‘लोक’ के आधुनिकता बनाम यांत्रिक आधुनिकीकरण

– डा. प्रमोद कुमार तिवारी

Pramod-kr-tiwari
लोक के नाँव लेहला पऽ मन में ओकर दू गो छवि बनेला. एगो छवि में कलकल नदी बहेले, फल से गदराइल पेड़ लउकेला, गीत आ उत्सव से भरल खुशहाल लोग नजर आवेले आ हरियाली भरल खेत के बीच से कच्चा पगडंडी पऽ पोंछ उठा के भागत सुंदर बाछा-बाछी लउकेली स. दुसरका छवि में गांव एगो पुरान, जर्जर, पिछड़ा आ ठहरल समाज के रूप में लउकेला, जवना में लाचारी आ बेबसी भरल बा, जवन घनघोर जातिवाद आ राजनीति से ऊभचूभ हो रहल बा, जहां रह के कवनो नीमन काम ना कइल जा सके, एह से ओकरा के छोड़ के परदेस निकल जाए में लोग लागल रहेले. संभव होखे तऽ कलकत्ता, दिल्ली, बंगलौर आ ना जुरे त बनारस, पटना, आरा भा छपरा में कुछ रस्ता पकड़ल जाव. रस्ता पकड़े भा रास्ता धरावे के बात जवना ढंग से भोजपुरी लोक में सुने के मिलेला ओकरा से बुझाला कि गांव में रहे के मतलब बा कि बेरस्ता आ कुराह पऽ बानीं. जिनगी बेमतलब कट रहल बिया. ई खाली भोजपुरिये समाज के कहानी नइखे लगभग पूरा देश में लोक से जुडल समाज के कमोबेस सच्चाई इहे बा. कहे के जरूरत नइखे कि लोक के ई दूनो छवि गड़बड़ बा. पहिलका छवि के जादेतर ऊ लोग याद करेले जे कई बरिस पहिले गांव छोड़ के बड़ शहर भा विदेश निकल गइल रहले, एकर संबंध यथार्थ से कम कल्पना आ नास्टेल्जिया से बेसी हऽ, एह से एकरा के छोड़ देत बानीं. दुसरका छवि के संबंध पिछिला कुछ दशक के राजनीति आ जीवनशैली से जुड़ल बा, एह से एकरा पऽ गहिराह ढंग से सोचे के जरूरत बा.

नया आ आधुनिकता ई दूनो शब्द दू गो अर्थ देला. खाली भारते में ना पूरा दुनिया में जवना शब्दन के आधार पऽ सबसे जादे भ्रम रचल गइल बा ओहनी में से एगो ‘आधुनिकता’ हऽ. अइसनकुछ अउर शब्दन के उदाहरण के रूप में ‘विकास’ अउर ‘ज्ञान’ के लीहल जा सकता बा, जवना के एह आधुनिकता से सीधा संबंध जुडेला. ‘नया’ शब्द समय से जुड़ल ह जवन कुछ समय बाद बदलत रहेला जइसे बेटा के समय बाप के तुलना में आधुनिक होखी, बाकिर ‘आधुनिकता’ के संबंध एगो खास प्रवृत्ति, सोच आ जीवन दर्शन से जुड़ेला. आधुनिकता एगो मूल्य हऽ जवना के स्थापना पच्छिम के लोग ज्ञान, विज्ञान आ राजनीतिक क्रांति से कइले रहे. पूरा संभव बा कि बाप में आधुनिकता के तत्व होखे, बाकिर बेटा ओकरा से वंचित रह जाए. पच्छिम में आधुनिकता के आंदोलन चलल रहे जवन मनुष्यता के पक्ष में बौद्धिक लोग के एकजुट कइले रहे. आधुनिकता कवनो देवी-देवता-धरम-कर्मकांड भा राजा रानी के जगह पऽ मनुष्य के केन्द्रीय महत्व देबे के बात करेला. संक्षेप में कहीं तऽ
1. आधुनिकता के मतलब ई हऽ कि रउआ केतना कम कूड़ा फइलावेलीं, केतना कम ऊर्जा खरच में आपन जीवन यापन करेलीं.
2. आधुनिकता प्रकृति के साथ सहयोग आ सहजीवन में यकीन करे के मूल्य से जुड़ेला.
3. आधुनिकता के मतलब ई हऽ कि विविधता खातिर, असहमति खातिर रउआ समाज में केतना जगह बा. अपना विरोधी विचार के सुने आ सहे के रउवा भीतर केतना ताकत बा.
4. आधुनिकता के मतलब ई हऽ कि वंचित आ कमजोर तबका खातिर समाज विशेष में केतना जगह बा. यानी बच्चा, स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक आदि के समाज के मजबूत आ बहुसंख्यक तबका केतना जगह दे रहल बा. जवना समाज में आधुनिकता होला ऊ बहुसंख्यक के तानाशाही रवैया के विरोध करेला.

