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– डॉ॰ आशारानी लाल

हम अपना बारे में रउवा सभे से कुछ बतावल चाहत रहीं. कुछे नाहीं, बहुत कुछ बतइतीं, चाहें भर जिनगी के कहनी कहतीं, बाकी का कहीं – अपन नउँवें बतावत के नऽ हमरा लाज घेर लेले बा. सोचतानी कि हमार नउँवा सुनिये के लोग अपन नाक-मुँह कुल बिचकावे लागी, चाहे एने-ओने घुमा के लोग लागी कहे कि तोहरा के, के नइखे जानत ?

अइसे त हमार निवास हर घर में रहबे करेला, काहे कि हमरा बिना केहू रहिए ना सके. हम ना रहब त सब जगहा माछी भिनभिनात रही. कूड़ा-करकट आ गंदगी देखिए के सबका ओकाई आवे लागी, एही चलते सब हमके अपना-अपना घरवे में रखले रहेला. हमहीं सबका घर के साफ-सुथरा करत रहिंलाँ. अब त रउवा सभे हमार नाँव बिना बतवले बूझ गइल होखब. हमरा के लोग कइगो नाँव से बोलावेला. केहू हमके झाड़ू कहेला, त केहू बढ़नी, केहू कूँचा कहेला त केहू कूँची आ केहू खरहरा. चाहे कवनो नाँव से हमके केहू पुकारो, हम हर घर में घुस के बइठल-सुतल रहिलाँ. हमके भले केहू हीन बूझो, बाकी हम बड़ा मजिगर धरोहर सब घरन के हँई, एके केहू नकार ना सकेला.

जे निपढ़ आ गूढ़-गँवार होला उहे हमरा देंहिया के रोंवाँ-रोंवाँ के रच-रच के सजावेला आ बनावेला. जवन तरह-तरह के, कई खान के आ कई तरह से बनेला. कहीं हमके मूँज से बनावल जाला त कहीं रसरी, पतलो आ खजूर के पतई से. कहीं-कहीं हमके लोग नरियर के सींक से बनावेला, त केहू लमहर-लमहर घास से. इहे नाहीं जहाँ हमके फूल-झाड़ू कहल जाला ऊहाँ त सचहूँ हमरा देंह से फूल झरत रहेला. अब त हम प्लास्टिको के सींक से बनावल जातानी जवन लाल-पीयर-हरियर तरह-तरह के रंग में बने लागल बा. इहे कुल देख के बड़-बड़ शहरन में हमार कीमतो बड़े-बड़ लागे लागल बा. देहात में न हम बेमोल बिकात रहीं बाकी शहरियन में ई बात नइखे. सभकरा न हमरा से पाला पड़ेला चाहे ऊ धनी हो या गरीब. इ कुल हमार रूप जब गउँवाँ वाला देखेला लोग त कहेला कि अरे ! ई – त बड़ा महँग बिकाता रे, जनती त हमहूँ एक बोझा अपना गउँवें से ले-ले न अवतीं.

हमरा देंह-धजा, रूप-रंग का नाँव के त सभ केहू जानता एह से कि हमरा बिना कवनो घर शोभबे ना करेला. केहू के काम हमरा बिना ना चले तबो लोग हमसे घिनाला, काहे कि जब-जब हमके लोग छुएला तब-तब अपन हाथ धोवेला, जइसे हम अछूत होखीं, कहेला लोग कि झाड़ू न छुअले रहलीं हँऽ. ई बात त ओइसने बा के अन्हरा के देख के अँखियो पिराला आ अन्हरा बिना रहियो ना जाला.

