गोत आ गोतिया के चरचा (बतकुच्चन – 186)

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बात धरमपत्नी से बढ़ के गोत्र आ कुल खानदान पर आ गइल बा. एगो गोत के लोग दोसरा गोत के उपद्रवियन के गोतिया का बता दिहल कि सामने वाला बात के ले उड़ल आ ओकरा के अपना जाति के अपमान बतावे लागल. थोड़ देर ला हमहू चकरा गइनी कि गोत्र भा गोत जाति कइसे हो गइल. जाति आ गोत में एगो बहुते बड़ फरक होला आ ओकरा के जानल-बूझल जरूरी बा.

हमनी का समाज में शादी-बियाह जाति का भीतर होला बाकिर गोत में शादी-बियाह वर्जित होला. एक गोत में शादी सामाजिके रूप से गलत ना होखे वैज्ञानिक आ चिकित्सकीय कारणो से एकरा के वर्जित मानल जाला. हालांकि दुनिया में बहुते अइसनो समाज बाड़ी सँ जहाँ एके गोत में शादी गलत ना मानल जाव. बाकिर ओकर परिणाम अनेके तरह के बेमारियन का रूप में सामने आवेला आ अब ओहू समाजन में एकरा से बचे के राय दिहल जाए लागल बा. त गोत आ जाति में सबले बड़का अन्तर त इहे सामने आ गइल आ ई कवनो छोड मोट अन्तर नइखे.

बाकिर अतने पर बात खतम नइखे होखे वाला. हमनी का भोजपुरिया समाज में एक गोत्र वाला लोग अपना के गोतिया मानेला आ एके परिवार के भाईयन के मेहरारू एक दोसरा के गोतिनी कहेली. यह इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लीजे कि एक आग का दरिया है ओर डूब के जाना है. गोत आ गोतिया में गोता लगाएब त तय मानी कि गोता जाएब. अब एह गोतइला के चलते लोग रउरा के गोताइल- बोथाइल बता देव त कवनो अचरज ना. सीजन फगुआ के आइए गइल बा आ एह मौका पर लोग एक दोसरा के गोते में तनिको गुरेज ना करसु. बाद मे भले सामने वाला गोत्रोचार करे लागे. आ कुछ अइसनो लोग होला जे गोता लगावे में माहिर होला आ ओह लोग के पानी के भीतर डूबल चीज के खोज निकाले खातिर बोलावल जाला. एह लोग के गोताखोर कहल जाला. गोता लगा के आपन जीवनयापन करे वाला, खर-खोराकी चलावे वाला आदमी गोताखोर हो जाला, जइसे हराम के कमाई खाए वाला के हरामखोर कहल जाला. अब बतकुच्चन करे खातिर कह सकीलें कि हरामखोरी त होला बाकिर ईमानखोरी ना होखे. काहें कि शायद ईमान से खोराकी ना चल पावे आजु का जमाना में. भा इमान से खोराकी चलावल सामान्य होला आ एकरा ला कवनो विशेषण बनावल जरूरी ना लागल हमनी के पुरनियन के.

बाकिर गोत भा गोत्र आखिर बनल कइसे ? बात एह बतकुच्चन खातिर मिलल जगहा में एक बेर में ना कहल-बतावल जा सके. एह बात के पुरावे में अनेको कड़ी लाग सकेला. बाकिर ओतना गहिरा में गोता लगावे के जरूरत ना पड़े के चाहींं हमनी के. गोत भा गोत्र से वंश भले बनल होखो बाकिर हर गोत्र वंश ना होखे. हिन्दू जाति व्यवस्था में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आ शुद्र चार गो वर्ण मानल गइल बा. एहमें से ब्राह्मण लोग के वंश त सही में गोत्र होला बाकिर बाकी वर्णन के गोत्र वंश ना हो के विश्वविद्यालय माने के चाहीं. गोत्र हर वर्ण में होखेला. सभकर गोत होला, सभकर गोतिया भा गोतिनी होले. ऱउरा सभे एक हफ्ता एह गोत में गोता लगावत रहीं, हम त अगिला बेर गोता लगावे आएब. तबले गोता मार जात बानी!

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