– संतोष कुमार

अक्कितम अच्युतन नम्बूदिरी के मलयालम रचना (पुल्ककोदि) “फतिंगा” के अंगरेजी अनुवाद के भोजपुरी उल्था :

आगि में कूदि के मरे खातिर
भा आगिये खाए के लालसा में
आगि भीरी जुटान कइ के
दउडल जा रहल बाड़ें छोटहन छोटहन फतिंगा .

आगि में कूद के मरि जाए खातिर त
दुनिया में बुराई होखेला नू ?
आखिर पैदा होते कइसे
भर गइल निरासा.

खाए खातिर त इ जरत आगि
जदी तू इहे सोच रहल बाड़
त फेर निखिलेश्वर के छोड़ के
तोहरा कुछुओ कहे के नइखे .

विवेक पइदा होखे तक अब हर केहू
बिना पंख वाला बनल रहे.

By Editor

2 thought on “एगो अनूदित कविता – "फतिंगा"”

कुछ त कहीं...

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