गोलबंदी, गठबन्हन आ कि गिरोहबन्दी (बतकुच्चन 169)

admin
लागत ब कि मउराइल लोग फेरु मउराइल हो गइल बा. जान में जान आ गइल बा. कहल जात बा कि दहाड़त शेर प काबू पा लिहले बाड़े जंगल के सियार लोमड़ी आ मूस. बस अब तनिका जोर लगावे के बा आ शेर के बाहर क दिहल जाई. आ हम सोचत बानी कि एह गठजोड़ के का कहल जाव, गोलबंदी, गठबन्हन आ कि गिरोहबन्दी? एह ला सब से पहिले त गोल, गठ आ गिरोह के समुझे के पड़ी. तीनो टोली हईं सँ. छोट छोट गठ मिलला से बनल दल का सामने विकल्प होला कि उ गोल बनी कि गिरोह. दुनू कवनो ना कवनो मकसद से बनावल जाला. राजनेता आ खिलाड़ी गोल बनावेले बाकिर चोर डाकू गिरोह. गोल के मकसद होला कुछ पावल आ गिरोह चाहेला कुछ छीनल. करे के कुछ ना कुछ दुनू में पड़ेला. पावे वाला गोल आपन मकसद पुरावेला कुछ नया क के. सभका ला कुछ दे के अपनो ला पा लिहल ओकर चाह रहेला. जबकि गिरोह कुछ बनावे ना, उ त बस दोसरा से छीन के अपना खातिर ले लेला. देखे सोचे के जरूरत सभका बा कि देखे कि उ गोल का साथे जात बा कि गिरोह के.

एगो दोसर फरक जवन हमरा लागेला एह गोलबंदी, गठबन्हन आ गिरोहबंदी में उ ई होला कि गोलबंदी में सभे आपन मकसद पुरावे ला मिल जुल के काम करेला. ओहिजा भले केहू नेता होखे, राय सभकर सुनल-मानल जाला. गठबन्हन में अलग अलग गठ के गठनायक आपस में मोल-तोल, कुछ ले-दे के गठबन्हन क लेलें आ एहमें हर गठनायक के सत्ता होला जे अपना अपना गठ के सम्हार के राखेला, बिदके ना देेव. गिरोहबंदी में एह दुनू से अलग एक आदमी के सत्ता होले आ ओकर राय माने ला सगरी सदस्य मजबूर होलें. एगो गठबन्हन मरद आ मेहरारू का बीचहूँ होला शादी का नाम पर. हमनी के संस्कृति में एह गठबन्हन के बहुते पावन पवित्र मानल जाला आ भलही सब कुछ बिला जाव गठबन्हन टूटे ना दिआव. शादी के अइसन व्यवस्था दोसरा कवनो जगह देखे के ना मिले. बहुते जगह त सुतला में खर्राटा भरला का चलते तलाक ले लिहल जाला आ ओहिजा के कोर्टो मान लेले कि हँ ई त बहुते बड़ अत्याचार बावे संगे वाला प आ ओकरा एह अत्याचार से मुक्ति पावे के पूरा हक ह.

गँवे-गँवे अपनो देश में आपन संस्कृति भुला के दोसरा संस्कृतियन के कबाड़ बिटोरे के चलन बढ़ल जात बा. एकरा पीछे राजनीति के नीयत में आइल खोट बा. देश के आजाद भइला का बादे से कवनो ना कवनो बहाने हर ओह बात के बदले के कोशिश होत आइल बा जवन भारतीय संस्कृति के कमजोर कर सके. आ एहमें मिल गइल बाड़े आजु के मीडिया वाले. अधिकतर मीडिया के मलिकानन के भारत के धन से मतलब बा, भारत के मन से ना आ जे थोड़ बहुत भारतीय हित के मान राखे का नाम पर बड़लो बा त उहो सियार के हुँआ हुँआ में मिला के बोले में लागल बा कि फरका मत पड़ जाव. पिछला सरकार में सरकार के बोली बोले वाला मीडिया खुश रहे काहे कि ओकरो भरपूर माल मिलत रहे दाबे खातिर. बाकिर जब से सरकार बदलल तबसे खुराक मिलल बंद हो गइल बा आ ई लोग मउरा गइल बा.

एही मउराइल से हम आपन बतकुच्चन शुरू कइले रहीं आ एही पर खतमो करे के इरादा बा हमार. मउराइल कहल जाला जब कवनो फल भा सब्जी सूख के सिकुड़ जाला. आ ओहू के मउराइल कहल जाला जवन मोजर निकलला का बाद के स्थिति होला पेड़न के. आखिर मउर के बाति ह? दुलहो का माथे मउर चढ़ल होला त उ चहकत रहेला. ओकरा मालूम ना रहे कि हो सकेला कि मउराए के समय आवत बा आगा. बाजऽ ए बाजा बाजऽ, अनका के घर बाजऽ. एक बेर बजलऽ हमरा घर, हम जोतीं अनका के हर!

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