• इंदिरा राय

अम्मा के सहेलियन के एकाध सिसकी, बहरि बाँस के टिकठी बनावे के ठक-ठक आवाज आ बीच-बीच में ठेठ पूरबी अन्दाज में कुसुमी के “अरे मोर भउजी” के स्वर भीड़ भरल सन्नाटा के भेदत रहल. अम्मा के अँकड़ल गोड़न में महावर लगावत नीरा शायद अपना आँखिन के लिहले रहल. शायद जबरन लोर ढरकावे का कोशिस में. महावर लगल नीरा के आँख लाल टुहठुह अड्हुल के फूल जइसन लउकत रहल. कुसुमी सब कुछ भुलाके नीरा के दुलरवलसि – ‘जा दुलहिन, आँख धो आवऽ, सवेरे से रोअत-रोअत का हाल भइल…”

तबहिंए केहू पूछल – “सिन्होरा कहाँ बा?”

दुछत्ता पर राखल कबाड़ वाला लकड़ी के बक्सा में पड़ल अम्मा के सिन्होरा के जानकारी बस हमरे रहल. बचपन में आला में राखल कलावा से बन्हाइल चमकत लाल रंग के सिन्होरा हमरा आँखिन के सटा लेत रहुवे. एक दिन अम्मा के ओह सिन्होरा के बेरहमी से उठा के दुछत्ती पर फेंकत देखले रहीं. बाद में ना जाने कब ओकराहहह कबाड़ का बक्सा में जगह मिल गइल रहुवे. कबाड़ वाला बक्सा में ढेर खोजे के ना पड़ल रहे. समय के मार ओह सिन्होरो के भदरंग बना दिहले रहल. तबले मौसी बाबू जी के बोला ले आइल रहुवे.

“जीजा जी, अपना हाथ से दिदिया के माङ भर दऽ.“

बाबू जी के चेहरा तमतमा गइल रहल. काँपत हाथ से सिन्होरा के इर्द-गिर्द चिपकल सेनूर से ऊ अम्मा के माङ भरलन त बरिसन से सून माङ जगमगा गइल. माङ में सेनूर भरल अम्मा ना जाने कब के छोड़ दिहले रहल. केहू कबो टोके त कह देव – सेनूर लगवला से माङ में जलन होखे लागेला.

लाल चुनरी में लपटाइल प्राण विहीन देह में ना जाने कहवाँ के सौन्दर्य उमड़ पड़ल रहल. वइसे पहिरे ओढ़े के शौकीन रहली अम्मा. कड़कड़ात कलफ के रंगीन सूती साड़ी पहिर के मुँह में पान दबवले जब अपना सहेलियन बीच बइठे त गरिमापूर्ण व्यक्तित्व से अम्मा सबसे अलगा लउके. बाकिर एह बेरा त ऊ बीरबधूटी से दबाइल जूही की मुरझाइल पंखुरी जस लागत रहल.

बाहर टिकठी तइयार हो गइल रहुवे. अनुपम अम्मा के गोड़ ध के फूट-फूट के रो पड़ल रहे…कैंसर-मौत के सच्चाई, लगातार निचकात यमदूतन के मुखरित पगचाप, अम्मा के पल-पल छीझत देह अउर असह्य पीड़ा झेलत उनका अनथक प्रयास, कतना तराशे वाला अनुभव रहल. एहके हमरा से अधिका के जान सकत रहल? का बाबू जी आ अनुपम जे रोजे निचकात मृत्यु के प्रतीक्षा में उबियइल रहुवे? फेर अब ई रोवल धोवल कइसन? अपना एह बेपनाह ढरकत लोरन का बीच हमार मन अतना क्रूर शल्य चिकित्सक काहे होखल जा रहल बा – का अन्तिम यात्रा के बेरा सगरी राग-द्वेष गर्भगृह में बंद हो जाला. रह जाला विशुद्ध रागात्मक अनुभूति…’बबुआ मत रोवऽ, भउजी भरल पुरल गइलीं, रोवले से उनुकर आतमा के कष्ट होई. कुसुमी लमहर चौड़ा अनुपम के अँकवारि में समेटल चहलसि….

भरल पूरल शब्द कतना रीता हो जाला जइसे रेत के कस के मुट्ठी में बंद कइल होखे. अँगुरियन के दरारन से कब सगरी रेत निकल जाला पते ना चले आ मुट्ठी भरल पूरल जइसन बन्द रह जाले.