बाकिर पच्छिम खुदे एह कसौटी पऽ खरा ना उतर पावल. जवन आधुनिकता पच्छिम में धरम के विरोध में उठल रहे, ऊ बाहर सबसे जादे धरम के इस्तेमाल कइलस. जवन आधुनिकता बराबरी आ मनुष्यता के बात करत रहे ऊ सबसे जादे उपनिवेश बनवलस आ मनुष्यता के बर्बर ढंग से हत्या कहलस. अफ्रीका, अमेरिका, भारत सब आज तक ओह दंश के भोग रहल बा. एह से एगो बात साफ बा कि पच्छिम में आधुनिकता शुरूए में खतम हो गइल ओकरा स्थान पऽ आधुनिकीकरण आ गइल जवना में विवके के बजाय विज्ञान के राज रहे, जवना में मनुष्यता के तुलना में पूंजी के महत्व रहे अउर जवन प्रकृति के दुश्मन मान के ओकरा पऽ एकाधिकार जमावे के आपन हक समझत रहे.

पिछिला दू सौ साल में भारते ना पूरा दुनिया में पच्छिम, आधुनिकता के नाम पऽ आधुनिकीकरण थोपले बा आ जे भी ओकरा के रोके के कोशिश कइले बा ओकरा से सीधा मुठभेड़ कइले बा. चूंकि ओकरा लगे एकांगी विज्ञान आ यंत्र के साथ-साथ तमाम देश सब के शोषण आ लूट से इकट्ठा कइल पूंजी के ताकत ब एह से ऊ लगातार विजयी होत आ रहल बा. आधुनिकीकरण के एह ज्यादती सबसे मूल्य अइसन समाज सब के चुकावे के पड़ल बा, जेकर लमहर परंपरा रहल बिया आ जवन समाज प्रकृति से जीवन दर्शन के स्तर प कई सदियन से जुडल रहल बा.

सवाल खाली आधुनिकता से जुडे़ भा कटल रहे के नइखे, मूल सवाल तऽ ओह भाव, संस्कृति अउर जीवन शैली के रक्षा के बा जवन उकतरफा ढंग से आधुनिकीकरण के भेंट चढ़ रहल बा. ओह ज्ञान परंपरा के खतम भइला के बा जवना के लोकसंस्कृति हजारन साल के अनुभव के बाद अर्जित कइले रहे.

पच्छिम के ई व्यवस्था ‘व्यक्ति’ के बहुत जादे महत्व देबेले, जबकि पुरान संस्कृतियन में ‘व्यक्ति’ आत्म के जगह पऽ ‘समूह’ अउर ‘पर’ केन्द्र में रहे. ई लड़ाई व्यक्ति बनाम समाज, ब्यक्ति बनाम परिवार आदि के रूप लेत रहल बा. अपना वर्चस्व के बचावे खातिर ऊ नाम बदल बदल के नया रूप लेत रहेला. 1990 के बाद भारतो में इतिहास से लेके विचार तक के अंत के बात गूंजेलागल. उत्तर आधुनिकता अउर ओकरो से आगे के समय के बात होखे लागल बाकि सवाल उठत बा केकरा खातिर. इतिहास के अंत सबका खातिर नइखे भइल, एगो बड़ वर्ग खातिर ई इतिहास के निर्माण के काल हऽ, स्मृतियन के स्थापित करे के काल हऽ. सत्ता में बइठल प्रभु वर्ग हमनी के इतिहास के कबो महत्वे ना दिहल अउर जब एतना जागरूकता आइल कि हमनी के अपना बारे में पूछींजा तऽ खट से कह दिहल गइल कि इतिहास जइसन कवनो चीज ना होखे, कि इतिहास जादूगर के टोपी हऽ, जवना में से कुछुओ निकालल जा सकत बा. कहे के मतलब कि लोक के इतिहास के, लोक के दर्शन के कुछ मतलब ना रह जाए आ ऊ निरर्थक हो जाए.

