गज़ल

– डा0 अशोक द्विवेदी

DrAshokDvivedi

कुछ नया कुछ पुरान घाव रही
तहरा खातिर नया चुनाव रही ।

रेवड़ी चीन्हि के , बँटात रही
आँख में जबले भेद-भाव रही ।

अन्न- धन से भरी कहीं कोठिला
छोट मनई बदे अभाव रही ।

भाव हर चीज के रही बेभाव
जबले हमनी के ई सुभाव रही ।

एक दिन शहर, भाग के आई
आसरा देबे वाला गाँव रही ।

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