‘राम नाम सत्य है” टिकठी उठ गइल. अब अम्मा के मुह कबहूं ना देख पाएब, उनुकर छूअन, गंध, आ आवाज से वंचित हो गइला के बात सोचले भर से आवत वेग से फूटत रोआई के दाँत भींचत रोकनी हम – हमरा कुसुमी के लिजलिजी सान्त्वना ना चाहीं. ओकरा ला हमरा मन के एह घिना के उहो बढ़िया से जानेले आ एही से अनुपम आ नीरा पर आपन अधिका प्यार के प्रदर्शन हमरा के देखावत रहेले.

ई कुसुमी एहिजा काहे रहेले ? ओह रात के बाद के दूसरकी रात हम अम्मा से पूछले रहीं. “बुआ” ना कहि के कुसुमी के नाम लेत सुन अम्मा चउँकलि बाकिर अपन सुभाव का चलते हमर के टोकली ना.

आजु अम्मा के अस्तित्व हमेशा खातिर शून्य में समा जाई बाकिर बचपन के खण्ड-खण्ड चित्र के हरेक फ्रेम में उ जीयतार रहिहें – सुबह सवेरे हाथ में पूजा के टोकरी लिहले, हनुमानगढ़ी जात अम्मा, पड़ोसियन का संगे बइठल चाय पीयत अम्मा, बाबू जी के आफिस से आवे बेरा पलंग पर चादर तान के सूतल अम्मा, हमनी ला कबहीं त घोर आसक्ति आ कबहीं कड़ुवा वितृष्णा.

गोरखपुर के दखिन पछिम छोर पर राप्ती नदी का किनारे बनल हनुमानगढ़ी मंदिर के विशाल हनुमान मूर्ति से अम्मा के ना जाने कइसन लगाव रहल. नियमित रूप से ऊ ओहिजा जात रही. उनुका साथे ओहिडा गइल हमरा ला रोमांचक अनुभव रहत रहुवे. था। एक त हनुमान जी की मूर्तिए कम रहस्यमयी ना लागल करे आ तवना पर अम्मा के बतावल लोक गाथा कि कइसे एक बेर राप्ती में भयंकर बाढ़ आईल रहे आ बुझाव कि बँधा अब दूटी कि तब टूटा. आ टूटल त पूरा शहरे बह जाई. ओह बिपदा से आशंकित गढ़ी के महन्त के सपना आइल कि – डेराए के बात नइखे. हनुमान जी के गोड़ छूवला का बाद राप्ती आपन धारा समेट लीहें आ वइसने भइबो कइल. अतना शक्तिशाली हईं हनुमान जी कि राप्ती मइया उनुकर चरण पखारे आईल रहे. घर से अधिका दूर नइखे हनुमान गढ़ी, से अम्मा का साथही हम दुनु भाईओ-बहिन ओहिजा पहुँच जाते रहीं आ जतना देर अम्मा पूजा करती हमनी दुनु गढ़ी के बँवारा ओर के छोटका द्वार के सीढ़ियन पर खेलल करीं. सीढ़ी राप्ती के किनारे लो पहुँचा देत रहल. ओह दिन हमनी का खेलत-खेलत नीचे पहुँच गइनी. अनुपम त ओहिजे थथम गइल बाकिर हम दलदली किनारा पर गोड़ दबले-दबले पानी के नियरा पहुँचले रहीं कि गोड़ बिछिला गइल. नदी में नहात चरवाहा बाँह पकड़ के हमरा के उठवलसि आ मन्दिर में ले आके अम्मा के बतवलसि – “आजु त बहिनी डूबिए जइती.”

अम्मा ना त पुचकरली, ना दुलरली. उलुटे कस के एक चाँटा जड़ दिहली. कादो से सनाइल फ्राक में अपमानित हम ओहिजे मन्दिर के प्रांगण में खाड़ रह गइनी. अनुपम पहिले त हमरा के रिगावत रहे बाकिर अम्मा के आगे बढ़ गइला का बाद ऊ गम्भीर हो गइल, “चल बिट्टो, अम्मा तुझे मनावे थोड़ही अइहें. उनुका त बस मारे आवेला. अबहीं कुसुमी बुआ रहीत त तोरा के गोदी उठा लीत.

मन्दिर के फाटक का नियरा पहुँच के अम्मा थथमली आ फेरु पीछे मुड़के अइली आ हमार हाथ पकड़ के बुदुदइली – ”मरे के त हमरा चाहीं. तें काहें जान देबे पर पड़ल बारीस.” अम्मा के ई बुदबुदाइल बाति आपन रहस्य लिहले हमरा दिमाग पर टँका गइल. हालांकि उनुका एह बाति के अर्थ बहुत बाद में समुझ में आइल रहे.

