जो सहाय रघुबीर (बतकुच्चन 171)

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ना नीमन काम करे ना दरबारे ध के जाव! बतकुच्चन लिखे बइठल रहीं त इहे कहाउत ध्यान में रहल. लिखे के कुछ अउर रहल बाकिर मन में कुछ दोसरे सवाल उठे लागल. अधिकतर कहाउत का पीछे कवनो ना कवनो कहानी रहल बा. आ ओह कहानी के शीर्षक भा मथैला बाद में कहाउत बन के रहि गइल. कहानी त लोग भुला दिहल बाकिर कहानी के मथैला ना भुला पावल. एगो नौकर अपना मलकिनी के शिकायत से परेशान रहे. कुछु करे कवनो ना कवनो दोष निकाल दिहल जाव ओकरा में. खास क के दूध अँउटावे का मामिला में. त एक दिन अँउजिया के तय क लिहलसि कि ना अँउटेब, ना पउढ़ेब, ना दही जमाएब. दूधवे उठा के पी जाएब, एके शिकायत रही. ना खउलावे के झंझट, ना गाढ़ करे के, ना दही जमाए के. अइसहीं एगो कहाउत ह कि घोड़ा के पिछाड़ी आ साहब के अगाड़ी खड़ा ना होखल जाव. काहे के लात खाए के पूरा इंतजाम रहेला. घोड़ा के आदत ह पिछला दुनू लात उठा के पीछे मारे के. आ साहब-मलिकार लोग के आदत होला सामने खड़ा आदमी के हमेशा कवनो ना कवनो काम ओर्हावत रहे के भा कवनो काम ला डाँटत रहे के. अब पता ना कामचोरी करे खातिर अतना कहाउत कइसे बन गइली सँ. दास मलूको के कहना रहे कि अजगर करे ना चाकरी, पंछी करे ना काम, दास मलूका कहि गए, सब के दाता राम. आजु का जमाना में अइसने रामराज के वेलफेयर स्टेट कहल जाला. एहिजा आदमी के जवाबदेही ना मानल जाव कि उ अपना जीविका ला काम करो, ई जवाबदेही सरकार पर डालल रहेला कि उ सभकर चिंता करो, सभका ला जिए-खाए के इंतजाम करो. आ स्वाभाविक रूप से सगरी देहचोर अइसने व्यवस्था के हिमायत करेलें. करजा ले के पचा जाईं बाद में कवनो ना कवनो सरकार ओह करजा के माफ कराइए दी राउर वोट पाए खातिर. आ अइसन व्यवस्था शायद ओहू घरी रहल जब रहीम कवि लिख गइलन कि रहिमन पंछी के पिए घटे ना सरिता नीर, दान किए धन ना घटे जो सहाय रघुबीर. अब दान माँगे खोजे वाला लोग एह बात के खूब दोहरावेला बाकिर तनिका सावधानी का साथ. उ लोग सचेत रहेला कि राउर धेयान एहमें कहल – जो सहाय रघुबीर – पर मत जाव. दान-पुन्न-मस्ती में धन लुटावे वाला के ई सोच के ना राखे के चाहीं कि रघुबीर सरकार ओकर मदद करे आइए जाई. ई त ओह रघुबीर पर निर्भर बा कि उ रउरा सहायता में आओ कि ना! हमेशा का तरह आजुओ बतकुच्चन बहक गइल. ना नीमन काम करे ना दरबारे ध के जाव वाला कहाउत दोसरा संदर्भ में मन पड़ल रहे. बाकिर अब लागत बा कि ठीके भइल. काहे कि जवन कहे के मन रहे ओकरा में एगो खतरो रहे. सँईया अस कहीं त नतवे टूटे, भईया अस कहीं त सेजिए छूटे! साँच कहीं आ सभका चित से उतरल रहीं. त आजु नौकरिए पर बतियावल जाव. नौकरी का बारे में एगो कहाउत ह कि नोकरी के आमदनी तरकुल के छाँह. पुरनका लोग नोकरी के हेय मानत रहे. तब के लोग अपना गिरहस्थी में अपना जातिगत पेशा में जुड़ल रहत रहे. काहे कि ओहमें ना त मालिक के डर रहत रहे ना रिटायर होखे के. जब ले जाँगर तब ले काम. बाकिर अब त नोकरी करे वाला के मान बढ़ गइल बा खास कर के अगर केहू सरकारी नौकरी में होखो. एगारह बजे ले लेट ना एक बजे भेंट ना. खेतीबाड़ी आ जातिगत पेशा के काम से अब परता नइखे पड़त. कल कारखाना खुलल त पहिला चोट कारीगर, लोहार, कोहार, ठठेरने पर पड़ल. घड़ीसाज आ फोटो खींचेवालन के धंधा मोबाइल पी गइल. मोबाइल अइला का बाद घड़ी काम के चीझु ना रह गइल. देखावे के, सिंगार के चीझु बन के रहि गइल. बाॅल पेन आइल त कलम के चलन खतम हो गइल. लिखनिहारो लोग अब कलम से कम, अंगुरी से अधिका लिखे लागल बा. की बोर्ड अंगुरिए से नू टपटपावल जाला. अब चलत चलत ओह बाति के कहिए जात बानी जवन कहे चलल रहीं. सराहल बिटियवा नीच घरे जाली. केहू के ढेर सराहीं मत. का जाने कब ओकर भेद खुले लागे आ इमानदारी के पुतला घोटालाबाजन के माटी से बनल निकल जाव. खैर, खून, खाँसी, खुशी बैर प्रीत मदपान / रहिमन दाबे ना दबे जाने सकल जहान!

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