पिछला हफ्ता लस्टमानंद जी रामचेला से बतियावत में कह दिहले कि बतकुच्चन वाला ओम प्रकाश भाई से पूछल जाई कि “नाच ना जाने आँगन टेढ़” के सही मतलब का होला. जब से उनुकर लस्टम पस्टम पढ़ले बानी तबहिये से माथा घूम गइल बा. का जाने एह कहाउत के, जवना के मतलब दुनु तरफ निकालल जा सकेला, सबले पहिले के कहल. जाने अनजाने ऊ ढेर लोग के जान परान हरान कर के धर दिहलन. जान त परानो के कहल जाला, अपना सबले प्रियतमो के, आ ज्ञानो के बिगड़ल रूप हवे जान. अइसनके एगो अउरी नमूना वाक्य बा जवना में अल्प विराम के जगहा बदलला से मतलब बदलि जाले. जइसे कि “पकड़ऽ मत जाये द”. एकरा में अल्प विराम के जगहा बदल के देखीं, “पकड़ऽ मत, जाये द” आ “पकड़ऽ, मत जाये द.” दुनु के साफे दू गो मतलब निकलऽता. एक दोसरा से उलट. बाकिर “नाच ना जाने आँगन टेढ़” में अल्प विराम कहीं लगाईं कवनो फरक नइखे पड़े वाला. हर बेर मतलब इहे निकली कि नाच के एह से मतलब नइखे कि अँगनवा टेढ़ बा कि सोझ. ओकरा त बस नाचे के बा. नाच खुशी में होला दुख में ना. आ जब मन मिजाज खुश हो जाव त देश काल समय के ज्ञान कमजोर पड़ सकेला. अइसनका में नाच के दोषी ना ठहरावल जा सके. फेर सोचे लगनी कि अबही ले इहे काहे पढ़ावल गइल कि “नाच ना जाने आंगन टेढ़” के मतलब होला कि नाचे त आवे ना कहत बाड़े कि आंगन टेढ़ बा. हम त लस्टमानंद जी के कहल बात से पूरा सहमत बानी कि नाच टेढ़ आंगन के परवाह ना करे. वइसे एह से मिलल जुलल जवन ठेठ भोजपुरी कहाउत हमरा दिमाग में आवत बा ऊ हवे “करनी ना धरनी धियवा होठ बिदोरनी”. करे धरे कुछ आवे ना बस होठ बिदोरे के बा, दोसरा के कमी देखे के बा. एह हफ्ता हम दोसर कुछ सोचले रहीं. बीछे, बिछल, बिछिलाये के चरचा दिमाग में घूमत रहे. बाकिर लस्टमानंद जी नचा दिहले आ हम भुला गइनी कि दू घंटा के भाषण दू मिनट के भाषण से बहुते आसान होला. दू मिनट वाला में जबले भूमिका बान्हब तबले समयवे खतम हो जाई. बस !

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