लेकिन ओह बेरा त अम्मा खराब, बहुते खराब लागल रहली. घरे अइला पर जइसन उमेद रहल वइसहीं कुसुमी हमरा के गोदी में उठा लिहले रहल – ओकर ममता भरल बाँहन के आधार पाके हम फूट-फूट के रो पड़ल रहीं.

“जादा चोंचला करिके एह बचवन के बिगाड़ऽ मत.” अम्मा रूख़ाई से कहले रही त हम अउरी कस के कुसुमी का गोदी में चिपट गइल रहीं. ओह बेरा ऊ हमरा सभले अधिका आपन लागल रहुवे. हम दुनु जुड़वाँ भाई-बहिन के बचपन ओकरा लाड़ प्यार के धारा में आगे सरकत रहे – अम्मा के आपन रूटीन रहल. मंदिर से आ के ऊ तबले पूजा घर में बइठल रहती जबले बाबू जी आफिस ना चल जात रहलें.

बाबू जी के गइला का बादे उनुकर दिन शुरु होखल करे. कुसुमी उनुकर खाना मेज पर परोस देव. हम आ अनुपम सबेरे से तब ले ना जाने कतना बेर आ का-का खा चुकल रहत रहीं सँ तबहियों अम्मा के थरिया में हाथ बँटावे पहुँच जाई सँ. अम्मा के गंदगी, अव्यवस्था एकदम नापसन्द रहल. कुसुमी हमनिओ ला छोट-छोट छिपुली रख जात रहल. हम त तनिका रुठ-ठुनुक के अलगा खा लेत रहीं बाकिर अनुपम अम्मे का थरिया में खाए के जिद पकड़ लेव. हम देखतीं कि अम्मा ओकरा के खिआ देत रही बाकिर अपने कुछ ना खात रही. शायद उनुकर सफाई पसन्द मन एहमें बाधा डाल देत रहल. अकसरहाँ त कुसुमी अनुपम के बहला देत रहल, अरे ऊ तुहार महतारी पुजेरिन हई उनका थरिया में मत खा, तू त हमार राजा बेटा हव हमरे संग खा. अनुपम ढिठाई से अम्मा के देखे, रिगावे, कुसुमी का गोदी में चढ़ जाव. अम्मा अपना सफाई में हमनी बचवन के साफ सुथरा रहे आ सफाई से जीए के महत्व समुझा देत रही जवना के हमनी का कुछ त समझतीं, कुछ ना समझतीं.

खा पी के जाड़ा के दिन रहल त अङना में, गर्मी रहल त कोठरी में उनका सहेलियन के मंडली जुट जाव. उनुका लगे सभे ला कुछ-ना-कुछ रहत रहे. कढ़ाई बुनाई सिलाई सगरी गृहकलावन में ऊ पारंगत रहली. स्वेटरन के नया ये नया डिजायन उतरवावे होखे भा गला बाँह के पट्टी के ठीक फिटिंग करवावे के रहो भा क्रोशिए से बुनल कुशन कवर होखे, अम्मा से सभे के कुछ-ना-कुछ सीखे ला रहत रहे. जिनका लगे बाल बुतड़ुवन का चलते समय ना होखे ओह लोग के स्वेटर बुनाई में हाथ बँटावे के होखो भा ब्लाउज चाहे लड़िकन के कपड़ा काटे सिए के होखे. अम्मा के जरुरत सभका रहल. बीच-बीच में चाय पिआवे ला कुसुमी बुआ त रहले रहल. अनुपम आ हम खेल खेल में झगड़ के जब अम्मा का लगे कुछ फरियाद लेके पहुँचती जाँ ओह बेरा अगर ऊ केहू के कुछ बतावत भा अपने कुछ बनावत रहती त हमनी दुनु के झगड़ा एगो सपाटा से झटक देत रही, “जा, मिल जुल के खेलऽ जा, हमरा के काम करे द. नीमन बच्चा लड़े ना.’

चाय पहुँचावे भा चाय के जूठ कप उठावे कुसुमी बुआ ओहिजा पहुँच जाव आ हमनी के अपना गदबदी छाती में समेट लेव. हम त चुप रह जात रहीं थी, अनुपम अपना के छोड़ावत अम्मा से लिपटल चाहे बाकिर ई त अम्मा का मूड पर रहत रहे कि ऊ ओकरा के प्यार करींहे भा कुसुमी बुआ के हवाले.

