरा के ममिला में टांग अड़ावे खातिर तैयार ना भइल-
‘सुनऽ पांडे।’ कालू साह कहलें- ‘कुछ सुलफा चिलम क इन्तजाम करावऽ त हम बिचवइत बन सकीला। तू त इहो जानत होबा कि भौजाई हमरा के हरीचन्दर समझेली। बाकिर हर काम ई हरिचन्दर मुफुत में करे लगी त केतना घाट होई भइया। अपन राम बनिया हईं न। कुछ नगद ना चाहीं बाकी एक भर गाँजा के बिना त हम एमा हाथ ना डालब।’
‘त सारे तू बनिया बक्काल, हमसे घूस लेइ के तू हम मरद-मेहरारू के बीच समझौता करइबे सारे। अइसन पुराचरन बाँचब कि तोर खटिया कल्हिये उठ जाई।’
‘राम-राम।’ कालूराम कहलन- ‘भाई ई पुराचरन से त हमके हुराचरनो से अधिका डर लागेला। लोग बाग कहेंले कि सँवरू पांडे जदि मन से पाठ बाँच दें त आगिया बैतालो के बुला सकेलन। त तू मत दीहा गांजा। पकौड़ी आ जिलेबी त खिया सकेला न?’
‘हाँ खिया देब।’
दूनो बिचवइत अपने अपने मुवक्किलन के समझावे पहुँचलन। मुंशी अपन कानूनी दाँव लगा देहलन। ‘देखऽ भौजाई’ ऊ मिसिराइन से कहलन ‘आजकल सरकार नान्हें जात वाला चलावत बाड़न स। ओनहन के कहला से सरकार ई मान लेले बा कि आज हिन्दुनों में तलाक होइ जाई। अगर मिसिर चाहें त तोके तीन बार तलाक, तलाक, तलाक कहके घरे से बाहर कर सकेलन।’
‘का?’ मिसिराइन क आँख चम्मच नियर फइल गइल- ‘ई मिसिरवा हमके तलाक देके डरवावे खातिर तोहँके भेजलस ह? रह पहिले तोहरे मरम्मत कइ देहीं त मिसिर से त बाद में फरिया लेब।’
ओही समय कोने वाले घर से पुरसोतिमा निकलल- ‘अरे चाची ई तोहार काम ना हव। तनी हमहूँ के नया कानून समझे दे। बइठऽ तू। करे मुंसिया तू साले गाँव भर के मर्दुमसुमारी करवले। तनिक बताव त ए गाँव में केतना सान्ती हइन स?’
‘हम का दिमागे में लिखि के चलल बानी?’
‘त तू ई बताव कि हिन्दू कोड में तलाक कब लिखाइल?’
‘अब तू पढ़त बाड़ऽ हम नइखीं जानत। ना होत होई तलाक।’
तबले सेवा बो आ पुरसोतिमा क मेहरारू, झाड़ू ले के मुंशी पर पिल पड़लीं स। मुंशी क हाय-हाय सुन के सेवा मिसिर के लिलारे पर पसीना आवे लागल।
एहर कालू राम पांडे के घरे पंड़ाइन के समझवलन कि सान्ती खातिर तोहरा सरबत में काल्ह जहर पिआवे क मनसूंबा बँधले बाड़न पाँड़े। एहसे तू अपने पर अजलेम काहे लेताड़ू। ओनके मौका मत द। सगरी गाँव कही कि पंड़ाइन के दोस नइखे- ई सब सँवरू क चाल बा।
‘हमरा के मुवा के ऊ सान्ती से बिआह रचावे के सपना देखत बा’ पँड़ाइन रोवे लगलीं। ‘तू हमार हरीचन्दर देवर हउअ कालू साह। जब तू कहत बाटऽ त जरूर ई बात साँच होखी। ई पँड़वा बुढ़ौती में नई नई सादी रचावे खातिर मउर बाँधे में लागल बा। हे भगवान जी ई उफ्फर परो, एकरा बदन में कीड़ा परो- ई हमरा जइसन सती सवितरी नारी के छोड़ के जाने कौन बेसवा से बिआह कइल चाहत बा। हम जानके रहब। हम एके सांती से बिआह नाहीं करे देब। देखीला कि कइसे ई बिआह करेला।’ पड़ाइन बुक्का फाड़ के रोवे सुरू कइलीं तब ले बगल के कमरा में से मिसिर क लइकवा बिरजुआ आइल आ ऊ कालू साह क गदरन दूनो हाथ से पकरि के दबवलस।
‘हं, हँ अरे हमार जान लेबे का रे बिरजुआ?’ साह जी गर्दन झटकरलन। ‘ए सरवा झगरा से हमार का मतलब। सँवरू जवन कहे के कहलन हं हम उहे कहलीं ह।’