पिछिला 25 बरिस के समय स्मृति भा याद के मिटावे अउर ओकरा के बचावेवाला लोग के बीच के संघर्ष के समय रहल बा. रउआ आपन कथा, कहानी, गीत, परंपरा (रूढि ना) दर्शन, जीवन शैली सब भुला जाई. राउर दिमाग कोरा इस्लेट हो जाए ताकि ऊ लोग अपना मन के बात ओकरा पऽ लिख सके. एह पूरा प्रक्रिया के सबसे जादे कीमत लोक अउर आदिवासी संस्कृति से जुड़ल लोग के चुकावे के पड़ल बा. काहे कि ई दूनो व्यक्ति से ना सामूहिकता से संचालित होखे वाला संस्कृति हई स. असल में कुछ सौ साल के उमिर वाली अमेरिका जइसन सभ्यता के, लोक के पुरान संस्कृति सब परेशान करेली सऽ. अपना जीवन शैली आ जीवन दर्शन के कारण ऊ पूंजीवादी संस्कृति के लाभ आ शोषण के रथ रोके लागेली सऽ. एही से अमेरिका, अफ्रीका से लिहले आस्ट्रेलिया तक ऊ लोग सामूहिक नरसंहार के सहारा लेत रहेले. अमेरिका के रेडमैन आदिवासी राजा अमेरिकी राष्ट्रपति के नाम 1854 में जवन चिट्ठी लिखले रहले ओकरा के याद करीं जवना में ऊ अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा धरती बेचे खातिर दबाव डलला के जबाब में कहले रहले कि ‘ई हमनी के कल्पनो के बाहर के बात बा, भला धरती अउर आकाश के केहू कइसे कीन सकत बा, केहू पानी के कइसे खरीद सकत बा, एगो क्षेत्र के धूप अउर रोशनी के के कइसे बेच सकत बा. हमनी के पता बा कि रउआ ताकतवर बानीं, ना देब जा तऽ रउआ छीन लेब. बाकिर एगो बात याद रखीं, जब भी रउआ हमनी के धरती माई के रौंदब त याद राखब कि एह नदियन में खाली पानी ना हमनी के पुरखा लोग के खून बहेला. कहे खातिर ई संघर्ष 100 साल भा साठ साल पहिले खत्म हो गइल, बाकिर ई लगातार चल रहल बा, पहिले से कहीं तेज गति से चल रहल बा. लोक आ लोक के दर्शन में यकीन राखेवाला लोग एह युद्ध के एके साथे कई गो स्तर प लड़ रहल बा – आजीविका के स्तर पऽ, भाषा के स्तर पऽ, खान-पान पहिनावा के स्तर पऽ, संस्कृति के स्तर पऽ. साम्राज्यवादी ताकत सब तकनीक के सहयोग से एह लड़ाई के एकतरफा बनावे में लागल बाड़ी सऽ. बलुक ई कहल सही होखी कि एह वैश्विक लड़ाई में ऊ बढ़त ले चुकल बाड़ी सऽ. असल में ई लड़ाई खाली लोक आ आधुनिकीकरण के गुलामे लोग के बीच नइखे, ई आत्ममुग्ध लालची लोग अउर आवेवाली पीढ़ियन खातिर पृथ्वी के बचावेवाला प्रकृति प्रेमी लोग के बीच बा, जवना के संकेत महात्मा गांधी बहुत पहिले कइले रहले कि ‘ई धरती हमनी के जरूरत खातिर बहुत बड़ बिया बाकिर एगो आदमी के लालच के पूरा करे खातिर बहुत छोट बिया. ’ आज अइसन हजारन लाखन लालचियन के जुनून से ई धरती कराह रहल बिया. लोक के ई लड़ाई बाजार के पक्षधर अइसन सत्ता से बा जवन दुनिया के एकांगी, एकरूप अउर एकध्रुवीय बनावल चाहत बाड़ी स.

असल में आज के समय में लोकसाहित्य आ संस्कुति पऽ बात कइल ओह संस्कृति अउर जीवन पद्धति के पक्ष में खड़ा होखल बा, जवन एह धरती के ह्नदय से जुड़ के, ओकरा धड़कन के सदियन से सुनत आ रहल बिया. लोक, एकरा रग-रग से वाकिफ बा अउर प्रकृति के रहस्य के जाने आ खोले के तमाम तरह के वैज्ञानिक दावा करेवाला आधुनिक लोगन से कहीं बेहतर ढंग से प्रकृति के जाने आ समझेला.

पचासन हजार साल से समृद्धि के साथ जीयेवाला आदिवासी समुदाय सब के ई नया सभ्यता बेचारा बना देलस. आज ऊ लोग रचे के बजाय बचे में लागल बा. 50000 साल से प्रकृति के रहे लायक अउर सुंदर बनवले रहे के श्रेय अगर केहू के दिहल जा सकत बा तऽ ऊ आदिवासी समाज आ लोक संस्कृति से जुड़ल लोग के दीहल जाई. एह लोग के अविकसित और नासमझ कहे वाला लोग के खुद अपना गिरेबान में झांक के देखे के चाही, आस्ट्रेलिया में एह लोग के असभ्य कहेवाला लोग असल में इंग्लैंड के गुंडा अउर देशनिकाला के सजा पा के उहां पहुंचल लोग रहे.

