Eklavya
हिन्दी आ भोजपुरी के सुपरिचित रचनाकार डॉ. गोरख प्रसाद जी ‘मस्ताना’ एक ओर जहवाँ काव्य-मंच पर गेयता आ हास-व्यंग्य परोसे के कला में महारत हासिल कइला के कारन हरदम चरचा का केन्द्र में रहीलें, उहँवें दोसरा ओर इहाँ के गीतन के मस्ती आ गज़लन के रवानियो देखते बनेला. ‘मस्ताना’ जी के पहिलका कविता-संग्रह ‘जिनगी पहाड़ हो गईल’ में बहुवर्णी गीतन, व्यंग्य कवितन का संगहीं गज़लो संग्रहीत रहली स. संग्रह के भूमिका में डॉ. रमाशंकर श्रीवास्तव के ई पाँती अखियान करे लायक रहे – ‘मस्ताना जी के प्रिय विध गीत-गज़ल ह. अपना बात के कलात्मक शैली में परोस के मीठे-मीठे बेनिया डोलावे के कौशल बा एह कवि में. उनकरा एगो मीठ बोल के लालच में केतना दीवाना बोरा के बोरा मरीचा खा जइहें.’

मनुष्यता के पक्ष में ठाढ़ ई कवि मानवीय मूल्यन का क्षरण से कतना घवाहिल बा, एकर एहसास एह पाँती से अनसोहाते हो जात बा –

‘आदमीयत के जब अपहरण हो गइल
जिनगिए के गलत व्याकरण हो गइल।’

मस्ताना जी के कविताई पढ़निहारन-सुननिहारन के भोजपुरी के खाँटी-माटी आ मस्ती में सराबोर करत रहेले. इन्हनीं में सउँसे गँवई परिवेश आ प्रकृति के कुदरती छटा देखते बनेला. इहाँ के हास-परिहास के गुदगुदी आ व्यंग्य का मार्फत चिउँटी काटे के अन्दाज़ नायाब होला. अदमी छोट हो गइल, गाँधीजी से, टुक्का-टुक्का हिन्दुस्तान, भोला बाबा जइसन कई गो व्यंग्य रचना एह बात के सबूत बाड़ी स, जवनन में कवि कबो हँसावे त कबो करुणा जगावे में कामयाब भइल बा. कुल्हि मिला के, कुदरत अउर मनुजता के त्रासद आ जियतार तसवीर उकेरे में ‘जिनिगी पहाड़ हो गईल’ के रचनन के जवाब नइखे.

कवि के अगिला डेग स्फुट काव्य से खण्ड-काव्य का ओर बढ़ल बा. आजु जबकि जिनिगी अइँठाइल आ अझुराइल रसरी नियर गद्य बनि गइल बिया, महाकाव्य के के कहो, प्रबन्ध-काव्य भा खण्ड-काव्यो के सिरिजन टेढ़ खीर हो गइल बा. अइसना स्थिति में खण्ड-काव्य ‘एकलव्य’ के सिरिजना खास माने राखत बा. ओइसे समय-समय पर भोजपुरी में प्रबन्ध्काव्य-खण्ड-काव्य के लेखन-प्रकाशन शुरुआतिए दौर से होत आइल बा, जिन्हनीं में किछु कृति त मील के पाथर साबित भइल बाड़ स. एह परिपाटी के समहुत कइलीं 1957 में ‘कुँवर सिंह’ लिखि के हरेन्द्रदेव नारायण जी. पं. चन्द्रशेखर मिश्रजी 1966 में फेरु ‘कुँवर सिंह’ प्रबन्ध-काव्य लिखलीं. उहाँ के दूगो अउर प्रबन्ध-काव्य के सिरिजन कइलीं – ‘द्रौपदी’ आ ‘भीष्म बाबा’. अविनाश चन्द्र विद्यार्थी जी के लेखनी से जहवाँ 1973 में ‘कौशिकायन’ प्रबन्ध-काव्य फूटल, उहँवें 1984 में ‘सेवकायन’ के रचना भइल. 1980 में दण्डिस्वामी विमलानन्द सरस्वती के प्रबन्ध्काव्य ‘बउधायन’ के प्रकाशन भइल. एह क्रम में प्राध्यापक अचल के ‘महतारीः ममता के मूरति’ (1985) आ डॉ. किशोरी शरण शर्मा के ‘भोर अँजोर नहाइल’ (2010) वगैरह रेघरियावे जोग कृति बाड़ी स. एही ऐतिहासिक कृतियन के परम्परा में ‘एकलव्य’ खण्ड-काव्य के सिरिजना भइल बा.