बिरजुआ मार चप्पल साह क खोपड़ी गरमा देहलस। मचल कउआरोर। संवरू क त साँसे टँगा गइल। ओहर मिसराइन क उग्र रूप देखि के मिसिर सकपकाइल रहलन। आ एहर कउआरोर सुनि के पांड़े के धुकधुकी बढ़ गइल।
दूनो पास आ के, एहर-ओहर झाँकि के एक दोसरे के आँख में आँख डालि के बोललन स- ‘कहाँ के पचड़ा में फँसली हम सब।’ एक जाना कहें कि सान्ती तूँ कहलऽ दोसर जानी कहें कि ना पहिले तूँ कहलऽ।
तब ले रघुनाथ उपधिया बगुला के पाँख नियर सफेद धोती-कुर्ता झाड़ि के आ गइलन। ‘ई का होत हव हो सेवा आ सँवरू? तू लोग काहे अइसन रमझौंरा मचवले बाड़ऽ? जमाना एतना खराब आइल बा कि केहू बामन क हित चाहे वाला नइखे। ए सगरो राज में बस रूपइय्या क दबदबा बा। जेकरे पास ऊ हवे ओकरे समान गियानी केहू नइखे। तू सभे आपुस में लड़ि के काहे बदे नाक कटा रहल बाड़ऽ लोग बामन जात क? एही गाँव में एक से एक विद्वान आ जोतिखी होत रहलन। चारों ओर नवरातर में पाठ करावे वालन क अइसन भीर होत रहल कि एक-एक बटुक लोग दस-दस पाठ करत रहलन। ई हमरे आँख के आगे क गुजरल बात बा। केहू कहूँ ना कहल कि फलाँ के दुइयो पाठ नाहीं मिलल एह नवरातर में आ काहे के फलनवाँ के बारह-बारह जजमानन क पाठ करे क न्योतल गयल। फलनवा के बारह ठे कन्हावर मिलल, फलनवा के एगो गंजियो नाहीं नसीब भइल। त भइया तू लोग आपुसे में लड़ि के काहें आपन भविस्स खराब करत बाड़ऽ?’
‘देखऽ हो सँवरू भइया, कइसन गियान दे रहल बाड़न रघुनाथ उपधिया। अरे ई काहे नाहीं कहत बाड़ऽ चच्चा कि अपने पवरा से, डलिया देइ देइ के खुस कइले बाड़ऽ थानेदार आ अमीन के। बलाक से तोंहके सब कुछ दे रहल बा गवरमिंट। स्साला बीडीओ तोहरे दुआरेहि पलंगड़ी तोड़त बाटे, हमहम जइसन गरीब गुर्बन प आजो अंगरेजी जमाने क कहरै टूट रहल बा।’
‘देख रे सेवा, इनकर एगो बटुक बारह गो पाठ कइ रहल बा नवरात में। सीरी गनेश जी आए नम‘ सुवाहा। काली मैया आये नमः सुवाहा। गोरया बीर बाबा आये नमः सुवाहा।’
‘अरे सँवरू पांडे एतना सुद्ध मत बोला कि चच्चा के लिलाटे क चन्दन चड़चड़ा जाये। अरे पइसा से सब होत हव हो संवरू भइया। पइसवे पाठ करावेला, जग्य करावेला आ पइसवे सब असुद्ध के सुद्ध बता देला। बस चच्चा परनाम। तोहार किरपा चाही। हमहन क त पेट बाँधि के सुत्ते के आदत लग गइल बा। परनाम।’
‘भाड़ में जा तू लोग। सही बातो जब तोहन लोगन के कुनैन जइसन लगत बा त तोहन लोगन के समुझाइब बेवकूफिये बा। जा लोग उफ्फर परऽ। हम काहे अइसन बुड़वकवन से बात करके बेमतलब गारी सुनब। हमसे चिढ़ के तू लोग का कर लेबा?’
‘हँ चच्चा।’ पाँड़े आ मिसिर हाथ जोरि के बोललन- ‘एही से त हमहन क तीन बार बोललीं हँ सभ- तलाक, तलाक, तलाक।’
‘माने?’
‘सुनत हई जा कि केहू से तीन बार तलाक कहले से कुट्टी हो जाला। त हमहन के अपना हाल पर छोड़ीं रउआ। जेकरे पास नगद नारायन होखे, जेकरा ऊपर गुसैंया क किरिपा होखे, उहै सुद्ध बा।’ सँवरू कहलन।
‘बिना रुपैया वाला त असुद्ध होखबे करेलन’ सेवा कहलन।
‘जै हिन्द।’

(परिचय – यूपी के गाजीपुर जिला के जलालपुर गाँव में 19 अगस्त 1928 के जनमल शिव प्रसाद सिंह बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहलीं. उहाँ के निधन 28 सितम्बर 1998 के भइल रहे.)

(पाती, मार्च 2021 अंक से)

By Editor

कुछ त कहीं...

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