– ओ.पी. अमृतांशु

Oka Boka

तोर नैना, मोर नैना, मिलके भईले चार.
चलऽ खेलल जाई, ओका-बोका नदिया किनार. 

नदिया के तीरे-तीरे, बहकि बेयरिया.
संघे-संघे उड़ी गोरी, तोहरो चुनरिया.
हियना के डाढ़े-पाते, झुमिहें बहार,
चलऽ खेलल जाई, ओका-बोका नदिया किनार. 

लाली-लाली होठवा से, रस बरिसइह.
हहरल हियरा के मोरा जुडवइह.
नेहिया के सोत फूटी, बही जाई धार.
चलऽ खेलल जाई, ओका-बोका नदिया किनार.

दिलवा के डोर से, पतंग उड़ी आई.  
हौले-हौले छुई के आकाशवा के आई.
छुई-मुई होई तोरी, सोरहो सिंगार.
चलऽ खेलल जाई, ओका-बोका नदिया किनार.

पान-फूल ढोंढीया, जब रे पचकि जाई. 
चुटा-चुटी होई, फेरु कानवा ममोरल जाई.
लाता-लुती करल जाई, नाहिं मानल जाई हार.
चलऽ खेलल जाई, ओका-बोका नदिया किनार.

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कुछ त कहीं...

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