रउवा सभे सुनले होखब की कवनो चीज के ना रहला पर ओकर कीमत सबका बुझाला. जइसे चउका में नून के बिना खाना सून हो जाला ओइसही हमरा बिना घर में आदमी-जन-सर-सवाँग सब भरलो रहला पर घर-घर ना लउकेला. ई कहिके हम अपन बखान कइल नइखीं चाहत बस इहे बतावतानी कि हम बेकार ना हँई. कवनो घर में अगर हम तनी लुका के सुत जाइलाँ त भोर होते लागेला लोग पुछे कि झड़ुवा केने बा रे…., चाहे बढ़निया कहाँ धइल बा. लागेला चारों ओरी हमार खोजाहट होखे, कहेला लोग कि बेर चढ़ गइल आ अभी ले घर में बहारन पड़ल बा. घर में अलियार रही त लछिमीजी के बास कइसे होई रे. ई कुल बात सुनके हमहूँ जाग जाइलाँ आ अपना काम प चल देइलाँ.

हमरा अइला से सब घर में खुशी आ जाला. पूरा घर साफ-सुथरा होके चमके लागेला. इहे कुल देख के बूढ़-पुरनिया लोग हमके अपना घर के लछिमी कहेला लोग. हमार दोस्ती ओही लोग से ढेर रहेला, काहे कि ऊ लोग हमके अपना निगिचा राखेला. लड़िका-सेयान केहू हमके तनिको तलिया देला चाहे उठाके पटक देला या फेंक देला, त बूढ़ लोग लागेला ओके बोले आ कहे कि अइसे ना करे के हो. साचों हम कहल चाहतानी कि पुरनिया लोग हमार बड़ा इज्जत करेला आ हमके बड़ा जतन से सइहार के धरेला.

उत्तर से दक्खिन आ पूरब से पश्चिम ले सेबेरे उठते हर घर में लोग हमरे के लागेला खोजे. मेहरारू लोग त आँख खोलते पहिले हमही के अपना हाथे में उठावेली आ लागेली अपन पूरा घर दुआर झार बहार के चिकन-चाकन क के घर में घुसल दरिदर के सबेरहीं भगावे. कहेली ओग कि घर में बहारन रही त लछिमी जी के प्रवेश कबो केहू के घरे ना होई. इहे कुल अपन गुन जान के अब हमहूँ कहिलाँ कि- हमहीं न लछिमी जी के सुआगत के राह बनावेलीं. हम ना रहब त दुअरा पर आइयो के ऊ उलटे पाँव लवट जइहन. हमरा एकर नाज बा कि हमरे इशारा पर लछिमीयो जी चलेली.

हम दिन भर घर के सब लोगिन के इशारा पर अपन काम धन्धा करत रहिलाँ, बाकी सुरूज बाबा के डुबते लोग हमके आराम के मोका दे देला. दिन भर के थकान हम सुतिएके बिताइलाँ. साँझे सुत जाइलाँ त भोर होखे से पहिले हमके केहू जगावेला ना. हम खूब पसर के आराम से फों-फों कइके निचिन्ते पह फटला ले सुतत रहिलाँ. लोगवा कहेला कि अगर केहू साँझ भइला पर हमके सुतला में जगाई चाहे हमरा आराम में खलल डाली या झकझोर के झारे-बहारे के कही, तब ओकरा घर से लछिमीए जी भाग जइहन. ऊ घर दरिदर हो जाई, उहाँ मलेछ के राज होई- एही डरे सुरूज बाबा के अलोत होते केहू न-त हमके हिलावे डोलावेला न छुएला.

मेहरारू लोग त हमके अपना जान-परान से बेसी माने-जानेला-काहेंकि हम उन्हन लोगिन के इज्जतो-आबरू के खयाल हरदम राखिलाँ. मेहरारून के इज्जत बड़ा नाजुक होला, त जब ओपर आँच आवेला तब ऊ लोग अपना हाथे में हमरे के उठा लेला आ हम लागिलाँ सोझा आइल विपत के ओसहीं झटकारे आ भगावे जइसे अँजोर-अन्हार के भगावेला. हमरा के देखते कुल कुकर्मी अपन मुँह चोरा के पोंछिटा दबवले भाग जालनसन. इहे बात बा कि मेहरारू लोग अपन रक्षाकवच हमरे के बुझेला आ बाते-बात में कहेला कि- बढ़नी मारो रे, चाहे-बोहार जाव रे.

