Ram Raksha Mishra Vimal

– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल

चाहे शहर होखे भा गाँव आ गाँव में त अउरी, सावन के महीना आवते शुरू हो जाला लइकन के कबड्डी, खो-खो, चीका आ फनात के मजदार खेल. शहर-ओहर में त लइकियो ईहे गेमवा खेलेली सन बाकिर गाँव अबहिंयो एगो परंपरा का साथे आनंद लेत लउकेला. गाँव में अलग-अलग समूह में लइकी झुलुहा झूलेली सन आ झूलत-झुलावत गावतो रहेली सन. अक्सर सावन में ओह घरी जवन गीत अनासे मुँह से निकलेला आ सुर में सुर मिलत चलि जाला ऊहे सबसे मनोरम लोकगीत हटे- कजरी. कजरी गा-गा के जब झुलुहा खेलाला त ओकरा के ‘कजरी खेलल’ कहल जाला. ईहे कारन बा कि कजरी के गीतन में सावन के हरियाली, रिमझिम बरखा के फुहार से भींजल मन-प्राण, नवहिन का सङही बुढ़ियनो के उछाह आ मधुर छेड़छाड़वाली बातचीत के सरसता के खूब दरशन होला.

RadhaKrishna-SawanKeJhule
भारत के हर भाषा में अलग-अलग छंद आ अलग-अलग रूप में लोग एकर आनंद लेला बाकिर भोजपुरी के बाते कुछ अउर बा. खाली झूले के बेरि ना, कबहुँओ राह चलत कजरी के सुर रउँवा कान में चलिए जाई. चाहे चाउर बीनेके होखे भा दालि छाँटेके होखे, तरकारी छिलात होखे भा रोटी बेलात होखे- कजरी के राग घर के केहूँ सदस्य एक बार कढ़ा दिहल त बिना कवनो अवरोध के अब खिलले रही ऊ, चलते रही ऊ.

ओइसे त एह गीतन का बर्णन के ज्यादातर विषय पति-पत्नी के प्रेम होला आ नायिका के विरह के बहुत मार्मिक चित्रण एहमें पावल जाला बाकिर साइते कवनो विषय होई, जवन कजरी से बाँचल होई काहेंकि सावन के मनभावन महीना में सोच-विचार करे के मोका खूब मिलेला. अधिकतर संवादे में खिलेले भोजपुरी कजरी. अब सुनीं एगो ननद-भउजाई के बातचीत. भउजाई ननद से पूछतारी कि आहो ! ई त चारो ओर से बादरि घेरि लिहलसि. अइसना में हम कजरी खेले कइसे जाइबि ? ननद जबाब का देतारी, उनकर डर खुलिके सामने आ जाता– “ए भउजी तू त अकेलही कजरी खेले जातरू, कवनो सखियो सहेली तहरा सङे नइखे. जो रास्ता में तोहराके गुंडा घेरि लीहें सन तब का करबू ?” अब तनी भउजी के दबंगई देखीं. जवाब देतारी कि जो अइसन भइल त कतने लोग गोली खइहें, कतने फाँसी प चढ़ि जइहें आ कतने लोगन के जेल में चक्की पीसे के परी. माने हमरा के छुअला के खेलवाड़ जनि बूझऽ. एकरा के झूठी फायर माने के भूल मत करे केहू, भोजपुरिहा लोगन के ई दबंगई नीक लागेले आ सूटो करेले उनुका.

कइसे खेले जाइबि सावन में कजरिया
बदरिया घेरि आइल ननदी.
तू त चललू अकेली, केहू संगे ना सहेली
गुंडा घेरि लीहें तोहरी डगरिया.
बदरिया घेरि आइल ननदी.

केतने जना खइहें गोली, केतने जइहें फँसिया डोरी
केतने जना पीसिहें जेहल में चकरिया.
बदरिया घेरि आइल ननदी.

जेठ के तपन का बाद किसान के प्रान के आधार होले करिया बादर, जे पानी बरिसावेले. रात में करिया बदरिन के देखिके एगो सखी अपना दोसरा सखी से अपना खुशी के इजहार करतिया-
सखि हो कारी बदरिया रात
देखत निक लागे ए हरी .
गड़ गड़ गरजे, चम चम चमके
सखि हो झम झम बरसे  ना .