आज ‘लोक’ उपेक्षित बा. आजकाल अक्सरहां केन्द्र अउर हाशिया के बात सुने के मिल रहल बा, दिल्ली केन्द्र हऽ अउर लोक हाशिया. लोग आंदोलन कर रहल बा कि हमनियों के केन्द्र बना दऽ ना तऽ केन्द्र के तोड़ देब जा. माने हाशिया के प्रतिकेन्द्र बना देब जा. ई जवन प्रति के भाव हऽ, प्रतिरोध, प्रतिकार, प्रतिघात, प्रतिसंस्कृति ई बहुत दूर तक साथ ना देबेला. ई सत्ता के आंख से, ओही के भाषा में दुनिया के देखेला. केन्द्र के तोड़ के एगो अउर केन्द्र बना देला से का हो जाई. लोक दर्शन हमनी के सिखावेला कि प्रकृति के साथ चलीं अउर अर्जन ना विसर्जन सीखीं. प्रवृति ना निवृति के ओर कदम बढ़ाई काहें कि प्रवृति के कवनो अंत नइखे. कूड़ा मत फैलाई. जेतना पृथ्वी माई से ले रहल बानीं ओतना ओकरा के लवटइबो करीं, ना लवटा सकेली त कम से कम जइसन बा ओइसन रहे दीं (ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया) ताकि संतुलन बनल रहो. ई सही बा कि लोक में बहुत रूढि आ गइल बाड़ी सऽ बाकिर असल में ई सामूहिकता के दर्शन पर चलेले आ लोक-परंपरा, लोभ के छोड़ के साझापन अंउर सहअस्तित्व के बात करेले. व्यक्ति ना समूह, टकराव ना सौहार्द. एक के फायदा माने दूसरका के नुकसान बा, ई सोच तथाकथित विकसित लोग बनावले बा. इंसान अउर प्रकृति एक दूसरा के दुश्मन ना दोस्त हऽ.

आ मान लेहीं रउआ कार, बंगला, जहाज सब पा लेहनी, का हो जाई एह से? बहुत जादा आधुनिक आ विकसित बन के रउआ का कर लेब? बड़का महान बनके रउआ का कऽ लेब? रउआ पेड़ के बिना रह जाइब? मधुमक्खी के बिना रह जाइब? दूब अउर च्यूंटी के बिना रह पाइब? आदमी के बिना ई सब लोग रह जाई. कई लाख साल ई लोग बिना इंसान के रह चुकल बा. रउआ 10 मंजिला महल के आखिरी मंजिल गिरा दीं, भवन बांचल रह जाई बाकिर विकास के नाम पऽ हमनीं के लगातार नींव गिराके महल बचावे के सपना देख रहल बानीं जा ओकरा के पूरा करे में लागल बानीं जा. एगो कवि लिखले बाडे़ –
जवन सरकार सब बाघ बचावे का दावा करत बाड़ी स
ऊ झूठ बोलत बाड़ी स
काहें कि ऊ घास के बारे में चुप बाड़ी स
घास बची तब बाघ बचिहें स.

लोक के सीधा-सादा जीवन बा आ ओतने सहज दर्शन बा, कि समूह के साथे रहीं, प्रकृति के साथे रहीं, खूब मेहनत करीं, नीमन नींद लीं आ गायीं, बजायीं, उत्सव मनायीं, जन्म के उत्सव, मृत्यु के उत्सव, पेड के उत्सव, नदी के उत्सव यानी जीवन के उत्सव.

‘उतनी दूर मत व्याहना बाबा’ कविता में एगो आदिवासी कवयित्री निर्मला पुतुल लिखले बाड़ी –
ओइसन हाथ में मत दीहऽ हमार हाथ
जवन हाथ
कबो कवनो पेड़ ना लगवले होखे.

त आईं सभे, तनी आपन-आपन हाथ देखल जाव. हमनी के हाथ साफ बा आ कि आधुनिकीकरण आ विकास के चक्कर में मामला गड़बड़ गइल बा. हम व्यक्तिगत रूप से महसूस कर रहल बानीं कि हमार हाथ बहुत गंदा बा, बुझाला जइसे कि खून से लिथड़ल बा, तबो जादातर लोग के लागेला कि हम विकसित अउर आधुनिक हईं.
(भोजपुरी दिशाबोध के पत्रिका ‘पाती के 78 वां अंक’ से साभार)


हिन्दी विभाग, गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय,
गाँधीनगर-382030

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