महाभारत कालीन बेमिसाल महावीर ध्नुर्धर एकलव्य के दलित परिवार में जनम का चलते भलहीं गुरु द्रोणाचार्य चेला ना बनवलन बाकिर ऊ उन्हुकर माटी के मूरत बना के ओकरे सोझा आपन धनुर्विद्या के अभ्यास जारी रखले आ गुरुजी के सबसे प्रिय शिष्य अर्जुनो के पछाड़े में पाछा न रहले. प्रिय शिष्य के वीरता पर कवनो आँच ना आवे, एह से गुरु द्रोण एकलव्य से दच्छिना में उन्हुकर अंगूठा माँगि लिहलन, जवना के ऊ बेहिचक काटि के दे दिहलन. गुरुजी के गुरुत्व दागदार भइल आ एकलव्य के उपेक्षा, अपमान, वीरता आ गुरु के प्रति समर्पण दलित-विमर्श के हिस्सा बनि गइल. समय-समय पर साहित्यकारन के धियान एह दबाइल-कचराइल, प्रतिभा-जीवटता से लबालब भरल पात्र पर गइल आ अधीकांश भारतीय भाषा में एह पर दमदार-यादगार कृति रचइली स.

बाकिर ‘मस्ताना’ जी के ई खण्ड-काव्य भोजपुरी में एह इतिहास-प्रसिद्ध चरित्र पर लिखाइल पहिल खण्ड-काव्य बा, जवन कई माने में पहिले से बनल-बनावल लीखि से अलगा हटिके बा आ खास तौर से बाँचे, मूल्यांकन करे के माँग करत बा. आजु के एह गरदन काट बाज़ारवादी दौर में, जब गुरु-शिष्य सम्बन्ध पर सवालिया निशान लगावल जा रहल बा आ भारतीय संस्कृति-संस्कार पर अपसंस्कृति हावी होत जा रहल बिया, एह खण्ड काव्य के उपादेयता अउर बढ़ि जात बा.

नौ सर्गन में बँटाइल एह खण्डकाव्य के पहिलका सर्ग बा ‘उद्देश्य’ जवना में खण्ड-काव्यकार कृति के गढ़े के मकसद के उद्घाटित करत गुरू आ शिष्य के रिश्ता के पावनता पर भरपूर रोशनी डलले बा. ‘गुरु गुर, चेला चीनी’ पर चेला से बेसी गुरुवे गौरवान्वित होला. कवि के कहनाम बा:

‘चेला जब जग में नाम करे
कवनो जब अजगुत काम करे
त गुरू के हियवा हरसेला
आशीष नयन से बरसेला।

गुरू शिष्य-ज्ञान से हारस जब
माथा से पानी गारस जब
चेला से हार के हरसेलें
नेहिया बदरी बन बरसेलले।’

दोसरका सर्ग बा – ‘द्वापर महिमा’, जवना के तहत भक्त आरुणि के गुरु-भक्ति, किसन-सुदामा के मिताई, कौरव-पाण्डव के कथा, द्रौपदी-चीरहरण आ जुग-जुग में गुदरी के लाल कहाए वाला एकलव्य के चित्रा उकेरल गइल बा. तिसरका सर्ग ‘एकलव्य के परिचय’ के बा, जवना में हस्तिनापुर के जंगल में रहेवाला हिरण्यधनु के बेटा धनुर्धर एकलव्य के द्रोणाचार्य के शिष्य बने के लालसा आ इतिहास-प्रसिद्ध गुरुभक्तन के सरधाभाव से इयाद कइल गइल बा. चउथा सर्ग में गुरु द्रोणाचार्य के त्रासद जिनिगी आ फेरू उन्हुका विश्व-विख्यात भइला के रोमांचक कथा बा – ‘द्रोण’, जवना में कवि के मान्यता बा कि अगर गुरु द्रोण ना रहितन त एकलव्य के गौरवगाथा भला के जानित.

‘इहे ‘द्रोण’ एकलव्य कहानी के कारण
साँच कहीं त भीलपुत्र के जगतारन
रहते ना जे द्रोण त कइसे जग जानित
भीलपुत्र एकलव्य जगत में के बाड़न?’