एगो अउरी अपूर्व दृश्य देखल जाव. खेत का कियारी में मरद भींजिके खेतिहर के जिम्मेवारी निभावता आ ओकरा मेहनत से निखरल सुंदरता मेहरारू से कजरी गवावतिया.
रिमझिम बरसेले बदरिया,
गुइयाँ गावेले कजरिया
मोर सवरिया भींजे ना
ओही धनवा के कियरिया
मोर सवरिया भींजे ना.

खाली खुशिए ना, बिरहो के दुख कम ना लउके कजरी में. सावन के महीना आइल बा बाकिर अइसनो मेहरारू बाड़ी सन जेकरा ना त दिने में नीक लागता नु रातिये खा. एगो मेहरारू के मरद ओकरा खातिर नथिया ले आवे के वादा कइके परदेश चलि गइल बा. एही बीच सावन के महीना आ गइल. ओकर मनोदशा देखिके केकर आँखि लोर से ना भरि जाई ?
नथिया का कारन हरि, मोरे उतरि गइले पार
रतियाँ सेजिया हइ अकेली दिनवाँ बतियों ना सोहाई.
एक त राति हो बड़ी, दूसरे सैंया बिछुड़ी,
तिसरे सावन के महिनवाँ झम झमकावै बदरी.

एगो मेहरारू त अङना में बरखा होत देखिके अतना बेचैन हो जातिया कि खाली मरद के अइला के समाचार सुनवला पर अपना हाथ के कंगन इनाम में देबे खातिर तेयार हो जातिया-
बड़े बड़े बुनवा रे बरिसेला सवनवा
अरे केहू ना कहेला हमरा, हरि के अवनवा रे.
जे मोरा कहिहें रे हरि के अवनवा रे
ओके देबो हाथ के कंगनवा रे.

पहिले बाल बियाह के प्रथा रहे एह्से बियाह का बाद बहुत देर से गवना (वधूप्रवेश) होखत रहे. कई बेर एकरा पाछा गरिबियो कारन रहत रहे. हमेशा साथ रहला का कारन माई-बाप एह बात से अनभिज्ञ हो जात रहे कि ओकर बेटी जवान हो गइल बिया आ अब जवने बा ओही में ओकर बिदाई कर देबेके चाहीं. अइसना में एगो बेटी सावन के महीना अइला पर अपना प्रियतम का घरे जाइल चाहतिया आ लाज-लेहाज छोड़िके बाबूजी से गवना करे के कहतिया-
हरि हरि बाबा के सगरवा मोरवा बोले ए हरि.
मोरवा के बोलिया सुनि के जियरा उचटले

हरि हरि कइ द बाबा हमरो गवनवा ए हरी.

एह पर बाबूजी के सहज जबाब सुनिके लागता जइसे संतान कतनो बऽड़ काहें ना हो जाई माई-बाप खातिर ऊ बच्चे रही. ऊ बेटी के मनोदशा के समुझि नइखन पावत. बाकिर ईहे ह जवानी के बेग आ सावन के उद्दीपन के परिनाम कि लइकी पलटिके अइसन रूखर जबाब देतिया कि सुनिके कवनो माई-बाप के होश उड़ि जाई.
असो के सवनवा बेटी खेलि ल कजरिया
हरि हरि आगे अगहन, करबो तोर गवनवा ए हरी.
आगि लागो बाबा आगे के अगहनवा
हरि हरि समइ बितेला नइहरवा ए हरी.

एगो कम उमिरि के मेहरारू के मरद घर छोड़िके परदेश चलि गइल बा. ऊ दरजी किहाँ गइल बिया. ओकरा लइका से चोली सियावत कहतिया कि सोना के थरिया में खाना कढ़ले रहीं बाकिर हमार स्वामी बेगर खइलहीं बंगाल चलि गइले. ऊ ओकराके समुझावतिया कि हमरा पर डीठि जनि गड़ाउ (ना त एकर परिनाम भोगे खातिर तेयार रहु.).
सोने के थाली में जेंवना परोसलों, जेवना ना जेवे.
हरि मोरा चलले बाँगाला..
दर्जी बेटवना चोलिया सियवली, डिठिया जनि लगाऊ.
मोके लरिका रे गदेलवा, हरि छोड़ि गइले ना..