ई औरत लोग बखूबी हमरा गुन के जानेली आ हमरा के बड़ा चाव से धरेली लोग, काहे कि जब ऊ लोग सितला माई लगे उनके पूजे जाली त देखेली कि माई अपना हाथे में हमरे के लेके बइठल बाड़ी. ई माई सबकर रोग-बलाय के अपना एक नजर से अपना हाथ के झाड़ू से झार-बहारके दूर भगा देली. एही गुन के चलते हम सब मेहरारू लोगिन के अपन दुलरूवा बन जाइलाँ.

का बताई सब घर में त ना बाकी जवना घर में बूढ़-पुरनिया रहेला लोग – त ऊ लोग हमरो रहे के एगो जगह जरूर बनावेला आ अपना घर के देवता-पित्तर नाही हमरो के लुकवा के धइले रहेला. ई पुरनिए लोग जानेला कि हमरा के सबका सोझा धरे के ना चाँहीं. घर में आवे-जाये वाला लोगिन से हमके लोग बचा के राखेला. जइसे हर घर में मरद-मेहरारू लइका सेयान, जीव-जन्तु, देवता-पित्तर के बसे के एगो निश्चित ठौर-ठिकाना बनावल रहेला ओसहीं हमरो खातिर एगो जगह रहेला. बड़े-बूढ़ जानेला कि अपन-अपन हरवाही कइला के बाद सब थाकेला – त ओसही हम बढ़नी बानी त का – हमहूँ थाक जाइलाँ – एहिसे हमरो आराम के एगो जगह चाँहीं आ ऊ जगह सबका नजर के अलोते रहे के चाँहीं. हम त झाड़ू-बढ़नी बानी एहीसे हम सबकर लेहाज करींलाँ. हम सबका सोझा न-त सूत पाइलाँ न ओठघें के मन करेला, तबे न अलोते पड़ल रहिलाँ.

कईगो घरन में त लोग हमके जल्दी सुतहीं ना देला, थकला के बादो खड़ा होके रहेके सजा दे-देला. तब हम का करीं, हमार रग-रग काम करे से बथत रहेला आ फेरू खड़ा भइला से अवरी हमार पीड़ा बढ़ जाला. लोग भुला जाला कि हम लछिमी माई के अंश हईं. माई जब हमार दुःख दर्द आ पीरा देखेली त दुःखी हो जाली. कबो-कबो त माई हमार दुरदसा देख के ओह घर से अपन मुँहो फेर लेली. ई बात जब सब जान जाला त कबो हमके केहू खड़ा होके रहे के ना कहेला, न त कवनो दूसर सजा देला. जवन घर के लोग एह रहस्य के बूझ लेले बा ऊ लोग हमरो रहे के जगह जरूर बनावेला आ हमरा आराम में कवनो खलल कबो ना डालेला. अरे ! हम ई त नइखीं कहत कि केहू हमके फूल-अछ्त आ धूप देखावो, बाकी बस इहे कहब कि थकला पर तनी आराम से सुते के जगह जरूर मिले के चाहीं – इहे हमार मनो होला. एतने करे से हमरो के आराम भेंटाई आ घरहूँ के लोग के सुख-शान्ति मिली आधन-दउलत से लछिमी माई उनकर घर भर दीहन. माई के किरिपा हमरे आराम से सबका भेंटा जाई. लोगो के कहल हम सुनले बानी कि जे हमके खड़ा रहे के सजा देला ओकरा घर में हरदम कलह मचल रहेला, उत्पात होत रहेला – एही सब के चलते हमहूँ हरदम ओठँघिए के रहल चाहिलाँ.