चार बजत-बजत जब अम्मा कै दरबार खाली होखे त ऊ उठसु आ सगरी घर के सलीके से संभाल देसु. अम्मा के जादुई छूअन से पूरा घर सिनेमा में देखल जाए वाला घरन के सेट जइसन लागे लागे. ओकरा बाद ऊ हमनिओ के तइयार कइल चहती बाकिर अनुपम तबो ले रूसले रहत रहे. जइसहीं बाबू जी के आवे के बेरा होखे, अम्मा अपनाा कोठरी में जा के ओठँग जासु. बाबू जी आफिस से आवते हमनी के दुलरतें. हमनी के छोटो-छोट बात ध्यान से सुनसु आ तब ले कुसुमी बुआ उनुता ला नाश्ता ले के आ जासु. जब ले बाबू जी खासु तबले ऊ ओहिजे जमीन पर पर बइठल रहीत. घर के रोज-रोज के जरुरत के सामान उहे बाबू जी के बतावे आ ओकरा बाद बाबू जी बाजार चल जासु.

अनुपम आ हम अम्मा से कहानी सुने के जिद ठनतीं बाकिर ओह घरी उनुकर मूड ठीक ना रहता रहे. लागबे ना करे कि ई उहे अम्मा हई जे दुपहरिया में अपना सहेलियन से हँस विहँस के बतियावत रही.

अम्मा हमनी के पहुँच, अपना समुझ से दूर लागल करसु. एक दिन के घटना त हमरा बढ़िया से याद बा. स्कूल से लवटला पर अम्मा के जमावड़ा हमनी के बहुते बेजाँय लागल करे. ओह दिना अनुपम स्कूल से खेल में जीत के आइल रहल. भर रास्ता रट लगवले रहुवे कि आजु अम्मा के खूबे दुलरिहें. बाकिर सहेलिय का बीचे बइठल अम्मा रोजे का तरह ओह दिनो बिना उठले कहली कि जा, कुसुमी से खाना ले ल.

अनुपम एकदम कुढ़ गइल रहुवे. बस्ता ओहिजे पटक के ऊ बिफर गइल. अम्मा बिगड़त ओकरा के मनावे ला जबले उठती तबले कुसुमी लपकत आइल आ ओकरा के गोदी में भर लिहलसि, “अरे हमार राजा, तोहरे खातिर हम खीर बना के रखले हई, चलऽ. खीर आजु ले अनुपम के कमजोरी हवे. ओकर नाम सुनते ऊ ओह बेरा त चुपा गइल बाकिर ओकर भँव तबले चढ़ले रहल. आग में घीव डाले के काम कुसुमी के बड़बड़ाहट करते रहे. ‘मरद खट-खट के कमावत बा आ ई चाय पानी में उड़ा देत बाड़ी. लड़िकन ला दूध कम पड़ जाला बाकिर इनका ओकर कुछऊ खेयाल बा?” अम्मा के आलोचना ओह घरी घाव पर राखल फाहा जस शीतल लागल रहे. अम्मा से टूटत आ कुसुमी बुआ से जुड़त बचपन उमिर का राह में पीछे छूट गइल. अम्मा के रूटीन के हम त पहिलहीं सकार चुकल रहीं, अब अनुपमो रोवल मचलल छोड़ दिहले रहुवे. हमनी का कुसुमिए बुआ का कोठरी में सूतल करीं, ओह घरी ऊ कतना आपन लागल करे. ई त ऊ अँजोरिया में नहाइल उज्जर रात के करीखा रहल जवन हमार सगरी समीकरण बदल दिहलसि.

किशोरावस्था के दूधे धोआइल उमिर के बेसुध नींद जवना के कान पर बाजत नगाड़ो ना तूड़ पावत रहल ओह रात काँच के चूड़ी जस चट से टूट गइल. गहराईल रात के भारी सन्‍नाटा में बगल के खटिया पर सूतल अनुपम के खर्राटा लय बद्ध गति से सम पर आवे, पल भर को थथमे आ फेरु आपन रफ्तार पकड़ लेव. ओकरा खर्राटा से हमरा देह में भय के अजानल सिहरन हमरा के जगा देव. लागे कोठरी में केहू गते-गते चलत बा. डेरात-डेरात हम आँख खोलनी. जंगला से अँजोरिया के एगो छोटहन टुकड़ा टुकड़ा टार्च के रोशनी जइसन कुसुमी के खाली पड़ल खटिया पर पटाइल रहल. शायद ऊ बाथरूम गइल बाड़ी, सोच के हमार साहस लवटि आइल, हम अपना बिछवना से उठनी. बहरि जाए वाला दरवाजा भिड़ल रहल, हम गँवे से ओकरा के खोलनी – पिछला पहर के ज्योत्स्ना से नहात नर मादा जोड़ी देखि के हमरा नस के खून जइसे बरफाइल पानी बन गइल रहे. प्रकृति के आदिम रहस्य के देखके हमार माथा घूम गइल रहे. जइसे-तइसे बिछवना पर आ के काँपत हाथ से माथ पर से चादर ओढ़ के मानो हम सगरी दुनिया से अपना के लुका लीहल चाहत रहनी. हिम के समान शीतल हो गइल देह में रहि-रहि के कँपकँपी उठत रहल. शायद कुछ आहट कुसुमी के मिल गइल रहुवे माथ के पसीना पोंछत ऊ कोठरी में आ के सीधे अनुपम के बिछवना लगे गइल. ओकरा के खर्राटा भरला से तोस पावत ऊ हमरा लगे आइल. हम साँस रोकले पड़ल रहीं. आँख के कोना से बाबू जी के परछाई के अपना कोठरी में जात देखि के हम ग्लानि के दलदल में धँसत चल गइल रहीं.