पाँचवा सर्ग बा ‘गुरुदर्शन’ के, जवना में गुरु द्रोण से शिक्षा पावे खातिर एकलव्य के गोहार, द्रोण के ‘द्विजेतर’ के शिक्षा देवे से इंकार आ मूरत का आगा विद्या सीखिके महाधनुर्धर बने के कथा बा. एगो तसवीर देखीं:

‘बानर भालू बाघ सिंह सब उनकर कला निहारस
जंगलवा के फूल-पात उनके आरती उतारस
गुरु मूरत में सरधा से ऊ अइसन गुन पा गइलें
कुछे दिन में भीलपुत्र जी महाधनुर्धर भइलें।’

छठवाँ सर्ग बा – ‘वन भ्रमण’ के। एह में एकलव्य के अजगुत कला के बखान कइल गइल बा, जब ऊ भूँकत कुकुर के तीरे से मुँहि बान्हि देले रहलें आ अर्जुन-द्रोण सभकर अचरज से मुँह बवा गइल रहे. अगिला सातवाँ सर्ग ‘अउँठा-दान’ के बा, जवना में कवि लीखि से अलगा हटिके ई स्थापना देत बा कि एकलव्य के अमरता दियवावे आ दलित-उद्धार के दियानत से गुरु द्रोण उन्हुकर दहिना अंगूठा दच्छिना में माँगि लिहलन. गुरुजी के मंशा के अभिव्यक्ति आगे के पाँतियन में देखला जाउः

‘गुरुवर द्रोण के संकल्पो में रहे ना घर-परिवार
उनका त बस रहे करे के, आज दलित-उद्धार
एके भाव रहे कि कइसे चेला पाई नाम
भले हमीं ए दुनिया में होईं चाहे बदनाम।’

………..

‘प्रभुजी! हमरा मनसा में का बाटे रउए जानीं
एकलव्य होखस महान, जुग उनकर पढ़े कहानी
एतना गुन, गुरु दहिना हाथ के अउँठा मँगले दान
गुरु के महिमा गड़हा में, चेला हो गइल महान।’

आठवाँ सर्ग ‘उपसंहार’ में कोचिंग-ट्यूशन में बन्हाइल गुरु-शिष्य के नेह-नाता के तार-तार करे वाली बाज़ारवादी सोच पर कवि फिकिरमंद होत कहत बा –

‘गुरु आ चेला के नाता होखत बा आज कलंकित
एक-दोसरा पर दूनों के शंका होखत बा अंकित
कोचिंग आ ट्यूसन में बाड़ें गुरुवर आज बन्हाइल
गुरुकुल शबद कहीं कोना में बाटे आज लुकाइल।’

आखिरी सर्ग ‘निहोरा’ में कवि के दिली निहोरा बा कि गुरुकुल वाला गुरु-शिष्य के पावन नेह-नाता के पुनर्स्थापना होखे आ चेला के आँतर में उहे सेवा-समरपन भाव जोत बनिके बरत रहे, जवन एकलव्य के अमरता दियवावे में अहम भूमिका निबहले रहे.

‘इहे त जनावेला, मनावेला कि गुरुप्रेम
त्याग आ समर्पण अमर बनावेला,
जेकरा में सेवाभाव गुरु के निमित होला
ओकरे बड़ाई जुग-जुग इहाँ गावेला।’

एह खण्ड-काव्य के भाषा में सहजता बा आ बिलकुल सहज ढंग से गम्हीर बात कहे के कौशल कवि में मौजूद बा. शैली में रोचकता आ चुटीलापन रचना के पठनीय बनावत बा आ पनिगर प्रवाह शुरु से आखिर ले मन के बान्हे-बेधे में समर्थ बा. भोजपुरी के खाँटी शब्दन, मुहावरन, लोकोक्तियन के चटख रंग बा, त तत्सम शब्दावली के इस्तेमालो बा. कवि के चूंकि अध्यापन आ शिक्षा से गहिर जुड़ाव बा आ ऊ कवि का संगहीं एगो बेहतर इंसान बा, एह से एह खण्ड-काव्य का जरिए ऊ ई सनेस दिहल चाहत बा कि सउँसे समाज में समरसता आवे आ शिक्षक-शिक्षार्थी का मन में गुरुकुले नियर नेह-नाता फेरू से प्रगाढ़ होखे. एह सनेसमूलक सोचे में ‘एकलव्य’ खण्ड-काव्य के औचित्य आ महत्ता सन्निहित बा. बिसवास बा, एह कृति के स्वागत दरियादिली से होई. कृतिकार डॉ. ‘मस्ताना’ जी के हमार दिली बधाई.

– भगवती प्रसाद द्विवेदी


( गुरू नानक जयन्ती 10.11.2011)

पूर्व महामंत्री, अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन,
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