साँच मानीं त कजरी लोक संस्कृति के जऽरि (सोरि) हटे. भलहीं बरखा का गीत का रूप में ई प्रसिद्ध बिया बाकिर ई लोकरंजन का सङही लोकजीवन के हर पहलू में सामाजिको चेतना के अलख जगावे के काम कइले बिया. बेगर हिचकले कहल जा सकता कि कजरी खाली राग-विराग भा संयोग-वियोग के लोकगीतन तक सीमित नइखे, बलुक एकरामें समसामयिको विषयन के बखूबी देखल जा सकता.

1857 का क्रांति में जवना जीवित लोगन से अंग्रेजी हुकूमत के ढेर खतरा बुझाइल, ओकराके कालापानी के सजाइ दे दिहल गइल. ओह घरी एगो ‘सुंदर’ नामक वेश्या (जे भोजपुरी के कवयित्री भी रही) के बचावेवाला एगो दबंग नायक ‘नागर’ के कालापानी के सजाइ भइल. उनुकर लिखल ई कजरी लोक में बहुत प्रसिद्ध भइल, घरे-घरे गवाए लागल-
आरे रामा नागर नैया जाला कालापनिया रे हरी
सभके त नैया जाला कासी हो बिसेसर रामा
नागर नैया जाला कालापनिया रे हरी
घरवा में रोवे नागर,
भाई ओ बहिनियाँ रामा
सेजिया पे रोवे बारी धनिया रे हरी.

आपन मए सुख छोड़िके एगो नायिका देश के सेवा खातिर जोगी बने के तेयार बिया. ऊ कहतिया कि हम घर-घर जाके देशभक्ति के उपदेश करबि आ एह तरह से हम अपना जीवन के सुफल बनाइबि.
जो पिया बनिहें रामा देसवा लागि जोगिया
हमहू बनि जइबों तब जोगिनिया ए हरी.
देसवा के नदिया रामा सोइबो अरू जगइबो
देहिया में रमइबो भल भभुतिया ए हरी.
जहवाँ–जहवाँ जइहें रामा हमरो रावल जोगिया
सथवा-सथवा डोलबि भरले झोरिया ए हरी.
भुखिया पिअसिया रामा तनिको ना लगिहें
बजर बनाइब आपन देहिया ए हरी.
घरवा घरवा जाइ रामा करबि उपदेसवा
सुफल बनाइबि हम जिनिगिया ए हरी.

देश-प्रेम में एगो मेहरारू स्वराज के स्थापना खातिर देश भर में अलख जगावे के बात करतिया, गाँधीजी के हुकुम माने के बात करतिया.
सावन भदउवा बरिसतिया के दिनवा रामा
बइठि के चरखवा घरवा कातबि ए हरी.
अपने त कतबो और सखिया से कतइबो
गाँधी के हुकुमवा हम मानबि ए हरी.
खोलि देबि घरवा में चरखा इसकुलवा
सब के हम चरखा सिखाइबि ए हरी.
अपने नगरिया हम त करब सुरजवा
देसवा में अलख जगाइबि ए हरी.

स्वतंत्रता का लड़ाई में सभे चाहत रहे कि ओकरो घर के लोग एह संग्राम में आपन आहुति देसु. अइसना में ओह घरी के मेहरारू घर में बैठल नवजवानन के कजरी का माध्यम से व्यंग्य करत खूब प्रेरित कइली सन-
लागे सरम लाज घर में बइठि जाहु
मरद से बनिके लुगइया ए हरी
पहिरि के साड़ी, चूड़ी, मुँह लुकवाई लेहु
राखि लेइ तोहरी पगरइया ए हरी.

साँच कहीं त कजरी लोकगीते ना एगो उत्सवो ह. एहमें रिश्ता खनकेले सन, अँखिया बरिसेली सन, ओठ तरसेले आ सरसेले, जियरा धड़केला, मनवा लहरेला, पोर-पोर में संगीत समा जाला आ अङना का सङही बागो बगइचा परम मनोहर प्रेम का एहसास से बउरा जाला. धरती पर जबले हरियरी बाँचल रही, कजरी लिखात रही, कजरी गवात रही, कजरी जियात रही.

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