अगिला भोरे केहू का ओरि ताके के बेंवत हमरा में न रहि गइल रहे. बुझाव जइसे हमहीं कवनो गलती कर दिहले बानी …. हमरा बढ़िया से ईयाद बा ओह दिने पहिला बेर हमरा स्कूल में सजाय मिलल रहुवे. इतिहास के प्राध्यापिका प्रेमपूर्वक अपनी सर्वप्रिय विषय अकबर के दीन इलाही का बारे में लेक्चर देत रहली – हम उनुकर प्रिय शिष्या रहनी, ऊ हमरा से कुछ पूछले रही बाकिर हमार ध्यान ओहिजा रहले कहाँ रहे, जे हम कुछ सुन समुझ पवतीं. सजा सुनके खड़ा होके हमरा लागल कि हमार पूरा देह पारदर्शी हो गइल बा आ आत्मा नग्न. शायद सभे हमरा विचारन के एक-एक बिन्दु के देख परखे लिहले बा. ओह दिन हम टिफिनो ना खइले रहीं. हमार टिफिन देखिओ के कुसुमी बुआ कुछऊ ना कहले रही, जबकि अनदिना एह हालत में ऊ आशंकित प्यार कै बरखा कर देत रही.

रात भइल त ऊ कोठरी हमरा के काटे लागल. हम अम्मा के कोठरी में जाके उनुका से चिपट गइनी, “हम एहिजे सूतब.”

“काहें, का भइल?” अप्रत्याशित प्यार पाके अम्मा मीठ बोली में पूछले रही.

‘हमरा ओहिजा डर लागेला.’ अम्मा से लिपट के सुरक्षा के भरपूर अनुभव करत हम पूछ लिहले रहीं, “ई कुसुमी एहिजा काहें रहेले?”

अम्मा चउँकल गइल रहली. ऊ बात टारे के चहले रही बाकिर हमहूं कवनो कम जिद्दी थोड़ही रहनी. हार के अम्मा बतवली – दादी के नइहर के हई कुसुमी. विधवा हो गइला का बाद उनुका के ससुरारि वाला निकाल दिहले सँ. इनकर भाई अपनहूं गरीब रहल, ऊ का कर सकत रहे. ओहि समय हमनी का अम्मा के पेट में रहली जा. दादी से सभकुछ संभर ना पावत रहल, त दादी के भाई कुसुमी के एहिता भेज दिहलन काम करे ला. हम जुड़वाँ भाई-बहिन के जनम आपरेशन से भइल रहल, अम्मा के हालत बचे जोग ना रहल. अइसना में कुसुमी सबकुछ संभार लिहले रहल. अम्मा त पूरा साल भर बिछवना पर पड़ल रहली, हमनी के पालन-पोषण, घर के सगरी काम, साथ में दादी के सेवा टहल. कहीं कवनो कमी ना छोड़लसि कुसुमी. दादी ला त ओकर जानो हाजिर रहल करे. दादी मरे लगली त अम्मा से वचन ले लिहली, ‘एह अनाथ विधवा के कबहिंयो घर से बेघर जिन करीहऽ…. आ सचहूं अम्मा अपने घर से बेघर होखत चलि गइली बाकिर आपन वचन ना तूड़ली… लेकिन अतना समुझ त बहुते बाद में आइल. ओह घरी त हमरा लागे – कहाँ करिया कलूटी कुसुमी आ कहाँ हमार गोर-गोर अम्मा.

बाबूओजी छिः छिः, उनुका सोझा आवते हम कुंठित होके हट जात रहीं – ओह घरी कुसुमी के हम नया-नया कोन से देखे लागल रहीं. विकसित होखत जात हमार अविकसित मन जब सहेलियन से मिलल सस्ता रूमानी उपन्यासन के पढ़ि के जब नारी सौन्दर्य के मापे लागल तब कुसुमी के अजंता के मूर्ति जइसन गठल देह यष्टि के रहस्य परख सकल रहे.

