Ishu
चलि गइल छोड़ि कवन देसवा हो बाबू,
मिले नाहिं कवनो सनेसवा हो बाबू।।

गोदिये से गइल, अवाक् रह गइनीं
कवनो ना बस चलल, का का ना कइनी
कुहुके करेजवा कलेसवा हो बाबू।।

बबुआ तुँ रहल, एह अँखिया के जोति
तोहरे ला झरेला, नयनवा से मोती
हूक उठे हिया हरमेसवा हो बाबू।।

पलनी आ पोसनी, नहवनी खिअवनी
संगे संगे खेलनी आ संगहीं पढ़वनी
संगहीं सुतवनी विसेसवा हो बाबू।।

तोहर ऊ बतिआ, सुरतिया सतावे
हँसल हँसावल से अधिका रोआवे
परल बाटे प्रान पेसम पेसवा हो बाबू।।

हर एक हुकारी पर, मरलऽ किलकारी
धने धने होत रहली तोहर महतारी
ध लिहली पगली के भेसवा हो बाबू।।

डाँटे फटकारे के दिहल ना मोका
सोचले ना रहनी जे मिली अस धोखा
कठिन बा विधान कइल फेसवा हो बाबू।।

लागल अचक बान, रोग अस धइलस
कवनो उधापन ना फेर काम अइलस
सूझे ना जाये के उदेसवा हो बाबू।।

दवा दारु कवनो कामे ना आइल
पंथ पैथ कइनी सब जवने बुझाइल
तंत्र मंत्र जाप सब झलेसवा हो बाबू।।

अदमी जो पसिझे, हो जाला सहाई
टारे लिखलका ना विधना कसाई
सूने अरदास ना महेसवा हो बाबू।।

ढोवले ढोवाला ना, कान्ह के इ बोझा
बेटा जब चल जालें, बापे का सोझा
तनिको सहाला ना ठेसवा हो बाबू ।।

आखिर में कहलऽ कि बाबूजी बनाईं
टुके टुके हो गइल करेज का देखाईं
बिसरे ना रुप रंग भेसवा हो बाबू ।।

तीज तेवहार दिन खुशी के जो आवे
तोहर इयाद ईशु अधिका रोआवे
घर भर के रहल गनेसवा हो बाबू ।।

दुनिया में आवे से जानी जे जाला
आपन जब जाला मरम तब बुझाला
माने ना मन उपदेसवा हो बाबू ।।

दिनों में सुत जाईं, सपनो में अइबऽ
कब अइबऽ आके तूँ सबके हँसइबऽ
मेटित मुस्कान से कलेसवा हो बाबू।।

लागल बा असरा जे ईशु फिर अइबऽ
बाकिर जब अइबऽ त कइसे चिन्हइबऽ
जिनगी के जे बा उदेसवा हो बाबू ।।

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’

(तिथि – ३१-५-२०१५ )


(पुत्र विछोह में एक बाप के दिल की कराह है यह कविता. उनका ला तोस के दू गो शब्द नइखे मिलत. भगवान उनका के हिम्मत आ ताकत देसु एह दुख के सहे के आ बेटा इशु (स्व. शुभेन्द्र प्रताप सिंह) के आत्मा के शांति मिले, इहे कह सकीलें – संपादक)

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