बहुते गरीब भाई-बहिन लोग हमरे सहारे अपन खेवा खरचा चलावेला. कवनो सरकारी आफिस चाहे संस्था में झाड़ू-बहारू आ सफाई करे खातिर जब निपढ़ आ गरीब तबका के भरती होखे लागेला तब उहाँ हमरे परधानता बेसी रहेला. एक बेरी अचानके इहे देखे में आइल कि हमरा के चाहेवाला कुल मरद-मेहरारू अपना हाथ में हमके उठवले सड़क पर चल रहल बा. हमरा बुझाइल त कुछ ना बाकी सुनली कि अपन महिना के पइसा बढ़ावे खातिर ऊ लोग हड़कम्प मचवले रहे आ नारा बोलत हड़ताली रहे. हम झन्डा बन के ओह लोगिन के हाथ में लहरात रहीं, एहि से जल्दिए सरकार ओह लोगिन के माँग मान लिहलस. सरकारो के हमरा गूढ़ रूप आ एकता के बोली के सोझा झुकहीं के परल. अपन इहे कुल करतब के चलते हम त कहिलाँ कि गरीबी के दूर भगावल त हमरा बाएँ हाथ के खेल होला. हम अपना मुँहे अपन ढे़र बखान कइल नइखी चाहत बाकी तनी-मनी कुछु-कुछु बताके अपन नाँवहँसाई रोकल चाहतानी आ बस एतने कहल चाहतानी कि हमके देख के केहू अपन मुँह मत फेरो – हम बड़ा काम के चीज बानी.

हमार जनम गरीबे लोग के घर में होला. ऊ लोग घास-पात, मूँज-पतलो कुल बटोर-बटोर के आ रच-रच के ओके रसरी से बान्ह के हमार रूप बनावेला, फेरू एगो बोझा में हमके बान्ह के अपना कान्हा पर धर लेला आ घरे-घरे घूम-घूम के हमके लोग बेचेला. इहे कइला से ओह लोगिन के खरची चलेला. हमहूँ एह गरीब लोग के चीन्ह लेले बानी ओहिसे उन्हने लोगिन से सटल रहींलाँ.

हमार एगो अउरी गूढ़ मरम बा जेके सब ना बुझेला, ऊ हऽ कि जब केहू अपन पुरान घर छोड़के नया घर में जाला तब हमके पुरनका घर में ऊ कबो ना छोड़ेला. सबसे पहिले नया घर में हमरे प्रवेश होला. हमरा के लेके लोग एहसे जाला कि अपना लछिमीजी के लोग ओह पुरान जगह पर छोड़ल ना चाहेला. दूसर बात ई बा कि नया घरवा साफ ना होई त लोग, जीव, जन्तु, देबी-देवता रहिहन कहँवा. ई बात ठीक ओसहीं बा कि लाठियो ना टूटे आ सँपवो मरा जाला. नयका घर हम साफो कर देइलाँ आ ओह में धनो-दउलत भर जाला. भले हमरा एह गूढ़ रहस्य के केहू बूझ ना पावेला बाकी ई साँच बात बा. हम लोगिन से इहे कहब कि हमके पुरान बुझके अपना पुरनका घर में कबो छोड़ीं लोग मत नाहीं त लछिमी माई ऊहें छुटल रह जाइब.

हम अपन कहनी रउवा सभे के सुनवलीं हँ एहसे कि हमार गुन-अवगुन रउवा सभे जान जाइब त कबो हमके हीन ना बूझबऽ. फेरू अपन अवरी गुन-ढंग इयाद परी त जरूर बताइब – अबे ना.


अपना भोजपुरी सेवा ला अनेके संस्था संगठन से सम्मानित हो चुकल डा॰ आशारानी लाल बलिया जिला के सँवरुपुर के हईं. शादी मऊ के अमला में भइल आ पच्चीस साल ले सिवान महिला डिग्री कालेज के प्राचार्या रहनी. ईहाँ के लिखल अनेके रचना बहुते पत्र पत्रिकन में प्रकाशित होत आइल बा. झाड़ू के आत्मकथा वाला ई लेख पाती के जून २०१३ अंक में प्रकाशित भइल बा. उहाँ के लिखल भोजपुरी किताबन में ए बचवा फूलऽ फरऽ, हमहुं माई घरे गइनी, डिठौना, माटी के भाग, देवकुरी, जय कन्हैया लाल के, आ काहे कहली ईया शामिल बाड़ी सँ. डा॰ आशारानी के अधिकतर रचना महिला केन्द्रित बाड़ी सँ.

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