कुसुमी के देखते हमार मानसिक सन्तुलन गड़बड़ा जाव. ओकर हर काम हमरा खराब लागल करे. बहाना बना-बना के ओकरा से हम लड़ल करीं. एक दिन रात के खात घरी सब्जी के रस लेके हम बहुते बिगड़ गइल रहीं. कुसुमी चिढ़ के कहले रहल, ‘जादे तेजी मत देखावऽ. ससुरारी में अपना से काम करे के पड़ी तब पता चली, सब जगह हमरे जइसन करे वाली ना भेंटाई.

“ना चाहीं हमरा तोहरा जइसन करे वाला, तू अबहीं चल जा एहिजा से. तोहार कवनो जरुरत नइखे एहिजा.“ हम खीसी पागल रहनी, तबहिंए बाबू जी आ के एक तमाचा हमरा गाल पर लगवलन, “बड़ से जबान लड़ावत बाड़ी. इहे सीखतारु महतारी से. खबरदार जे आजु का बाद अइसन ऊटपटाँग बात कइलू….”

हम भउँचक अवाक्‌ अपमानित जइसन होके थरिया छोड़ के उठ गइनी, एक दम से हमरा लड़िकाईं में हनुमान गढ़ी के आङन में पड़ल अम्मा के चाटाँ याद आ गइल जवन हमरा के कुसुमी आ बाबूजी से जोड़ दिहले रहल. अम्मा के ओह दिन कहल बात के रहस्य समुझ में आ गइल. आजु के मार हमरा के अम्मा से त जोड़ दिहलसि बाकिर हम भीतर से टूट गइनी, ना पढ़े में मन लागे ना कवनो काम में. छमाही परीक्षा में पहिला बार असफल भइल रहनी -अम्मा ओह दिन बहुत दुलरवले रहली, ध्यान से मन लगा के पढ़ बेटी, एही साल हाई स्कूल के परीक्षा देबे के बा तोहरा. स्त्री के जनम पवले बाड़ू, बढ़िया से पढ़ लिख लेबू त केहू पर निर्भर ना रहे के पड़ी. तोहरे जीवन सुखी होखी. अम्मा के दर्द से भींजल बाति हमरा मन का गहराई में चिपक गइल आ अब हम रहनी आ हमार किताब-कापी.

पन्दरह दिन पहिले बाबू जी के चिटिठी हमरा के आइल रहल. ई उनुकर पहिला चिट्ठी रहल हमरा ला -अम्मा के कैंसरग्रस्त होखे के समाद का साथही हमार त साँसो जइसे कि रुक गइल. एने हमार सास आ पति हमरा नइहर का नाम से चिढ़त रहले आ ओह लोग के चिढ़े के पर्याप्त कारणो रहल -अच्छा खात-पीयत घर के इकलौती बेटी से सम्बन्ध जोड़े जात बानी जा ई सोचत हमार ससुरारवाले कुछ मँगले ना त बाबूओ जी कुछ दिहले ना, इहां ले कि बारात के आवोभगत में कटौती क लिहलन. मामा लाग भिन्नाइल रहल – ‘का दिदिया, एह तरह कहीं बेटी के बिआह कइल जाला, बीच में पड़ के हमनी का अनेरे बदनाम होत बानी. अम्मा के कसमसाहट साफ लउकत रहल. साँच कहीं त अम्मा मामा लोग के गोड़धरिया क के हमार बिआह तय करवले रही. बाबू जी एहमें इचिको रुचि ना देखवले रहलें. विदा के बेरा नाक में एगो छोटहन नथ आ कान में छोट-छोट बाली पहिर के हम तइयार भइनी त अम्मा अपना बक्सा से आपन हार आ कंगन ले आ के हमरा के पहिरा दिहली. अनुपम आँखिन में लोर भरले हमरा लगहीं खड़ा रहे, घर के शीतोयुद्ध में हम दुनु जुड़वां कवने बिन्दु पर एक रहनी जा. लेकिनजब कुसुमी केवाड़ी का लगे से मलिकाँव जइसन बोलत कहले रहल, ‘सब कुछ बेटिए के दे दिहले बाड़ू कि कुछ बेटवो ला बा.’ त अनुपम के आँखि के लोर चिन्गारी बन के ओह स्नेह तन्तु के जरा दिहले रहल. आ फेरु ना त कवनो चिट्ठी आइल, ना पत्री, ना कवनो बुलावा, जइसे हमरा ओह अनकइल अपराध के दंड मिलल होखे. तबहियों हम अपना ससुराल वालन के कृतज्ञ बानी जे ऊ लोग हमरा के कवनो कष्ट ना दिहल – बिआह का बाद हम बस एके बेर आ उहो अनुपम के बिआह में आइल रहनी. उहो बेहद मिन्नत खुशामद क के, कि एके गो त भाई बा हमार. बस एक बेर त हो आईं फेरु कबो ना कहब ओहिजा जाए के.

