– भगवती प्रसाद द्विवेदी

हमार नाँव सुनिके
बड़ा ललक से
आइल रहले ऊ मिले
बाकिर भेंटात कहीं
कि हो गइले उदास.

शहर के हमरा
खँड़हरनुमा खपड़पोश घर में
नजर ना आइल
दूरदर्शनी एंटिना के मायाजाल
दूर-दूर ले ना लउकल
वी॰सी॰पी॰ के दर्शनीयता
पीए के दिहलीं हम
फ्रिज का जगहा घइला के पानी
आऊ हो गइलें उदास.ना लउकल उन्हुका
ड्राइंग रूम, बेडरूम
आ डाइनिंग रूम के बँटवारा
चिहा के निररेखलन ऊ
पीढ़ा पर बइठिके जीमे, चटाई पर पढ़े
आ चउकी प सूते के हमार आदत
आ हो गइलन ऊ उदास.

देखलन ऊ
लोकगीतन के चुनिन्दा कैसेट
लोककथा के भारी-भरकम संगरह
किताबन के बेसम्हार अम्बार
पत्र-पत्रिकन के बाढ़
आ देखत कहीं
कि फेरु हो गइलन उदास.

जब हम ना रोवलीं
अपना अभाव-बेबसी के रोना
ढेर टकटोरला का बादो
जब ना लउकल हमरा मुँह पर
कलेस के इचिकियो परिछाहीं
त दुखी देखे के आदी
उन्हुकरा आँखिन से एकाएक
ना भइल बरदास ई लखिके
आ रोवे लगलन ऊ खुदे फफकि-फफकि के.


बचपने से साहित्य सर्जना में विशेष अभिरुचि. हिन्दी भोजपुरी में समान अधिकार से अनवरत सृजन आ देश के तमाम प्रतिष्ठित पत्र प्त्रिका में प्रकाशित आ दूरदर्शन के विभिन्न केन्द्रन से प्रसारित.

प्रस्तुत कविता कवि भगवती प्रसाद द्विवेदी जी के प्रकाशित कविता संग्रह जौ-जौ आगर से

कवि से संपर्क करे खातिर मोबाइल नं 09430600958

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