अनुपम के बिआह में कुसुमी के बनावटी बावलापन, बेटा के कड़ेर बातन से भितरे-भीतर पीयत-टूटत अम्मा – कुसुमी के अँचरा से जब हम छिटक गइल रहीं त अनुपम पर ओकरा माई के पकड़ मजबूत होत चल गइल रहे. किशोर तरुण आ जवान होखत अनुपम के आक्रोश अम्मा के हर बात पर सोझा आवत रहल – लेकिन अम्मा कबो अपना ममता के अधिकार ना जतवले रही, आ बाबू जी – बेटाते बिआह से से खुश व्यस्त रुपया लुटावत में कवनो झिझक ना – हमरा ला त बाबू जी का लगे मानो कुछ रहबे ना कइल…ना प्यार, ना धन… हँ त जब बाबू जी के चिट्ठी आइल रहे त हम सकुचात माँ जी का सोझा ऊ चिट्ठी रख दिहले रहीं – कैंसर के विस्फोटक शब्द उनुकर प्रतिरोधक क्षमता पर इतिश्री लगा दिहलस. पतिदेव अपनहीं हमरा के पहुँचा गइलन. एहिजा अइला पर ओह साँझ लागल कि घर में कहीं कुछऊ त नइखे बदलल. बाबू जी अपना कोठरी में कुछ पढ़त रहलें. नीरा, अनुपम कहीं घूमे जाए का तइयारी में रहलें. कुसुमी रसोई में नौकर का साथे काम करत रहल -अनुपम जब से कमाए लागल बा घर में एगो नौकर आ गइल बा, ‘बुओ के आराम करे के उमिर हो गइल बा, ई ओकर कहना रहल.’

अम्मा अपना कोठरी में हमेशा का तरह चादर ओढ़ले ओठंगल रहली. सगरी शरीर मानो गल गइल रहल, एगो जीर्णशीर्ण काया जवन आपन पीड़ा झेले का कोशिश में कँपला से अपना होखला के सूचना देत रहल. “अम्मा, अम्मा” हमार रोआइन आवाज से उनुकर पलक खुलल, पहिचनबो कइली, बाकिर प्रसन्‍नता के अभिव्यक्ति दर्द का बोझ से कचरा गइल रहल – बरीसन बाद पहिला बेर हम बाबू जी से पूछले रहीं, “अम्मा के बम्बई भा दिल्ली काहे ना ले गइल?

बाबू जी खाँस के आपन गला साफ कइलन, “बहुत बाद में पता चलल, डाक्टर कहलन कि अब कवनो फायदा नइखे कहीं ले जाए के.’

मन त कइलस कि कहीं कि अम्मा पर ध्यान देतऽ त कइसे ना पता चलीत बाकिर नइहर के मोह के छोह कतना विकट रहल कि हम चुप रह गइनी. यदि हम कुछ कड़ेर बात कह दिहनी त शायद दुबारा एहिजा डेग ना रख पाएब. बाकिर कई बेर अनकहलो बात बहुत जोर से सुनी जाला …

नीरा सफाई दिहली – अम्मा जी कबो आपन तकलीफ बतवती त पता चलीत. अनुपम के रोष अबहीं ले कम ना भइल रहल, “अम्मा त हमेशा अपने जिद में रहली, जे जानबूझ के अपना के मिटावल चाहे ओकरा के के रोक सकेला. दवा खाइले ना चाहत रहली त बम्बई दिल्‍ली ले जा के पइसा बरबाद कइला के का फायदा?

हमरा ठकुआ मार दिहलसि कि बचपन में बोवल विष बीज छतनार अमरलता बनिके माया ममता दया के अंकुरन के गायब कर दिहले रहल. महाप्रस्थान ला प्रस्तुत यात्री का इचकी भर प्यार भरल तसल्लिओ के हकदार ना होखे? अनुपम के खीस से अनजान ना रहनी हम. अनजान रहल ओकर तर्क – शायद घर के भूल ग्रन्थि ले उहो पहुँच चुकल रहे बाकिर एकरो ला ओकरा विचार में अम्मे दोषी रहली.

कई दिन से अम्मा का सगे बइठल देखत आइल बानी, कुसुमी अपना तरफ से अम्मा के देखरेख में कमी नइखे कइले, हँ नीरा जबो एहिजा आवेले त ओकरा के कवनो बहाने ऊ बाहर बोला लेले. अनुपम सबेरे साँझ आफिस जात-जात एक दू बेर आ जाला, कबो कुछ पूछियो लेला जवना के जबाब अम्मा सिर हिलाके हँ भा ना में दे देली. अम्मा के सहेलियो लोग उनुकर साथ नइखे छोड़ले. दिन भर ऊ लोग सहानुभूति देखावे आवत रहेला. जब कबो कोठरी खाली होला बाबू जी आ के चक्कर लगा जालें. मृत्यु के आसन्न उपस्थिति उनुका अपराध बोध के जगा दिहले बा मानो. आ अम्मा बाड़ी कि अबहियों बाबू जी के आहट पहचान के अपना कराहटन के समेट लेबेली आ एगो सन्नाटा पसर जाला कोठरी के चार दीवारन का बीच…

काल्हु सँझिया बाबू जी का लगे कुछ लोग आइल रहे. कुसुमी अम्मा ला कप में रस लेके आइल रहे, नीरा हमरा साथे ओहिजे बिठल रहल. कुसुमी आवते कहलसि, दुलहिन जा, तनी बाहर घूम फिर आव, हम भउजी के रस पिया देब.’ हम ओकरा हाथ से कप ले लिहनी, ‘हम रस पिआ देब. जा तुहूं जा के आपन काम देखऽ.

मन-ही-मन बहुते खीझियात हमरा मुँह से निकल पड़ल, ‘कुसुमिो खूब बिया, अबहियों संतोष नइखे आ ई नीरा – केहू लाख कहे ओकरा त समुझे के चाहीं !

आश्चर्य कि अम्मा एह बेरा चैतन्य रहली. ऊ पूरा आँख खोल के चारों ओर देखली आ फेर कहली, ‘कुछ मत कह बिट्टी, कुसुमी एह घर ला बहुते कइले बिया.

जीवन के आखिरी बेरा में हमरा अम्मा के रागद्वेष के संकेर गलियन में भटकावल ना चाहत रहल बाकिर ओकर साफ आवाज से हमरा मानो भरम हो गइल रहे कि अम्मा पूरा तरह पहिलहीं जइसन स्वस्थ बाड़ी, “कइले बिया त तोहरा सुख पर डाको त डलले बिया.”

‘अइसन मत कह बिट्टी, ओकर का दोष? ओह अनाथ बेसहारा के एह घर में आपन जगह बनावे ला सब कुछ करे के पड़ल, दोष त हमरा भाग के बा जवना में सगरी खोट सिक्का हमरे ला लिखल रहे. देह के कैंसर त अब लागल बा बिट्टी, आत्मा कं कैंसर त कबहिंए के लाग गइल रहल. जब तोहरा लोग का जनम का बाद के लमहर बेमारी का बाद हमार पुनर्जन्म भइल रहल.”

अतना बोलके अम्मा हॉफे लगली. हम चम्मच से उनुका के रस पिआवल चहनी. एक चम्मच बाद ऊ सिर हिला दिहली. ऊ रसो होंठ का कोरन से बाहर निकल आइल रहल. तनिका देर में ऊ सूत गइली. सूतले-सूतल उनुकर आत्मा आपन दुख-दर्द हमरा कान्ह पर डाल के आजाद हो गइल रहे….

‘कुछऊ कहऽ अम्मा के आशीर्वाद दिदिए पर फलल. मउसी के आवाज कहीं बहुत दूर से आवत लागल, हम अपना विचार-गुफा से तबहिँए निकलल रहनी.

”कुछ कहलू ह मउसी?” राते में फोन से अम्मा के देहान्त के खबर पावते मउसी आ गइल रहली.

‘हँ, इहे कहत रहनी कि अम्मा त हमनी सगरी बहिन के आशीर्वाद दिहली बाकिर दिदिए के ऊ सब सचहूं मिल पावल. मउसी अपना वैधव्य के दुख महसूसत कहत रहली. हमरा नानी के चिट्ठियन के याद आ गइल. हर चिट्ठी में आड़ा-तिरछा आखरन में लिखल रहत रहुवे – ‘सौभाग्यवती भवऽ !’

सरोकारनामा पर प्रकाशित कहानी संग्रह कथा-गोरखपुर से. सगरी अधिकार लेखिका आ प्रकाशक का लगे. http://sarokarnama.blogspot.com

By Editor

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